सख्त कानूनों के बाद दक्षिण कोरिया में पीछा करने की शिकायतों में उछाल, सुरक्षा व्यवस्था की कमियां उजागर

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सख्त कानूनों के बाद दक्षिण कोरिया में पीछा करने की शिकायतों में उछाल, सुरक्षा व्यवस्था की कमियां उजागर

पीछा करने के खिलाफ नए कानून के बाद शिकायतों में उछाल

कानूनी सुधारों के बाद दक्षिण कोरिया में पीछा करने की शिकायतों में तेज बढ़ोतरी हुई है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि दर्ज मामलों की संख्या तेजी से बढ़ी है और मदद मांगने के लिए लोग पहले से ज्यादा आगे आ रहे हैं। विधायकों को दिए गए न्याय मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में देशभर में पीछा करने की 13,269 शिकायतें दर्ज हुईं, जबकि 2022 में यह संख्या 7,626 थी। इस साल के पहले सात महीनों में 7,981 और मामले दर्ज किए गए। यही रफ्तार बनी रही तो 2025 में कुल मामले पिछले साल के आंकड़े से अधिक होने की संभावना है।

विषय-सूची
  1. पीछा करने के खिलाफ नए कानून के बाद शिकायतों में उछाल
  2. कानून में क्या बदला
  3. आपातकालीन और अदालती सुरक्षा
  4. 2023 का संशोधन
  5. सुरक्षा आदेश बढ़ते मामलों के साथ कदम नहीं मिला पा रहे
  6. जनमत बदलने वाले मामले
  7. पहले साल के मामलों से क्या पता चलता है
  8. डिजिटल पीछा कानून से तेज बढ़ रहा है
  9. क्षेत्रीय संदर्भ और रोकथाम
  10. अब पैरवीकार और अधिकारी क्या मांग रहे हैं
  11. मुख्य बातें

यह बढ़ोतरी इस बात में आए बुनियादी बदलाव के साथ हुई है कि न्याय व्यवस्था पीछा करने के मामलों को किस तरह देखती है। दक्षिण कोरिया ने अक्टूबर 2021 में पीछा करने के अपराध के दंड पर कानून बनाया। इससे पहले कई साल तक ऐसी शिकायतों को अक्सर सार्वजनिक व्यवस्था के मामूली उल्लंघन के तौर पर निपटाया जाता था। कानून के तहत पीछा करना ऐसा अनचाहा आचरण है जो बार-बार या लगातार हो और डर या चिंता पैदा करे। इसके लिए तीन साल तक की जेल या 30 मिलियन वॉन तक जुर्माने का प्रावधान है। 2023 में संशोधन के तहत एक विवादित प्रावधान हटाया गया, जिससे पीड़ित की सहमति न होने पर आरोपी सजा से बच सकता था। इससे अभियोजन की एक बड़ी बाधा दूर हुई।

यह बदलाव अकेले नहीं हुआ। 2022 में सिंदांग स्टेशन पर सियोल मेट्रो की 28 वर्षीय कर्मचारी की हत्या सहित कई चर्चित मामलों ने विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया और महिला अधिकार समूहों ने रोकथाम के मजबूत उपायों तथा त्वरित हस्तक्षेप की मांग की। पीड़िता ने लगातार उत्पीड़न की शिकायत की थी। नागरिक समाज के दबाव और मीडिया की बढ़ती निगरानी ने पीछा करने को निजी शिकायत के दायरे से निकालकर सार्वजनिक सुरक्षा की प्राथमिकता बना दिया।

आंकड़ों का रुझान बदलाव का पैमाना दिखाता है। 2021 के आखिर में नए कानून के पहले तीन महीनों के दौरान केवल 406 मामले दर्ज हुए थे। 2023 के अंत तक दर्ज मामलों की संख्या 10,400 से अधिक हो गई। यह बढ़ोतरी शिकायतें दर्ज कराने में वृद्धि और कानून के अधिक प्रभावी अमल, दोनों का संकेत देती है। हालांकि पीड़ितों की सुरक्षा और अदालत के आदेशों से मिलने वाले संरक्षण में कमियां अब भी बनी हुई हैं।

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कानून में क्या बदला

2021 के कानून ने दक्षिण कोरिया में पहली बार पीछा करने की व्यापक कानूनी परिभाषा दी और शारीरिक नुकसान तक बढ़ सकने वाले खतरे को देखते हुए सजा तय की। इसमें किसी व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध उसके पास जाना या उसका पीछा करना, पीड़ित के घर, कार्यस्थल या स्कूल के पास इंतजार करना या मंडराना, अनचाहे संदेश या तस्वीरें भेजना, डर पैदा करने के तरीके से संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, निजी जानकारी फैलाना और किसी और का रूप धरना जैसे बार-बार या लगातार किए गए कृत्य शामिल हैं। ऐसे आचरण को अपराध माना जा सकता है, जिसके लिए तीन साल तक की जेल या 30 मिलियन वॉन जुर्माना हो सकता है। हथियार इस्तेमाल करने पर पांच साल तक की जेल और इससे अधिक जुर्माने का प्रावधान है। अदालत के आदेशों का उल्लंघन करने पर अतिरिक्त सजा हो सकती है।

आपातकालीन और अदालती सुरक्षा

पीछा करने की शिकायत मिलने पर पुलिस तत्काल कदम उठा सकती है। इनमें इस कृत्य को रोकना, आरोपी और पीड़ित को अलग करना, आरोपी को अहम ठिकानों के 100 मीटर के दायरे में आने से रोकने के आदेश देना और पीड़ित को फोन करने, संदेश भेजने या ऑनलाइन संपर्क करने पर पाबंदी लगाना शामिल है। आगे नुकसान का गंभीर खतरा हो तो पीड़ित को आश्रय स्थल में भेजा जा सकता है। कानून के तहत न्यायिक पुलिस तत्काल आपातकालीन उपाय जारी कर सकती है, जिनकी अदालत से शीघ्र समीक्षा जरूरी है। अभियोजक अदालत से अस्थायी आदेश मांग सकते हैं, जिनमें रोक संबंधी आदेश, जरूरत पड़ने पर हिरासत और कुछ मामलों में इलेक्ट्रॉनिक निगरानी शामिल हैं। कानून में उपायों को बदलने या रद्द करने की प्रक्रिया भी तय है और पीड़ित की पहचान की सुरक्षा अनिवार्य की गई है।

2023 का संशोधन

महिला समूहों के यह कहने के बाद कि पीछा करने वाले अक्सर पीड़ितों पर शिकायत वापस लेने का दबाव डालते हैं, नेशनल असेंबली ने 2023 में अभियोजन के लिए पीड़ित की सहमति जरूरी करने वाला प्रावधान हटा दिया। सभी दलों के विधायकों ने पूर्ण अधिवेशन में इस बदलाव का समर्थन किया। उनका कहना था कि यह जरूरी सुधार है, ताकि अभियोजन आरोपी के उस दबाव पर नहीं, बल्कि सबूतों और खतरे के आकलन पर आगे बढ़े, जिसे वह भयभीत पीड़ित पर डाल सकता है। पैरवी करने वाले समूहों के नेताओं ने इसे कई वर्षों के अभियान के बाद उठाया गया देर से आया कदम बताया।

कोरिया विमेन्स हॉटलाइन की प्रमुख सॉन्ग रान ही ने इस बदलाव का स्वागत किया, लेकिन देरी की आलोचना भी की। उन्होंने कहा कि मूल प्रावधान में पीछा करने की प्रकृति को बुनियादी तौर पर गलत समझा गया था, जबकि प्रतिशोध का डर अक्सर पीड़ितों को चुप करा देता है।

यह कदम वर्षों पहले उठाया जाना चाहिए था। पीछा करने के खिलाफ शुरुआती कानून बनने के समय से ही हमने इस मुद्दे पर गंभीर चिंता जताई थी और सरकार से इस अनुचित प्रावधान को हटाने की बार-बार मांग की थी।
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सुरक्षा आदेश बढ़ते मामलों के साथ कदम नहीं मिला पा रहे

मामले बढ़ने के बावजूद आपातकालीन और अस्थायी सुरक्षा उपायों को अदालतों की मंजूरी में गिरावट आई है। विधायकों द्वारा उद्धृत आंकड़ों के अनुसार, अभियोजकों के आपातकालीन उपायों को अदालतों की मंजूरी 2021 के आखिरी महीनों में 98.4 प्रतिशत थी, जो 2022 में 98.1 प्रतिशत, 2023 में 97.9 प्रतिशत और 2024 में 95.8 प्रतिशत रह गई। इस साल जुलाई तक यह और घटकर 93.3 प्रतिशत हो गई। न्यायिक पुलिस की ओर से किए गए अनुरोधों की मंजूरी भी 2022 के 94.1 प्रतिशत से घटकर 2024 में 92.2 प्रतिशत पर आ गई। वहीं, लंबे समय तक लागू रहने वाले अस्थायी उपायों के लिए अभियोजकों के अनुरोधों की मंजूरी दर करीब 84 प्रतिशत पर बनी हुई है।

पीड़ितों की पैरवी करने वालों के लिए ये आंकड़े चिंताजनक हैं, क्योंकि उत्पीड़न को गंभीर रूप लेने से रोकने में अस्थायी उपाय अहम हैं। रोक संबंधी आदेश, सुरक्षित स्थानों पर भेजना और इलेक्ट्रॉनिक संपर्क पर पाबंदी का मकसद सुरक्षा योजना बनाने के लिए समय और गुंजाइश देना है। मंजूरी दर ऊंचे स्तर से ही क्यों न घटे, इसका मतलब है कि खतरा बने रहने के बावजूद अधिक पीड़ित अदालत के संरक्षण के बिना घर लौट रहे हैं।

डेमोक्रेटिक पार्टी की सांसद जॉन ह्यॉन हुई ने कहा कि अभियोजक या पुलिस जब विश्वसनीय जोखिम आकलन और बार-बार हुए उत्पीड़न के दस्तावेज पेश करें, तो न्यायपालिका को अधिक निर्णायक कार्रवाई करनी चाहिए।

जब मदद की सख्त जरूरत वाले पीड़ित पीछा किए जाने के खतरे में बने रहें, तब कार्रवाई करने में अदालतों की हिचकिचाहट कर्तव्य की अवहेलना है।
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जनमत बदलने वाले मामले

2022 में सियोल के सिंदांग स्टेशन पर हुई हत्या ने इस बात की दर्दनाक मिसाल पेश की कि सुरक्षा व्यवस्था नाकाम होने पर क्या हो सकता है। पुलिस ने जॉन जू ह्वान पर एक सहकर्मी का पीछा करने का आरोप लगाया था। वह उसे लगातार फोन और संदेश करता था तथा उसकी गैरकानूनी तरीके से फिल्में बनाता था। पीड़िता ने छह महीनों के भीतर दो बार उसकी शिकायत की, लेकिन उसे हिरासत में नहीं लिया गया। उसे नौकरी से निकाल दिया गया था और पीछा करने के आरोप में सजा सुनाई जानी थी। अदालत की सुनवाई से एक दिन पहले वह उस स्टेशन पहुंचा जहां पीड़िता काम करती थी और शौचालय में उस पर चाकू से हमला कर उसकी हत्या कर दी। इस हमले के बाद शोक और गुस्से की लहर फैल गई। इससे विधायकों और अदालतों पर कानूनी खामियां दूर करने और उत्पीड़न के सिलसिले के शुरुआती चरण में ही अधिक मजबूत सुरक्षा उपाय अपनाने का दबाव बढ़ा।

गिरफ्तारी के बाद पत्रकारों के सामने लाए जाने पर जॉन ने माफी मांगी और अपना अपराध स्वीकार किया।

मैंने सचमुच बहुत पागलपन भरा काम किया।

शिक्षाविदों का कहना है कि इस मामले ने महिलाओं में असुरक्षा की व्यापक भावना को स्पष्ट कर दिया। उनका कहना है कि भीड़भाड़ वाले स्टेशन का शौचालय सबसे सुरक्षित सार्वजनिक जगहों में से एक होना चाहिए।

कोरियाई राजनीति की सहायक प्रोफेसर ह्योबिन ली ने इस डर को सीधे शब्दों में जाहिर किया।

कोरिया में अब महिलाओं के लिए कोई जगह सुरक्षित नहीं है, क्योंकि यह हमला दिनदहाड़े एक भीड़भाड़ वाली सार्वजनिक जगह पर हुआ।

पहले साल के मामलों से क्या पता चलता है

2021 के कानून के तहत अदालतों के पहले साल के फैसलों की एक अकादमिक समीक्षा जोखिम के कारकों की ठोस तस्वीर पेश करती है। अक्टूबर 2021 से अक्टूबर 2022 के बीच पीछा करने से जुड़े 193 मामलों का विश्लेषण करने वाले शोधकर्ताओं ने पाया कि ज्यादातर पीड़ित महिलाएं थीं और उनकी औसत उम्र 42 वर्ष से कुछ अधिक थी। कथित तौर पर पीछा करने वालों में पूर्व अंतरंग साथी सबसे बड़ा समूह थे और अस्वीकृति इसका सबसे आम बताया गया कारण थी। करीब 16.6 प्रतिशत आरोपियों में मानसिक विकार का निदान हुआ था। जिनकी पहचान की गई, उनमें मनोविकृति अपेक्षाकृत आम थी। केवल डिजिटल या अप्रत्यक्ष व्यवहार की तुलना में सीधे संपर्क और पास आने की घटनाएं अधिक थीं।

ये निष्कर्ष बताते हैं कि जमीन पर सुरक्षा अक्सर त्वरित हस्तक्षेप और स्पष्ट दस्तावेजीकरण पर निर्भर करती है। कानून में बार-बार या लगातार किए गए आचरण की शर्त है, इसलिए शुरुआती शिकायत और सबूत जुटाना निर्णायक हो सकता है। पूर्व साथी के शामिल होने पर इस तरह के व्यवहार में अक्सर फोन करना, मिलने पहुंचना, घर या कार्यस्थल के पास इंतजार करना और टकराव बढ़ाना शामिल होता है। पुलिस जितनी जल्दी इस सिलसिले का दस्तावेजीकरण कर संपर्क रोकने के आदेश हासिल कर सकेगी, गंभीर नुकसान रोकने की संभावना उतनी ही अधिक होगी।

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डिजिटल पीछा कानून से तेज बढ़ रहा है

विशेषज्ञों ने चेताया है कि तकनीक के जरिए निगरानी और उत्पीड़न कानूनी ढांचों से आगे निकल रहे हैं। स्मार्टफोन का लगभग सार्वभौमिक इस्तेमाल और सोशल मीडिया का व्यापक तंत्र होने के बीच, पीड़ितों ने स्पाइवेयर इंस्टॉल किए जाने, जीपीएस के जरिए वास्तविक समय में निगरानी और चौबीसों घंटे संदेश भेजकर उन पर नजर रखने, उन्हें अलग-थलग करने और डराने की शिकायतें की हैं। कोरियन विमेन्स डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट के हालिया विश्लेषण के मुताबिक, दक्षिण कोरिया में तकनीक के जरिए पीछा करने के आधिकारिक आंकड़े नहीं हैं। गुप्त रूप से जीपीएस से ट्रैक करने जैसे कुछ कृत्यों पर अक्सर पीछा करने के बजाय निजता के उल्लंघन के आरोप लगाए जाते हैं, जिससे सजा सीमित हो सकती है और खतरे की प्रकृति स्पष्ट नहीं रह पाती।

सुप्रीम प्रॉसीक्यूटर्स ऑफिस में लैंगिक समानता अधिकारी बे सॉन्ग शिन ने तकनीक के जरिए होने वाले उत्पीड़न का अध्ययन किया है। उनका कहना है कि इससे होने वाला नुकसान न तो काल्पनिक है और न ही मामूली। लगातार निगरानी और धमकियां पीड़ितों की रोजमर्रा की जिंदगी बदल देती हैं।

पारंपरिक शारीरिक पीछा करने से अलग, तकनीक के जरिए पीछा करना सीधे संपर्क के बिना ही नियंत्रण का एक शक्तिशाली तरीका बन जाता है। इससे पीड़ितों को ऐसा महसूस होता है मानो वे उस चीज में कैद हों जिसे अदृश्य जेल कहा जा सकता है।

जबरन नियंत्रण को घरेलू उत्पीड़न की एक प्रमुख विशेषता मानने वाले देश ऐसे डराने और निगरानी करने के तरीकों को कानून में शामिल कर रहे हैं, जिनमें शारीरिक संपर्क जरूरी नहीं होता। दक्षिण कोरिया में पैरवी करने वाले समूह विधायकों से पीछा करने के कानून में संशोधन कर तकनीक के जरिए किए जाने वाले नियंत्रण को स्पष्ट रूप से शामिल करने की मांग कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि जांच इकाइयों को तुरंत कार्रवाई के लिए जरूरी संसाधन, प्रशिक्षण और डिजिटल फॉरेंसिक सहायता मिले।

क्षेत्रीय संदर्भ और रोकथाम

क्षेत्रभर में सरकारें मानसिक नुकसान, ऑनलाइन उत्पीड़न और निजी जानकारी की सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों को शामिल करने के लिए आपराधिक कानूनों में संशोधन कर रही हैं। उदाहरण के लिए, मलेशिया ने दंड संहिता में ऐसे संशोधन लागू किए हैं जो निजी जानकारी उजागर करने और भावनात्मक परेशानी पैदा करने के इरादे से किए गए संचार को अपराध मानते हैं। इसका उद्देश्य भौतिक और डिजिटल, दोनों जगहों पर बदमाशी के खिलाफ तेज और सख्त कार्रवाई करना है। ये कदम शारीरिक चोट पर ही ध्यान केंद्रित करने के बजाय भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक नुकसान को मान्यता देने की व्यापक दिशा में बदलाव दर्शाते हैं।

दक्षिण कोरिया ने भी पीछा करने के कानून के साथ मिलने वाली सहायता व्यवस्था का विस्तार शुरू किया है। 2023 में पीछा करने की रोकथाम और पीड़ितों के संरक्षण से जुड़े कानून ने जोखिम में पड़े लोगों के लिए आश्रय स्थलों और परामर्श सेवाओं को औपचारिक रूप देकर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की। पुलिस पीड़ितों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचा सकती है, उनके अधिकारों और सेवाओं की जानकारी दे सकती है और जोखिम के अनुरूप सुरक्षा आदेश मांगने के लिए अभियोजकों के साथ तालमेल कर सकती है।

अन्य देशों में असरदार साबित हुई रोकथाम की रणनीतियों में पुलिस से पहली बार संपर्क के दौरान जोखिम का मानकीकृत आकलन, आपातकालीन उपायों की त्वरित न्यायिक समीक्षा, रोक संबंधी आदेशों का सख्ती से पालन और सबसे अधिक जोखिम वाले अपराधियों की इलेक्ट्रॉनिक निगरानी शामिल हैं। पुलिस, अभियोजकों, अदालतों और पीड़ित सहायता सेवाओं के बीच जानकारी साझा करना भी अहम है। इसके साथ ही डिजिटल सबूतों और ऑनलाइन उत्पीड़न से निपटने के लिए विशेष प्रशिक्षण जरूरी है।

अब पैरवीकार और अधिकारी क्या मांग रहे हैं

मामले बढ़ रहे हैं और अब इनमें पूर्व साथियों के अलावा परिचितों और अजनबियों से जुड़े मामले भी शामिल हैं। ऐसे में पैरवी करने वाले समूह सुरक्षा आदेश हासिल करने की प्रक्रिया आसान बनाने और आदेशों का उल्लंघन होने पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। कई लोग आपातकालीन चरण में ही अस्थायी संपर्क निषेध आदेश अधिक आसानी से जारी करने की अपील कर रहे हैं, क्योंकि खतरे के बढ़ने की संभावना अच्छी तरह दर्ज है। अभियोजकों और पुलिस अधिकारियों का कहना है कि बढ़ते मामलों को निपटाने और आदेशों के पालन की निगरानी के लिए पर्याप्त कर्मचारियों और संसाधनों की जरूरत है। जोखिम के आधार पर इलेक्ट्रॉनिक निगरानी का इस्तेमाल भी इसमें शामिल है।

तकनीक के जरिए होने वाले उत्पीड़न के विशेषज्ञ ऐसे स्पष्ट कानूनी प्रावधान चाहते हैं जिनमें स्पाइवेयर का इस्तेमाल, खातों पर कब्जा, गुप्त जीपीएस ट्रैकिंग और कई प्लेटफॉर्म पर मिलकर किया जाने वाला उत्पीड़न शामिल हो। वे नीतियां बनाने और संसाधन आवंटित करने के लिए तकनीक के जरिए पीछा करने के मामलों को राष्ट्रीय अपराध आंकड़ों में शामिल करने की भी सिफारिश करते हैं। पीड़ित सहायता सेवा प्रदाता आश्रय स्थलों का विस्तार, सुरक्षित स्थान पर भेजने की सहायता में सुधार और पीछा करने के मामलों के लिए चौबीसों घंटे चलने वाली हेल्पलाइन स्थापित करने की मांग करते हैं। वे अल्पकालिक संकट प्रबंधन के बजाय लंबे समय तक मामले की निगरानी की जरूरत पर जोर देते हैं।

मुख्य बातें

  • पीछा करने की शिकायतें 2022 में 7,626 से बढ़कर 2024 में 13,269 हो गईं। इस साल जुलाई तक 7,981 मामले दर्ज किए गए।
  • 2021 के पीछा करने के अपराध के दंड संबंधी कानून में तीन साल तक की जेल का प्रावधान है। हथियार इस्तेमाल होने पर पांच साल तक की जेल हो सकती है।
  • 2023 के संशोधन ने वह प्रावधान हटा दिया जिसके तहत पीड़ित की सहमति न मिलने पर आरोपी सजा से बच सकता था।
  • मामले बढ़ने के बीच आपातकालीन और अस्थायी उपायों को अदालतों की मंजूरी में गिरावट आई है।
  • 2022 में सिंदांग स्टेशन पर हुई हत्या ने पीड़ितों के लिए तेज और मजबूत सुरक्षा की सार्वजनिक मांग को बल दिया।
  • पहले साल के मामलों की अकादमिक समीक्षा में पाया गया कि ज्यादातर आरोपी पूर्व साथी थे, अस्वीकृति आम कारण थी और सीधे संपर्क का तरीका सबसे अधिक देखा गया।
  • विशेषज्ञों ने डिजिटल पीछा करने से जुड़े कानूनी अंधे क्षेत्रों, जैसे स्पाइवेयर, जीपीएस ट्रैकिंग और कई प्लेटफॉर्म पर समन्वित ऑनलाइन उत्पीड़न, को लेकर चेतावनी दी है।
  • पैरवीकार तकनीक के जरिए नियंत्रण को कानून में स्पष्ट रूप से शामिल करने, सुरक्षा आदेश तेजी से जारी करने, सख्त अमल और आश्रय व परामर्श सेवाओं के विस्तार की मांग कर रहे हैं।
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