परिचय: ताइवान में परमाणु ऊर्जा के एक युग का अंत
17 मई, 2025 को ताइवान ने माशान परमाणु ऊर्जा संयंत्र के अपने आखिरी चालू रिएक्टर को बंद कर दिया। इसके साथ ही द्वीप पर लगभग पांच दशकों से जारी परमाणु ऊर्जा उत्पादन का अंत हो गया। “परमाणु-मुक्त मातृभूमि” बनाने की लंबे समय से चली आ रही नीति की परिणति इस ऐतिहासिक कदम ने ताइवान की ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता और पर्यावरणीय लक्ष्यों के भविष्य पर तीखी बहस छेड़ दी है। यह बंदी ऐसे समय हुई है, जब कम कार्बन वाले ऊर्जा स्रोत के रूप में परमाणु ऊर्जा में दुनिया भर की दिलचस्पी बढ़ रही है और ताइवान अनूठी भू-राजनीतिक तथा औद्योगिक चुनौतियों का सामना कर रहा है।
विषय-सूची
- परिचय: ताइवान में परमाणु ऊर्जा के एक युग का अंत
- ताइवान ने परमाणु ऊर्जा को चरणबद्ध ढंग से क्यों बंद किया?
- परमाणु संयंत्र बंद होने के बाद ऊर्जा मिश्रण: जीवाश्म ईंधनों का दबदबा
- आर्थिक और औद्योगिक प्रभाव: बढ़ती लागत और तकनीकी क्षेत्र के जोखिम
- ऊर्जा सुरक्षा: तनावपूर्ण भू-राजनीतिक माहौल में रणनीतिक कमजोरियां
- पर्यावरणीय बहस: वायु गुणवत्ता, उत्सर्जन और नवीकरणीय ऊर्जा की भूमिका
- राजनीतिक और सामाजिक गतिशीलता: जनमत और नीतिगत बदलाव
- नवीकरणीय ऊर्जा और आगे की राह: अवसर और चुनौतियां
- ताइवान से सबक: ऊर्जा बदलाव की एक कसौटी
- संक्षेप में
परमाणु ऊर्जा को चरणबद्ध ढंग से बंद करने का फैसला दशकों के राजनीतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय आंदोलनों की पृष्ठभूमि में लिया गया। 1996 में ऑर्किड द्वीप पर नाटकीय गतिरोध के दौरान स्थानीय आदिवासी निवासियों ने परमाणु कचरा ले जा रहे मालवाहक जहाज को रोक दिया था। यह अहम घटना जनमत और सरकारी नीति को आकार देने में मददगार साबित हुई। तब से ताइवान के बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी लगातार घटती गई है और उसकी जगह जीवाश्म ईंधनों पर बढ़ती निर्भरता ने ली है। नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल भी बढ़ा है, लेकिन उसकी हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है।
ताइवान ने परमाणु ऊर्जा को चरणबद्ध ढंग से क्यों बंद किया?
ताइवान के परमाणु-विरोधी आंदोलन की जड़ें गहरी हैं। 1970 और 1980 के दशक में परमाणु संयंत्रों का निर्माण मार्शल लॉ के दौरान हुआ, जिसमें जनता से बहुत कम राय ली गई। 1986 की चेरनोबिल आपदा और पड़ोसी जापान में 2011 की फुकुशिमा दुर्घटना ने परमाणु सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दीं, खासकर ताइवान की भूकंपीय गतिविधियों और घनी आबादी को देखते हुए। इन घटनाओं ने परमाणु ऊर्जा के खिलाफ जनविरोध को बल दिया और यह आंदोलन ताइवान के लोकतंत्रीकरण तथा पर्यावरण आंदोलनों से जुड़ गया।
डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (डीपीपी), जो 2016 में सत्ता में आई, ने परमाणु-मुक्त मातृभूमि को अपनी प्रमुख नीतिगत प्राथमिकता बनाया। सरकार ने 2025 तक सभी परमाणु संयंत्रों को बंद करने, पवन और सौर ऊर्जा का तेजी से विस्तार करने और कोयले पर निर्भरता घटाने का वादा किया। इस नीति को कानून में शामिल किया गया और पर्यावरण समूहों का समर्थन मिला, लेकिन उद्योग जगत के नेताओं और ऊर्जा विशेषज्ञों के बीच यह विवादित बनी रही।
परमाणु संयंत्र बंद होने के बाद ऊर्जा मिश्रण: जीवाश्म ईंधनों का दबदबा
माशान का आखिरी रिएक्टर बंद होने के बाद ताइवान के बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी शून्य हो गई है। आर्थिक मामलों के मंत्रालय के अनुसार, अब द्वीप की करीब 84% बिजली जीवाश्म ईंधनों से मिलती है, जिनमें मुख्य रूप से कोयला और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) शामिल हैं। नवीकरणीय स्रोत, खासकर सौर और पवन ऊर्जा, कुल बिजली का 12% से कुछ अधिक हिस्सा देते हैं। सरकार का लक्ष्य 2027 तक यह हिस्सेदारी 20% और 2030 तक 30% करना है।
परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता की कमी पूरी करने के लिए ताइवान पावर कंपनी (ताइपावर) गैस से चलने वाले बिजली संयंत्रों का तेजी से विस्तार कर रही है और नवीकरणीय ऊर्जा की नई परियोजनाओं में निवेश कर रही है। सरकार का कहना है कि कम से कम 2032 तक बिजली की आपूर्ति स्थिर रहेगी और अधिकतम मांग के दौरान भी आरक्षित क्षमता 10% से ऊपर रहेगी। प्रधानमंत्री चो जंग-ताई ने जनता को भरोसा दिलाया है कि शिंता, सन बा और दातान संयंत्रों में नई उत्पादन इकाइयां परमाणु ऊर्जा से पैदा हुई कमी पूरी करेंगी। उन्होंने यह भी कहा कि हाई-टेक उद्योगों और एआई डेटा केंद्रों के विस्तार को सहारा देने के लिए बिजली ग्रिड को मजबूत किया जा रहा है।
आर्थिक और औद्योगिक प्रभाव: बढ़ती लागत और तकनीकी क्षेत्र के जोखिम
परमाणु ऊर्जा को चरणबद्ध ढंग से बंद करने के आर्थिक नतीजे बड़े हैं। टीएसएमसी जैसी कंपनियों पर आधारित ताइवान का विश्व-अग्रणी सेमीकंडक्टर उद्योग बिजली का बड़ा उपभोक्ता है। अकेले टीएसएमसी द्वीप की करीब 10% बिजली इस्तेमाल करती है। ऊर्जा-सघन एआई और चिप निर्माण की मांग बढ़ने के साथ ताइवान के बिजली ग्रिड और ऊर्जा लागत पर दबाव भी बढ़ रहा है।
उद्योग विश्लेषकों का कहना है कि ऊर्जा मिश्रण से परमाणु बिजली हटाने पर बिजली उत्पादन की लागत हर साल NT$100 अरब (करीब 3.2 अरब अमेरिकी डॉलर) बढ़ेगी। परमाणु उत्पादन क्षमता की कमी पूरी करने के लिए जरूरी एलएनजी आयात वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति संबंधी जोखिमों के अधीन है। बिजली की कीमतें स्थिर रखने के लिए ईंधन की बढ़ी लागत खुद वहन करने वाली ताइपावर ने बताया कि 2024 के अंत तक उसका संचित घाटा NT$420 अरब (14 अरब अमेरिकी डॉलर) से अधिक हो गया था। इस वित्तीय दबाव के चलते भविष्य में कारोबारों और परिवारों के लिए बिजली दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं।
ताइवान की औद्योगिक प्रतिस्पर्धा के लिए स्थिर और किफायती बिजली बेहद अहम है। ऊर्जा लागत लगातार बढ़ने या आपूर्ति भरोसेमंद न रहने पर वैश्विक तकनीकी कंपनियां अपने परिचालन को अधिक सुरक्षित और हरित ऊर्जा वाले क्षेत्रों में ले जा सकती हैं। इसके ताइवान की अर्थव्यवस्था और उसके “सिलिकॉन शील्ड” पर दूरगामी असर होंगे। यह वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में ताइवान के सेमीकंडक्टर उद्योग का रणनीतिक महत्व है।
ऊर्जा सुरक्षा: तनावपूर्ण भू-राजनीतिक माहौल में रणनीतिक कमजोरियां
शायद सबसे बड़ी चिंता ऊर्जा सुरक्षा की है। ताइवान अपनी 97% ऊर्जा आयात करता है, जिसमें उसकी पूरी एलएनजी, कोयला और तेल की जरूरत शामिल है। समुद्र से घिरा और चीन से 160 किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित यह द्वीप आपूर्ति बाधित होने के प्रति बेहद संवेदनशील है, खासकर सैन्य नाकेबंदी या संघर्ष की स्थिति में।
विशेषज्ञों का कहना है कि परमाणु ऊर्जा से स्थल पर ईंधन भंडारित किया जा सकता था और कम कार्बन उत्सर्जन के साथ ऊर्जा संबंधी आत्मनिर्भरता तथा मजबूती को कुछ हद तक सहारा मिलता था। इसके विपरीत, समुद्री मार्ग बंद होने पर एलएनजी की आपूर्ति कुछ ही दिनों में बाधित हो सकती है। ताइवान के पास फिलहाल करीब 11 दिन की जरूरत पूरी करने लायक गैस का भंडार है। चीन के साथ बढ़ते तनाव को देखते हुए यह एक बड़ी कमजोरी है।
कुछ विश्लेषक यूक्रेन का उदाहरण देते हैं, जहां अन्य बुनियादी ढांचे पर हमलों के बावजूद परमाणु संयंत्रों ने बिजली आपूर्ति बनाए रखने में मदद की है। उनका कहना है कि ताइवान में परमाणु संयंत्रों को निशाना बनाने से चीन हिचकिचाएगा, क्योंकि रेडियोधर्मी विकिरण का असर उसकी अपनी आबादी और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। परमाणु ऊर्जा के बिना ताइवान का बिजली ग्रिड भौतिक और आर्थिक, दोनों तरह के खतरों के प्रति अधिक संवेदनशील है।
पर्यावरणीय बहस: वायु गुणवत्ता, उत्सर्जन और नवीकरणीय ऊर्जा की भूमिका
परमाणु ऊर्जा को चरणबद्ध ढंग से बंद करने के पक्ष में एक प्रमुख तर्क पर्यावरणीय सुरक्षा था, खासकर रेडियोधर्मी कचरे और दुर्घटनाओं के जोखिम को लेकर चिंता। ताइवान के आदिवासी ताओ समुदाय का घर ऑर्किड द्वीप, परमाणु कचरे के भंडारण के खिलाफ प्रदर्शनों का लंबे समय से केंद्र रहा है। स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी संबंधी जोखिमों का हवाला देते हुए निवासी अब भी कचरे के ड्रम हटाने की मांग कर रहे हैं।
हालांकि, इस नीति के आलोचकों का कहना है कि जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता बढ़ने से ताइवान के जलवायु लक्ष्य कमजोर होंगे। परमाणु ऊर्जा से दीर्घजीवी कचरा तो पैदा होता है, लेकिन इससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन लगभग नहीं होता। अब जब ऊर्जा मिश्रण में कोयले और गैस का दबदबा है, तो कार्बन उत्सर्जन बढ़ने की आशंका है। इससे 2035 तक उत्सर्जन में 38% कटौती और 2050 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करना ताइवान के लिए मुश्किल होगा।
इस बदलाव के समर्थकों का जवाब है कि हाल के वर्षों में वायु गुणवत्ता में वास्तव में सुधार हुआ है। 2016 से 2024 के बीच पीएम2.5 की औसत सांद्रता 20 से घटकर 12.8 µg/m³ रह गई। इसका श्रेय सख्त नियमों, कोयले के कम इस्तेमाल और नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार को दिया जाता है। उनका कहना है कि परमाणु और नवीकरणीय ऊर्जा अक्सर नीतिगत प्राथमिकताओं और निवेश के लिए एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं और हरित ऊर्जा पर स्पष्ट ध्यान देने से कार्बन उत्सर्जन घटाने की रफ्तार तेज होगी।
राजनीतिक और सामाजिक गतिशीलता: जनमत और नीतिगत बदलाव
ताइवान में परमाणु ऊर्जा पर बहस गहरे राजनीतिक रंग लिए हुए है। डीपीपी ने परमाणु-मुक्त भविष्य का समर्थन किया है, लेकिन हाल के वर्षों में जनमत बदला है। सर्वेक्षणों से पता चलता है कि अब अधिकांश ताइवानी मौजूदा परमाणु संयंत्रों की परिचालन अवधि बढ़ाने के पक्ष में हैं, खासकर ऊर्जा लागत बढ़ने और जलवायु संबंधी चिंताएं गहराने के बीच। 2018 में हुए जनमत संग्रह में परमाणु ऊर्जा बंद करने की योजना खारिज कर दी गई थी, लेकिन सरकार ने अपनी नीति जारी रखी। 2021 में हुए एक और मतदान में एक संयंत्र बंद करने के फैसले को समर्थन मिला, हालांकि जीत का अंतर कम था।
माशान संयंत्र बंद होने के बाद विपक्षी दलों ने परमाणु ऊर्जा का उत्पादन फिर शुरू करने पर नए जनमत संग्रह की मांग की है। हाल ही में विधायिका ने परमाणु रिएक्टर सुविधाएं विनियमन अधिनियम में संशोधन कर लाइसेंस की अवधि 20 साल तक बढ़ाने की अनुमति दी है। इससे सुरक्षा और कचरे से जुड़ी समस्याएं सुलझने पर संयंत्र फिर शुरू करने का रास्ता खुल गया है। प्रधानमंत्री चो और आर्थिक मामलों के मंत्री कुओ ने नई परमाणु तकनीकों पर विचार करने की इच्छा जताई है, बशर्ते इस पर राष्ट्रीय सहमति हो और मजबूत सुरक्षा उपाय किए जाएं।
हालांकि, सामाजिक सहमति अब भी दूर है। कई लोगों, खासकर आदिवासी समुदायों और पर्यावरणविदों के लिए, परमाणु कचरे की विरासत और दुर्घटनाओं का जोखिम इसके लाभों से अधिक है। वहीं, कुछ लोगों के लिए ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता सबसे अहम हैं। तेजी से बदलते ऊर्जा परिदृश्य के बीच इन परस्पर विरोधी प्राथमिकताओं में संतुलन बनाना सरकार के सामने चुनौती है।
नवीकरणीय ऊर्जा और आगे की राह: अवसर और चुनौतियां
ताइवान सरकार ने नवीकरणीय ऊर्जा के महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किए हैं। उसका लक्ष्य 2027 तक बिजली का 20% और 2030 तक 30% नवीकरणीय स्रोतों से हासिल करना है। अपतटीय पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा और ऊर्जा भंडारण में बड़े निवेश जारी हैं। ताइनान में शालुन ग्रीन एनर्जी टेक्नोलॉजी डेमॉन्स्ट्रेशन साइट में लगभग शून्य और शून्य उत्सर्जन वाले मॉडल घर हैं, जो टिकाऊ जीवनशैली की संभावनाओं को दर्शाते हैं।
फिर भी बड़ी बाधाएं बनी हुई हैं। ताइवान का पहाड़ी भूभाग और सीमित जमीन बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा परियोजनाओं को मुश्किल बनाते हैं। स्थानीय सामग्री के इस्तेमाल की अनिवार्य शर्तों और भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण अपतटीय पवन परियोजनाओं में देरी हो रही है। रुक-रुककर मिलने वाली नवीकरणीय ऊर्जा और डेटा केंद्रों तथा उद्योगों की बढ़ती मांग को संभालने के लिए बिजली ग्रिड का उन्नयन जरूरी है। बैटरी भंडारण और मांग प्रबंधन कार्यक्रमों का विस्तार हो रहा है, लेकिन अधिकतम मांग पूरी करने के लिए इन्हें बड़े पैमाने पर लागू करना जटिल काम है।
कुछ विशेषज्ञ विविध ऊर्जा रणनीति की वकालत करते हैं, जिसमें छोटे मॉड्यूलर परमाणु रिएक्टर विकसित करना और स्वच्छ ऊर्जा में निजी निवेश बढ़ाना शामिल है। अन्य विशेषज्ञ भरोसा और सहमति बनाने के लिए जनता के साथ लगातार संवाद और पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया पर जोर देते हैं।
ताइवान से सबक: ऊर्जा बदलाव की एक कसौटी
ऊर्जा बदलाव के फायदे और नुकसान के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे दूसरे देशों के लिए ताइवान का अनुभव उपयोगी सबक देता है। परमाणु ऊर्जा पर निर्भरता से जीवाश्म ईंधन-प्रधान और नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार की आकांक्षा वाली व्यवस्था तक का ताइवान का सफर दिखाता है कि सुरक्षा, आपूर्ति की भरोसेमंदी, किफायत और टिकाऊपन में संतुलन बनाना कितना जटिल है।
जब दुनिया कार्बन उत्सर्जन घटाने और विद्युतीकरण की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है, तब ताइवान की चुनौतियां और भी प्रासंगिक होती जा रही हैं। इनमें तनावपूर्ण भू-राजनीतिक माहौल में ऊर्जा सुरक्षा, हाई-टेक अर्थव्यवस्था की जरूरतें और जनसहमति की आवश्यकता शामिल हैं। परमाणु ऊर्जा पर बहस अभी खत्म नहीं हुई है और आने वाले साल ताइवान की ऊर्जा प्रणाली की मजबूती तथा बदलती परिस्थितियों के अनुरूप ढलने की क्षमता की परीक्षा लेंगे।
संक्षेप में
- ताइवान ने मई 2025 में अपना आखिरी परमाणु रिएक्टर बंद कर दिया, जिससे करीब 50 साल से जारी परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल समाप्त हो गया।
- यह फैसला सुरक्षा संबंधी चिंताओं, जनविरोध और परमाणु-मुक्त मातृभूमि के सरकारी संकल्प से प्रेरित था।
- अब ताइवान की 84% बिजली जीवाश्म ईंधनों से मिलती है। नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी 12% से कुछ अधिक है और भविष्य में इसे तेजी से बढ़ाने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किए गए हैं।
- इस बंदी से ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं, खासकर आयातित एलएनजी पर ताइवान की निर्भरता और चीन के साथ तनाव के बीच आपूर्ति बाधित होने के जोखिम को देखते हुए।
- आर्थिक प्रभावों में बिजली उत्पादन की बढ़ती लागत, ताइपावर पर वित्तीय दबाव और सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए संभावित जोखिम शामिल हैं।
- पर्यावरणीय लाभों पर मतभेद हैं: वायु गुणवत्ता में सुधार हुआ है, लेकिन जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल बढ़ने से कार्बन उत्सर्जन बढ़ सकता है।
- ऊर्जा लागत और जलवायु संबंधी चिंताएं बढ़ने के साथ परमाणु ऊर्जा के समर्थन में जनमत बदल रहा है।
- सरकार नवीकरणीय ऊर्जा और बिजली ग्रिड के उन्नयन में निवेश कर रही है, लेकिन स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार करने और आपूर्ति स्थिर रखने में चुनौतियां हैं।
- ताइवान का अनुभव ऊर्जा बदलाव की जटिलता और संतुलित, बदलती परिस्थितियों के अनुकूल नीतियों की जरूरत को रेखांकित करता है।






