रोजमर्रा के पानी में जानलेवा खतरा
इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में कई परिवारों के लिए पीने के पानी का एक साधारण-सा गिलास जानलेवा साबित हुआ। दूषित पानी ने लोगों की जान ली और सैकड़ों को अस्पताल पहुंचा दिया। यह त्रासदी मध्य भारत के इंदौर शहर में सामने आई है, जिसे लगातार आठ वर्षों तक देश का सबसे स्वच्छ शहर चुना गया है। शहर की प्रतिष्ठित छवि और अब वहां के निवासियों के सामने आई जानलेवा हकीकत के इस तीखे विरोधाभास ने शहरी बुनियादी ढांचे और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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आधिकारिक रिपोर्टों में मृतकों की संख्या चार से नौ के बीच बताई गई है, हालांकि निवासियों का दावा है कि यह आंकड़ा 15 तक हो सकता है। गंभीर जठरांत्र संबंधी लक्षणों के चलते 200 से अधिक लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जबकि 2,400 से ज्यादा लोगों ने दूषित जलापूर्ति से जुड़ी बीमारी की शिकायत की है। इस प्रकोप से भागीरथपुरा के हजारों निवासी प्रभावित हुए हैं। यह मुख्य रूप से कम आय वाले परिवारों का इलाका है, जहां अब लोगों को अपने नलों से आने वाला पीने का पानी तक असुरक्षित लग रहा है।
यह संकट दिसंबर के अंत में शुरू हुआ, जब निवासियों ने दस्त, उल्टी और बुखार के गंभीर मामलों की सूचना देनी शुरू की। दहशत फैलने के साथ ही आपात जांच शुरू की गई और चिकित्सा दल प्रभावित लोगों की पहचान के लिए घर-घर पहुंचे। 2 जनवरी तक स्वास्थ्य अधिकारियों ने करीब 40,000 निवासियों की जांच की और हजारों संदिग्ध मामले दर्ज किए।
परिवारों ने खोए अपने प्रियजन
आधिकारिक आंकड़ों के पीछे ऐसे घर हैं, जहां सन्नाटा, सदमा और अनुत्तरित सवाल पसरे हैं। मरने वालों में छह महीने का अव्यान भी शामिल है, जिसका जन्म उसके परिवार के एक दशक के इंतजार के बाद हुआ था। शिशु के पिता सुनील साहू समझ नहीं पा रहे हैं कि उनके बेटे की जिंदगी इतनी जल्दी कैसे छिन गई।
"उसे दस्त और बुखार था। हम 26 दिसंबर को उसे डॉक्टर के पास ले गए। दवाओं से फायदा हुआ और वह दो दिन तक ठीक लगा," साहू ने रुंधे गले से याद किया। "लेकिन अचानक एक रात उसे बहुत तेज बुखार हो गया। उसे उल्टी हुई और 29 दिसंबर को घर पर ही उसकी मौत हो गई।"
बीबीसी की खबरों के मुताबिक, अव्यान को स्तनपान कराया जा रहा था, लेकिन उसे नल के पानी में मिलाकर गाय का दूध भी दिया गया था। परिवार ने शिशु को दूध देने से पहले मिश्रण उबाल लिया था और उन्हें लगा था कि इससे वह सुरक्षित हो जाएगा। उन्हें पता नहीं था कि पाइपों से आने वाले पानी में जानलेवा दूषित तत्व मौजूद थे।
पिता ने परिवार के दुख की गहराई बयां करते हुए कहा, "मेरी पहले से एक बेटी है। यह बेटा इतने सालों बाद हुआ था। वह सिर्फ छह महीने का था।"
दूसरे परिवारों की कहानियां भी अचानक हुए इसी तरह के विनाशकारी नुकसान की दास्तां सुनाती हैं। सुधा पाल ने दूषित पानी पीने के बाद अपने पिता की मौत का जिक्र करते हुए बताया कि गंभीर दस्त और उल्टी से पीड़ित होने के बाद उनका निधन हो गया। उन्होंने कहा, "उन्हें न तो दिल का दौरा पड़ा था, न कोई और बीमारी थी। यह सिर्फ दस्त और उल्टी की वजह से हुआ।" उन्होंने बताया कि उनकी हालत इतनी तेजी से बिगड़ी कि वह अपने पैरों पर खड़े भी नहीं हो पा रहे थे।
इलाके के दर्जी संजय यादव ने बताया कि 26 दिसंबर की शाम उनकी 69 वर्षीय मां को उल्टी होने लगी। यादव ने कहा, "हम उन्हें अस्पताल ले गए, लेकिन 24 घंटे से भी कम समय में उनकी मौत हो गई।" उनका 11 महीने का बेटा भी बीमार पड़ गया।
प्रभावित मोहल्ले में ऐसी दर्दनाक कहानियां हर तरफ सामने आई हैं। आर्थिक रूप से कमजोर तबके के निवासियों को इस त्रासदी का सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ा है। अस्पताल का हर चक्कर इस डर के साथ था कि कहीं कोई और प्रियजन न छिन जाए। परिवार अपने रिश्तेदारों को ऐसी बीमारियों से जूझते हुए बेबस होकर देखते रहे, जिनसे बचा जा सकता था।
पीने के पानी में सीवेज: तकनीकी विफलता
जांच में सामने आया है कि बुनियादी ढांचे की एक गंभीर खामी के कारण पानी दूषित हुआ। रॉयटर्स और द गार्जियन की खबरों के मुताबिक, "पानी की टंकी से आने वाली मुख्य पाइपलाइन में सीवेज मिल रहा था।" इसकी खास वजह यह थी कि पुलिस चौकी के पास पीने के पानी की मुख्य पाइपलाइन के ठीक ऊपर एक शौचालय बनाया गया था और वहां अनिवार्य सेप्टिक टैंक नहीं था। इससे सीवेज रिसकर जलापूर्ति में मिल गया।
इंदौर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी माधव प्रसाद हसनानी ने रॉयटर्स को बताया कि भागीरथपुरा इलाके का पीने का पानी रिसाव के कारण दूषित हुआ था और पानी की जांच में पाइपलाइन में बैक्टीरिया की पुष्टि हुई। हसनानी ने कहा, "मृतकों की संख्या के बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता, लेकिन हां, उसी इलाके के 200 से अधिक लोगों का शहर के अलग-अलग अस्पतालों में इलाज चल रहा है।"
जिला प्रशासनिक अधिकारी श्रवण वर्मा ने पुष्टि की कि अधिकारियों ने रिसाव का एक ऐसा स्थान खोजकर ठीक किया, जिससे पानी दूषित हो सकता था। वर्मा ने कहा, "हमें रिसाव का एक ऐसा स्थान मिला है, जिससे पानी दूषित हो सकता था। उसे ठीक कर दिया गया है।"
द गार्जियन में उद्धृत एक चिकित्सा अधिकारी के मुताबिक, पानी की जांच में "सीवेज के पानी में आम तौर पर पाए जाने वाले असामान्य बैक्टीरिया की मौजूदगी की पुष्टि हुई, जिसमें मानव मल-मूत्र शामिल था।" इस निष्कर्ष से समझ आता है कि पूरे इलाके के निवासियों को जठरांत्र संबंधी गंभीर लक्षण क्यों हुए।
यह त्रासदी शहरी बुनियादी ढांचे की एक गंभीर कमजोरी उजागर करती है: पुरानी पाइपलाइनें और बिना उचित योजना के किया गया निर्माण, सीवेज और पीने के पानी की आपूर्ति एक-दूसरे के संपर्क में आने पर जानलेवा हालात पैदा कर सकते हैं। बताया जाता है कि इलाके की कई पाइपलाइनें 30 साल से ज्यादा पुरानी हैं, जिससे रिसाव का पता लगाना और उसकी मरम्मत करना मुश्किल हो जाता है।
चेतावनियों पर नहीं दिया गया ध्यान
इस त्रासदी का शायद सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इसे रोका जा सकता था। मीडिया खबरों के मुताबिक, भागीरथपुरा के निवासियों ने दस्त का प्रकोप संकट बनने से दो महीने से भी ज्यादा पहले से बदबूदार और दूषित पानी की शिकायत की थी।
इस त्रासदी में अपनी बहन को खोने वाले जितेंद्र प्रजापत ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा, "पिछले एक हफ्ते से पानी का स्वाद कड़वा, लगभग धातु जैसा था। मेरी बहन ने इसकी शिकायत की थी। मैंने और मेरे पड़ोसियों ने भी शिकायत की थी। हमें लगा शायद उन्होंने बहुत ज्यादा क्लोरीन या कोई शुद्धिकरण रसायन मिला दिया होगा। हमने यह सोचकर पानी उबाला कि इससे वह सुरक्षित हो जाएगा।"
निवासियों ने बताया कि मौतें होने से कई हफ्ते पहले से पानी से बदबू आ रही थी और उसका रंग भी असामान्य था। फिर भी नगर अधिकारियों ने इन चेतावनियों को कथित तौर पर नजरअंदाज किया या खारिज कर दिया। निवासियों के मुताबिक, शिकायतें "लालफीताशाही के भूलभुलैया" में फंसकर रह गईं।
एबीपी न्यूज की जांच में 2019 से बार-बार दी गई चेतावनियों, मरम्मत में देरी और ऑडिट की अनदेखी की गई सिफारिशों का खुलासा हुआ। लापरवाही के इस सिलसिले में जिम्मेदार अधिकारियों ने शुरुआती चेतावनियों और चिंताओं पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं की, जिससे एक ऐसी स्थिति जानलेवा आपदा में बदल गई जिसे रोका जा सकता था।
इससे भी गंभीर खुलासा यह है कि पुरानी पाइपलाइन बदलने के लिए अगस्त में निविदा जारी की गई थी, लेकिन प्रशासनिक देरी के कारण वह चार महीने तक अटकी रही। प्रकोप पूरी तरह आपात स्थिति बनने के बाद ही इस प्रक्रिया को तेज किया गया।
इंदौर नगर निगम पार्षद कमल वाघेला ने कहा, "प्रथम दृष्टया यह मामला कर्तव्य की घोर उपेक्षा का है।"
पानी की गुणवत्ता को लेकर नागरिकों की शिकायतों पर कार्रवाई न करना, शासन की सबसे बुनियादी जिम्मेदारी यानी सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने में विफलता को दर्शाता है।
सरकार की प्रतिक्रिया और जवाबदेही
संकट के जवाब में मध्य प्रदेश सरकार ने कई कदमों की घोषणा की है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि "लापरवाही" बर्दाश्त नहीं की जाएगी और अनुशासनात्मक कार्रवाई की घोषणा की। राज्य सुधारात्मक कदम लागू करने की तैयारी कर रहा है।
सरकार ने मृतकों के परिवारों के लिए ₹2 लाख की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की है और सभी मरीजों का मुफ्त इलाज सुनिश्चित करने का आश्वासन दिया है। नगर निगम के कई अधिकारियों को निलंबित या बर्खास्त किया गया है। इनमें नगर आयुक्त दिलीप कुमार यादव, अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के प्रभारी अधीक्षण अभियंता संजीव श्रीवास्तव शामिल हैं।
मुख्यमंत्री यादव ने मीडिया से कहा, "यह घटना होनी ही नहीं चाहिए थी। हमने मामले की जांच के लिए एक समिति बनाई है और यह सुनिश्चित करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी कि ऐसा दोबारा न हो।"
स्थानीय नगर निगम फिलहाल टैंकरों के जरिए भागीरथपुरा में पानी पहुंचा रहा है और निवासियों को अगली सूचना तक नल का पानी इस्तेमाल न करने की सलाह दी गई है। स्वास्थ्य दल घर-घर जाकर ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन (ओआरएस) के पैकेट और पानी को शुद्ध करने में मदद के लिए क्लोरीन की गोलियां बांट रहे हैं।
हालांकि, विपक्षी नेताओं ने सरकार की प्रतिक्रिया की आलोचना की है। कांग्रेस के जीतू पटवारी ने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा, "स्वच्छ पानी कोई एहसान नहीं, जीवन का अधिकार है।"
पटवारी ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा, "इंदौर के लोगों ने लगातार भाजपा को वोट दिया, लेकिन बदले में उन्हें जहरीला पानी मिला।"
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस घटना का स्वतः संज्ञान लिया है और इसे नागरिकों के सुरक्षित पेयजल के अधिकार के संभावित उल्लंघन से जुड़ा गंभीर मामला बताया है। आयोग ने मध्य प्रदेश सरकार से दो हफ्ते के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
चिकित्सा सहायता और मौजूदा हालात
मरीजों की अचानक बढ़ी संख्या के इलाज के दौरान इंदौर के अस्पतालों पर क्षमता से ज्यादा दबाव पड़ा। कई मरीज ठीक होने के बाद अस्पताल से छुट्टी पा चुके हैं, लेकिन दर्जनों अब भी निगरानी में हैं। शहर प्रशासन ने खास तौर पर भागीरथपुरा के निवासियों के लिए अरबिंदो अस्पताल में 100 अतिरिक्त बिस्तरों की व्यवस्था की।
जिला मजिस्ट्रेट शिवम वर्मा ने चिकित्सा सहायता के पैमाने का ब्योरा देते हुए कहा, "करीब 149 लोग अस्पतालों में भर्ती हैं… हमारी सर्वेक्षण टीम घर-घर जा रही है। कल तक 2,700 घरों का सर्वेक्षण किया जा चुका था।"
यह पता लगाने के लिए सर्वेक्षण आसपास के इलाकों तक बढ़ाया गया है कि क्या दूषण भागीरथपुरा से बाहर भी फैला है। एएनएम और आशा कार्यकर्ता एहतियात के तौर पर निवासियों को ओआरएस बांट रही हैं।
जिला मजिस्ट्रेट वर्मा ने कहा, "हमारी सर्वेक्षण टीम आसपास के इलाकों का भी दौरा कर रही है। एएनएम और आशा कार्यकर्ता भी घर-घर जाकर लोगों को ओआरएस बांट रही हैं।"
अधिकारियों ने 8,500 से अधिक लोगों की जांच की है और लक्षणों वाले सैकड़ों लोगों की पहचान की है। ताजा खबरों के मुताबिक, शहर के अस्पतालों में 200 से अधिक लोग भर्ती हैं, जिनमें से कई गहन चिकित्सा इकाइयों में हैं। हालांकि, जिला प्रशासन ने बताया है कि मरीज ठीक हो रहे हैं और गंभीर हालत में भर्ती लोगों की स्थिति में सुधार आया है।
चिकित्सा प्रयासों के बावजूद भागीरथपुरा के निवासियों का पीने के पानी जैसी बुनियादी जरूरत पर भरोसा गहराई से डगमगा गया है। सरकार की ओर से अब टैंकरों के जरिए दिए जा रहे पानी को पीने से भी कई लोग डर रहे हैं।
जल सुरक्षा पर व्यापक असर
इंदौर की त्रासदी ऐसे समय में हुई है जब देशभर में जल सुरक्षा को लेकर व्यापक चिंताएं हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली सरकार की सार्वजनिक जल-परीक्षण प्रयोगशालाओं में से सिर्फ 8% को राष्ट्रीय परीक्षण और अंशांकन प्रयोगशालाओं की प्रत्यायन बोर्ड से मान्यता मिली थी। यह बोर्ड अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता-नियंत्रण मानकों पर खरी उतरने वाली सुविधाओं को प्रमाणित करता है। देशभर में अब 59% सार्वजनिक प्रयोगशालाओं को मान्यता प्राप्त है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की शहरी आबादी तेजी से बढ़ने के साथ पानी की जांच में चूक से बीमारी फैलने का खतरा बढ़ता है। इंदौर की स्थिति, एक अखबार के संपादकीय के शब्दों में, "भारत के जल प्रबंधन के लिए खतरे की घंटी" है।
द हिंदू के एक संपादकीय में "हर स्तर पर जल संबंधी दिशानिर्देशों और अन्य पर्यावरण कानूनों को बेहतर तरीके से लागू करने" की मांग की गई। अखबार ने कहा कि कई शहरों को अपनी चपेट में लेने वाला जहरीला वायु प्रदूषण पहले से ही "नागरिकों के स्वास्थ्य पर कहर बरपा रहा है" और मध्य प्रदेश में हुई घटना को बुनियादी ढांचे के रखरखाव के बारे में एक चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए।
यह त्रासदी खास तौर पर विडंबनापूर्ण है, क्योंकि इंदौर को लगातार आठ वर्षों से भारत का सबसे स्वच्छ शहर माना गया है। यह दर्जा मुख्य रूप से कचरे को अलग-अलग करने और सड़कों की सफाई जैसे दिखने वाले उपायों पर आधारित है, लेकिन इस संकट ने शहर की सतह के नीचे मौजूद पुराने बुनियादी ढांचे के छिपे खतरों को उजागर कर दिया है।
एक टिप्पणीकार के मुताबिक, असली स्वच्छता में "सड़कों की दिखने वाली सफाई ही नहीं, भूमिगत बुनियादी ढांचे की अदृश्य सुरक्षा भी शामिल होनी चाहिए।"
इस घटना के बाद कानूनी कार्रवाई भी शुरू हुई है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ में जनहित याचिका दायर कर कहा गया है कि प्रशासन की ओर से पीने योग्य पानी उपलब्ध कराने में विफलता, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार का गंभीर उल्लंघन है।
निचोड़
इंदौर इस त्रासदी से उबरने की कोशिश कर रहा है, लेकिन आंकड़ों, रिपोर्टों और वादों पर जोर उन परिवारों को खोखला लगता है, जो इसकी सबसे भारी कीमत पहले ही चुका चुके हैं। उनके लिए यह आंकड़ों या बयानों का मामला नहीं, बल्कि पानी जैसी बुनियादी और जरूरी चीज के कारण अपने प्रियजनों को खोने का दुख है।
जांच जारी है, ताकि यह तय किया जा सके कि आखिर कितने लोगों की जान गई और निगरानी की कौन-सी व्यवस्थाएं नाकाम रहीं। अधिकारियों ने मध्य प्रदेश में पानी की पाइपलाइनों का व्यापक ऑडिट कराने का वादा किया है, ताकि दूसरे शहरों में ऐसी त्रासदियां न दोहराई जाएं।
मुख्यमंत्री यादव ने अधिकारियों को पूरे राज्य में सुधारात्मक कदमों के लिए समयबद्ध योजना तैयार करने और नगर निगम में तत्काल नियुक्तियां सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। सरकार ने क्षितिज सिंघल को इंदौर का नया नगर आयुक्त भी नियुक्त किया है। संकट के बाद स्थानांतरित किए गए दिलीप कुमार यादव की जगह उन्होंने पद संभाला है।
लेकिन भागीरथपुरा के शोकाकुल परिवारों के लिए ये कदम बहुत देर से आए हैं। उनके सवाल सरल हैं, लेकिन बेहद दर्दनाक: यह कैसे हुआ? क्या इसे रोका जा सकता था? और यह सुनिश्चित कौन करेगा कि ऐसा फिर कभी न हो?
मुख्य बातें
- इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में आधिकारिक तौर पर कम से कम 9 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, हालांकि निवासियों का दावा है कि मृतकों की संख्या 15 तक हो सकती है
- गंभीर जठरांत्र संबंधी लक्षणों के साथ 200 से अधिक लोग अस्पताल में भर्ती हुए, जबकि 2,400 से ज्यादा लोगों ने बीमारी की शिकायत की
- बिना सेप्टिक टैंक वाले शौचालय के नीचे से गुजर रही पाइपलाइन में रिसाव के कारण सीवेज पीने के पानी में मिला
- प्रकोप के संकट बनने से दो महीने से भी ज्यादा पहले से निवासियों ने बदबूदार पानी की शिकायत की थी
- इंदौर को लगातार आठ वर्षों तक भारत का सबसे स्वच्छ शहर चुना गया है
- सरकार ने पीड़ितों के परिवारों के लिए ₹2 लाख मुआवजे की घोषणा की और नगर निगम के कई अधिकारियों को निलंबित किया
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने घटना का स्वतः संज्ञान लिया है
- प्रभावित इलाकों में नल का पानी असुरक्षित होने के कारण फिलहाल टैंकरों से पानी पहुंचाया जा रहा है






