परिचय: चौराहे पर खड़ा एक देश
दक्षिण कोरिया लंबे समय से अपनी अथक कार्यसंस्कृति और दफ्तर में लंबे समय तक काम करने के लिए जाना जाता है। अब वहां एक तीखी राष्ट्रीय बहस छिड़ी है: क्या देश को 4.5-दिवसीय कार्यसप्ताह अपनाना चाहिए? राष्ट्रपति ली जे-म्युंग के मानक कार्यसप्ताह को 40 से घटाकर 36 घंटे करने के चुनावी वादे से इस प्रस्ताव ने कर्मचारियों में बेहतर कार्य-जीवन संतुलन की उम्मीद जगाई है। वहीं, इसकी व्यवहार्यता और आर्थिक प्रभाव को लेकर कारोबारी नेताओं और अर्थशास्त्रियों की गहरी चिंताएं भी बढ़ी हैं।
विषय-सूची
- परिचय: चौराहे पर खड़ा एक देश
- 4.5-दिवसीय कार्यसप्ताह क्यों? बदलाव की मांग
- राजनीतिक वादे और नीतिगत प्रस्ताव
- कारोबारी जगत का विरोध: उत्पादकता और आर्थिक चिंताएं
- श्रमिक संगठन और कर्मचारियों के हितों की पैरवी
- वास्तविक प्रयोग: कंपनियां और स्थानीय सरकारें आगे
- अंतरराष्ट्रीय तुलना: सबक और सीमाएं
- संरचनात्मक चुनौतियां: उत्पादकता, असमानता और दोहरा श्रम बाजार
- सफलता के लिए क्या जरूरी होगा?
- व्यापक प्रभाव: सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक असर
- संक्षेप में
यह मुद्दा केवल काम के घंटों का नहीं है। इसका संबंध दक्षिण कोरिया के आर्थिक मॉडल, पीढ़ियों के बदलते मूल्यों, श्रम बाजार की संरचना और काम तथा उत्पादकता के वैश्विक रुझानों के अनुरूप ढलने की देश की क्षमता से है। सरकार, कारोबारी जगत और कर्मचारी इसके निहितार्थों पर विचार कर रहे हैं। इस बहस का नतीजा एशिया की सबसे गतिशील अर्थव्यवस्थाओं में से एक में काम के भविष्य को नया रूप दे सकता है।
4.5-दिवसीय कार्यसप्ताह क्यों? बदलाव की मांग
कई दक्षिण कोरियाई लोगों के लिए कम कार्यसप्ताह का विचार महज नीतिगत प्रस्ताव नहीं, बल्कि लंबे समय से राहत की उम्मीद है। सर्वेक्षणों में लगातार भारी समर्थन दिखता है: कारोबारी नेटवर्किंग मंच रिमेंबर के 2024 के एक सर्वेक्षण में 70% वेतनभोगी कर्मचारियों ने चार-दिवसीय कार्यसप्ताह को प्राथमिकता दी। सरामिन के एक सर्वेक्षण में 86.7% कर्मचारियों ने इस विचार का समर्थन किया और 60% से अधिक ने कम घंटों के बदले कम वेतन स्वीकार करने की इच्छा जताई।
सियोल में दफ्तर में काम करने वाली 39 वर्षीय किम जी-उन जैसे कर्मचारियों की भावना आम है:
अभी हर शुक्रवार शाम मैं काम से इतनी थकी हुई निकलती हूं कि आराम करने के लिए भी बमुश्किल समय मिलता है, जीवन का आनंद लेने या बच्चों की देखभाल की तो बात ही छोड़िए। बस आधा दिन और मिल जाए तो सचमुच संतुलन बनाने का मौका होगा।
इस व्यापक समर्थन के पीछे दक्षिण कोरिया के कुख्यात रूप से लंबे कार्य घंटे हैं। 2022 में एक औसत दक्षिण कोरियाई ने 1,901 घंटे काम किया, जो ओईसीडी के औसत से 149 घंटे अधिक था। देश की जरूरत से ज्यादा काम करने की संस्कृति ने ग्वारोसा, यानी “अत्यधिक काम से मौत”, जैसे शब्द को भी जन्म दिया है। खासकर युवा कर्मचारियों में थकान और मानसिक तनाव व्यापक हैं और वे बदलाव की जरूरत पर तेजी से मुखर हो रहे हैं।
पीढ़ियों का नजरिया बदल रहा है। तथाकथित “एमजेड पीढ़ी” (मिलेनियल्स और जेन ज़ी) आर्थिक सफलता के लिए निजी खुशहाली का त्याग करने को कम तैयार है और ऐसे सुधारों की मांग कर रही है जो कार्य-जीवन संतुलन और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें। 4 डे वीक ग्लोबल के सीईओ डेल व्हीलहन कहते हैं:
यह युवा पीढ़ी उस समझौते को ठुकरा रही है जिसे उनके माता-पिता और दादा-दादी को अक्सर करना पड़ा: आर्थिक सफलता के लिए अपनी खुशहाली, स्वास्थ्य और निजी संतुष्टि का त्याग करना।
राजनीतिक वादे और नीतिगत प्रस्ताव
दक्षिण कोरिया के राजनीतिक परिदृश्य में 4.5-दिवसीय कार्यसप्ताह एक प्रमुख मुद्दा बन गया है। दोनों प्रमुख दलों, उदारवादी डेमोक्रेटिक पार्टी (डीपी) और रूढ़िवादी पीपल पावर पार्टी (पीपीपी), ने अपने घोषणापत्रों में इस नीति के अलग-अलग रूप शामिल किए हैं, हालांकि उनके तरीकों में महत्वपूर्ण अंतर हैं।
- डेमोक्रेटिक पार्टी (डीपी): कानूनी कार्यसप्ताह को 40 से घटाकर 36 घंटे करने का प्रस्ताव देती है, बिना वेतन घटाए। उसका लक्ष्य 2030 तक कोरिया के औसत वार्षिक कार्य घंटों को ओईसीडी के औसत से नीचे लाना है। डीपी चरणबद्ध बदलाव की कल्पना करती है, जिसमें नई व्यवस्था अपनाने वाली कंपनियों को सरकार का मजबूत समर्थन मिलेगा और अंततः चार-दिवसीय कार्यसप्ताह की ओर बढ़ा जाएगा।
- पीपल पावर पार्टी (पीपीपी): “लचीले” 4.5-दिवसीय कार्यसप्ताह का सुझाव देती है, जिसमें कर्मचारी सोमवार से गुरुवार तक रोज एक घंटा अतिरिक्त काम करेंगे और शुक्रवार को आधे दिन की छुट्टी लेंगे। इस तरह सप्ताह के कुल कार्य घंटे 40 ही रहेंगे। पीपीपी का तर्क है कि ऐसे बदलाव कानून से अनिवार्य करने के बजाय अलग-अलग कंपनियों के विवेक पर छोड़े जाने चाहिए।
राष्ट्रपति ली जे-म्युंग ने जोर देकर कहा है कि कोई भी बदलाव धीरे-धीरे होगा और संबंधित पक्षों से बातचीत के आधार पर किया जाएगा। उन्होंने विवादास्पद “समावेशी वेतन प्रणाली” (जिससे अक्सर बिना वेतन के अतिरिक्त काम करना पड़ता है) की समीक्षा करने, छुट्टियों के लिए सहायता बढ़ाने और नई व्यवस्था अपनाने वाली कंपनियों को प्रोत्साहन देने का वादा भी किया है।
कारोबारी जगत का विरोध: उत्पादकता और आर्थिक चिंताएं
जनता के समर्थन के बावजूद कारोबारी जगत इस प्रस्ताव को लेकर गहरे संदेह में है। अंतरराष्ट्रीय मानकों की तुलना में दक्षिण कोरिया की श्रम उत्पादकता अब भी कम है। कोरिया लेबर इंस्टीट्यूट के अनुसार, 2023 में देश 38 ओईसीडी देशों में 33वें स्थान पर था। प्रति घंटे उत्पादकता 44.4 डॉलर थी, जो अमेरिका के स्तर का केवल 57% और जर्मनी के स्तर का 65% है।
नियोक्ताओं को चिंता है कि उत्पादकता में समान बढ़ोतरी के बिना काम के घंटे घटाने से श्रम लागत बढ़ेगी और प्रतिस्पर्धा को नुकसान होगा, खासकर छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों (एसएमई) को। कोरिया एम्प्लॉयर्स फेडरेशन के अध्यक्ष सोन क्यंग-सिक ने चेतावनी दी:
कुछ अग्रणी कंपनियां प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए चार-दिवसीय या 4.5-दिवसीय कार्यसप्ताह अपना सकती हैं। लेकिन कई कंपनियों के लिए यह बदलाव भारी दबाव का कारण होगा।
कोरियाई अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले एसएमई खास तौर पर चिंतित हैं। मौजूदा 52-घंटे के कार्यसप्ताह (40 घंटे और अधिकतम 12 घंटे अतिरिक्त काम) के तहत भी कई कंपनियों को समयसीमा पूरी करने में दिक्कत होती है। 50 कर्मचारियों वाले एक छोटे ऑटो पार्ट्स निर्माता ने बताया:
घटे हुए घंटों में काम पूरा करने के लिए हमें या तो ऑर्डर कम करने होंगे या अधिक कर्मचारियों को रखना होगा। पहले विकल्प से विकास बाधित होगा, जबकि दूसरे से श्रम लागत बढ़ेगी।
कोरिया फेडरेशन ऑफ एसएमई के अनुसार, 42.4% छोटे कारोबार मौजूदा व्यवस्था में कठिनाइयों की बात कहते हैं। उन्होंने श्रमिकों की कमी, अनिश्चित ऑर्डर और बढ़ती लागत को बड़ी चुनौतियां बताया। कारोबारी नेताओं का तर्क है कि सभी पर एक समान नियम थोपने से बड़ी कंपनियों (जो बढ़ी हुई लागत उठा सकती हैं) और छोटी फर्मों (जो ऐसा नहीं कर सकतीं) के बीच अंतर और गहरा हो सकता है।
श्रमिक संगठन और कर्मचारियों के हितों की पैरवी
दूसरी ओर, श्रमिक संगठन और कर्मचारियों के हितों की पैरवी करने वाले 4.5-दिवसीय कार्यसप्ताह के प्रबल समर्थक हैं। फेडरेशन ऑफ कोरियन ट्रेड यूनियन्स और कोरियन कन्फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियन्स, दोनों ने इस नीति का समर्थन किया है। उनका कहना है कि लंबे कार्य घंटों की समस्या से निपटना और जीवन की गुणवत्ता सुधारना बेहद जरूरी है।
श्रमिक संगठन आइसलैंड, फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों के सफल प्रायोगिक कार्यक्रमों का हवाला देते हैं, जहां कम कार्यसप्ताह से नौकरी को लेकर संतुष्टि बढ़ी और कुछ मामलों में उत्पादकता भी बढ़ी। उनका तर्क है कि स्वचालन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मंच-आधारित श्रम मॉडल में प्रगति से पारंपरिक कार्य-सारिणी पर फिर से विचार करना संभव हो गया है।
श्रमिक संगठन कम कार्यसप्ताह के सामाजिक लाभों पर भी जोर देते हैं, जिनमें जन्म दर में बढ़ोतरी, बेहतर मानसिक स्वास्थ्य और अधिक गतिशील घरेलू अर्थव्यवस्था शामिल हैं। एक श्रमिक संगठन के बयान में कहा गया:
अगर काम बदल रहा है, तो स्वीकार्य श्रम घंटों की हमारी परिभाषा को भी बदलना होगा।
वास्तविक प्रयोग: कंपनियां और स्थानीय सरकारें आगे
राष्ट्रीय कानून पर बहस जारी है, लेकिन दक्षिण कोरिया की कई बड़ी कंपनियां और स्थानीय सरकारें पहले से ही कम कार्यसप्ताह और लचीली समय-सारिणी के प्रयोग कर रही हैं।
- पोस्को: इस्पात क्षेत्र की दिग्गज कंपनी ने दफ्तर के कर्मचारियों के लिए हर दो सप्ताह में चार-दिवसीय कार्यसप्ताह शुरू किया है। कर्मचारी कुछ दिनों में अधिक घंटे काम करने के बदले हर दो सप्ताह में एक शुक्रवार की छुट्टी ले सकते हैं, जबकि कुल कार्यसप्ताह 40 घंटे का रहता है।
- सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स: जून 2023 से कर्मचारी महीने में एक बार चार-दिवसीय कार्यसप्ताह ले सकते हैं, बशर्ते वे जरूरी कार्य घंटे पूरे करें। वेतन वार्ता के दौरान तय की गई इस नीति का उद्देश्य कर्मचारियों का मनोबल बढ़ाना और प्रतिभाओं को आकर्षित करना है।
- एसके समूह: एसके टेलीकॉम और एसके हाइनिक्स भी ऐसे विकल्प देते हैं। काम के घंटों के आधार पर कर्मचारी हर दो सप्ताह में या महीने में एक बार शुक्रवार की छुट्टी ले सकते हैं।
- ग्योंगगी प्रांत: स्थानीय सरकार ने लचीली समय-सारिणी अपनाने वाली 83 कंपनियों को अनुदान देने का प्रायोगिक कार्यक्रम शुरू किया है। इसमें हर दो सप्ताह में चार-दिवसीय कार्यसप्ताह, 35-घंटे का कार्यसप्ताह या हर शुक्रवार आधे दिन काम करने जैसे विकल्प शामिल हैं। भाग लेने वाली करीब आधी कंपनियों में 40 से कम कर्मचारी हैं। इससे पता चलता है कि सहायता मिलने पर छोटी फर्में भी इसमें रुचि रखती हैं।
ये प्रयोग व्यापक स्तर पर लागू करने के लिए उपयोगी आंकड़े और व्यावहारिक मॉडल उपलब्ध कराते हैं। कोरिया वर्कर इंस्टीट्यूट एंड यूनियन सेंटर के निदेशक किम जोंग-जिन कहते हैं कि 2000 के शुरुआती वर्षों में छह-दिवसीय से पांच-दिवसीय कार्यसप्ताह की ओर बदलाव में चार साल लगे थे। इससे संकेत मिलता है कि अगले कदम के लिए भी इतना ही समय लग सकता है।
अंतरराष्ट्रीय तुलना: सबक और सीमाएं
कार्यसप्ताह पर नए सिरे से विचार करने वाला दक्षिण कोरिया अकेला देश नहीं है। कई देशों ने कम कार्यसप्ताह का प्रयोग किया है या उसे अपनाया है, और नतीजे मिले-जुले रहे हैं:
- आइसलैंड: बिना वेतन कटौती के चार-दिवसीय कार्यसप्ताह के सार्वजनिक क्षेत्र के एक परीक्षण से कर्मचारियों की खुशहाली में सुधार हुआ और उत्पादकता कायम रही या बढ़ी। हालांकि, आइसलैंड की छोटी आबादी और अनूठी आर्थिक संरचना के कारण उससे सीधी तुलना सीमित है।
- संयुक्त अरब अमीरात (यूएई): 2022 में यूएई ने संघीय कर्मचारियों के लिए 4.5-दिवसीय कार्यसप्ताह अपनाया। प्रतिक्रिया सकारात्मक रही, लेकिन यह अधिक तेल-संपन्नता और अलग श्रम बाजार वाले संदर्भ में हुआ।
- बेल्जियम, ब्रिटेन, जापान, न्यूजीलैंड: इन देशों ने परीक्षण किए हैं या लचीले विकल्प दिए हैं। जहां वेतन घटता है, वहां अक्सर भागीदारी कम हो जाती है।
विशेषज्ञ आगाह करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय उदाहरण उत्साहजनक हैं, लेकिन दक्षिण कोरिया के विशिष्ट श्रम बाजार में बड़ी चुनौतियां हैं। वहां सुरक्षित, स्थायी नौकरियों और अस्थिर, गैर-नियमित रोजगार के बीच गहरी खाई है। खासकर देश का सेवा क्षेत्र उत्पादकता के मामले में पिछड़ा है, इसलिए व्यापक सुधारों के बिना सभी पर लागू होने वाली घंटे-कटौती जोखिम भरी हो सकती है।
संरचनात्मक चुनौतियां: उत्पादकता, असमानता और दोहरा श्रम बाजार
इस बहस के पीछे दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था से जुड़े गहरे संरचनात्मक मुद्दे हैं। श्रम बाजार में बड़ा विभाजन है: बड़ी कंपनियां और सार्वजनिक क्षेत्र सुरक्षित, अच्छी तनख्वाह वाली नौकरियां देते हैं, जबकि छोटे कारोबार और सेवा उद्योग कम वेतन वाले, अस्थिर काम पर निर्भर हैं। इस “दोहरी संरचना” का अर्थ है कि एक समूह के लिए फायदेमंद सुधार दूसरों के लिए असमानता बढ़ा सकते हैं।
श्रम उत्पादकता भी विवाद का एक अहम मुद्दा है। विनिर्माण क्षेत्र की उत्पादकता ओईसीडी के औसत से अधिक है, लेकिन सेवा क्षेत्र में मूल्यवर्धित उत्पादकता ओईसीडी के औसत का केवल 64% है। सुधार के बिना काम के घंटे घटाने से कई कर्मचारियों की आय कम हो सकती है और उनकी नौकरी असुरक्षित हो सकती है, खासकर सेवा क्षेत्र में।
कोरिया विश्वविद्यालय में श्रम विषय के प्रोफेसर किम सोंग-ही बताते हैं:
दशकों से ऐसे नियमों ने श्रम बाजार में लचीलेपन के बजाय रोजगार स्थिरता को प्राथमिकता दी है। कठोर कानूनी ढांचे और सांस्कृतिक मान्यताओं के कारण कंपनियों के लिए उत्कृष्ट काम का पुरस्कार देना या खराब प्रदर्शन से निपटना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में कारोबारों के लिए कम कार्य घंटों के प्रयोग करना जोखिम भरा है।
विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि 4.5-दिवसीय कार्यसप्ताह की ओर किसी भी कदम के साथ व्यापक श्रम सुधार जरूरी हैं। इनमें उत्पादकता बढ़ाने, एसएमई को सहयोग देने और गैर-नियमित तथा मंच-आधारित श्रमिकों की जरूरतों को पूरा करने के उपाय शामिल होने चाहिए।
सफलता के लिए क्या जरूरी होगा?
अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि दक्षिण कोरिया में 4.5-दिवसीय कार्यसप्ताह की सफल शुरुआत के लिए इन कदमों की जरूरत होगी:
- चरणबद्ध क्रियान्वयन: प्रायोगिक कार्यक्रमों और स्वैच्छिक शुरुआत से धीरे-धीरे लागू करना, खासकर उन क्षेत्रों और कंपनियों में जो बदलाव के लिए बेहतर स्थिति में हैं।
- उत्पादकता में बढ़ोतरी: स्वचालन, डिजिटलीकरण और प्रशिक्षण में निवेश करना, ताकि घंटे घटने के साथ उत्पादन कम न हो।
- लचीली व्यवस्थाएं: कठोर राष्ट्रीय मानक लागू करने के बजाय कंपनियों और कर्मचारियों को अपनी जरूरतों के अनुसार समय-सारिणी तय करने देना।
- सरकारी समर्थन: लागत की भरपाई और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए एसएमई तथा कमजोर क्षेत्रों को अनुदान, कर छूट और अन्य प्रोत्साहन देना।
- श्रम बाजार सुधार: दोहरी संरचना से निपटना, गैर-नियमित कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा बेहतर करना और लचीलेपन तथा निष्पक्षता को समर्थन देने के लिए कानूनी ढांचे को अद्यतन करना।
कोरिया विश्वविद्यालय की श्रम विशेषज्ञ पार्क जी-सुन सलाह देती हैं:
काम के माहौल और कर्मचारियों की योजनाओं को नए सिरे से तैयार करने से लेकर उचित वेतन सुनिश्चित करने तक, निजी क्षेत्र को संरचनात्मक बदलाव की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए।
व्यापक प्रभाव: सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक असर
4.5-दिवसीय कार्यसप्ताह पर बहस केवल काम के घंटों और वेतन तक सीमित नहीं है। यह दक्षिण कोरियाई समाज में बड़े बदलाव को दर्शाती है: युवा पीढ़ियां काम और जीवन के बीच नए संतुलन की मांग कर रही हैं और देश तेजी से बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धी बने रहने की कोशिश कर रहा है।
समर्थकों का तर्क है कि कम कार्यसप्ताह कम जन्म दर, मानसिक स्वास्थ्य संकट और घरेलू मांग में सुस्ती जैसी गंभीर चुनौतियों से निपटने में मदद कर सकता है। आलोचक आगाह करते हैं कि अगर सुधार सावधानी से नहीं किए गए तो लागत बढ़ सकती है, प्रतिस्पर्धा घट सकती है और असमानता बढ़ सकती है।
अंततः नतीजा इस बात पर निर्भर करेगा कि सभी संबंधित पक्ष—सरकार, कारोबारी जगत, श्रमिक और नागरिक समाज—ईमानदार संवाद करने, नए मॉडलों को आजमाने और बदलती वास्तविकताओं के अनुसार ढलने के लिए कितने तैयार हैं।
संक्षेप में
- दक्षिण कोरिया में 4.5-दिवसीय कार्यसप्ताह के प्रस्ताव को जनता का मजबूत समर्थन है, खासकर उन युवा कर्मचारियों का जो बेहतर कार्य-जीवन संतुलन चाहते हैं।
- राजनीतिक दलों के क्रियान्वयन के तरीकों में अंतर है: डेमोक्रेटिक पार्टी कानूनी रूप से कार्य घंटे घटाने के पक्ष में है, जबकि पीपल पावर पार्टी कंपनियों की अगुवाई में लचीली व्यवस्था चाहती है।
- कारोबारी नेता और एसएमई कम उत्पादकता, बढ़ती लागत और गहरी होती असमानता के जोखिम को लेकर चिंतित हैं।
- श्रमिक संगठन और समर्थक इस नीति को सामाजिक प्रगति के लिए जरूरी मानते हैं और अंतरराष्ट्रीय सफलता के उदाहरणों का हवाला देते हैं।
- बड़ी कंपनियों और स्थानीय सरकारों के प्रायोगिक कार्यक्रम व्यावहारिक मॉडल देते हैं, लेकिन देशव्यापी शुरुआत के लिए चरणबद्ध क्रियान्वयन और सरकारी समर्थन जरूरी होगा।
- सुधारों की सफलता के लिए संरचनात्मक चुनौतियों, खासकर दोहरे श्रम बाजार और सेवा क्षेत्र की कम उत्पादकता, से निपटना होगा।
- यह बहस व्यापक सामाजिक और आर्थिक बदलावों को दर्शाती है और दक्षिण कोरिया में काम के भविष्य को नया रूप दे सकती है।






