दर्द न करने वाली गांठ पर भी तुरंत ध्यान देना जरूरी हो सकता है
आईआईटी मद्रास और एम्स दिल्ली के एक प्रारंभिक सर्वेक्षण में शामिल 102 महिलाओं में से 75 ने कभी स्तन कैंसर की स्क्रीनिंग नहीं कराई थी। इन 75 में से 45 ने कहा कि उनमें कोई लक्षण नहीं थे। उत्तरदाताओं की औसत आयु 38 वर्ष थी। इससे स्तन स्वास्थ्य को लेकर एक आम गलतफहमी उन वर्षों में सामने आती है जब कई महिलाएं खुद को चिंता करने के लिए बहुत कम उम्र का मानती हैं।
विषय-सूची
- दर्द न करने वाली गांठ पर भी तुरंत ध्यान देना जरूरी हो सकता है
- युवा महिलाओं के बारे में आंकड़े क्या बताते हैं?
- गांठ के अलावा किन बदलावों पर ध्यान दें
- स्वस्थ महसूस करना स्क्रीनिंग में देरी की वजह कैसे बन सकता है
- स्क्रीनिंग कब शुरू करनी चाहिए?
- पारिवारिक इतिहास से व्यक्तिगत योजना बनाने में मदद मिल सकती है
- दूरी, निजता और खर्च से देखभाल में देरी होती है
- असामान्यता का पता लगना सिर्फ शुरुआत है
- इलाज से जीवन बचाने के साथ और भी कुछ संभव है
- देखभाल के लिए समय निकालने में व्यावहारिक मदद जरूरी
- मुख्य बातें
स्क्रीनिंग उन लोगों में कैंसर का पता लगाने के लिए होती है जिनमें कोई लक्षण नहीं होते। नई गांठ, निप्पल में बदलाव या त्वचा में लगातार बना रहने वाला बदलाव चिकित्सकीय जांच की मांग करता है, चाहे महिला नियमित स्क्रीनिंग के लिए सुझाई गई उम्र तक पहुंची हो या नहीं।
भारत में इसका बोझ काफी बड़ा है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और राष्ट्रीय रोग सूचना विज्ञान एवं अनुसंधान केंद्र ने 2020 में महिलाओं में स्तन कैंसर के करीब 200,000 मामले होने का अनुमान लगाया था। 18 अगस्त 2020 को जारी उनकी कैंसर रजिस्ट्री विज्ञप्ति में अधिकांश भाग लेने वाली रजिस्ट्रियों में स्तन कैंसर की बढ़ती दर और स्तन क्षेत्र या आसपास के ऊतकों तक फैल चुके कैंसर का अनुपात बढ़ने की बात भी दर्ज की गई।
पुणे के रूबी हॉल क्लिनिक की रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. मानसी मुंशी कहती हैं कि कैंसर में दर्द होना जरूरी है, इस धारणा के कारण डॉक्टर से मिलने में देरी हो सकती है। उनकी चेतावनी स्पष्ट है:
स्तन कैंसर में हमेशा दर्द नहीं होता और दर्द का इंतजार करने से निदान में देरी हो सकती है।
स्तन की ज्यादातर गांठें कैंसरयुक्त नहीं होतीं। फिर भी, नई या असामान्य तब्दीली की जांच डॉक्टर से करानी चाहिए, न कि महिला को दर्द, उम्र या पारिवारिक इतिहास के आधार पर खुद ही उसका कारण तय करने देना चाहिए। काम, बच्चों और दूसरी जिम्मेदारियों के बीच समय निकालने वाली युवा महिलाओं के लिए वह अपॉइंटमेंट लेना पहला अहम कदम हो सकता है।
युवा महिलाओं के बारे में आंकड़े क्या बताते हैं?
यह दावा अक्सर किया जाता है कि भारत में स्तन कैंसर के करीब आधे मरीज 50 वर्ष से कम उम्र के हैं। इसे 2024 में 200,000 से अधिक निदान के अनुमानों के साथ भी उद्धृत किया जाता है। हालांकि, इस सटीक आयु-अनुपात को पुष्ट करने वाला राष्ट्रीय डेटा इस दावे के साथ नहीं मिला। व्यावहारिक संदेश अधिक स्पष्ट है: रजोनिवृत्ति से पहले भी स्तन कैंसर हो सकता है, भले ही उम्र बढ़ने के साथ इसका जोखिम आम तौर पर बढ़ता है।
डॉ. राजीव अग्रवाल की चिकित्सकीय समीक्षा और 15 अप्रैल 2025 के अद्यतन वाली मेडांटा की स्तन कैंसर संबंधी जानकारी के अनुसार, इसके मामले 50 से 64 वर्ष की उम्र के बीच सबसे अधिक होते हैं। फिर भी युवा मरीजों को यह बीमारी हो सकती है, कभी परिवार की योजना बनाते या बच्चों का पालन-पोषण करते समय।
इंदौर और उज्जैन में सामने आए मामलों में 30, 33 और 35 वर्ष की महिलाएं शामिल हैं। 35 वर्ष की महिला ने पहले स्तन की गांठ को नजरअंदाज किया, लेकिन गांठ बने रहने पर जांच कराई। 33 वर्ष की महिला के मामले में नानी को कैंसर होने के इतिहास के चलते जांच की गई और आनुवंशिक परीक्षण से विरासत में मिला कारण सामने आया।
भारत के आंकड़ों के साथ उनकी तारीख और परिभाषा भी समझना जरूरी है। आईसीएमआर का 2020 में स्तन कैंसर के 200,000 मामलों का अनुमान, दोनों लिंगों में कैंसर के कुल मामलों का 14.8% था। मेडांटा महिलाओं में होने वाले कैंसर के 14% को स्तन कैंसर बताता है, जो एक अलग कुल संख्या पर आधारित है।
- 18 अगस्त 2020: आईसीएमआर और एनसीडीआईआर ने 28 जनसंख्या रजिस्ट्रियों और 58 अस्पताल रजिस्ट्रियों के आंकड़ों पर आधारित अनुमान जारी किए।
- 2023: तमिलनाडु में महिलाओं में कैंसर के 49,225 नए मामले दर्ज हुए, जिनमें करीब हर 10 में से 3 स्तन कैंसर के थे।
- 15 अप्रैल 2025: मेडांटा ने स्तन कैंसर के चेतावनी संकेतों से जुड़ी अपनी जानकारी अद्यतन की।
गांठ के अलावा किन बदलावों पर ध्यान दें
स्तन या बगल में नई गांठ देखभाल लेने का एक अहम कारण है, लेकिन स्तन कैंसर दूसरे बदलाव भी ला सकता है। मुंशी और सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. रितेश तपकिरे महिलाओं को स्तन के रूप-रंग के साथ-साथ उसके महसूस होने के तरीके में बदलावों पर भी ध्यान देने की सलाह देते हैं।
- स्तन, बगल या कॉलरबोन के पास नई गांठ या मोटा उभरा हुआ हिस्सा।
- स्तन के आकार, बनावट या सूजन में अचानक आया या लगातार बना रहने वाला बदलाव।
- त्वचा में गड्ढे, सिकुड़न, मोटापन, लालिमा या संतरे के छिलके जैसी बनावट।
- निप्पल का हाल में अंदर की ओर मुड़ जाना।
- निप्पल से असामान्य स्राव, खासकर खून।
- निप्पल या स्तन की त्वचा के आसपास लगातार पपड़ी जमना, छिलना, जलन या दूसरे बदलाव।
- स्तन या निप्पल में लगातार दर्द, हालांकि कई कैंसर में दर्द नहीं होता।
मेडांटा उन नसों को भी जांच कराने लायक बदलावों में गिनाता है जो स्तन पर नई और उभरी हुई दिखने लगें, और पूरे स्तन में बिना स्पष्ट कारण सूजन को भी। उसकी जानकारी के अनुसार, खासकर बीमारी बढ़ने पर थकान और शरीर में सामान्य दर्द भी लक्षण हो सकते हैं। इन आम लक्षणों के कई संभावित कारण होते हैं; डॉक्टर स्तन में किसी बदलाव के साथ-साथ इनकी भी जांच कर सकते हैं।
मासिक धर्म चक्र, संक्रमण, सिस्ट और दूसरी गैर-कैंसरयुक्त स्थितियां भी स्तन के ऊतकों को प्रभावित कर सकती हैं। स्तनों के सामान्य रूप और महसूस होने के तरीके से परिचित रहने पर नया बदलाव पहचानना आसान होता है। कौन-सी जांच या परीक्षण जरूरी हैं, यह डॉक्टर तय करते हैं।
स्वस्थ महसूस करना स्क्रीनिंग में देरी की वजह कैसे बन सकता है
आईआईटी मद्रास और एम्स दिल्ली के सर्वेक्षण में गांठ पहचानने और दूसरे लक्षणों को पहचानने के बीच अंतर सामने आया। 72.5% उत्तरदाताओं ने गांठ या मोटे हिस्से को पहचाना, जबकि 45.1% ने लालिमा या त्वचा की बनावट में बदलाव पहचाना। केवल 37.3% ने निप्पल या स्तन की त्वचा के छिलने या पपड़ी जमने को पहचाना।
जिन महिलाओं ने कभी स्क्रीनिंग नहीं कराई थी, उनमें से 75 में 45, यानी 60%, ने इसकी वजह लक्षण न होना बताया। शोधकर्ताओं ने सर्वेक्षण को प्रारंभिक बताया और कहा कि चेन्नई की महिलाओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए बड़े नमूने की जरूरत है।
सर्वेक्षण पर काम करने वालीं, वरिष्ठ सलाहकार रेडियोलॉजिस्ट और ब्रेस्ट इमेजिंग सोसायटी ऑफ इंडिया की पूर्व अध्यक्ष डॉ. भाग्यम राघवन बताती हैं कि स्क्रीनिंग उन महिलाओं के लिए होती है जो दिखने और महसूस करने में स्वस्थ हों। लक्षण दिखने के बाद उनका इंतजार करने के बजाय उनकी जांच करना जरूरी है।
स्क्रीनिंग तक पहुंच इस बात पर भी निर्भर करती है कि महिलाएं सेवाओं का लाभ लेने में सहज महसूस करती हैं या नहीं। सर्वेक्षण में शामिल तीन चौथाई महिलाओं ने महिला स्वास्थ्यकर्मी को प्राथमिकता दी। राघवन ने इन जरूरतों के अनुरूप सेवाएं देने की मांग की:
सेवाएं किफायती होनी चाहिए। महिलाओं की पसंद की जगहों पर महिला डॉक्टर और तकनीशियन उपलब्ध हों, और निजता, गरिमा तथा सहजता का ध्यान रखा जाए।
तमिलनाडु के रजिस्ट्री आंकड़े बताते हैं कि पहुंच क्यों मायने रखती है। 2023 में स्तन कैंसर की दर प्रति 100,000 महिलाओं पर 35.6 मामले थी, जबकि गर्भाशय ग्रीवा कैंसर की दर 15.7 थी। यानी स्तन कैंसर की दर दोगुने से अधिक थी। राज्य में महिलाओं में कैंसर के नए मामले 2019 के 42,852 से बढ़कर 2023 में 49,225 हो गए, करीब 15% की वृद्धि।
स्क्रीनिंग कब शुरू करनी चाहिए?
बेंगलुरु के अपोलो कैंसर सेंटर में मेडिकल ऑन्कोलॉजी की वरिष्ठ सलाहकार डॉ. संगीता के. पार्थिबन 40 वर्ष की उम्र से स्क्रीनिंग शुरू करने की सलाह देती हैं। अधिक जोखिम वाली महिलाओं के लिए इसे पहले शुरू किया जा सकता है। इंदौर के सलाहकार मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. प्रांजिल मांडलोई औसत जोखिम वाली महिलाओं को 40 वर्ष के बाद मैमोग्राफी पर चर्चा करने की सलाह देते हैं। स्क्रीनिंग की शुरुआत की उम्र और जांचों के बीच का अंतराल व्यक्तिगत जोखिम और लागू दिशा-निर्देशों के अनुसार तय होना चाहिए।
मैमोग्राम में स्तन के ऊतकों की जांच के लिए एक्स-रे की कम मात्रा का इस्तेमाल होता है। तस्वीरें लेने के लिए स्तन को थोड़ी देर दो प्लेटों के बीच दबाया जाता है। किसी असामान्यता की जांच में अल्ट्रासाउंड मदद कर सकता है और यह युवा महिलाओं या गर्भावस्था के दौरान उपयोगी हो सकता है। अधिक जोखिम वाली महिलाओं की स्क्रीनिंग में चुंबकीय क्षेत्र से काम करने वाला एमआरआई भी शामिल किया जा सकता है।
मांडलोई कहते हैं कि वंशानुगत जोखिम बहुत अधिक होने पर कुछ महिलाओं को 25 वर्ष की उम्र से एमआरआई स्क्रीनिंग कराने की सलाह दी जा सकती है। ऐसा कार्यक्रम विशेषज्ञ की जांच के बाद ही तय होना चाहिए। लक्षणों वाली महिला की जांच किसी भी उम्र में जरूरी है, 40 वर्ष से काफी पहले भी।
प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी द्वारा की जाने वाली क्लिनिकल ब्रेस्ट जांच भारत की सेवाओं का एक और हिस्सा है। टाटा मेमोरियल सेंटर के 151,538 महिलाओं पर किए गए परीक्षण में, मुख्य परीक्षण विश्लेषण के बाद किए गए एक विश्लेषण में 50 वर्ष और उससे अधिक उम्र की महिलाओं में स्तन कैंसर से होने वाली मृत्यु में करीब 30% की कमी पाई गई। सभी उम्र के समूह में कमी करीब 15% थी, लेकिन यह सांख्यिकीय रूप से निर्णायक नहीं थी। 50 वर्ष से कम उम्र में मृत्यु दर में कोई कमी नहीं मिली।
पारिवारिक इतिहास से व्यक्तिगत योजना बनाने में मदद मिल सकती है
बीआरसीए1 और बीआरसीए2 ऐसे जीन हैं जो क्षतिग्रस्त डीएनए की मरम्मत में शामिल होते हैं। इन जीनों में विरासत में मिले कुछ बदलाव स्तन और अंडाशय के कैंसर का जोखिम बढ़ाते हैं। आनुवंशिक परामर्श से व्यक्ति समझ सकता है कि परीक्षण कराना उचित है या नहीं, नतीजों का क्या अर्थ हो सकता है और इसका असर रिश्तेदारों पर कैसे पड़ सकता है।
परिवार में कैंसर का मजबूत इतिहास, खासकर कम उम्र में स्तन या अंडाशय का कैंसर होने पर, इस बारे में चर्चा करनी चाहिए। क्लीवलैंड क्लिनिक में हेमेटोलॉजी और मेडिकल ऑन्कोलॉजी के अध्यक्ष डॉ. जेम अब्राहम भी युवा स्तन कैंसर मरीजों और ट्रिपल नेगेटिव स्तन कैंसर वाले लोगों को उन समूहों में रखते हैं जिनमें वंशानुगत जोखिम की जांच होनी चाहिए।
ट्रिपल नेगेटिव स्तन कैंसर में इलाज तय करने के लिए आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली तीन विशेषताएं नहीं होतीं: एस्ट्रोजन रिसेप्टर, प्रोजेस्टेरोन रिसेप्टर और एचईआर2 प्रोटीन की अधिकता। ट्यूमर में इन विशेषताओं की जांच से डॉक्टरों को दवाएं चुनने में मदद मिलती है।
स्तन कैंसर से निदान की गई कई महिलाओं के परिवार में इस बीमारी का कोई ज्ञात इतिहास नहीं होता। मुंशी और गुरुग्राम के फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट में मेडिकल ऑन्कोलॉजी के प्रधान निदेशक डॉ. अंकुर बहल, दोनों ही सलाह देते हैं कि रिश्तेदार को यह बीमारी हुई हो या नहीं, लक्षणों और व्यक्तिगत जोखिम पर ध्यान देना चाहिए।
गुरुग्राम के आर्टेमिस अस्पताल में सर्जिकल ऑन्कोलॉजी और ब्रेस्ट सर्जरी के प्रमुख डॉ. दीपक झा के अनुसार, शारीरिक सक्रियता, स्वस्थ वजन बनाए रखना, शराब और तंबाकू से बचना तथा स्तनपान कम जोखिम से जुड़े हैं। मांडलोई के मुताबिक, नियमित व्यायाम करने वाली महिलाओं में निष्क्रिय महिलाओं की तुलना में जोखिम करीब 8% से 12% कम होता है। जोखिम घटाने के साथ उचित स्क्रीनिंग और लक्षणों पर तुरंत ध्यान देना भी जरूरी है।
दूरी, निजता और खर्च से देखभाल में देरी होती है
एशियन अस्पताल में मेडिकल ऑन्कोलॉजी के वरिष्ठ सलाहकार और यूनिट III के प्रमुख डॉ. भारत पटोडिया के अनुसार, मैमोग्राफी की सुविधा हर जगह समान रूप से उपलब्ध नहीं है; केंद्र बड़े शहरों और निजी अस्पतालों में अधिक हैं। छोटे शहरों की महिलाओं को लंबी यात्रा करनी पड़ सकती है, निजता सीमित हो सकती है और प्रशिक्षित महिला तकनीशियनों की कमी हो सकती है।
शहरी महिलाओं को अलग तरह की मुश्किलें हो सकती हैं: खर्च, झिझक, रेडिएशन की चिंता, स्तन दबाने के दौरान असहजता और काम या परिवार की जिम्मेदारियों से समय निकालने में परेशानी। आकाश हेल्थकेयर सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल में सर्जिकल ऑन्कोलॉजी के निदेशक डॉ. अरुण कुमार गिरि कहते हैं कि डर और दूसरी जिम्मेदारियों के चलते देखभाल तब तक टल सकती है जब तक बीमारी पास के लिम्फ नोड तक न पहुंच जाए।
पार्थिबन द्वारा उद्धृत आंकड़ों के अनुसार, कर्नाटक में 2023 में स्तन कैंसर के लगभग 14,484 नए मामले और इससे जुड़ी 5,388 मौतें दर्ज हुईं। ये सालाना आंकड़े स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव दिखाते हैं। स्क्रीनिंग के साथ निदान और इलाज की सुविधा जुड़ी होना जरूरी है।
राष्ट्रीय सेवाओं में गैर-संचारी रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम, आयुष्मान आरोग्य मंदिर और आशा कार्यकर्ता शामिल हैं। अब्राहम का कहना है कि व्यवस्थित निमंत्रण, रिमाइंडर और आगे की देखभाल जरूरी हैं, ताकि महिलाओं को जांच से लेकर उपचार तक पहुंचने का स्पष्ट रास्ता मिले।
असामान्यता का पता लगना सिर्फ शुरुआत है
अपोलो के चेन्नई क्षेत्र में रेडियोलॉजी और इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी की क्लिनिकल सेवाओं के प्रमुख डॉ. नवीन ज्ञानशेखरन, जीएलओबीओसीएएन 2024 के नाम से दिए गए अनुमानों का हवाला देते हैं। उनके अनुसार, भारत में हर साल स्तन कैंसर के करीब 237,000 मामले सामने आते हैं और 96,000 मौतें होती हैं। उनका कहना है कि जल्दी पहचान के लिए भरोसेमंद उपचार व्यवस्था जरूरी है, जिसमें इमेजिंग, बायोप्सी, प्रयोगशाला जांच और विशेषज्ञों के फैसले जुड़े हों।
ज्ञानशेखरन का प्रस्ताव है कि 40 से 60 वर्ष की महिलाओं को हर दो साल में मैमोग्राफी के लिए बुलाया जाए। शुरुआत 20 जिलों से हो और तीन साल बाद निदान के समय बीमारी के चरण में आए बदलाव का आकलन किया जाए। यह उनका प्रस्तावित कार्यक्रम है, घोषित राष्ट्रीय स्क्रीनिंग कार्यक्रम नहीं।
उनके प्रस्ताव में मोबाइल सेवाएं, आने-जाने की व्यवस्था, दूरस्थ रूप से तस्वीरों की जांच और हर महिला को देखभाल की प्रक्रिया पूरी करने में मदद देने वाला नेविगेटर शामिल हैं। उनका कहना है कि रेडियोलॉजिस्ट को स्कैन की समीक्षा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता मदद कर सकती है। इसके लिए पहले भारतीय महिलाओं की तस्वीरों से उपकरणों की पुष्टि होनी चाहिए और हर रिपोर्ट पर रेडियोलॉजिस्ट के हस्ताक्षर हों।
पटोडिया कैंसर से जुड़े छोटे आरएनए संकेतों की तलाश करने वाले रक्त परीक्षणों पर शोध की भी चर्चा करते हैं। वे इन्हें शुरुआती पहचान का एक संभावित अतिरिक्त तरीका बताते हैं, जबकि जरूरत के अनुसार मैमोग्राफी और क्लिनिकल जांच जारी रहनी चाहिए। नियमित इस्तेमाल के लिए कोई समयसीमा नहीं दी गई है।
पहले से उन्नत स्तन कैंसर वाले कुछ मरीजों में रक्त जांच की एक और भूमिका है। मांडलोई कहते हैं कि लिक्विड बायोप्सी ट्यूमर से जुड़े आनुवंशिक बदलाव पहचान सकती है और उपचार चुनने में मदद कर सकती है। यहां चिकित्सकीय सवाल यह होता है कि पहले से मौजूद कैंसर के लिए कौन-सी दवा काम कर सकती है।
इलाज से जीवन बचाने के साथ और भी कुछ संभव है
मैक्स हेल्थकेयर में रेडिएशन ऑन्कोलॉजी इकाई की उपाध्यक्ष और प्रमुख डॉ. चारु गर्ग कहती हैं कि उचित मरीजों में रेडियोथेरेपी के बाद स्तन-संरक्षण सर्जरी से मास्टेक्टॉमी के समान नतीजे मिल सकते हैं। स्तन-संरक्षण सर्जरी में कैंसर निकालकर स्तन का अधिकांश हिस्सा बचा रहता है; मास्टेक्टॉमी में पूरा स्तन निकाल दिया जाता है।
रेडियोथेरेपी की योजना ट्यूमर, पहले हुई सर्जरी और मरीज के स्वास्थ्य के अनुसार बनाई जा सकती है। गर्ग जिन तकनीकों का जिक्र करती हैं उनमें गहरी सांस लेकर रोकना भी शामिल है। उपयुक्त उपचार में इससे सांस रोकने के दौरान हृदय की सुरक्षा में मदद मिलती है। सतह के मार्गदर्शन और इमेजिंग से मरीज की सही स्थिति तय करने तथा उपचार देने में भी मदद मिलती है। उपचार के छोटे कार्यक्रमों से पात्र मरीजों को अस्पताल के कम चक्कर लगाने पड़ सकते हैं।
दवाओं का चुनाव भी कैंसर की जैविक विशेषताओं पर निर्भर करता है। हार्मोन थेरेपी उन कैंसरों का इलाज करती है जो हार्मोन संकेतों पर प्रतिक्रिया करते हैं। लक्षित दवाएं ट्यूमर की खास विशेषताओं पर असर डालती हैं, जबकि चुनिंदा मामलों में इम्यूनोथेरेपी प्रतिरक्षा तंत्र को कैंसर पर हमला करने में मदद करती है। मांडलोई कहते हैं कि उचित आकलन के बाद कम जोखिम वाले हार्मोन रिसेप्टर पॉजिटिव ट्यूमर के कुछ मरीज कीमोथेरेपी से बच सकते हैं।
युवा मरीजों को इलाज शुरू होने से पहले प्रजनन क्षमता को लेकर सलाह की जरूरत हो सकती है। इंदौर की 30 वर्षीय महिला को निदान के साथ भविष्य में मातृत्व को लेकर भी सवालों का सामना करना पड़ा। उनकी स्थिति और उपचार योजना के आधार पर अंडाणु या भ्रूण को फ्रीज करना एक विकल्प हो सकता है।
देखभाल के लिए समय निकालने में व्यावहारिक मदद जरूरी
स्तन कैंसर के इलाज के बाद कुछ महिलाओं के लिए गर्भधारण संभव है, लेकिन इसका समय कैंसर के प्रकार, चरण और इस्तेमाल की गई दवाओं पर निर्भर करता है। इलाज से पहले प्रजनन क्षमता पर चर्चा करने से मरीजों और विशेषज्ञों को उसे सुरक्षित रखने के विकल्पों पर विचार करने और कैंसर देखभाल को प्रजनन देखभाल के साथ समन्वित करने का मौका मिलता है।
परिवार और नियोक्ता भी ठोस तरीकों से देरी कम कर सकते हैं। झा के अनुसार, किसी के साथ अपॉइंटमेंट पर जाना, बिना आलोचना किए उसकी बात सुनना और निदान व इलाज के दौरान व्यावहारिक मदद देना उपयोगी है। गिरि का कहना है कि जागरूकता साल भर कार्यस्थलों, रिहायशी समुदायों, आंगनवाड़ियों और परिवारों तक पहुंचनी चाहिए।
जिस महिला को नई गांठ दिखे, उसके लिए तत्काल कदम जांच की व्यवस्था करना है, न कि दर्द का इंतजार करना या यह मान लेना कि कम उम्र उसे सुरक्षित रखती है। बिना लक्षण वाली महिला को अपनी उम्र, पारिवारिक इतिहास और दूसरे जोखिमों के आधार पर उचित स्क्रीनिंग योजना पर चर्चा करनी चाहिए। दोनों ही स्थितियों में ऐसी सेवाएं जरूरी हैं जो किफायती और सुलभ हों तथा असामान्य नतीजे के बाद उपचार तक पहुंच सुनिश्चित करें।
मुख्य बातें
- दर्द न करने वाली गांठ, निप्पल में नया बदलाव, त्वचा में गड्ढे या स्तन में लगातार बना रहने वाला बदलाव किसी भी उम्र में चिकित्सकीय जांच की मांग करता है।
- 102 महिलाओं के एक प्रारंभिक सर्वेक्षण में 75 ने कभी स्क्रीनिंग नहीं कराई थी; उनमें से 45 ने लक्षण न होने की बात कही।
- स्क्रीनिंग बिना लक्षण वाले लोगों के लिए होती है। डॉक्टर 40 वर्ष के आसपास मैमोग्राफी पर चर्चा करने की सलाह देते हैं; अधिक जोखिम वाली कुछ महिलाओं के लिए योजना पहले शुरू हो सकती है।
- परिवार में कैंसर का मजबूत इतिहास या कम उम्र में निदान होने पर आनुवंशिक परामर्श और जांच की जरूरत पड़ सकती है।
- दूरी, खर्च, निजता और महिला स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता से महिलाओं की देखभाल तक पहुंच प्रभावित हो सकती है।
- इलाज ट्यूमर के प्रकार और चरण पर निर्भर करता है। उपचार शुरू होने से पहले प्रजनन क्षमता से जुड़ी चिंताओं पर चर्चा करनी चाहिए।






