मानचित्रण के फैसले से संप्रभुता विवाद फिर खुला
चीन द्वारा भारतीय सर्वेक्षण विभाग के आधिकारिक नक्शों पर 28 स्थानों और भौगोलिक विशेषताओं के नाम मानकीकृत करने को चुनौती दिए जाने के बाद, भारत ने 13 अक्टूबर 2026 को लद्दाख पर अपना दावा दोहराया। इस सूची में गोगरा और हॉट स्प्रिंग शामिल हैं, जो 2020 में पूर्वी लद्दाख में शुरू हुए सैन्य गतिरोध से जुड़े हैं। इसमें अक्साई चिन के स्थान भी हैं, जिस पर भारत दावा करता है और जिसका प्रशासन चीन के हाथ में है।
विषय-सूची
- मानचित्रण के फैसले से संप्रभुता विवाद फिर खुला
- भारत और चीन ने क्या कहा
- 28 प्रविष्टियों में वास्तव में क्या शामिल है
- गोगरा और हॉट स्प्रिंग क्यों अहम हैं
- अक्साई चिन की प्रविष्टियों के पीछे ऐतिहासिक रास्ते
- यह सूची पाकिस्तान से जुड़े विवादित क्षेत्रों तक भी पहुंचती है
- अरुणाचल प्रदेश से सबसे नज़दीकी तुलना
- नामों में सांस्कृतिक अर्थ और क्षेत्रीय दावे दोनों हैं
- राजनयिक प्रगति से सीमा विवाद का समाधान नहीं हुआ
- क्या अब भी अनसुलझा है
- मुख्य बातें
गृह मंत्रालय ने 2 अक्टूबर को इस कवायद की घोषणा करते हुए कहा कि उसने लद्दाख प्रशासन और स्थानीय हितधारकों से परामर्श किया है। भारत ने इस फैसले को स्थानों की सही पहचान करने और जन-जागरूकता बढ़ाने का उपाय बताया। चीन ने इसे उस क्षेत्र पर दावा जताने की कोशिश कहा जिस पर वह अपना दावा करता है और लद्दाख को भारतीय केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा देने से अपना इनकार दोहराया।
यह बयानबाज़ी अक्टूबर 2024 में कज़ान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद से संबंधों में आए सुधार की सीमाएं उजागर करती है। सैन्य स्तर पर पीछे हटने और राजनयिक संपर्क फिर शुरू होने से तनाव घटा है, लेकिन दोनों में से किसी भी सरकार ने अपना क्षेत्रीय रुख नहीं छोड़ा है। राष्ट्रीय नक्शे पर किसी नाम को मानकीकृत करने से अपने आप यह नहीं बदलता कि जमीन पर नियंत्रण किसका है, न ही इससे विवादित सीमा का समाधान होता है।
भारत और चीन ने क्या कहा
चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने घोषणा का विरोध किया और इसे सीधे उन प्रशासनिक व्यवस्थाओं से जोड़ा जिन्हें भारत ने 2019 में लागू किया था और जिन्हें बीजिंग मान्यता नहीं देता। नामकरण के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा:
भारत का यह कदम अवैध और अमान्य है तथा इससे यह तथ्य नहीं बदलता कि चीन-भारत सीमा का पश्चिमी क्षेत्र चीन का है।
कुछ रिपोर्टों में उनके बयान का अनुवाद "अवैध और अमान्य" के रूप में भी किया गया है और पश्चिमी क्षेत्र के "संबंधित इलाकों" का उल्लेख करने वाला अधिक सीमित कथन उद्धृत किया गया है। दोनों संस्करण बीजिंग के विरोध को दर्शाते हैं, लेकिन उसका क्षेत्रीय दावा विवादित है, सीमा का सर्वमान्य विवरण नहीं।
भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस रुख को खारिज करते हुए लद्दाख पर नई दिल्ली का मत दोहराया:
यह दोहराया जाता है कि लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है। चीनी पक्ष के बार-बार इनकार करने से भी इस स्थापित तथ्य को बदला नहीं जा सकता।
जायसवाल ने गृह मंत्रालय की घोषणा को अपने आप में स्पष्ट बताया। उन्होंने कहा कि आधिकारिक भारतीय सर्वेक्षण विभाग के नक्शे में शामिल करने के लिए केंद्रशासित प्रदेश और स्थानीय हितधारकों से परामर्श कर नामों की पहचान की गई थी।
28 प्रविष्टियों में वास्तव में क्या शामिल है
विस्तृत सूची में 10 शिखर, तीन पर्वत, सात भू-क्षेत्र, दो दर्रे, दो हिमनद, एक घाटी, एक नदी, एक झील और एक अन्य जल निकाय का उल्लेख है। इन श्रेणियों की कुल संख्या 28 होती है। शिखर और पर्वत मिलाकर 13 प्रविष्टियां हैं, जबकि सात भू-क्षेत्रों में कई ऐसे स्थान शामिल हैं जो क्षेत्रीय विवाद के केंद्र में हैं।
विस्तृत विवरण में दी गई भौगोलिक विशेषताओं के प्रकार के अनुसार पूरी सूची इस प्रकार है:
- शिखर: अतिशा गिरि, कनिष्क पीक, मार्तंड गिरि, ज़ोरावर पीक, रिनचेन ज़ंगपो, शाक्यश्री गिरि, मारपा लोत्सावा री, मिलारेपा कांगरी, शिव री और महेश्वर री।
- पर्वत: करुण पीर, ड्राक कार्पो और जोलमोरी।
- भू-क्षेत्र: ब्रांगसा, कुकसेल, देहरा कंपास, गोगरा, कुमारायणा पॉइंट, पांगलुंग और शमाल लुंगपा।
- दर्रे: छपचिंगल दर्रा और शाचमिर्क दर्रा।
- हिमनद: परपिक और स्कामरी हिमनद।
- अन्य विशेषताएं: शकोरगा घाटी, यांगपा नदी, गुरु रिनपोछे झील और हॉट स्प्रिंग, जिसे जल निकाय के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
रिपोर्टों में वर्तनी और वर्गीकरण को लेकर अंतर है। कुछ में अतिशा गिरि की जगह अलीशा गिरि, शाचमिर्क की जगह शाचमिरिक और महेश्वर की जगह महेश्वरा लिखा गया है। एक अन्य वर्गीकरण में बाकी विशेषताओं के साथ 11 शिखर, पांच पर्वत और छह भू-क्षेत्र दिए गए हैं, लेकिन इनकी कुल संख्या 28 के बजाय 32 होती है। ऊपर दी गई विस्तृत सूची घोषित कुल संख्या के अनुरूप है।
तारीख को लेकर भी अंतर है। अधिकांश विवरणों में गृह मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति की तारीख 2 अक्टूबर बताई गई है, जबकि एक अन्य विवरण भारतीय सर्वेक्षण विभाग की घोषणा 3 अक्टूबर को हुई बताता है। ये प्रकाशन के अलग-अलग चरण हो सकते हैं, लेकिन इस अंतर की पुष्टि नहीं हुई है।
गोगरा और हॉट स्प्रिंग क्यों अहम हैं
गोगरा और हॉट स्प्रिंग नक्शे पर लिखे नाम भर नहीं हैं। 2020 में भारतीय और चीनी बलों के बीच झड़पों के बाद शुरू हुए पूर्वी लद्दाख गतिरोध के दौरान ये टकराव के प्रमुख बिंदुओं में शामिल थे। उसी साल जून में गलवान घाटी में हुई घातक झड़प ने सीमा विवाद को कहीं अधिक खतरनाक दौर में पहुंचा दिया।
वास्तविक नियंत्रण रेखा, यानी एलएसी, भारत और चीन के नियंत्रण वाले क्षेत्रों को अलग करती है। यह दोनों देशों के बीच पारस्परिक रूप से सहमत अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं है। इसके रास्ते को लेकर मतभेद के कारण गश्ती दल एक ही विवादित इलाके में पहुंच सकते हैं।
सितंबर 2022 में दोनों देशों ने गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स में पीछे हटने की प्रक्रिया पूरी की। यह क्षेत्र पेट्रोलिंग पॉइंट 15 से जुड़ा है। पीछे हटने का मतलब किसी खास टकराव-बिंदु पर सैनिकों को अलग करना है। यह अंतिम क्षेत्रीय समझौता नहीं है और इससे गश्त के अधिकार को लेकर हर असहमति का समाधान होना भी जरूरी नहीं।
इसके बाद विदेश मंत्रालय ने कहा था कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उस इलाके में एलएसी का "कड़ाई से पालन और सम्मान" किया जाए। इसलिए गोगरा और हॉट स्प्रिंग को मानकीकृत सूची में शामिल करना इस मानचित्रण कवायद को उन स्थानों से जोड़ता है जहां दोनों देशों ने पहले ही सैन्य व्यवस्थाओं पर बातचीत की थी।
उस स्थानीय स्तर पर पीछे हटने के बाद भी व्यापक गतिरोध जारी रहा। अक्टूबर 2024 में हुई राजनयिक प्रगति से संबंधों को फिर से पटरी पर लाने का रास्ता खुला। इससे स्पष्ट होता है कि 2022 के समझौते और बाद में संबंधों में आए सुधार को एक ही घटना नहीं मानना चाहिए।
अक्साई चिन की प्रविष्टियों के पीछे ऐतिहासिक रास्ते
देहरा कंपास और शमाल लुंगपा विवाद की एक और परत सामने लाते हैं। दोनों अक्साई चिन से जुड़े हैं। भारत इसे लद्दाख का हिस्सा मानता है, लेकिन इस पर चीन का नियंत्रण है। अक्साई चिन शिनजियांग और तिब्बत के बीच संपर्क का रास्ता भी है, जिससे बीजिंग के लिए इसका रणनीतिक महत्व बढ़ जाता है।
सीमा प्रश्न पर भारत और चीन की सरकारों के अधिकारियों की 1961 की रिपोर्ट में चांग चेनमो घाटी, लिंगज़ी तांग के मैदानों और अक्साई चिन से होकर जाने वाले ऐतिहासिक रास्तों का उल्लेख है। इसमें पश्चिमी चांग चेनमो मार्ग का वर्णन है, जो पामज़ल से शमाल लुंगपा और समज़ुंग लिंग होते हुए देहरा गोम्पा और ऊपरी क़रा क़ाश घाटी की ओर जाता था।
रिपोर्ट में गोगरा को पूर्वी चांग चेनमो मार्ग का एक पड़ाव भी बताया गया है। इसमें व्यापारियों के लिए रास्तों, विश्रामगृहों और भंडारगृहों के रखरखाव में कश्मीर राज्य के अधिकारियों की भूमिका का जिक्र है। पांगलोंग को घास वाली जमीन की घाटी बताया गया है। मौजूदा नामकरण सूची में पांगलुंग लिखा गया है, इसलिए नक्शे पर इनके स्थानों की जांच किए बिना दोनों वर्तनियों को एक समान नहीं मानना चाहिए।
1959 के भारतीय सरकारी पत्राचार में गश्त के संदर्भ में हॉट स्प्रिंग और शमाल लुंगपा का उल्लेख है। ये दस्तावेज़ बताते हैं कि कुछ प्रविष्टियों का महत्व उनके भौतिक विवरण से कहीं अधिक ऐतिहासिक है। इनमें सीमा दावों के समर्थन में इस्तेमाल किए गए रास्तों और गतिविधियों का रिकॉर्ड है, न कि ऐसा सीमा समझौता जिसे दोनों देशों ने स्वीकार किया हो।
यह सूची पाकिस्तान से जुड़े विवादित क्षेत्रों तक भी पहुंचती है
नामकरण की यह कवायद भारत-चीन की तत्काल सैन्य सीमा तक सीमित नहीं है। कुछ वर्तनी-अंतर के साथ छपचिंगल दर्रा, कुकसेल और परपिक हिमनद गिलगित-बाल्टिस्तान पर्यटन विभाग के जारी किए गए एक पर्यटक नक्शे पर भी दिखाई देते हैं। ये स्थान पाकिस्तान के प्रशासन वाले उस क्षेत्र में हैं जिस पर भारत पूर्ववर्ती जम्मू-कश्मीर रियासत के हिस्से के रूप में दावा करता है।
स्कामरी हिमनद का संबंध श्योक और शक्सगाम घाटियों से भी जुड़ता है। वैज्ञानिक शोध में इसी नाम के हिमनदों का उल्लेख मिलता है। शक्सगाम 5,180 वर्ग किलोमीटर का वह भू-भाग है जिसे 1963 के चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते के तहत पाकिस्तान ने चीन को देने पर सहमति जताई थी। भारत इस समझौते को मान्यता नहीं देता।
यह मुद्दा इससे पहले 16 सितंबर को भी सामने आया था, जब पाकिस्तान और चीन ने अपने सीमा संयुक्त आयोग को सक्रिय किया। पाकिस्तान ने कहा था कि यह व्यवस्था सीमा प्रबंधन, संयुक्त सर्वेक्षण, व्यापार और सीमा पार लोगों के संपर्क को बढ़ावा देगी।
भारत ने इस कदम को खारिज कर दिया। जायसवाल ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के दोनों केंद्रशासित प्रदेशों पर भारत का दावा दोहराया और कहा कि भारत जिस क्षेत्र को अवैध कब्जे में मानता है, उससे जुड़े इंतजाम करने का पाकिस्तान को कोई अधिकार नहीं है। इन विशेषताओं को शामिल करने से लद्दाख के नक्शे का क्षेत्रीय दायरा पेट्रोलिंग पॉइंट 15 के पास नामों पर विवाद से कहीं आगे बढ़ जाता है।
अरुणाचल प्रदेश से सबसे नज़दीकी तुलना
लद्दाख की घोषणा से पहले अगस्त 2026 में भारत ने अरुणाचल प्रदेश के 27 स्थानों और विशेषताओं के लिए मानक नाम तय किए थे। दोनों घोषणाओं को मिलाकर 55 प्रविष्टियां होती हैं; लद्दाख की सूची में अरुणाचल की सूची से एक अधिक है। ये विवादित सीमा के अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ी हैं, लेकिन दोनों में भारतीय नामों को औपचारिक नक्शा रिकॉर्ड में दर्ज किया गया।
चीन ने 2017 से अरुणाचल प्रदेश के स्थानों के लिए मानकीकृत नामों की कई सूचियां जारी की हैं। रिपोर्टों में करीब एक दशक के दौरान ऐसी कम से कम छह कवायदों का जिक्र है, हालांकि 2026 में घोषणाओं के सटीक क्रम और संख्या को लेकर उनमें अंतर है। भारत ने लगातार चीन की नामकरण कवायदों को भारतीय क्षेत्र पर दावे को मजबूत करने की कोशिश बताकर खारिज किया है।
चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने अरुणाचल प्रदेश के नामों को मानकीकृत करने के भारत के अगस्त वाले फैसले की आलोचना की थी। उनकी टिप्पणी उस कवायद के बारे में थी, बाद में हुई लद्दाख घोषणा के बारे में नहीं। अक्टूबर में माओ निंग की प्रतिक्रिया लद्दाख की 28 प्रविष्टियों पर चीन की प्रासंगिक प्रतिक्रिया है।
तक्षशिला संस्थान के भू-रणनीति कार्यक्रम की एसोसिएट फेलो अनुष्का सक्सेना ने चीन के नाम बदलने के प्रयासों को उसके ऐतिहासिक दावों को मजबूत करने और अन्य सरकारों तथा देशों के उपयोग में चीनी नाम शामिल कराने की कोशिश बताया है। यह विश्लेषण समझाता है कि नक्शे पर नाम चुनने का मुद्दा सैन्य नियंत्रण में किसी बदलाव के बिना भी राजनयिक ध्यान क्यों खींच सकता है।
अक्टूबर की इस बयानबाज़ी को दो साल में नामों को लेकर पहला विवाद बताने वाली बात पर भी मतभेद है। कुछ रिपोर्टें अगस्त 2026 में इससे पहले हुए टकराव का उल्लेख करती हैं। यह अंतर महत्वपूर्ण है: लद्दाख की घोषणा एक जारी सिलसिले में नया विवाद है, जरूरी नहीं कि 2024 के बाद ऐसा पहला मामला हो।
नामों में सांस्कृतिक अर्थ और क्षेत्रीय दावे दोनों हैं
कई प्रविष्टियां क्षेत्र के धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास से जुड़े बौद्ध व्यक्तित्वों के नाम पर हैं। अतिशा, रिनचेन ज़ंगपो, मारपा लोत्सावा और मिलारेपा शिखरों के नामों में शामिल हैं। झील के लिए इस्तेमाल गुरु रिनपोछे नाम उस बौद्ध गुरु का है जिन्हें पद्मसंभव के नाम से भी जाना जाता है।
शिव री और महेश्वर री में शिव से जुड़े नाम हैं। ज़ोरावर पीक का नाम जनरल ज़ोरावर सिंह और लद्दाख में उनके अभियानों पर रखा गया है। इन नामों से सूची के प्रशासनिक उद्देश्य के साथ सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भ भी जुड़ते हैं।
मानकीकरण का उद्देश्य सरकारी एजेंसियों, मानचित्रण प्राधिकरणों और आम लोगों के लिए एक समान संदर्भ उपलब्ध कराना है। यह व्यावहारिक उद्देश्य संप्रभुता के सवाल से अलग है: किसी एक देश के रिकॉर्ड में कोई नाम मानक बन सकता है, भले ही दूसरा देश उसे स्वीकार न करे या उससे उस स्थान का प्रशासन न बदले।
राजनयिक प्रगति से सीमा विवाद का समाधान नहीं हुआ
ताज़ा विवाद के बाद 2024 में कज़ान में मोदी-शी बैठक के बाद से दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच बातचीत के तीन दौर हो चुके हैं। रिपोर्टों में बताया गया सबसे हालिया दौर अगस्त में हुआ और उसमें आठ नतीजे निकले। इनमें सीमा निर्धारण और सीमा प्रबंधन पर काम आगे बढ़ाने की मंशा भी शामिल थी।
सीमा निर्धारण का मतलब यह तय करना है कि सीमा कहां से गुजरेगी। सीमा प्रबंधन का संबंध इस बात से है कि व्यापक मतभेद बने रहने के दौरान दोनों पक्ष सीमा पर गतिविधियों को कैसे संभालते हैं। इसलिए अंतिम क्षेत्रीय समझौते के बिना भी तनाव प्रबंधन में प्रगति संभव है।
घटनाओं का मुख्य क्रम इस प्रकार है:
- 2019: जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के दौरान भारत ने लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश बनाया। चीन ने इस बदलाव का विरोध किया।
- जून 2020: गलवान में हुई घातक झड़प से सैन्य और राजनयिक संकट और गहरा गया।
- सितंबर 2022: भारत और चीन ने पेट्रोलिंग पॉइंट 15 के पास गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स में पीछे हटने की प्रक्रिया पूरी की।
- अक्टूबर 2024: संबंध बहाल करने की प्रक्रिया के बीच मोदी और शी कज़ान में मिले।
- अगस्त 2026: भारत ने अरुणाचल प्रदेश में 27 नाम मानकीकृत किए; विशेष प्रतिनिधियों की सबसे हालिया बताई गई वार्ता भी अगस्त में हुई।
- 2 अक्टूबर 2026: गृह मंत्रालय ने लद्दाख के 28 नामों की घोषणा की।
- 13 अक्टूबर 2026: भारत ने चीन की आपत्तियां खारिज कर लद्दाख पर अपना रुख दोहराया।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में मोदी-शी की बाद की बैठक के समय को लेकर रिपोर्टों में अंतर है। एक रिपोर्ट में तारीख 12 सितंबर, दूसरी में अगस्त और तीसरी में 2 अक्टूबर की घोषणा से चार दिन पहले बताई गई है। साझा और सत्यापित तारीख के अभाव में इस बैठक को नामकरण विवाद की घटनाओं का विश्वसनीय आधार नहीं माना जा सकता।
क्या अब भी अनसुलझा है
राजनयिक मतभेदों के साथ आर्थिक बातचीत भी जारी है। चीन अपनी कंपनियों के लिए भारत में निवेश की शर्तें आसान करने की मांग कर रहा है। नई दिल्ली दुर्लभ मृदा सामग्री, कुछ उर्वरकों और अन्य औद्योगिक कच्चे माल की भरोसेमंद आपूर्ति चाहती है। साथ ही, वह वीज़ा जारी करने में अधिक पारदर्शिता और कम पाबंदियां चाहती है।
भारत का कहना रहा है कि संबंधों के विकास के लिए सीमा पर शांति जरूरी है। नामों को लेकर यह विवाद दिखाता है कि व्यावहारिक सहयोग के प्रयासों के बीच भी क्षेत्रीय मतभेद बने रह सकते हैं। इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि सैन्य स्तर पर पीछे हटने की प्रक्रिया पलट गई है या आर्थिक बातचीत रुक गई है।
इन विवरणों में नए सीमा समझौते, आगे की सुनवाई या लद्दाख के नामों पर किसी खास फैसले की तारीख घोषित नहीं की गई है। तत्काल नतीजा भारत का औपचारिक मानचित्र रिकॉर्ड और परस्पर विरोधी दावों के दोबारा सामने आए बयान हैं। क्षेत्रीय नियंत्रण, सीमा का रास्ता और नामों की स्वीकृति अलग-अलग ऐसे मुद्दे हैं जिनका समाधान अब भी बाकी है।
मुख्य बातें
- भारत ने 2 अक्टूबर 2026 को लद्दाख के 28 स्थानों और विशेषताओं के मानक नामों की घोषणा की।
- चीन ने इन नामों पर आपत्ति जताई और लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा देने से अपना इनकार दोहराया।
- भारत ने 13 अक्टूबर को चीन की आपत्तियां खारिज कर अपना क्षेत्रीय रुख दोहराया।
- सूची में गोगरा, हॉट स्प्रिंग, अक्साई चिन के स्थान और पाकिस्तान के प्रशासन वाले क्षेत्र की विशेषताएं शामिल हैं।
- विस्तृत वर्गीकरण में कुल 28 प्रविष्टियां हैं, हालांकि कुछ वर्तनी, तारीखों और श्रेणियों की संख्या को लेकर रिपोर्टों में अंतर है।
- इस मानचित्रण कवायद से अपने आप क्षेत्रीय नियंत्रण नहीं बदलता और न ही विवादित सीमा का समाधान होता है।






