निर्यात कारोबार बढ़ा, लेकिन आयात का बिल उससे भी तेजी से बढ़ा
भारत ने जनवरी से सितंबर 2026 के बीच चीन से 125.19 अरब डॉलर के सामान खरीदे, जबकि वहां 19.26 अरब डॉलर का सामान बेचा। इससे व्यापार घाटा 105.93 अरब डॉलर रहा। चीन के सीमा शुल्क सामान्य प्रशासन की 14 अक्टूबर को जारी आंकड़ों के अनुसार, एक साल पहले की इसी अवधि के मुकाबले यह अंतर 20.7% बढ़ा, जबकि भारतीय निर्यात में 40.7% की उछाल आई।
विषय-सूची
- निर्यात कारोबार बढ़ा, लेकिन आयात का बिल उससे भी तेजी से बढ़ा
- निर्यात की तेज वृद्धि के बावजूद घाटा क्यों बढ़ा
- रिपोर्टिंग के दो कैलेंडर और सालाना कुल आंकड़ों में अंतर
- चीनी आपूर्ति भारतीय कारखानों तक गहराई से पहुंचती है
- भारतीय निर्यात में पुर्जे भी, जिंसें भी
- मोदी और शी ने बाजार पहुंच को कूटनीतिक एजेंडे में शामिल किया
- यह संबंध यहां तक कैसे पहुंचा
- खिलौनों में प्रगति, इलेक्ट्रॉनिक्स में गहरी निर्भरता
- चीन का व्यापक निर्यात उछाल दबाव बढ़ा रहा है
- निवेश और औद्योगिक नीति को साथ-साथ चलना होगा
- मुख्य बात
कुल व्यापार 25.4% बढ़कर 144.45 अरब डॉलर पर पहुंच गया। भारत को चीनी निर्यात में 23.3% की वृद्धि हुई। प्रतिशत के लिहाज से यह चीन को भारतीय निर्यात में हुई वृद्धि से कम थी, लेकिन डॉलर में इसकी बढ़ोतरी कहीं अधिक रही। दोनों देशों के संबंध सुधारने की कोशिशों में यह असंतुलन एक केंद्रीय मुद्दा बन गया है। इसमें सितंबर में नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई बातचीत भी शामिल है।
ये आंकड़े वस्तुओं के व्यापार से जुड़े हैं: जैसे मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन और समुद्री खाद्य उत्पाद। व्यापार घाटे का मतलब है कि कोई देश अपने व्यापारिक साझेदार से सामान खरीदने पर उससे सामान बेचकर कमाई गई रकम से अधिक खर्च करता है। चीन के साथ भारत का घाटा चीनी उत्पादों की उसकी भारी मांग और चीन में बिक्री बढ़ाने में भारतीय कारोबारियों के सामने आने वाली मुश्किलों, दोनों को दर्शाता है।
निर्यात की तेज वृद्धि के बावजूद घाटा क्यों बढ़ा
भारत का निर्यात काफी छोटे आधार से बढ़ा। प्रकाशित वृद्धि दरों के आधार पर, जनवरी से सितंबर 2025 के बीच चीन को भारत की बिक्री लगभग 13.69 अरब डॉलर थी, जबकि चीन से खरीद करीब 101.53 अरब डॉलर थी। इस हिसाब से बाद में निर्यात में लगभग 5.57 अरब डॉलर और आयात में 23.66 अरब डॉलर की वृद्धि हुई।
इसलिए भारत की चीन को बिक्री से हुई हर अतिरिक्त एक डॉलर की कमाई के मुकाबले चीन ने भारत को अपनी बिक्री में चार डॉलर से अधिक की बढ़ोतरी की। दोनों बढ़ोतरी का अंतर घटाने पर घाटा लगभग 18.09 अरब डॉलर बढ़ा। यह गणना प्रकाशित आंकड़ों के गोल किए गए मानों पर आधारित है, इसलिए नतीजा अनुमानित है।
2026 के पहले नौ महीनों में द्विपक्षीय वस्तु व्यापार का लगभग 86.7% हिस्सा चीन से हुई आपूर्ति का था। भारत ने चीन से हर 1 डॉलर की बिक्री के मुकाबले करीब 6.50 डॉलर का सामान खरीदा। यही वजह है कि निर्यात में मजबूत वृद्धि के साथ-साथ घाटा भी बढ़ सकता है: व्यापार का बड़ा हिस्सा वास्तविक रकम के लिहाज से तेजी से फैलता रहता है।
रिपोर्टिंग के दो कैलेंडर और सालाना कुल आंकड़ों में अंतर
चीन जनवरी से दिसंबर के कैलेंडर वर्ष के व्यापार आंकड़े जारी करता है। भारत आम तौर पर वित्त वर्ष के आंकड़े देता है, जो अप्रैल से मार्च तक चलता है। कैलेंडर वर्ष 2025 का व्यापार घाटा 116.12 अरब डॉलर बताया गया था। 2026 के पहले नौ महीनों में दर्ज 105.93 अरब डॉलर का घाटा उस रकम का लगभग 91% था, जबकि तीन महीने के आंकड़े अभी जुड़ने बाकी थे।
भारत के 2025-26 वित्त वर्ष के लिए वाणिज्य मंत्रालय के नाम से दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, द्विपक्षीय वस्तु व्यापार 151.1 अरब डॉलर था। इसमें 19.47 अरब डॉलर का निर्यात और 131.63 अरब डॉलर का आयात शामिल था। आयात में से निर्यात घटाने पर घाटा 112.16 अरब डॉलर आता है, जो 2024-25 के 99.21 अरब डॉलर से अधिक है। एक अन्य प्रकाशित आंकड़े में 2025-26 का घाटा 112.6 अरब डॉलर बताया गया है।
प्रकाशित आंकड़ों के एक और समूह में 2025-26 का द्विपक्षीय व्यापार 127.7 अरब डॉलर और घाटा 99.19 अरब डॉलर दिया गया है। एक साल पहले ये आंकड़े क्रमशः 118.39 अरब डॉलर और 85 अरब डॉलर थे। हालांकि, इसी समूह में निर्यात 19.47 अरब डॉलर और आयात 131.62 अरब डॉलर बताया गया है। इनका जोड़ 151.09 अरब डॉलर होता है और इनसे 112.15 अरब डॉलर का घाटा निकलता है। इन कुल आंकड़ों में आंतरिक गणितीय असंगति है।
चीन का सीमा शुल्क सामान्य प्रशासन अपने मासिक बुलेटिन में व्यापारिक साझेदारों के आधार पर आंकड़े प्रकाशित करता है। एजेंसी आगाह करती है कि प्रकाशन के बाद सत्यापन होने पर आंकड़े बदल सकते हैं और उसका नवीनतम प्रकाशन अधिक सटीक होता है। इसलिए सालाना कुल आंकड़ों की तुलना करते समय रिपोर्टिंग अवधि और निर्यात तथा आयात की मूल रकम, दोनों जांचनी चाहिए।
चीनी आपूर्ति भारतीय कारखानों तक गहराई से पहुंचती है
चीन भारत को मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक सामान, कंप्यूटर उपकरण, इंटीग्रेटेड सर्किट, दूरसंचार के पुर्जे और लिथियम-आयन बैटरियां देता है। रसायन, सौर सेल और बैटरी बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री भी भारतीय उत्पादन में सहायक हैं। कुछ आयात तैयार उत्पाद होते हैं, जबकि अन्य पुर्जे, कच्चा माल या भारतीय कारखानों में इस्तेमाल होने वाले उपकरण होते हैं।
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के मुताबिक, चीन से भारत के आयात में विद्युत मशीनरी और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की हिस्सेदारी 36% है। मशीनरी और अन्य यांत्रिक उपकरणों का हिस्सा 21.7% है। उसके वर्गीकरण में ये दोनों श्रेणियां मिलकर आयात बिल का 57.7% हिस्सा हैं।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के अजय श्रीवास्तव का कहना है कि भारत के औद्योगिक आयात का 30% से अधिक चीन से आता है और 100 से अधिक महत्वपूर्ण उत्पादों के लिए भारत उस पर निर्भर है। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सौम्य भौमिक आगाह करते हैं कि आपूर्ति रुकने से कारखानों का उत्पादन ठप हो सकता है और नुकसान उपभोक्ता वस्तुओं की कमी से आगे तक फैल सकता है।
भारतीय निर्यात में पुर्जे भी, जिंसें भी
2026 में चीन को भारत के प्रमुख निर्यातों में समुद्री खाद्य उत्पाद, नैफ्था और प्रिंटेड सर्किट बोर्ड शामिल हैं। नैफ्था पेट्रोलियम से बना उत्पाद है, जिसका इस्तेमाल रसायन बनाने के लिए कच्चे माल या शुरुआती सामग्री के रूप में होता है। प्रिंटेड सर्किट बोर्ड इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों को थामते और आपस में जोड़ते हैं, इसलिए वे कई उपकरणों के अहम हिस्से हैं।
भारत के निर्यात में अयस्क, ईंधन और कृषि उत्पाद भी शामिल हैं। सर्किट बोर्ड की खेप में बढ़ोतरी एक सकारात्मक बदलाव है, क्योंकि पहले भारत इन उत्पादों की बड़ी मात्रा चीन से खरीदता था। इससे पता चलता है कि व्यापार संबंधों में कच्चे माल और खाद्य पदार्थों के साथ-साथ भारत में बने पुर्जों की बिक्री भी शामिल है।
2026 के पहले नौ महीनों में चीन को भारत का 19.26 अरब डॉलर का निर्यात, पूरे 2025-26 वित्त वर्ष के लिए बताए गए 19.47 अरब डॉलर के आंकड़े के करीब पहुंच गया था। दोनों अवधियां एक-दूसरे से कुछ हद तक मेल खाती हैं और अलग-अलग कैलेंडर पर आधारित हैं, लेकिन ये आंकड़े बिक्री की मौजूदा रफ्तार दिखाते हैं।
भारत ने सूचना प्रौद्योगिकी, दवाओं और कृषि उत्पादों के लिए चीनी बाजारों तक बेहतर पहुंच की मांग बार-बार की है, लेकिन प्रगति सीमित रही है। एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट के सेंटर फॉर चाइना एनालिसिस के केविन झोंगझे ली भारतीय उत्पादों के सामने मौजूद टैरिफ और अन्य बाधाओं की ओर ध्यान दिलाते हैं। उनका मानना है कि चीन की आबादी बूढ़ी होने और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ने के साथ दवाओं के क्षेत्र में अवसर हो सकता है। हालांकि, उनके मुताबिक कुछ क्षेत्रों में बढ़त इस स्तर के घाटे को पाटने के लिए पर्याप्त नहीं होगी।
मोदी और शी ने बाजार पहुंच को कूटनीतिक एजेंडे में शामिल किया
मोदी और शी ने 12 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान व्यापार पर चर्चा की। यह मुलाकात अक्टूबर 2024 में हुई बातचीत के बाद संबंध सामान्य करने की कोशिशों का हिस्सा थी। भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि नेताओं ने व्यापार असंतुलन, आपूर्ति शृंखलाओं और बाजारों तक पहुंच के मुद्दों पर चर्चा की।
मंत्रालय ने कहा कि दोनों नेताओं ने:
एक-दूसरे की चिंताओं, जिनमें संरचनात्मक व्यापार असंतुलन और आपूर्ति शृंखला से जुड़े मुद्दे शामिल हैं, को दूर करने और सार्थक तथा पूर्वानुमेय बाजार पहुंच को सुगम बनाने की जरूरत पर जोर दिया
पूर्वानुमेय बाजार पहुंच का मतलब है कि कारोबार नियमों और जरूरी अनुमतियों के बारे में उचित भरोसे के साथ बिक्री की योजना बना सके। संरचनात्मक असंतुलन वह लगातार बना रहने वाला अंतर है, जिसकी जड़ें इस बात में होती हैं कि हर देश किस तरह का सामान बनाता, खरीदता और अपने बाजार में आने देता है। यह खेप में आए किसी अस्थायी बदलाव से अलग है।
बैठक के बाद चीन के विदेश मंत्रालय ने अपना पक्ष रखा:
दोनों पक्षों को एक-दूसरे की आर्थिक और व्यापार संबंधी चिंताओं को संतुलित तरीके से दूर करना चाहिए और आर्थिक तथा व्यापार संबंधों के स्वस्थ एवं स्थिर विकास को बढ़ावा देना चाहिए।
भारत ने उर्वरकों और दुर्लभ मृदा तत्वों पर असर डालने वाले चीनी निर्यात नियंत्रणों को लेकर भी चिंता जताई है। निर्यात नियंत्रण वे सरकारी पाबंदियां हैं जो कुछ खास वस्तुओं को विदेश में बेचने पर लगाई जाती हैं। दुर्लभ मृदा तत्वों का एक समूह है, जिनका इस्तेमाल शक्तिशाली चुंबकों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों समेत कई उत्पादों में होता है। इसलिए औद्योगिक उत्पादन के लिए इनकी पहुंच अहम है।
यह संबंध यहां तक कैसे पहुंचा
राजनीतिक संबंधों में तनाव और उसके बाद कूटनीतिक सुधार की अवधि में भारत की व्यापार निर्भरता बढ़ी है। मुख्य घटनाक्रम कई साल में फैले हैं:
- 2020: गलवान घाटी में झड़पों से संबंधों को गंभीर नुकसान पहुंचा। इसके बाद भारत ने कई चीनी ऐप पर पाबंदी लगाई और कुछ आयात पर अतिरिक्त शुल्क लगाया।
- अक्टूबर 2024: दोनों देशों के संबंध सामान्य करने की दिशा में बढ़ने के बीच मोदी और शी की मुलाकात हुई।
- 2025: चीन के साथ भारत का कैलेंडर वर्ष का व्यापार घाटा 116.12 अरब डॉलर पहुंच गया।
- अप्रैल 2025 से मार्च 2026: भारत सरकार के आंकड़ों में वस्तु व्यापार 151.1 अरब डॉलर और गणना के आधार पर घाटा 112.16 अरब डॉलर रहा।
- 12 सितंबर 2026: नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान मोदी और शी ने व्यापार असंतुलन और आपूर्ति शृंखलाओं पर चर्चा की।
- 14 अक्टूबर 2026: चीन के सीमा शुल्क आंकड़ों में जनवरी से सितंबर तक का घाटा 105.93 अरब डॉलर दिखाया गया।
घरेलू उत्पादकों के लिए खतरा बने आयातों के जवाब में भारत ने एंटी-डंपिंग शुल्क का इस्तेमाल किया। ये अतिरिक्त शुल्क तब लगाए जाते हैं जब आयातित सामान को अनुचित रूप से कम कीमत पर बिकता हुआ और स्थानीय उद्योग को नुकसान पहुंचाता हुआ आंका जाता है। ऐसे उपाय कुछ कारोबारों की रक्षा कर सकते हैं, लेकिन आयातित मशीनरी और सामग्री की जरूरत वाले कारखाने इन्हें खरीदते रहते हैं।
श्रीवास्तव का अनुमान है कि यदि आयात तेजी से बढ़ता रहा तो घाटा 134 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। यह मौजूदा रुझानों के जारी रहने पर आधारित अनुमान है; सीमा शुल्क का कुल आंकड़ा अब तक पूरे हो चुके नौ महीनों को कवर करता है।
खिलौनों में प्रगति, इलेक्ट्रॉनिक्स में गहरी निर्भरता
भारत का खिलौना उद्योग आयात घटाने की ठोस मिसाल है। खिलौनों पर आयात शुल्क 20% से बढ़ाकर 60% और फिर 70% किया गया। साथ ही गुणवत्ता संबंधी शर्तें सख्त हुईं। खिलौनों का सालाना आयात 2020 के करीब 300 मिलियन डॉलर से घटकर लगभग 100 मिलियन डॉलर रह गया, जबकि निर्यात 129 मिलियन डॉलर से बढ़कर करीब 200 मिलियन डॉलर हो गया।
इन आंकड़ों से आयात में लगभग दो-तिहाई की गिरावट और निर्यात में करीब 55% की वृद्धि का संकेत मिलता है। कभी भारत के खिलौना बाजार में चीन की हिस्सेदारी 70% थी। यह बदलाव दिखाता है कि टैरिफ और उत्पादन नीतियां किसी खास उद्योग को बदल सकती हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स के मामले में चुनौती अधिक जटिल है। दुनिया के एक-चौथाई से अधिक आईफोन अब भारत में बनते हैं, लेकिन उत्पादन अब भी चीनी पुर्जों और सामग्री पर निर्भर है। श्रीवास्तव का कहना है कि भारत में बड़े पैमाने पर विनिर्माण का बड़ा हिस्सा अब भी आयातित पुर्जों को जोड़ने पर केंद्रित है।
इसलिए कोई भारतीय कारखाना उत्पादन बढ़ाते हुए चीन से खरीद भी बढ़ा सकता है। तैयार उपकरण को देश में बनाना और उसके पुर्जे देश में बनाना औद्योगिक विकास के अलग-अलग चरण हैं। निर्भरता घटाने के लिए अंतिम उत्पाद के साथ-साथ कारखाने में इस्तेमाल होने वाले पुर्जों, सामग्री और उपकरणों का भारतीय उत्पादन भी बढ़ाना होगा।
चीन का व्यापक निर्यात उछाल दबाव बढ़ा रहा है
सितंबर में चीन का सभी गंतव्यों को निर्यात 36.3% बढ़कर 447.18 अरब डॉलर हो गया, जबकि आयात 31% बढ़कर 313.65 अरब डॉलर रहा। चीन का मासिक व्यापार अधिशेष, यानी निर्यात और आयात के बीच का अंतर, 133.53 अरब डॉलर पहुंच गया। जनवरी से सितंबर तक यह अधिशेष 938.11 अरब डॉलर था।
प्रौद्योगिकी उत्पादों की मांग इस वृद्धि को सहारा दे रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बुनियादी ढांचे पर खर्च से सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों, कंप्यूटिंग उपकरणों और बिजली नेटवर्क की मांग बढ़ती है। साथ ही, घरेलू मांग कमजोर रहने और चीन के संपत्ति क्षेत्र की समस्याएं जारी रहने से चीनी उत्पादकों के लिए विदेशी बिक्री का महत्व बढ़ जाता है।
चीन का सालाना आर्थिक वृद्धि लक्ष्य 4.5% से 5% है। मजबूत निर्यात इस लक्ष्य में मदद करता है, हालांकि कारखानों में बढ़ती कीमतें और उपभोक्ता महंगाई में नरमी कारोबारों और परिवारों पर अलग-अलग दबाव दिखाते हैं। घरेलू खर्च तुलनात्मक रूप से सुस्त रहने के बीच उत्पादकों की लागत बढ़ रही है।
इस्पात, सौर पैनल और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे क्षेत्रों में चीनी विनिर्माताओं के पास उत्पादन की काफी क्षमता भी है। श्रीवास्तव का कहना है कि भारतीय उद्योग के विस्तार और पश्चिमी देशों की ओर से चीनी सामान पर टैरिफ तथा अन्य पाबंदियां लगाने के बीच कुछ उत्पादन भारत पहुंच रहा है। 2025 में चीन का अधिशेष करीब 1.2 ट्रिलियन डॉलर था। निर्यात की रफ्तार बनी रही तो 2026 का कुल आंकड़ा भी 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो सकता है।
निवेश और औद्योगिक नीति को साथ-साथ चलना होगा
वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि भारत चीन के साथ संबंध फिर से बनाने की दिशा में काम कर रहा है, साथ ही निष्पक्ष शर्तों और भरोसेमंद संपर्क की मांग कर रहा है। ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी कार्यक्रम में उन्होंने साझेदारियों को लेकर भारत का रुख बताया:
हम दुनिया के सभी देशों के साथ काम करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते हमें निष्पक्ष सौदा मिले, संपर्क की निरंतरता सुनिश्चित हो और भू-राजनीतिक स्थिति न बिगड़े। मुझे लगता है कि पहले हमें कुछ चिंताएं थीं। हम एक बार फिर चीन के साथ संबंध विकसित करने के लिए काम कर रहे हैं, लेकिन इस सफर का आखिरी अध्याय अभी नहीं लिखा गया है,
भारत ने अपनी स्थलीय सीमाएं साझा करने वाले देशों से आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नियम सख्त किए थे। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का मतलब है कि कोई कंपनी या निवेशक विदेश में किसी कारोबार में दीर्घकालिक हिस्सेदारी लेता है, जैसे कारखाना बनाना या किसी कंपनी का हिस्सा खरीदना। बाद की कुछ रिपोर्टों में निवेश नियमों में ढील दिए जाने की बात है, लेकिन सटीक बदलावों और उनके लागू होने की तारीखों की जानकारी नहीं दी गई।
श्रीवास्तव का तर्क है कि निवेश के फैसलों में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, घरेलू स्तर पर पुर्जों के उत्पादन और भारत से निर्यात को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उनका कहना है कि अगर निवेश बिक्री नेटवर्क या चीनी पुर्जों की असेंबली पर केंद्रित रहा तो आयात बढ़ सकता है। उनके सुझाए औद्योगिक उपायों में सस्ती बिजली, कम लागत वाला ऋण, बेहतर परिवहन और हर उद्योग के अनुरूप स्थिर नियम भी शामिल हैं।
सिंगापुर के उपप्रधानमंत्री और ऊर्जा, व्यापार तथा उद्योग मंत्री गन किम योंग ने कहा कि सिंगापुर और भारत सेमीकंडक्टर क्षेत्र में सहयोग और भारतीय कामगारों के प्रशिक्षण पर चर्चा कर रहे हैं। ऐसी साझेदारियां भारत के सामने मौजूद चुनौती के अनुरूप हैं: विनिर्माण के अधिक जटिल चरणों के लिए जरूरी कौशल और उत्पादन क्षमता विकसित करना।
मुख्य बात
- 2026 के जनवरी से सितंबर के बीच चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 20.7% बढ़कर 105.93 अरब डॉलर पहुंच गया।
- भारतीय निर्यात 40.7% बढ़कर 19.26 अरब डॉलर हुआ, जबकि आयात 23.3% बढ़कर 125.19 अरब डॉलर रहा।
- आयात का बड़ा आधार होने के कारण खरीद की रकम निर्यात से हुई कमाई के मुकाबले कहीं अधिक बढ़ी।
- मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक सामग्री के कारण चीनी आपूर्ति भारतीय कारखानों के उत्पादन से गहराई से जुड़ी है।
- मोदी और शी ने सितंबर में व्यापार असंतुलन, आपूर्ति शृंखलाओं और पूर्वानुमेय बाजार पहुंच पर चर्चा की।
- भारत के नीतिगत विकल्पों में चीन में बेहतर बाजार पहुंच, देश में पुर्जों का विनिर्माण और ऐसी निवेश व्यवस्था शामिल है जो प्रौद्योगिकी तथा उत्पादन क्षमता लाए।
- चीन के कैलेंडर वर्ष और भारत के वित्त वर्ष के आंकड़े अलग-अलग अवधियों को कवर करते हैं; कुछ प्रकाशित सालाना कुल आंकड़ों में गणितीय असंगतियां भी हैं।






