थाईलैंड में गोल्ड कार्ड के तहत मरीजों से शुल्क लेने का विरोध, इलाज तक पहुंच घटने की चेतावनी

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Thai Gold Card Campaigners Oppose Patient Charges, Warn of Lost Access to Care

300 बाट का शुल्क एक दिन की कमाई के बराबर हो सकता है

3,000 बाट के चिकित्सा बिल पर 10% मरीज-अंशदान 300 बाट होगा। यह उस व्यक्ति की पूरे दिन की कमाई के बराबर है, जिसे इतनी रकम मिलती है, और कुछ बुजुर्गों को मिलने वाले 600 बाट के भत्ते का आधा है। यही गणना थाईलैंड के 2002 के राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा अधिनियम में बदलावों के खिलाफ सामुदायिक अभियान के केंद्र में है।

विषय-सूची
  1. 300 बाट का शुल्क एक दिन की कमाई के बराबर हो सकता है
  2. प्रस्तावित संशोधन से क्या बदलेगा
  3. मौजूदा कानून में पहले से भुगतान का प्रावधान रहा है
  4. अभियानकर्ताओं का कहना है कि मरीज पहले से योगदान देते हैं
  5. मरीजों के अनुभव अस्पताल के बिल से आगे की बात बताते हैं
  6. लाभ और बजट का फैसला कौन करे?
  7. यह विवाद कई वर्षों से लौटता रहा है
  8. वित्तीय दबाव वास्तविक है, लेकिन पुराने आंकड़ों को संदर्भ में देखना होगा
  9. विकल्पों में रोकथाम और तीनों कोषों पर जोर
  10. मुख्य बिंदु

बैंकॉक के साई माई जिले की सामुदायिक नेता विमोन थाविनपोंग ने 5 अक्टूबर, 2026 को संशोधन के विरोध में निकाले गए मार्च में हिस्सा लिया। 12 अक्टूबर को प्रकाशित टिप्पणियों में उन्होंने सांसदों से ऐसे बदलाव रोकने की अपील की, जिनसे यूनिवर्सल कवरेज योजना, जिसे आम तौर पर गोल्ड कार्ड कहा जाता है, के तहत इलाज कराने वालों को अधिक भुगतान करना पड़ सकता है।

उनकी चेतावनी उन परिवारों के सामने मौजूद विकल्प को लेकर है, जिनके पास भोजन और अन्य जरूरी खर्चों के बाद बहुत कम पैसा बचता है: इलाज का खर्च दें या परिवार की आमदनी बचाकर रखें। उन्हें डर है कि कुछ मरीज इलाज कराने के बजाय बीमारी झेलते रहेंगे। 10% की गणना इस जोखिम का उदाहरण थी, किसी स्वीकृत शुल्क की पुष्टि नहीं।

विवाद इस बात को लेकर भी है कि स्वास्थ्य खर्च पर किसका नियंत्रण हो, मरीजों का कितना प्रभाव बना रहे और आर्थिक दबाव से निपटने के लिए अस्पतालों को अधिक धन दिया जाए, खरीद व्यवस्था में सुधार हो या इलाज के समय शुल्क लिया जाए। 2012 का एक आधिकारिक नोटिस दिखाता है कि कानूनी इतिहास मुफ्त इलाज और भुगतान के बीच साधारण बंटवारे से अधिक जटिल है: मौजूदा अधिनियम में पहले से ही कुछ छूटों के साथ सीमित 30 बाट शुल्क का प्रावधान था।

प्रस्तावित संशोधन से क्या बदलेगा

सीनेट की जन स्वास्थ्य समिति ने जुलाई 2026 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव रखा, जिसमें मरीजों से संभावित अंशदान पर चर्चा शामिल थी। उम्मीद थी कि यह प्रस्ताव सितंबर या अक्टूबर में संसद के सामने आएगा। 26 अगस्त को थाईलैंड उपभोक्ता परिषद ने बैंकॉक के अमारी डॉन मुआंग होटल में इसका विरोध करते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की।

अभियानकर्ताओं ने चेतावनी दी कि बदलावों से अतिरिक्त शुल्क लगाए बिना इलाज तक पहुंच कमजोर हो सकती है। उन्होंने राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा बोर्ड में संभावित बदलावों और कवर की जाने वाली सेवाओं के वर्णन के लिए इस्तेमाल होने वाली भाषा पर भी सवाल उठाए। ये प्रस्ताव को लेकर चिंताएं हैं, इस बात का सबूत नहीं कि संसद ने किसी खास भुगतान व्यवस्था को मंजूरी दे दी है।

इन विवरणों से अंतिम अंशदान दर, भुगतान की अधिकतम सीमा, पूरी छूट-सूची या संसद में किसी निश्चित मतदान की पुष्टि नहीं होती। ये बातें अहम हैं: तय शुल्क, बिल का प्रतिशत और केवल कुछ सेवाओं पर लागू शुल्क, मरीजों पर अलग-अलग तरह का खर्च डालेंगे।

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मौजूदा कानून में पहले से भुगतान का प्रावधान रहा है

राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा बोर्ड का 2012 का भुगतान नोटिस कानूनी स्थिति का ठोस संदर्भ देता है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा अधिनियम की धारा 5, उपधारा दो के तहत जारी इस नोटिस में इलाज और दवा लेने वाली प्रत्येक पात्र मुलाकात के लिए 30 बाट अंशदान निर्धारित किया गया था।

यह नोटिस निर्धारित स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं पर लागू था। इनमें सामुदायिक अस्पताल स्तर या उससे ऊपर के जन स्वास्थ्य मंत्रालय के अस्पताल, अन्य सरकारी अस्पताल, विश्वविद्यालय अस्पताल और समान स्तर के निजी अस्पताल शामिल थे। इस पर 27 जुलाई, 2012 को तत्कालीन जन स्वास्थ्य मंत्री और बोर्ड के अध्यक्ष विट्ठया बुरानासिरी ने हस्ताक्षर किए थे। यह उसी साल 1 सितंबर से लागू हुआ।

इसमें स्वास्थ्य संवर्धन, बीमारी की रोकथाम, गंभीर और तत्काल आपातकालीन उपचार, गरीब लोगों, जन स्वास्थ्य मंत्री द्वारा निर्धारित अन्य समूहों और सामुदायिक अस्पताल स्तर से नीचे की सुविधाओं में दी जाने वाली सेवाओं को शुल्क से छूट दी गई थी।

यह दस्तावेज स्थापित करता है कि 2002 के अधिनियम में मरीजों से भुगतान के एक निर्धारित रूप की पहले से अनुमति थी। इससे यह साबित नहीं होता कि आज हर मरीज को कितना भुगतान करना पड़ता है या 2026 के संशोधन में क्या अनिवार्य होगा। मुख्य अंतर उस समय के छूट सहित तय शुल्क और इलाज की लागत के हिस्से के रूप में गणना किए जा सकने वाले संभावित अंशदान के बीच है।

अभियानकर्ताओं का कहना है कि मरीज पहले से योगदान देते हैं

विमोन का तर्क है कि गोल्ड कार्ड के लाभार्थी रोजमर्रा की खरीद पर मूल्य वर्धित कर समेत करों के जरिए पहले से ही सार्वजनिक सेवाओं के वित्तपोषण में योगदान देते हैं। उनके अनुसार, अस्पताल में फिर से भुगतान की मांग करने से सबसे कम खर्च सह पाने वाले लोगों पर अधिक बोझ पड़ेगा।

वह पात्र प्रत्येक व्यक्ति के हिसाब से योजना में धन आवंटित किए जाने की व्यवस्था की ओर भी ध्यान दिलाती हैं। कैपिटेशन कहलाने वाली इस व्यवस्था में हर व्यक्ति का योगदान अलग-अलग चिकित्सा खाते की तरह नहीं गिना जाता, बल्कि प्रत्येक कवर व्यक्ति के लिए एक तय रकम बजट में रखी जाती है। संसाधन साझा करने से उन लोगों से जुड़ा धन, जिन्हें कम इलाज की जरूरत होती है, गंभीर रूप से बीमार पड़ने वालों की मदद कर सकता है।

विमोन का मानना है कि जोखिम साझा करने की इस व्यवस्था में मरीजों से अतिरिक्त शुल्क की जरूरत नहीं है। हालांकि, उनकी टिप्पणियों में ऐसा कोई मौजूदा वित्तीय आकलन नहीं है जो यह साबित करे कि बजट पर्याप्त है। साझा जोखिम और करों पर उनका तर्क अस्पतालों की वित्तीय स्थिति के सत्यापित निष्कर्ष से अलग रखा जाना चाहिए।

उन्हें याद है कि योजना शुरू होने से पहले मरीज चिकित्सा बिल चुकाने के लिए खेत, घर और दूसरी संपत्तियां बेचते थे। उन्हें डर है कि अधिक शुल्क से परिवारों को फिर अपनी आजीविका बचाने और इलाज कराने में से एक चुनने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

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मरीजों के अनुभव अस्पताल के बिल से आगे की बात बताते हैं

27 जून, 2017 को प्रकाशित मरीजों के अनुभव बताते हैं कि अपेक्षाकृत कम शुल्क भी क्यों मायने रख सकता है। उस समय 60 वर्षीय बेरोजगार महिला निमजिन जारेनो ने बताया था कि उन्हें मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अस्थमा है तथा वह हर तीन महीने में अस्पताल जाती हैं। नियमित इलाज कराने वाले व्यक्ति के लिए भुगतान एक बार का आपातकालीन खर्च नहीं, बल्कि बार-बार होने वाला खर्च है।

निमजिन ने अनिवार्य अंशदान के बजाय अधिक संसाधन वाले लोगों से स्वैच्छिक मदद का समर्थन किया। मधुमेह के मरीजों को नाश्ता देने वाले एक अस्पताल में दान-पेटी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा:

लेकिन यह उनकी मर्जी होनी चाहिए। जिनके पास अधिक है, उन्हें कम वालों की मदद करनी चाहिए।

उस समय 76 वर्षीय किराना दुकान के मालिक बूनलर्न जारेमनुएरविट्टायाकुल को उच्च रक्तचाप था और उन्होंने बताया कि वह हर तीन या चार महीने में डॉक्टर से मिलते थे। उन्होंने आंख के एक इलाज को याद किया, जिस पर 9,000 बाट खर्च होते, लेकिन कार्ड के इस्तेमाल से उन्होंने 30 बाट दिए। यह किसी खास घटना का उनका विवरण है, सभी मरीजों पर लागू शुल्कों की सूची नहीं।

रोटी और कॉफी बेचने वाली वरापोर्न थोंगचली ने बताया कि चाकू से कट जाने पर उन्हें बिना भुगतान आपातकालीन उपचार मिला था। सुरक्षा गार्ड विराचा सिरिनाई ने कहा कि आने-जाने, खाने और अन्य खर्चों का असर इस फैसले पर पहले से पड़ता था कि वह अस्पताल जाएं या इसके बजाय फार्मेसी से दवा खरीदें।

अगस्त 2026 के अभियान में भी यही चिंता सामने आई। फायाओ विकास फाउंडेशन के सचिव लाफित रुएकदी ने चेतावनी दी कि अस्पतालों से दूर रहने वाले लोगों को यात्रा खर्च के साथ मरीजों का शुल्क भी देना पड़ेगा। यात्रा में ही जब परिवार की आमदनी का बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता है, तब अस्पताल का कम शुल्क भी चुकाना मुश्किल हो सकता है।

लाभ और बजट का फैसला कौन करे?

सुरिन में गोल्ड कार्ड अधिकार संरक्षण केंद्र की अध्यक्ष मीना दुआंगरासी ने चेतावनी दी कि संशोधित बोर्ड में सेवा प्रदाताओं की संख्या बढ़ सकती है और सार्वजनिक प्रतिनिधियों का हिस्सा घट सकता है। उन्हें चिंता है कि इससे सेवाओं, नीतियों और खर्च पर मरीजों का प्रभाव कम हो जाएगा।

उन्होंने बुनियादी लाभों और अन्य उपचारों के बीच संभावित अंतर पर भी सवाल उठाया। अगर कुछ दवाएं या सेवाएं बुनियादी पैकेज से बाहर हों, तो उन्हें डर है कि मरीजों से भुगतान मांगा जा सकता है, भले ही वह इलाज चिकित्सकीय रूप से जरूरी हो। इस जोखिम के कानूनी रूप से अनिवार्य होने का पता लगाने के लिए लागू संशोधन की सटीक भाषा देखनी होगी।

फार्मासिस्ट और सोंगखला उपभोक्ता संघ के उपाध्यक्ष चालोम केतचिंदा ने याद किया कि 2002 में गोल्ड कार्ड कानून के प्रस्ताव को विधायी प्रक्रिया में लाने में जनता के 50,000 हस्ताक्षरों ने मदद की थी। उन्होंने प्रति पात्र व्यक्ति अतिरिक्त धन, चिकित्सा कर्मचारियों को सहयोग और स्थानीय स्वास्थ्य कोषों के माध्यम से जनता की भागीदारी जारी रखने की अपील की। उनके अनुसार, मरीजों के हितों की पैरवी करने वालों और स्वास्थ्य कर्मचारियों को विरोधी पक्ष नहीं मानना चाहिए।

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यह विवाद कई वर्षों से लौटता रहा है

2026 का अभियान संशोधनों और मरीजों के अंशदान पर पहले हुई बहसों के बाद आया है। घटनाक्रम दिखाता है कि अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में भी ऐसी चिंताएं उठती रही हैं, हालांकि इन प्रस्तावों को एक ही लगातार चलने वाला विधेयक नहीं समझना चाहिए।

  • 2002: राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा अधिनियम ने इस विवाद के केंद्र में मौजूद कानूनी ढांचा बनाया।
  • 27 जुलाई, 2012: राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा बोर्ड ने 30 बाट के भुगतान का नोटिस जारी किया, जो 1 सितंबर से प्रभावी हुआ।
  • जून 2017: संशोधन पर सुनवाई के दौरान विरोध हुआ। कार्यकर्ताओं के बहिष्कार या विरोध में जुटने के बाद चार में से तीन सुनवाई रद्द कर दी गईं।
  • 12 फरवरी, 2019: खबरों के अनुसार, चार प्रमुख दलों के नेताओं ने इलाज की लागत का 10% से 20% मरीजों से लेने के प्रस्ताव का विरोध किया।
  • जुलाई और अगस्त 2026: सीनेट समिति ने संशोधन का प्रस्ताव रखा, जिसके बाद 26 अगस्त को उपभोक्ता परिषद ने विरोध कार्यक्रम किया।
  • अक्टूबर 2026: विमोन ने 5 अक्टूबर के मार्च में हिस्सा लिया और 12 अक्टूबर को प्रकाशित अपनी टिप्पणियों में फिर आपत्तियां जताईं।

2017 में प्रधानमंत्री प्रयुत चान-ओचा ने कहा था कि गोल्ड कार्ड बंद नहीं किया जाएगा। जन स्वास्थ्य मंत्री पियासाकोल सकोलसतायादोर्न ने कहा था कि संशोधन का लक्ष्य कुछ चिकित्सा सेवा प्रदाताओं की वित्तीय कुप्रबंधन की समस्या थी, कार्डधारक नहीं। ये आश्वासन प्रदर्शनकारियों और मरीजों की आशंकाओं से अलग थे; इनमें से कोई भी 2026 के अलग प्रस्ताव की विषयवस्तु स्थापित नहीं करता।

लाभार्थियों की संख्या के आंकड़े भी अलग-अलग हैं। विमोन ने 4.5 करोड़ से अधिक लाभार्थियों का जिक्र किया, जबकि अगस्त 2026 के अभियान में यह संख्या 4.7 करोड़ बताई गई। जून 2017 के मरीज संबंधी विवरण और फरवरी 2019 की राजनीतिक बहस में करीब 4.8 करोड़ की संख्या दी गई, जबकि जून 2017 की एक अलग वित्तीय चर्चा में करीब 4.9 करोड़ का उल्लेख था। नामांकन के एकसमान आंकड़ों के बिना इन अलग-अलग समय के अनुमानों को सत्यापित रुझान नहीं मानना चाहिए।

वित्तीय दबाव वास्तविक है, लेकिन पुराने आंकड़ों को संदर्भ में देखना होगा

खर्च के ऐतिहासिक आंकड़े दिखाते हैं कि वित्तपोषण बहस का हिस्सा क्यों बना हुआ है। यूनिवर्सल कवरेज का बजट 2003 में 55.3 अरब बाट से बढ़कर वित्त वर्ष 2017 में 165 अरब बाट हो गया। यह 109.7 अरब बाट, यानी करीब 198% की वृद्धि है। बाद का बजट पहले से लगभग तीन गुना था।

जून 2017 के एक वित्तीय विवरण में नकदी की कमी झेल रहे पांच अस्पतालों के लिए 5 अरब बाट के आपात आवंटन का भी जिक्र था। नकदी उपलब्धता का अर्थ है तत्काल खर्च चुकाने के लिए पर्याप्त धन होना। कोई योजना मरीजों को बिल से बचा सकती है, जबकि अलग-अलग सेवा प्रदाताओं को परिचालन खर्च चुकाने में फिर भी मुश्किल हो सकती है।

इसी विवरण में बताया गया था कि 2016 में 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों की हिस्सेदारी 14% थी और 2025 तक इसके एक चौथाई होने का अनुमान था। बुजुर्गों के कल्याण पर खर्च 2014 में 270 अरब बाट बताया गया था, जो 2024 तक 680 अरब बाट होने का अनुमान था। इस व्यापक कल्याण खर्च में पेंशन और भत्ते शामिल थे, सिर्फ गोल्ड कार्ड की स्वास्थ्य सेवाएं नहीं।

ये ऐतिहासिक आंकड़े और अनुमान थे, 2026 के सत्यापित नतीजे नहीं। ये बढ़ती उम्र वाली आबादी के वित्तपोषण को लेकर लंबे समय से बनी चिंता समझाते हैं, लेकिन यह साबित नहीं करते कि अभी मरीजों से अंशदान लेना जरूरी है।

2017 में साक्षात्कार दिए एक मरीज ने कहा था कि प्रति व्यक्ति आवंटन 1,500 से बढ़कर 3,200 बाट हो गया था। यह उनकी याद पर आधारित जानकारी है, मौजूदा आधिकारिक वित्तपोषण दर नहीं। आज के बजट का आकलन करने के लिए मौजूदा आवंटन, इलाज की लागत और सेवा प्रदाताओं के खाते चाहिए, जिनकी यहां पुष्टि नहीं है।

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विकल्पों में रोकथाम और तीनों कोषों पर जोर

फरवरी 2019 में मरीजों से शुल्क लेने का विरोध दलगत सीमाओं से परे था। फेउ थाई, पलांग प्रचारत, डेमोक्रेट पार्टी और फ्यूचर फॉरवर्ड ने 10% से 20% अंशदान के प्रस्ताव को खारिज किया, हालांकि स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए उनके तरीके अलग-अलग थे।

उस समय फेउ थाई की रणनीतिक समिति की अध्यक्ष खुनयिंग सुदारत केयुराफान ने रोकथाम, स्वास्थ्य संवर्धन और बेहतर बजट प्रबंधन की वकालत की। बैंकॉक में एक सेमिनार में उन्होंने कहा:

पार्टी स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था में रोकथाम और स्वास्थ्य संवर्धन के साथ-साथ जनता की व्यापक भागीदारी पर जोर देगी,

उस समय पलांग प्रचारत के उपनेता सुवित मैसिन्सी ने खरीद व्यवस्था में बदलाव करके दवाओं और आपूर्तियों की लागत घटाने तथा तीनों मुख्य स्वास्थ्य कोषों को करीब लाने का प्रस्ताव रखा। ये कोष सरकारी कर्मचारियों, सामाजिक सुरक्षा में नामांकित कर्मचारियों और यूनिवर्सल कवरेज के तहत आने वाले लोगों को कवर करते हैं। उन्होंने मरीजों को किसी भी अस्पताल में सेवाएं लेने की अनुमति देने का भी समर्थन किया।

तत्कालीन डेमोक्रेट नेता अभिसित वेज्जाजीवा ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा कार्यालय के लिए पर्याप्त धन की मांग की। उनका तर्क था कि किसी भी अतिरिक्त बोझ का भुगतान उन उत्पादकों को करना चाहिए जिनके उत्पाद बीमारी में योगदान देते हैं, मरीजों को नहीं। फ्यूचर फॉरवर्ड के नेता थानाथोर्न जुआंगरूंगरुआंगकित ने कहा कि 2.33 लाख करोड़ बाट का वार्षिक राष्ट्रीय बजट इस योजना के वित्तपोषण के लिए पर्याप्त था। यह उस समय बताए गए बजट पर आधारित राजनीतिक रुख था, मौजूदा वित्तीय आकलन नहीं।

अगस्त 2026 में कंचनाबुरी उपभोक्ता अधिकार संरक्षण केंद्र के अध्यक्ष सुन्थोर्न सुरियो ने लाभों में अंतर घटाने के लिए तीनों कोषों को मिलाने का प्रस्ताव फिर रखा। बार-बार सामने आने वाला विकल्प यह है कि मरीजों से अधिक शुल्क लेने से पहले सार्वजनिक धन जुटाने, बांटने और खर्च करने के तरीकों में सुधार किया जाए।

अगला निर्णायक कदम संशोधन के सटीक प्रावधानों का प्रकाशन और उन पर संसद में विचार होगा। प्रस्ताव पेश किए जाने की उम्मीद सितंबर और अक्टूबर 2026 में थी, लेकिन किसी पुष्ट मतदान, स्वीकृत अंशदान दर या लागू होने की तारीख की पुष्टि नहीं है। इन विवरणों के तय होने तक अभियान की चेतावनियों को पहले से लागू कानूनी बदलावों से अलग समझना चाहिए।

मुख्य बिंदु

  • साई माई की सामुदायिक नेता विमोन थाविनपोंग ने सांसदों से ऐसे संशोधन रोकने की अपील की, जिनसे मरीजों पर अतिरिक्त शुल्क लग सकता है।
  • उनके उदाहरण में 3,000 बाट के बिल का 10% हिस्सा 300 बाट है, जो इतनी रकम पाने वाले व्यक्ति की एक दिन की कमाई के बराबर है।
  • 2012 के आधिकारिक नोटिस में 30 बाट का तय शुल्क निर्धारित था, जिसमें गरीब लोगों और निर्दिष्ट आपातकालीन उपचार समेत कुछ छूटें शामिल थीं।
  • अभियानकर्ता सार्वजनिक प्रतिनिधित्व घटने और कवर किए जाने वाले लाभों पर संभावित पाबंदियों का भी विरोध कर रहे हैं।
  • ऐतिहासिक बजट में खर्च की बड़ी वृद्धि दिखती है, लेकिन इससे योजना की मौजूदा वित्तीय स्थिति स्थापित नहीं होती।
  • 2026 के प्रस्ताव के लिए अंतिम भुगतान दर, छूट व्यवस्था या संसद में किसी पुष्ट मतदान की जानकारी उपलब्ध नहीं है।
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