पृष्ठभूमि: लंबे समय से चला आ रहा जटिल सीमा विवाद
थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीमा 800 किलोमीटर से अधिक लंबी है। इसका बड़ा हिस्सा औपनिवेशिक दौर की संधियों और 19वीं सदी के उत्तरार्ध तथा 20वीं सदी की शुरुआत में कंबोडिया पर फ्रांसीसी कब्जे के दौरान बनाए गए नक्शों के आधार पर तय किया गया था। दशकों तक अपेक्षाकृत शांति रहने के बावजूद, सीमा का निर्धारण तनाव का कारण बना हुआ है। दोनों देश कई ऐसे क्षेत्रों पर दावा करते हैं जिनकी सीमाएं एक-दूसरे से मिलती हैं। इनमें प्रेह विहियर मंदिर जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के स्थल तथा तथाकथित एमराल्ड ट्रायंगल क्षेत्र भी शामिल हैं, जहां थाईलैंड, कंबोडिया और लाओस की सीमाएं मिलती हैं।
विषय-सूची
- पृष्ठभूमि: लंबे समय से चला आ रहा जटिल सीमा विवाद
- मई 2025 की चोंग बोक झड़प: नए कूटनीतिक संकट की शुरुआत
- कूटनीतिक कदम: कंबोडिया ने संयुक्त राष्ट्र से की अपील
- कानूनी तर्क और ऐतिहासिक दावे
- थाईलैंड का जवाब: संप्रभुता और द्विपक्षीय प्रक्रिया का बचाव
- आईसीजे के अधिकार क्षेत्र को अस्वीकार
- कंबोडिया का जवाब: संधि उल्लंघन के आरोप और कानूनी समाधान की मांग
- राजनीतिक और जन प्रतिक्रियाएं
- संयुक्त राष्ट्र की प्रक्रिया: अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने विवाद का आधिकारिक रिकॉर्ड
- द्विपक्षीय वार्ता विफल, अंतरराष्ट्रीय कानूनी मंचों की ओर रुख
- तनाव बढ़ाने वाले कदम: सीमा बंदी, आर्थिक जवाबी कार्रवाई और राष्ट्रवादी बयानबाजी
- नेतृत्व की गतिशीलता और राजनीतिक असर
- क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय असर
- आगे क्या? समाधान की संभावनाएं
- संक्षेप में
इन विवादों ने समय-समय पर हिंसक रूप लिया है। सबसे उल्लेखनीय घटनाक्रम 2008 से 2011 के बीच हुआ, जब प्रेह विहियर मंदिर को लेकर झड़पों में दर्जनों लोगों की मौत हुई और हजारों लोग विस्थापित हुए। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) ने 1962 में मंदिर पर कंबोडिया की संप्रभुता के पक्ष में फैसला दिया और 2013 में इसकी पुष्टि की, लेकिन आसपास का इलाका अब भी विवादित है। इसके बाद से दोनों देश द्विपक्षीय तंत्रों के जरिए मतभेद सुलझाने की कोशिश करते रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख 2000 के समझौता ज्ञापन (एमओयू) के तहत स्थापित संयुक्त सीमा आयोग (जेबीसी) है। हालांकि, प्रगति धीमी रही है और सीमा दोनों देशों में राष्ट्रवादी भावना तथा राजनीतिक दांव-पेच का केंद्र बनी हुई है।
मई 2025 की चोंग बोक झड़प: नए कूटनीतिक संकट की शुरुआत
तनाव का ताजा दौर 28 मई 2025 को शुरू हुआ, जब थाईलैंड के उबोन रत्चथानी प्रांत के चोंग बोक इलाके में थाई और कंबोडियाई सैनिकों के बीच कुछ समय तक चली, लेकिन घातक सशस्त्र झड़प हुई। इसमें एक कंबोडियाई सैनिक की मौत हो गई। इसके बाद दोनों पक्षों ने सीमा पर अतिरिक्त सैनिक और भारी हथियार तैनात किए। दोनों सरकारों ने एक-दूसरे पर आक्रामकता का आरोप लगाया। कंबोडिया ने दावा किया कि थाई सैनिकों ने कंबोडियाई क्षेत्र में तैनात उसके सैनिकों पर गोलीबारी शुरू की, जबकि थाईलैंड का कहना था कि उसके सैनिक थाई भूमि पर नियमित गश्त कर रहे थे और उन्होंने बिना उकसावे के हुए हमले के बाद ही जवाब दिया।
इस टकराव ने लंबे समय से चली आ रही शिकायतों को फिर हवा दी और कूटनीतिक तथा कानूनी कदमों का सिलसिला शुरू हो गया। दोनों देश अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपना पक्ष मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
कूटनीतिक कदम: कंबोडिया ने संयुक्त राष्ट्र से की अपील
16 जून 2025 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में कंबोडिया के स्थायी प्रतिनिधि ने महासचिव एंटोनियो गुटेरेस को औपचारिक पत्र भेजा। पत्र में अनुरोध किया गया कि हालिया सैन्य झड़पों और जारी सीमा विवादों को 79वें संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के एजेंडा मद “सशस्त्र संघर्ष की रोकथाम” के तहत आधिकारिक दस्तावेज के रूप में प्रसारित किया जाए। कंबोडिया ने यह भी संकेत दिया कि वह मामला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में ले जाने का इरादा रखता है। उसने कहा कि थाईलैंड में द्विपक्षीय बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं है और उस पर कंबोडिया की संप्रभुता का उल्लंघन करने का आरोप लगाया।
कंबोडिया के पत्र में हालिया झड़प के साथ-साथ अनसुलझे विवादों का इतिहास भी शामिल था, जिसमें औपनिवेशिक दौर की संधियों की व्याख्या और आईसीजे के पिछले फैसले शामिल हैं। पत्र में थाईलैंड पर एकतरफा बनाए गए नक्शों पर निर्भर रहने, कंबोडियाई क्षेत्र में अतिक्रमण करने और सैन्य तथा राजनीतिक नेताओं की भड़काऊ बयानबाजी से राष्ट्रवादी भावना भड़काने का आरोप लगाया गया।
कानूनी तर्क और ऐतिहासिक दावे
कंबोडिया का पक्ष 1904 और 1907 की फ्रांको-सियामी संधियों पर आधारित है, जिनमें फ्रांसीसी औपनिवेशिक नक्शों के आधार पर सीमा तय की गई थी। कंबोडियाई सरकार का तर्क है कि इन नक्शों और प्रेह विहियर मंदिर के संबंध में आईसीजे के फैसलों को सीमा निर्धारण का कानूनी आधार माना जाना चाहिए। कंबोडिया ने बार-बार इस बात पर निराशा जताई है कि उसके अनुसार थाईलैंड इन समझौतों का सम्मान करने से कतरा रहा है और ऐसे द्विपक्षीय तंत्रों को प्राथमिकता देता है जो कंबोडिया की राय में नतीजे देने में विफल रहे हैं।
थाईलैंड का जवाब: संप्रभुता और द्विपक्षीय प्रक्रिया का बचाव
कंबोडिया के कूटनीतिक कदम पर थाईलैंड ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। 19 जून 2025 को संयुक्त राष्ट्र में थाईलैंड के स्थायी प्रतिनिधि ने महासचिव को विस्तृत बयान सौंपा, जिसमें घटनाओं का थाईलैंड का पक्ष और उसकी कानूनी तथा कूटनीतिक स्थिति बताई गई। थाई सरकार ने “अंतरराष्ट्रीय कानून तथा संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों के प्रति अपनी दृढ़ प्रतिबद्धता” दोहराई और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान तथा संप्रभुता के सम्मान पर जोर दिया।
थाईलैंड के बयान में दावा किया गया कि उसके सैनिक थाई संप्रभु क्षेत्र में नियमित गश्त कर रहे थे, तभी “कंबोडियाई सैनिकों ने बिना उकसावे के गोलीबारी की।” जवाब में कहा गया कि थाई सैनिकों ने “आत्मरक्षा में अनुपातिक और उचित कार्रवाई” की।
थाईलैंड के तर्क का एक प्रमुख आधार दोनों देशों के बीच 2000 का समझौता ज्ञापन (एमओयू) है, जिसके तहत सीमा संबंधी मुद्दों के समाधान के लिए जेबीसी को मुख्य तंत्र बनाया गया था। थाईलैंड ने कंबोडिया पर एमओयू के अनुच्छेद V का उल्लंघन करने का आरोप लगाया, जो सीमावर्ती क्षेत्र के पर्यावरण को बदलने वाली गतिविधियों पर रोक लगाता है। उसने मामले को आईसीजे में ले जाने पर विचार करने के कंबोडिया के फैसले की भी आलोचना की और तर्क दिया कि यह एमओयू के अनुच्छेद VIII के विरुद्ध है, जिसके तहत विवादों का समाधान परामर्श और बातचीत से होना चाहिए।
आईसीजे के अधिकार क्षेत्र को अस्वीकार
थाईलैंड के बयान में मामले को एकतरफा रूप से आईसीजे में ले जाने की किसी भी कोशिश को दृढ़ता से खारिज किया गया। बयान में कहा गया कि थाईलैंड ने 1960 से आईसीजे संविधि के अनुच्छेद 36(2) के तहत न्यायालय के अनिवार्य अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया है। संयुक्त राष्ट्र में थाईलैंड के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत चेरदचाई चाइवाइवित ने कहा:
शाही थाई सरकार अपने इस रुख को दोहराती है कि थाईलैंड एकतरफा कार्यवाही शुरू करने की किसी भी कोशिश के लिए सहमति नहीं देगा।
थाईलैंड ने मौजूदा द्विपक्षीय तंत्रों के जरिए मतभेद सुलझाने की अपनी प्रतिबद्धता पर भी जोर दिया। इनमें सामान्य सीमा समिति (जीबीसी), क्षेत्रीय सीमा समिति (आरबीसी) और जेबीसी शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि जेबीसी की बैठक 14 से 15 जून 2025 के बीच हुई थी, यानी संयुक्त राष्ट्र में कूटनीतिक पत्राचार से कुछ ही दिन पहले। इससे पता चलता है कि तनाव के बावजूद दोनों पक्ष स्थापित माध्यमों के जरिए बातचीत के इच्छुक थे।
कंबोडिया का जवाब: संधि उल्लंघन के आरोप और कानूनी समाधान की मांग
थाईलैंड के बयानों के जवाब में कंबोडिया के विदेश और अंतरराष्ट्रीय सहयोग मंत्रालय ने कड़ा प्रतिवाद जारी किया। उसने थाईलैंड पर “भ्रामक बयान” देने और 2000 के एमओयू के तहत अपने दायित्वों का पालन न करने का आरोप लगाया। कंबोडिया का कहना था कि थाईलैंड ने एकतरफा रूप से अपने नक्शे लागू किए और क्षेत्र में अतिक्रमण किया, जिससे न केवल एमओयू बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून का भी उल्लंघन हुआ।
कंबोडियाई सरकार ने मामले को आईसीजे में भेजने के अपने फैसले का बचाव करते हुए इसे थाईलैंड द्वारा सशस्त्र बल के इस्तेमाल और सीमा के संयुक्त निर्धारण के परस्पर सहमत ढांचे में शामिल होने से इनकार के जवाब में उठाया गया “संतुलित, नियम-आधारित और शांतिपूर्ण” कदम बताया। कंबोडिया ने थाईलैंड से सभी एकतरफा कार्रवाई रोकने और संधि संबंधी दायित्वों का सम्मान करने की अपील की। उसने आईसीजे सहित विवादों के शांतिपूर्ण और कानूनी समाधान के तंत्रों में रचनात्मक भागीदारी का आग्रह किया।
राजनीतिक और जन प्रतिक्रियाएं
इस विवाद से दोनों देशों में राष्ट्रवादी भावना तेज हुई है। विवादित स्थलों पर सैन्यकर्मियों के बीच ही नहीं, आम नागरिकों और पर्यटकों के बीच भी टकराव की खबरें आई हैं। सोशल मीडिया ने तनाव को और बढ़ाया है। दोनों देशों के लोग तीखे विचार व्यक्त कर रहे हैं और कभी-कभी ऑनलाइन बहसों में उलझ जाते हैं। ऐतिहासिक मंदिरों और सीमा चौकियों पर हुई घटनाओं ने जनमत को और भड़काया है, जिससे कूटनीतिक समाधान की राह कठिन हुई है।
संयुक्त राष्ट्र की प्रक्रिया: अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने विवाद का आधिकारिक रिकॉर्ड
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने कंबोडिया और थाईलैंड के दोनों पत्रों को 79वें महासभा सत्र के एजेंडा मद 32 के तहत दर्ज कर लिया है। इसका मतलब है कि ये दस्तावेज संयुक्त राष्ट्र के सभी 193 सदस्य देशों को भेजे जाएंगे। इस तरह दोनों देशों के पक्ष आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज होंगे और व्यापक अंतरराष्ट्रीय समुदाय को उनकी-उनकी स्थिति की जानकारी मिलेगी। हालांकि, यह प्रक्रियात्मक कदम अपने आप संयुक्त राष्ट्र की कार्रवाई या फैसले की शुरुआत नहीं करता; इसका मुख्य उद्देश्य पारदर्शिता और अंतरराष्ट्रीय जागरूकता बढ़ाना है।
थाईलैंड के विदेश मंत्रालय के अनुसार, देशों के पक्षों को आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज करने और सदस्य देशों को घटनाक्रम से अवगत कराने के लिए दस्तावेज प्रसारित करना संयुक्त राष्ट्र की मानक प्रक्रिया है। इससे सदस्य देशों का औपचारिक रुख दर्ज होता है, लेकिन यह प्रक्रिया अपने आप मूल विवाद का समाधान नहीं करती।
द्विपक्षीय वार्ता विफल, अंतरराष्ट्रीय कानूनी मंचों की ओर रुख
थाई-कंबोडियाई संयुक्त सीमा आयोग (जेबीसी) की छठी बैठक 15 जून 2025 को नोम पेन्ह में हुई, लेकिन बिना किसी समझौते के समाप्त हो गई। दोनों पक्षों ने शांतिपूर्ण बातचीत को आगे बढ़ाने में आयोग की भूमिका की पुष्टि की, लेकिन संवाद केवल गैर-विवादित क्षेत्रों तक सीमित रहा। कंबोडिया ने कहा कि चार विवादित स्थलों—ता मोअन थॉम, ता मोअन ताउच, ता क्रबेई मंदिरों और मुम बेई क्षेत्र—पर जेबीसी के ढांचे के भीतर चर्चा नहीं होगी; इसके बजाय इन मामलों को आईसीजे के समक्ष उठाया जाएगा।
प्रगति न होने के बावजूद दोनों सरकारों ने कूटनीतिक संपर्क बनाए रखने और तनाव को और बढ़ने से रोकने की प्रतिबद्धता जताई है। हालांकि, जेबीसी वार्ता की विफलता और इसके बाद कंबोडिया के कानूनी कदम गहरे अविश्वास और ऐसे जटिल विवादों को सुलझाने में द्विपक्षीय तंत्रों की सीमाओं को उजागर करते हैं।
तनाव बढ़ाने वाले कदम: सीमा बंदी, आर्थिक जवाबी कार्रवाई और राष्ट्रवादी बयानबाजी
28 मई की झड़प और कूटनीतिक गतिरोध के बाद दोनों देशों ने जवाबी कदम उठाए हैं या उठाने की धमकी दी है। थाईलैंड ने सीमा पर नई पाबंदियां लगाईं, पर्यटकों के कंबोडिया में प्रवेश पर रोक लगाई और भूमि सीमा चौकियों पर नियंत्रण कड़ा किया। केवल विद्यार्थियों, चिकित्सा सहायता लेने वालों और जरूरी काम से यात्रा करने वालों को सीमा पार करने की अनुमति दी गई। बताया गया कि इन कदमों का उद्देश्य सीमा पार अपराध, खासकर कंबोडिया में चल रहे घोटाले के धंधों पर अंकुश लगाना था, लेकिन ये आर्थिक दबाव का जरिया भी बने।
कंबोडिया ने जवाब में थाई इंटरनेट सेवाओं का बहिष्कार किया, थाईलैंड से बिजली और ईंधन की आपूर्ति रोक दी तथा टेलीविजन और सिनेमाघरों में थाई फिल्मों पर प्रतिबंध लगा दिया। इन कदमों से सीमा के आसपास रोजमर्रा की जिंदगी और व्यापार प्रभावित हुए तथा द्विपक्षीय संबंधों पर दबाव और बढ़ा। दोनों सरकारों ने राष्ट्रीय संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा को इन कदमों का आधार बताया, लेकिन इन्हें घरेलू राष्ट्रवादी भावना को संतुष्ट करने की कोशिश के रूप में भी देखा गया।
नेतृत्व की गतिशीलता और राजनीतिक असर
यह विवाद जटिल राजनीतिक रिश्तों की पृष्ठभूमि में सामने आया है। थाईलैंड की प्रधानमंत्री पैतोंगतार्न शिनावात्रा और कंबोडिया के प्रधानमंत्री हुन मानेत, दोनों पूर्व नेताओं—थाकसिन शिनावात्रा और हुन सेन—की संतान हैं। इन दोनों पूर्व नेताओं की सार्वजनिक रूप से मित्रता रही है। इस व्यक्तिगत रिश्ते के चलते अटकलें लगी हैं कि मौजूदा नेता एक-दूसरे के प्रति “बहुत नरम” हो सकते हैं। इस आरोप ने थाईलैंड में राष्ट्रवादी समूहों की आलोचना को बढ़ाया है और दोनों सरकारों के राजनीतिक फैसलों को जटिल बनाया है।
कंबोडिया में सीनेट अध्यक्ष हुन सेन ने आईसीजे के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार करने में थाईलैंड की अनिच्छा को सार्वजनिक रूप से चुनौती दी। उनका तर्क था कि अदालत का फैसला विवाद सुलझाने के लिए निष्पक्ष आधार देगा और दोनों सरकारों को अपने नागरिकों के सामने नतीजे को उचित ठहराने में मदद करेगा। उन्होंने सवाल किया:
बैंकॉक कंबोडिया पर थाईलैंड की संप्रभुता का उल्लंघन करने का आरोप लगाता है। तो वह आईसीजे में मामला क्यों नहीं दायर करता? कानूनी कार्यवाही से क्यों बचता है? जो कानूनी है, उससे डरना नहीं चाहिए।
इन बयानों को कंबोडियाई जनता के कुछ वर्गों का समर्थन मिला है और थाई सरकार पर अपना रुख बचाव करने का दबाव बढ़ा है।
क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय असर
थाईलैंड और कंबोडिया का सीमा विवाद निकटवर्ती क्षेत्र से आगे तक असर डालता है। दोनों देश दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों के संगठन (आसियान) के सदस्य हैं। आसियान विवादों के शांतिपूर्ण समाधान और क्षेत्रीय एकजुटता पर जोर देता है। जारी तनाव आसियान की क्षेत्रीय संघर्षों को संभालने और अपने सिद्धांतों को बनाए रखने की क्षमता की परीक्षा लेता है।
अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने चिंता जताई है कि यह विवाद व्यापक क्षेत्र को अस्थिर कर सकता है, खासकर अगर सैन्य जमावड़ा जारी रहा या राष्ट्रवादी बयानबाजी और तेज हुई। संयुक्त राष्ट्र की भागीदारी और आईसीजे में कार्यवाही की संभावना इस संघर्ष के वैश्विक आयाम को उजागर करती है, भले ही दोनों पक्ष द्विपक्षीय समाधान को प्राथमिकता देने की बात करते हों।
आगे क्या? समाधान की संभावनाएं
थाईलैंड-कंबोडिया सीमा विवाद सुलझाना आसान नहीं होगा। ऐतिहासिक, कानूनी और राजनीतिक जटिलताएं गहरी हैं और दोनों देशों की घरेलू राजनीतिक मजबूरियां समझौता करना कठिन बनाती हैं। हाल की द्विपक्षीय वार्ता की विफलता और कंबोडिया का आईसीजे की ओर रुख संकेत देता है कि विवाद एक नए चरण में प्रवेश कर सकता है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय कानूनी मंचों की भूमिका बढ़ेगी।
हालांकि, थाईलैंड के आईसीजे के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार करने से इनकार और द्विपक्षीय तंत्रों पर जोर देने के कारण किसी भी कानूनी कार्यवाही के लंबी और विवादास्पद होने की आशंका है। इस बीच, अपने-अपने दावे पेश करने के साथ-साथ दोनों सरकारों का हित सीमा पर आगे हिंसा रोकने और स्थिरता बनाए रखने में है।
फिलहाल, संयुक्त राष्ट्र में आधिकारिक पत्रों का प्रसार अंतरराष्ट्रीय समुदाय को याद दिलाता है कि विवाद अब भी अनसुलझा है और इस पर लगातार नजर रखने तथा कूटनीतिक संवाद जारी रखने की जरूरत है।
संक्षेप में
- 28 मई 2025 को विवादित चोंग बोक इलाके में हुई घातक झड़प के बाद थाईलैंड-कंबोडिया सीमा विवाद फिर भड़क उठा।
- कंबोडिया ने संयुक्त राष्ट्र से अपील की और संधि उल्लंघन तथा द्विपक्षीय वार्ता में प्रगति न होने का हवाला देते हुए मामला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में ले जाने का इरादा जताया।
- थाईलैंड ने अपनी कार्रवाई को आत्मरक्षा बताते हुए उसका बचाव किया, आईसीजे के अधिकार क्षेत्र को अस्वीकार किया और 2000 के एमओयू के तहत द्विपक्षीय तंत्रों की जरूरत पर जोर दिया।
- दोनों देशों ने संयुक्त राष्ट्र में अपने पक्ष प्रसारित कराए हैं, लेकिन इस प्रक्रिया से अपने आप अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप शुरू नहीं होता।
- द्विपक्षीय वार्ता की विफलता, आर्थिक जवाबी कार्रवाई और बढ़ती राष्ट्रवादी भावना ने विवाद सुलझाने की कोशिशों को जटिल बनाया है।
- इस संघर्ष का आसियान पर क्षेत्रीय असर पड़ता है और यह दक्षिण-पूर्व एशिया की व्यापक स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।
- जल्दी समाधान की संभावना कम है। दोनों पक्ष अपने रुख पर अड़े हैं और कानूनी, ऐतिहासिक तथा राजनीतिक कारक समझौते को कठिन बनाते हैं।






