पुलिस वाहन से डिलीवरी राइडर की मौत के बाद देशभर में भड़के विरोध प्रदर्शन
जकार्ता में प्रदर्शनों के दौरान पुलिस के एक बख्तरबंद वाहन की चपेट में आने से 21 वर्षीय मोटरसाइकिल टैक्सी चालक अफान कुर्नियावान की मौत के बाद इंडोनेशिया में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों और हिंसक अशांति की लहर फैल गई है। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा किया गया और यह पुलिस की बर्बरता, सरकार की असंवेदनशीलता तथा आर्थिक कठिनाइयों को लेकर जनता के गुस्से का केंद्र बन गई है। सांसदों के विवादास्पद आवास भत्तों के खिलाफ शुरू हुए प्रदर्शन तेजी से राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के प्रशासन के सामने अब तक की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन गए हैं।
विषय-सूची
- पुलिस वाहन से डिलीवरी राइडर की मौत के बाद देशभर में भड़के विरोध प्रदर्शन
- प्रदर्शन कैसे शुरू हुए?
- अफान कुर्नियावान की मौत: आक्रोश भड़काने वाली घटना
- इंडोनेशिया के कई हिस्सों में फैले प्रदर्शन, हिंसक हुए
- आर्थिक असर और जनजीवन में बाधा
- सरकार और पुलिस की प्रतिक्रिया
- पुलिस सुधार और न्याय की मांग
- हिंसा, त्रासदी और 1998 की छाया
- इंडोनेशिया के लोकतंत्र के लिए व्यापक मायने
- संक्षेप में
प्रदर्शन कैसे शुरू हुए?
अशांति की शुरुआत इस खुलासे के बाद हुई कि इंडोनेशिया की संसद के सभी 580 सदस्यों को हर महीने 5 करोड़ रुपिया (करीब 3,075 डॉलर) का आवास भत्ता दिया गया है—जो जकार्ता के न्यूनतम वेतन से लगभग दस गुना है। ऐसे समय में आई इस खबर ने व्यापक आक्रोश भड़का दिया, जब कई इंडोनेशियाई लोग बढ़ती जीवन-यापन लागत, बेरोजगारी और ठहरे हुए वेतन से जूझ रहे हैं। आलोचकों ने इस भत्ते को अत्यधिक और असंवेदनशील बताया, खासकर तब जब सोशल मीडिया पर नेताओं की आलीशान जीवनशैली दिखाने वाले वीडियो सामने आए।
सप्ताह की शुरुआत में छात्रों और श्रमिक संगठनों ने भत्ता रद्द करने और व्यापक सुधारों की मांग करते हुए प्रदर्शन शुरू किए। प्रदर्शनकारियों ने सांसदों को मिलने वाली सुविधाओं के साथ-साथ रोजगार की कमी, ऊंचे करों और सरकार में कथित भ्रष्टाचार पर भी गुस्सा जताया। आंदोलन को जल्द ही समर्थन मिलने लगा और इसमें राइड-हेलिंग चालक, अधिकार कार्यकर्ता तथा देशभर के आम नागरिक शामिल हो गए।
अफान कुर्नियावान की मौत: आक्रोश भड़काने वाली घटना
गुरुवार शाम हालात नाटकीय रूप से बिगड़ गए, जब गो-जेक और ग्रैब के लिए मोटरसाइकिल राइड-शेयरिंग चालक के रूप में काम करने वाले अफान कुर्नियावान को जकार्ता में संसद भवन के पास पुलिस के एक बख्तरबंद वाहन ने कुचल दिया। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि कुर्नियावान खाने की डिलीवरी का ऑर्डर पूरा कर रहे थे और प्रदर्शन में शामिल नहीं थे, तभी वे अफरातफरी में फंस गए। चश्मदीदों के मुताबिक, राष्ट्रीय पुलिस की मोबाइल ब्रिगेड इकाई का बख्तरबंद वाहन प्रदर्शनकारियों की भीड़ के बीच से तेज रफ्तार में गुजरा, कुर्नियावान को टक्कर मारी और बिना रुके उन्हें कुचलता चला गया।
घटना का वीडियो बनाया गया और वह तेजी से वायरल हो गया। इससे देशभर में आक्रोश फैल गया और पुलिस को जवाबदेह ठहराने की मांग तेज हो गई। हजारों मोटरसाइकिल चालकों, कार्यकर्ताओं और नेताओं ने कुर्नियावान के अंतिम संस्कार में हिस्सा लिया और उनके पार्थिव शरीर को विशाल काफिले के साथ मध्य जकार्ता से लेकर गए। शोक और एकजुटता के इस प्रदर्शन ने कई इंडोनेशियाई लोगों के भीतर अन्याय की गहरी भावना को उजागर किया।
प्रमुख अधिकार संगठन जकार्ता लीगल एड ने सरकार से प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तार किए गए सैकड़ों लोगों को रिहा करने की मांग की और कहा: "प्रदर्शन करने के लिए किसी को अपनी जान नहीं गंवानी चाहिए।"
इंडोनेशिया के कई हिस्सों में फैले प्रदर्शन, हिंसक हुए
कुर्नियावान की मौत के बाद जकार्ता, सुरबाया, बांडुंग, मकासर, योग्याकार्ता, मेदान, मनाडो और यहां तक कि पापुआ समेत कई शहरों में प्रदर्शन भड़क उठे। प्रदर्शनकारियों ने जकार्ता में पुलिस की मोबाइल ब्रिगेड के मुख्यालय तक मार्च किया और कुछ लोगों ने परिसर में घुसने की कोशिश की। पुलिस ने पानी की बौछारों और आंसू गैस के गोले दागकर जवाब दिया, जबकि प्रदर्शनकारियों ने बोतलें, पत्थर और ज्वलनशील पटाखे फेंके। कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारियों ने इमारतों, वाहनों और सरकारी कार्यालयों में आग लगा दी।
दक्षिण सुलावेसी के मकासर में अशांति जानलेवा हो गई, जब प्रदर्शनकारियों ने एक परिषद भवन में आग लगा दी और कई लोग अंदर फंस गए। आग में कम से कम तीन लोगों की मौत हुई, जिनमें परिषद के दो कर्मचारी और एक सरकारी कर्मचारी शामिल हैं। बांडुंग में भी ऐसे ही दृश्य देखने को मिले, जहां प्रदर्शनकारियों ने क्षेत्रीय संसद भवन में आग लगा दी, हालांकि वहां किसी के हताहत होने की खबर नहीं है।
सुरक्षा चिंताओं के चलते जकार्ता में प्रदर्शन स्थलों के पास की दुकानें और मॉल जल्दी बंद हो गए। कई निवासियों को मई 1998 के दंगों की दर्दनाक यादें ताजा हो गईं, जिनके बाद सुहार्तो की तानाशाही का अंत हुआ था। सड़कों पर प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों की झड़पों के बीच अतीत की हिंसा का डर छाया रहा और कानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए कई इलाकों में सेना तैनात की गई।
आर्थिक असर और जनजीवन में बाधा
अशांति ने दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में निवेशकों के भरोसे को झटका दिया है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले इंडोनेशियाई रुपिया लगभग 1% गिरा और शेयर सूचकांक में 2.3% तक की गिरावट आई, हालांकि बाद में इसमें थोड़ी रिकवरी हुई। जकार्ता में स्कूलों ने छात्रों की छुट्टी जल्दी कर दी और कई व्यवसायों ने कर्मचारियों को घर से काम करने को कहा। बड़े शहरों में रोजमर्रा का जीवन प्रभावित हुआ है: यातायात पूरी तरह ठप रहा और भीड़ ने सार्वजनिक परिवहन के रास्ते रोक दिए।
सरकार और पुलिस की प्रतिक्रिया
अपने राष्ट्रपति कार्यकाल की सबसे गंभीर चुनौती का सामना कर रहे राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने टेलीविजन पर प्रसारित भाषण में देश को संबोधित किया। उन्होंने कुर्नियावान के परिवार के प्रति संवेदना जताई और शांति बनाए रखने की अपील की। उन्होंने घटना की पूरी और पारदर्शी जांच का वादा किया। पूर्व जनरल प्रबोवो ने जनता के गुस्से और पुलिस की अत्यधिक बल-प्रयोग की कार्रवाई से उपजी निराशा को स्वीकार किया।
राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने कहा: "मैं इस घटना से गहराई से चिंतित और बेहद दुखी हूं। अधिकारियों की अत्यधिक कार्रवाई से मुझे सदमा लगा और निराशा हुई। मैंने पूरी और पारदर्शी जांच का आदेश दिया है और इसमें शामिल अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।"
राष्ट्रीय पुलिस प्रमुख लिस्त्यो सिगित प्रबोवो ने भी सार्वजनिक रूप से माफी मांगी और पुष्टि की कि कुर्नियावान की मौत से जुड़े पुलिस मोटर ब्रिगेड के सात सदस्यों को पेशेवर आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में हिरासत में लेकर पूछताछ की गई है। हालांकि, बख्तरबंद वाहन के चालक की अभी पहचान नहीं हुई है। अधिकारियों ने कुर्नियावान के परिवार को आर्थिक सहायता देने का वादा किया है।
इन आश्वासनों के बावजूद प्रदर्शनकारियों को संदेह है। वे ठोस सुधारों और पुलिस हिंसा के लिए जवाबदेही की मांग कर रहे हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल और अन्य अधिकार संगठनों ने प्रदर्शनकारियों पर सरकार की कार्रवाई की निंदा की है और कहा है कि अत्यधिक बल-प्रयोग और मनमानी गिरफ्तारियां बंद होनी चाहिए।
पुलिस सुधार और न्याय की मांग
कई प्रदर्शनकारी कुर्नियावान की मौत को इंडोनेशिया में पुलिस की बर्बरता और जवाबदेही की कमी जैसी व्यापक समस्याओं का प्रतीक मानते हैं। घटना में शामिल विशिष्ट अर्धसैनिक पुलिस इकाई मोबाइल ब्रिगेड कोर (ब्रिमोब) की कठोर कार्रवाई के लिए लंबे समय से आलोचना होती रही है। प्रदर्शनकारी व्यापक पुलिस सुधारों की मांग कर रहे हैं, जिनमें हिरासत में मौतों की स्वतंत्र जांच, कानून लागू करने वाली एजेंसियों की बेहतर निगरानी और नागरिक स्वतंत्रताओं की मजबूत सुरक्षा शामिल है।
प्रदर्शन में शामिल मोटरसाइकिल चालक पेंदी नासिर ने रॉयटर्स से कहा: "हम नहीं चाहते कि यहां हमारे साथी फिर इस दंगे का शिकार बनें। हम चाहते हैं कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हो।"
प्रदर्शनकारी सांसदों का आवास भत्ता रद्द करने, वेतन बढ़ाने, कर घटाने और भ्रष्टाचार-विरोधी उपाय मजबूत करने की मांग भी कर रहे हैं। छात्रों, गिग वर्करों, श्रमिक संगठनों और अधिकार कार्यकर्ताओं समेत विभिन्न समूह एक साझा उद्देश्य—आम इंडोनेशियाई लोगों के लिए न्याय और सम्मान—के इर्द-गिर्द एकजुट हुए हैं।
हिंसा, त्रासदी और 1998 की छाया
प्रदर्शनों के पैमाने और तीव्रता की तुलना 1998 के उन दंगों से की जा रही है, जिन्होंने तीन दशक के सत्तावादी शासन के बाद राष्ट्रपति सुहार्तो को सत्ता से हटाया था। तब भी, और अब भी, आर्थिक कठिनाइयों, सरकारी भ्रष्टाचार और पुलिस हिंसा ने जनता के गुस्से को हवा दी। उन घटनाओं की याद, जिनमें एक हजार से अधिक लोग मारे गए थे और बड़े पैमाने पर तबाही हुई थी, आगे हालात बिगड़ने की आशंका बढ़ा रही है।
ताजा अशांति में मकासर में कम से कम तीन लोगों की मौत हुई है और पुलिस के साथ झड़पों में दर्जनों लोग घायल हुए हैं। अधिकारियों ने बताया कि 25 पुलिसकर्मियों को गंभीर चोटों के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया, जबकि घायल प्रदर्शनकारियों की संख्या इससे अधिक मानी जा रही है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, अकेले जकार्ता में करीब एक हजार लोगों को गिरफ्तार किया गया है।
तेज बारिश और पुलिस की आक्रामक कार्रवाई के बावजूद भीड़ डटी हुई है और छात्रों तथा मोटरसाइकिल टैक्सी चालकों की इसमें अग्रणी भूमिका है। प्रदर्शनकारियों ने न्याय और सुधारों की मांग को अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए देशभक्ति के गीतों, बैनरों और सोशल मीडिया का सहारा लिया है।
इंडोनेशिया के लोकतंत्र के लिए व्यापक मायने
ये प्रदर्शन इंडोनेशिया के लोकतंत्र के लिए एक निर्णायक क्षण हैं और पारदर्शिता, जवाबदेही तथा कानून के शासन के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता की परीक्षा ले रहे हैं। आर्थिक विकास और सामाजिक स्थिरता के वादों के साथ चुनाव लड़ने वाले राष्ट्रपति प्रबोवो पर अब सार्थक सुधार लागू करने और जनता का भरोसा बहाल करने का दबाव बढ़ रहा है।
विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि आर्थिक असमानता, पुलिस की दंडमुक्ति और राजनीतिक भ्रष्टाचार जैसी मूल शिकायतों का समाधान न होने पर अशांति और बढ़ सकती है। सरकार की प्रतिक्रिया पर देश और विदेश, दोनों जगह करीबी नजर रखी जाएगी, क्योंकि इंडोनेशिया को अक्सर दक्षिण-पूर्व एशिया में लोकतांत्रिक प्रगति का संकेतक माना जाता है।
सिंगापुर स्थित आईएसईएएस-युसोफ इशाक संस्थान में विजिटिंग फेलो मादे सुप्रियात्मा ने रॉयटर्स से कहा: "अगर प्रबोवो ने सावधानी नहीं बरती, तो प्रदर्शन अराजकता में बदल सकते हैं।"
संक्षेप में
- जकार्ता में प्रदर्शनों के दौरान पुलिस के एक बख्तरबंद वाहन की चपेट में आने से 21 वर्षीय डिलीवरी राइडर अफान कुर्नियावान की मौत के बाद पूरे इंडोनेशिया में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन भड़क उठे।
- सांसदों के नए आवास भत्तों, आर्थिक कठिनाइयों और पुलिस की बर्बरता को लेकर जनता के गुस्से ने अशांति को जन्म दिया।
- प्रदर्शन कई शहरों में फैल गए और कुछ इलाकों में हिंसक हो गए। मकासर में परिषद भवन में आग लगने से कम से कम तीन लोगों की मौत हुई।
- राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो और पुलिस अधिकारियों ने माफी मांगी और पूरी जांच का वादा किया। घटना से जुड़े सात अधिकारियों को हिरासत में लिया गया है।
- प्रदर्शनकारी पुलिस सुधार, सांसदों को मिलने वाली सुविधाएं रद्द करने और राज्य की हिंसा के लिए अधिक जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।
- यह अशांति इंडोनेशिया के लोकतंत्र और गहरी जड़ें जमा चुकी शिकायतों को दूर करने की सरकार की क्षमता की बड़ी परीक्षा है।






