ऑस्ट्रेलियाई मां का आरोप: चार साल की बेटी के मृत मिलने से पहले दक्षिण कोरियाई पुलिस ने उनकी अपीलों को अनसुना किया

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Australian Mother Says South Korean Police Ignored Appeals Before Four-Year-Old Daughter Was Found Dead

बेटी को लौटाने का आदेश उसे घर नहीं ला सका

दक्षिण कोरिया के जेजू द्वीप के सोग्विपो में प्योसॉन-म्योन के पास 12 अक्टूबर को शाम करीब 6:08 बजे एक चार साल की बच्ची और उसके पिता एक खड़ी कार में मृत पाए गए। उसकी ऑस्ट्रेलियाई मां का कहना है कि बच्ची को ढूंढ़ने, उसकी सुरक्षा की जांच करने और उसे पिता से अलग करने के लिए वह महीनों तक पुलिस से गुहार लगाती रही थीं, जबकि अदालत से उसकी वापसी का आदेश भी मिल चुका था।

विषय-सूची
  1. बेटी को लौटाने का आदेश उसे घर नहीं ला सका
  2. बच्ची दक्षिण कोरिया कैसे पहुंची
  3. लापता होने की रिपोर्ट और थोड़ी देर की कुशलक्षेम जांच
  4. पहले का दुर्व्यवहार संबंधी आरोप सामने आया
  5. ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों के जरिए भी जारी रहीं गुजारिशें
  6. जाने की बताई गई योजना के बाद तत्काल कार्रवाई की मांग
  7. 12 अक्टूबर से पहले की घटनाओं का क्रम
  8. मुख्य बातें

बी. के रूप में पहचानी गई मां ने कहा कि उन्हें 30 मार्च को पहली बार अनुकूल फैसला मिला और 30 सितंबर को अपील में भी जीत हासिल हुई। उन्होंने 2 अक्टूबर को जेजू प्रांतीय पुलिस एजेंसी से संपर्क कर अधिकारियों से बेटी को ढूंढ़ने और उसकी सुरक्षा के लिए कदम उठाने को कहा। उनके मुताबिक, उन्हें बताया गया कि अभी किसी अधिकारी को जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई है और कोई बाद में उन्हें फोन करेगा। उन्होंने कहा कि वह फोन कभी नहीं आया।

13 अक्टूबर को बात करते हुए बी. ने बताया कि वह दक्षिण कोरियाई पुलिस से मदद पाने की बार-बार कोशिश कर रही थीं और साथ ही ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों से भी सहायता मांग रही थीं। उन्होंने कहा कि वह इतना रो चुकी थीं कि अब आंसू भी नहीं बचे थे।

कोरियाई पुलिस न तो मेरी कॉल का जवाब देती थी, न ही मेरी गुजारिशों पर कार्रवाई करती थी। उन्होंने बस मुझे अनदेखा किया। मैं और क्या कर सकती थी?

परिवार का आरोप है कि पिता ने बच्ची की हत्या की। खबरों के मुताबिक, वाहन के भीतर चारकोल की एक ब्रिकेट और उन्हें दी गई अवसादरोधी दवा की बिना खुली हुई खुराक मिली। ये चीजें अपने आप में मौतों का चिकित्सकीय कारण या उनका क्रम साबित नहीं करतीं। मामले की खबरों में किसी पूरी हुई फॉरेंसिक जांच के निष्कर्षों का उल्लेख नहीं है।

मुख्य विवाद इस बात को लेकर है कि 12 अक्टूबर से पहले अधिकारियों को क्या जानकारी थी और उन्होंने उस पर क्या कार्रवाई की। पुलिस ने कहा कि वह घटनाक्रम का ब्यौरा जुटाकर बाद में जानकारी देगी। इस कारण 13 अक्टूबर की खबरों के समय मां के आरोपों पर पुलिस की ओर से कोई विस्तृत सार्वजनिक जवाब नहीं आया था।

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बच्ची दक्षिण कोरिया कैसे पहुंची

ए. के रूप में पहचाने गए पिता, जिनकी उम्र 40 के आसपास बताई गई है, ऑस्ट्रेलिया में रहते थे। परिवार के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया में तलाक की कार्यवाही और बच्चे की अभिरक्षा को लेकर विवाद के दौरान, पिछले साल अक्टूबर के आखिर में वह बी. की सहमति के बिना बेटी को दक्षिण कोरिया ले आए।

बी. ने हेग कन्वेंशन के तहत बच्ची की वापसी का मामला दायर किया। आम तौर पर इस प्रक्रिया में यह तय किया जाता है कि अंतरराष्ट्रीय सीमा पार ले जाए गए बच्चे को उस देश में लौटाया जाना चाहिए या नहीं जहां वह आम तौर पर रहता था। वापसी की कार्यवाही, इस बारे में अंतिम फैसले से अलग होती है कि बच्चे की अभिरक्षा किस अभिभावक को मिलनी चाहिए।

एक विवरण में 30 मार्च के फैसले को सियोल फैमिली कोर्ट का आदेश बताया गया है, जिसने जबरन अमल की अनुमति दी थी। एक अन्य विवरण में कार्यवाही को ऑस्ट्रेलिया में हुई बताते हुए इसे अभिरक्षा संबंधी फैसला कहा गया है। इसलिए, अदालत और उस फैसले की प्रकृति को लेकर उपलब्ध विवरण अलग-अलग हैं। बी. के मुताबिक, उनकी कानूनी कार्रवाई हेग कन्वेंशन के तहत बच्ची की वापसी का मामला थी और 30 सितंबर को दूसरी अपील में भी उन्हें जीत मिली।

बी. अप्रैल में बेटी को घर लाने के लिए दक्षिण कोरिया गईं। तब तक ए. सियोल से सोग्विपो जा चुके थे। उन्होंने कहा कि वह बच्ची को लेकर लगातार अलग-अलग जगहों पर जाते रहे, जिससे वापसी के आदेश को लागू करना मुश्किल हुआ।

लापता होने की रिपोर्ट और थोड़ी देर की कुशलक्षेम जांच

बी. के मुताबिक, उन्होंने 13 अप्रैल को बच्ची के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी, जबकि अन्य विवरणों में इसे अप्रैल की शुरुआत में दर्ज कराया गया बताया गया है। उन्होंने सोग्विपो पुलिस से बेटी को ढूंढ़ने और अदालत के फैसले को लागू कराने में मदद मांगी।

बी. के अनुसार, पुलिस ने वीडियो कॉल के जरिए पिता और बच्ची से संपर्क किया, फिर यह मानकर लापता होने का मामला बंद कर दिया कि बच्ची सुरक्षित है। उनका कहना है कि पुलिस ने यह पता नहीं लगाया कि उनकी बेटी वास्तव में कहां रह रही थी और शुरुआत में व्यक्तिगत रूप से उसकी परिस्थितियों की पुष्टि भी नहीं की।

और गुजारिशों के बाद, अप्रैल में पुलिस ने ए. और बच्ची को कुशलक्षेम जांच के लिए एक पुलिस चौकी बुलाया। बी. ने बताया कि यह मुलाकात करीब दो मिनट चली और इसके बाद बच्ची के ठिकाने का पता लगाने या उसे पिता से अलग करने के लिए आगे कोई कोशिश नहीं की गई।

इस मुलाकात का एक अहम पहलू यह है कि आरोप यह नहीं है कि पुलिस का बच्ची से कभी संपर्क ही नहीं हुआ। आरोप यह है कि उस संपर्क से बेटी की लगातार सुरक्षा को लेकर मां की चिंताओं का समाधान नहीं हुआ और अदालत का वापसी आदेश भी लागू नहीं हो सका। बी. ने कहा कि किसी ने यह जांच नहीं की कि पिता-बेटी मोटलों में जगह बदलते हुए रह रहे थे या खुले में सो रहे थे। ये ऐसी चिंताएं थीं जिनकी वह जांच चाहती थीं, न कि उनके रहने की स्थिति के बारे में पुष्ट तथ्य।

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पहले का दुर्व्यवहार संबंधी आरोप सामने आया

ए. के खिलाफ बाल दुर्व्यवहार का संदेह जताने वाली रिपोर्ट 22 मार्च को दर्ज हुई थी, यानी अप्रैल में बी. के पुलिस से मदद मांगने से पहले। बताया गया कि चिंता इस बात को लेकर थी कि बच्ची लगातार रोती रहती थी। इस आरोप के बाद पुलिस और सोग्विपो सिटी ने कथित तौर पर दो बार मौके पर जाकर जांच की।

दुर्व्यवहार के संदेह की रिपोर्ट अपने आप में इस बात का निष्कर्ष नहीं है कि दुर्व्यवहार हुआ था। फिर भी, मां की शिकायत के संदर्भ में इसका होना अहम है, क्योंकि अधिकारियों को पहले ही उसी बच्ची और पिता को लेकर एक चिंता बताई जा चुकी थी।

बी. ने कहा कि मार्च के इस आरोप के बारे में उन्हें ऑस्ट्रेलिया लौटने के बाद ही पता चला। उन्होंने कहा कि दक्षिण कोरिया में बच्ची के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराते समय पुलिस ने उन्हें इसकी जानकारी नहीं दी थी।

मूल विवरण में यह भी कहा गया है कि बी. की पूछताछ के जवाब में न्याय मंत्रालय ने पाया कि मार्च के दुर्व्यवहार संबंधी आरोप या बच्ची को ढूंढ़ने की उनकी जून की गुजारिश के बारे में पुलिस रिपोर्टें लिखी ही नहीं गई थीं। अन्य विवरणों में लापता बताया गया दस्तावेज खास तौर पर दुर्व्यवहार की जांच के बाद तैयार होने वाली परिणाम रिपोर्ट है। मंत्रालय का कोई दस्तावेज यहां प्रकाशित नहीं है, इसलिए उसके निष्कर्ष का सटीक दायरा तय नहीं किया जा सकता।

बी. ने कहा कि 13 अक्टूबर को उन्होंने पुलिस से पूछा कि पहले के आरोप के बारे में उन्हें क्यों नहीं बताया गया था। उनके मुताबिक, अधिकारियों ने माना कि उन्होंने इसकी जांच नहीं की थी और माफी मांगी। उन्होंने कहा कि जांच के नतीजों की रिपोर्ट न होने की कोई वजह उन्हें नहीं बताई गई।

ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों के जरिए भी जारी रहीं गुजारिशें

ऑस्ट्रेलिया लौटने के बाद भी बी. ने ऑस्ट्रेलियाई दूतावास और अन्य अधिकारियों के जरिए बेटी के ठिकाने और सुरक्षा के बारे में जानकारी मांगना जारी रखा। उन्होंने कहा कि बच्ची को ढूंढ़ने और संभावित दुर्व्यवहार की जांच के लिए ऑस्ट्रेलियाई पुलिस ने अप्रैल और जुलाई में इंटरपोल के जरिए दक्षिण कोरियाई पुलिस से अनुरोध किया था।

इंटरपोल राष्ट्रीय पुलिस बलों के बीच सहयोग का माध्यम उपलब्ध कराता है। इस माध्यम से अनुरोध भेजे जाने भर से यह पता नहीं चलता कि अधिकारियों ने कौन-सी जांच पूरी की, उन्हें बच्ची मिली या नहीं, अथवा उसके बाद सुरक्षा के लिए क्या कार्रवाई हुई। इसलिए, बताए गए अनुरोधों और किसी पुष्ट जवाब के बीच फर्क करना जरूरी है।

बी. ने यह भी कहा कि उन्होंने मई और जून में जेजू पुलिस को बार-बार फोन कर अपने पूर्व पति की स्थिति को लेकर चिंता जताई और बच्ची को उनसे अलग करने की मांग की। परिवार के मुताबिक, एक दुर्घटना के बाद ए. को पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस के इलाज के लिए दवा दी गई थी। बी. ने बाद में अधिकारियों से कहा कि उन्हें लगता है कि वह अपनी दवा ठीक से नहीं ले रहे थे।

ये बातें मां की ओर से जताई गई चिंताओं का ब्यौरा हैं, न कि स्वतंत्र रूप से स्थापित चिकित्सकीय आकलन। किसी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी निदान या दवा के नुस्खे से अकेले यह साबित नहीं होता कि व्यक्ति हिंसा का जोखिम है। उनकी शिकायत का सवाल यह है कि क्या अधिकारियों ने खास चेतावनियों, पहले के दुर्व्यवहार संबंधी आरोप और लंबित वापसी कार्यवाही के जवाब में बच्ची की सुरक्षा का आकलन किया था।

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जाने की बताई गई योजना के बाद तत्काल कार्रवाई की मांग

खबरों के मुताबिक, 2 अक्टूबर को ए. ने सोग्विपो के बच्ची के डेकेयर केंद्र से संपर्क कर कहा कि वे अमेरिका जा रहे हैं, इसलिए बच्ची अब वहां नहीं आएगी। बी. को इस संदेश का पता चला और उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई दूतावास के जरिए तत्काल कार्रवाई की मांग की।

बताया गया कि ऑस्ट्रेलियाई अदालत ने 3 अक्टूबर को बच्ची का पासपोर्ट रद्द कर दिया, ताकि उसे देश से बाहर जाने से रोका जा सके। इस कदम का मकसद विदेश जाने की आशंका को रोकना था। इससे यह पता नहीं चला कि बच्ची दक्षिण कोरिया में कहां रह रही थी और न ही सुरक्षा के लिए हस्तक्षेप की मां की मांग का समाधान हुआ।

बी. ने कहा कि 2 अक्टूबर को उन्होंने ए. के अमेरिका जाने की योजना, उनके व्यवहार को लेकर अपनी चिंताओं और बेटी को ढूंढ़कर उसकी सुरक्षा करने की जरूरत के बारे में जेजू प्रांतीय पुलिस एजेंसी से भी संपर्क किया। उन्होंने कहा कि 13 अक्टूबर तक, यानी शव मिलने के अगले दिन तक, उन्हें कोई फोन नहीं आया था।

जाने की बताई गई योजना 30 सितंबर को अपील में मिली जीत के महज दो दिन बाद सामने आई। दो हफ्ते से भी कम समय में, अदालत से अनुकूल फैसला और पासपोर्ट रद्द करने की तत्काल कार्रवाई के बाद बच्ची की मौत हो गई।

12 अक्टूबर से पहले की घटनाओं का क्रम

बताए गए घटनाक्रम से कई महीनों के दौरान कानूनी और पुलिस अधिकारियों से बार-बार संपर्क किए जाने का पता चलता है। कुछ विवरण, जिनमें अप्रैल में लापता होने की रिपोर्ट की सही तारीख और मार्च का फैसला देने वाली अदालत शामिल हैं, अलग-अलग विवरणों में भिन्न हैं।

  • पिछले साल अक्टूबर का अंत: ए. कथित तौर पर बी. की सहमति के बिना बच्ची को ऑस्ट्रेलिया से दक्षिण कोरिया ले आए।
  • 22 मार्च: बाल दुर्व्यवहार के संदेह का आरोप दर्ज हुआ। पुलिस और सोग्विपो सिटी ने कथित तौर पर दो बार मौके पर जाकर जांच की।
  • 30 मार्च: बी. को अनुकूल फैसला मिला, जिससे कथित तौर पर जबरन अमल की अनुमति मिली। हालांकि, अदालत और कार्यवाही को लेकर विवरण अलग-अलग हैं।
  • अप्रैल: बी. दक्षिण कोरिया गईं, पुलिस से मदद मांगी और बच्ची के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज कराई, जिसकी तारीख वह 13 अप्रैल बताती हैं। पुलिस ने वीडियो कॉल पर और बाद में एक चौकी में बच्ची से संपर्क किया।
  • अप्रैल से जुलाई: बी. के मुताबिक, उन्होंने सुरक्षा के लिए गुजारिशें जारी रखीं। ऑस्ट्रेलियाई पुलिस ने भी अप्रैल और जुलाई में इंटरपोल के जरिए दक्षिण कोरियाई अधिकारियों से संपर्क किया।
  • 30 सितंबर: बी. के मुताबिक, बच्ची की वापसी के मामले में उन्हें एक और अपील में जीत मिली।
  • 2 और 3 अक्टूबर: ए. ने कथित तौर पर अमेरिका जाने की घोषणा की। बी. ने पुलिस से सुरक्षा मांगी और बताया गया कि अगले दिन ऑस्ट्रेलियाई अदालत ने बच्ची का पासपोर्ट रद्द कर दिया।
  • 12 अक्टूबर: बच्ची और उसके पिता शाम करीब 6:08 बजे एक खड़ी कार में मृत पाए गए।

पुलिस के वादे के मुताबिक ब्यौरा देने की कोई तारीख नहीं बताई गई और किसी पूरी हुई जांच के निष्कर्ष से यह स्थापित नहीं होता कि पहले की हर गुजारिश पर क्या कार्रवाई हुई। अनसुलझे सवालों में लापता दस्तावेज, विभिन्न एजेंसियों के बीच साझा की गई जानकारी और मौतों से पहले बच्ची को पिता से अलग न करने या उसे वापस न लाने के कारण शामिल हैं।

मुख्य बातें

  • चार साल की बच्ची और उसके पिता 12 अक्टूबर को सोग्विपो में एक कार के भीतर मृत पाए गए।
  • उसकी मां का कहना है कि बच्ची को ढूंढ़ने और उसकी सुरक्षा करने की बार-बार की गई गुजारिशों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
  • बाल दुर्व्यवहार के संदेह में 22 मार्च को दर्ज रिपोर्ट के बाद कथित तौर पर दो बार मौके पर जांच हुई, लेकिन बी. का कहना है कि अप्रैल में मदद मांगते समय उन्हें इसके बारे में नहीं बताया गया।
  • बी. को बच्ची की वापसी के मामले में अनुकूल फैसले मिले, जिनमें 30 सितंबर को अपील में मिली जीत भी शामिल है, लेकिन बेटी वापस नहीं लौटी।
  • अमेरिका जाने की योजना सामने आने के बाद, बताया गया कि ऑस्ट्रेलियाई अदालत ने 3 अक्टूबर को बच्ची का पासपोर्ट रद्द कर दिया।
  • पुलिस ने बाद में स्पष्टीकरण देने का वादा किया। खबरों में मौत का कारण और पहले की चेतावनियों पर हुई पूरी कार्रवाई स्थापित नहीं हुई।
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