बांग्लादेश का आतंकवाद-रोधी कानून और जबरन गुमशुदगियां: न्याय का व्यवस्थागत दुरुपयोग

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Rapid Action Battalion: Bangladesh’s notorious paramilitary force ...

परिचय: बांग्लादेश में आतंकवाद-रोधी कानूनों को दमन का हथियार बनाना

हाल के वर्षों में आतंकवाद-रोधी कानूनों, खासकर 2009 के आतंकवाद-रोधी अधिनियम के इस्तेमाल को लेकर बांग्लादेश को देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी जांच-पड़ताल का सामना करना पड़ा है। अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद गठित एक जांच आयोग ने एक चिंताजनक सिलसिले का खुलासा किया है: आतंकवाद-रोधी अधिनियम का व्यवस्थित रूप से दुरुपयोग कर जबरन गुम किए गए लोगों पर मुकदमे चलाए गए। अक्सर इसका इस्तेमाल राजनीतिक असहमति दबाने और विपक्षी आवाजों को खामोश करने के लिए किया गया। इस लेख में आयोग के निष्कर्षों, दुरुपयोग के तरीकों, सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका और बांग्लादेश में मानवाधिकारों तथा कानून के शासन पर इसके व्यापक प्रभावों की पड़ताल की गई है।

विषय-सूची
  1. परिचय: बांग्लादेश में आतंकवाद-रोधी कानूनों को दमन का हथियार बनाना
  2. आतंकवाद-रोधी अधिनियम दमन का औजार कैसे बना
  3. राजनीतिक संदर्भ और मुकदमों का समय
  4. दुरुपयोग के तरीके: दबाव, मनगढ़ंत मामले और न्यायिक मिलीभगत
  5. जबरन कबूलनामे और कानूनी सुरक्षा का अभाव
  6. न्यायिक मामलों का लंबित रहना और बड़े पैमाने पर बरी होना
  7. जबरन गुमशुदगियों में सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका
  8. रैपिड एक्शन बटालियन (RAB): आतंकवाद-रोधी कार्रवाई से राजनीतिक हत्यारे दस्ते तक
  9. पुलिस और डिटेक्टिव ब्रांच: राजनीतिकरण और दंडमुक्ति
  10. CTTC और DGFI: दमन के औजार बनीं खुफिया एजेंसियां
  11. NSI और BGB: निगरानी और सीमापार अपहरण
  12. गुप्त हिरासत केंद्र: अत्याचार का ढांचा
  13. पीड़ितों और उनके परिवारों पर असर
  14. अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और सुधार की मांग
  15. हाल के राजनीतिक घटनाक्रम और विधायी बदलाव
  16. व्यापक प्रभाव: नागरिक गतिविधियों के दायरे और कानून के शासन का क्षरण
  17. सारांश

आतंकवाद-रोधी अधिनियम दमन का औजार कैसे बना

2009 में लागू आतंकवाद-रोधी अधिनियम का उद्देश्य बांग्लादेशी अधिकारियों को आतंकवाद के वास्तविक खतरों से निपटने के लिए मजबूत कानूनी साधन देना था। लेकिन जून 2024 में पेश की गई आयोग की दूसरी अंतरिम रिपोर्ट में पाया गया कि इस कानून का सबसे अधिक इस्तेमाल आतंकवादियों के खिलाफ नहीं, बल्कि उन लोगों के खिलाफ हुआ जिन्हें सरकारी बलों ने जबरन गायब कर दिया था। जबरन गुमशुदगी के जिन 309 पीड़ितों का विश्लेषण किया गया, उनमें से 198 पर आतंकवाद-रोधी अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए, जो किसी भी अन्य कानून के मुकाबले कहीं अधिक थे। विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, शस्त्र अधिनियम, सूचना और संचार प्रौद्योगिकी अधिनियम, डिजिटल सुरक्षा अधिनियम और विशेष शक्तियां अधिनियम जैसे अन्य कानूनों का भी इस्तेमाल हुआ, लेकिन कम हद तक।

आयोग के विश्लेषण से बिना व्यक्तिगत साक्ष्य के लोगों को व्यवस्थागत रूप से अपराधी ठहराने का सिलसिला सामने आया। कानून की व्यापक और अस्पष्ट परिभाषाओं ने अधिकारियों को राजनीतिक विरोधियों, कार्यकर्ताओं और आलोचकों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताने का मौका दिया, जिससे आतंकवाद-रोधी कार्रवाई के नाम पर उनकी हिरासत और अभियोजन को जायज ठहराया गया।

राजनीतिक संदर्भ और मुकदमों का समय

सबसे खुलासा करने वाले निष्कर्षों में से एक राजनीतिक घटनाओं और आतंकवाद-रोधी मामलों के दर्ज होने के बीच का संबंध था। मुकदमों में तेजी राजनीतिक अशांति के दौर से मेल खाती थी, जैसे 2018 का आम चुनाव, विदेशी गणमान्य व्यक्तियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर हुए प्रदर्शन और विपक्ष की लामबंदी। उदाहरण के लिए, 2018 में मामलों में उल्लेखनीय उछाल आया, जो विपक्षी दलों पर कार्रवाई के साथ हुआ। 2022 में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और जमात-ए-इस्लामी की बढ़ी हुई गतिविधियों के चलते लगातार मामले दर्ज किए गए, जबकि 2021 के मामले भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के खिलाफ हुए प्रदर्शनों पर सरकार की प्रतिक्रिया को दर्शाते थे।

इसके उलट, 2023 में जब विपक्षी गतिविधियां सीधे सड़क पर टकराव के रूप में सामने आईं, तो आतंकवाद-रोधी आरोपों का इस्तेमाल कम हुआ और नए मामलों की संख्या घटी। 2024 के आम चुनाव के बाद राजनीतिक गतिविधियां कम होने के साथ मामले दर्ज करने की संख्या और गिर गई। यह उतार-चढ़ाव बताता है कि आतंकवाद-रोधी कानूनों का इस्तेमाल कतई निष्पक्ष नहीं था; बल्कि राजनीतिक रूप से संवेदनशील दौर में असहमति दबाने के सरकारी प्रयासों से उसका गहरा संबंध था।

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दुरुपयोग के तरीके: दबाव, मनगढ़ंत मामले और न्यायिक मिलीभगत

आयोग की रिपोर्ट में जबरन गुमशुदगी के पीड़ितों से कबूलनामे हासिल करने और उनके खिलाफ मामले गढ़ने के लिए इस्तेमाल की गई कई तरह की दमनकारी प्रथाओं का ब्यौरा दिया गया है। पीड़ितों को अक्सर गुप्त हिरासत केंद्रों में रखा जाता, यातना दी जाती और तब तक और नुकसान पहुंचाने की धमकी दी जाती, जब तक वे अपने बंदी बनाने वालों के कहे मुताबिक कबूलनामों पर दस्तखत न कर दें। धारा 164 के तहत दर्ज इन कबूलनामों को बाद में मजिस्ट्रेटों के सामने स्वेच्छा से अपराध स्वीकार करने के बयान के रूप में पेश किया जाता था।

जबरन कबूलनामे और कानूनी सुरक्षा का अभाव

आयोग द्वारा जुटाई गई गवाहियों में एक चिंताजनक रूप से एक जैसा सिलसिला सामने आया: पीड़ितों को कानून प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा लिखी गई पटकथाएं याद करने के लिए मजबूर किया जाता, दबाव में उनका अभ्यास कराया जाता और फिर अदालत में उन्हें दोहराने को कहा जाता। कई लोगों को वकील तक पहुंच नहीं दी गई और मजिस्ट्रेट अक्सर यह जांचने में नाकाम रहे कि कबूलनामे स्वेच्छा से दिए गए थे या नहीं। कुछ मामलों में पीड़ितों को अपने यातना देने वालों की मौजूदगी में बोलने के लिए मजबूर किया गया और मजिस्ट्रेट से निजी तौर पर बात करने का कोई मौका नहीं दिया गया।

19 साल के एक पीड़ित ने बताया कि 2020 में काउंटर टेररिज्म एंड ट्रांसनेशनल क्राइम यूनिट (CTTC) ने उसे एक महीने से ज्यादा समय तक एक गुप्त जेल में रखा। उससे बार-बार कबूलनामे का अभ्यास कराया गया। मजिस्ट्रेट को यह बताने के बावजूद कि उसे पीटा गया और कबूलने के लिए मजबूर किया गया, उसका बयान उसके खिलाफ दर्ज कर लिया गया। एक अन्य पीड़ित को डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फोर्सेज इंटेलिजेंस (DGFI) और रैपिड एक्शन बटालियन (RAB) ने एक साल तक गायब रखा। अदालत में पेश करते समय उसे हाल ही में शेव किया गया था और साफ कपड़े पहनाए गए थे, ताकि सब कुछ सामान्य लगे; इस बीच उसने जो कुछ झेला था, उसे नजरअंदाज कर दिया गया।

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न्यायिक मामलों का लंबित रहना और बड़े पैमाने पर बरी होना

आयोग ने पाया कि आतंकवाद-रोधी मामलों को न्यायिक व्यवस्था द्वारा संभालने का तरीका साक्ष्यों की गुणवत्ता के बजाय प्रशासनिक दबावों से प्रभावित था। पांच साल पूरे होने के करीब पहुंच रहे मामलों को अक्सर लंबित मामलों का आभास टालने के लिए बड़ी संख्या में एक साथ निपटाया जाता था और ज्यादातर मामलों में आरोपियों को बरी कर दिया जाता था। 2017 से 2024 के बीच निपटाए गए 794 मामलों में से केवल 52 में दोषसिद्धि हुई, यानी दोषसिद्धि की दर महज 7 प्रतिशत रही। यह बेहद कम दर बताती है कि कई मामलों में शुरुआत से ही अभियोजन का कोई ठोस आधार नहीं था और मुकदमे शुरू करने के लिए अपनाए गए मानकों पर गंभीर सवाल उठाती है।

जबरन गुमशुदगियों में सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका

आयोग की जांच में कई सरकारी एजेंसियों को जबरन गुमशुदगियों का मुख्य जिम्मेदार पाया गया: बांग्लादेश पुलिस (जिसमें डिटेक्टिव ब्रांच और स्पेशल ब्रांच शामिल हैं), रैपिड एक्शन बटालियन (RAB), काउंटर टेररिज्म एंड ट्रांसनेशनल क्राइम यूनिट (CTTC), DGFI, नेशनल सिक्योरिटी इंटेलिजेंस (NSI) और बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB)। दमन के तंत्र में हर एजेंसी की अलग भूमिका थी। अक्सर ये एजेंसियां अपने कानूनी अधिकार-क्षेत्र से बाहर काम करती थीं और उन पर बहुत कम जवाबदेही तय होती थी।

रैपिड एक्शन बटालियन (RAB): आतंकवाद-रोधी कार्रवाई से राजनीतिक हत्यारे दस्ते तक

गंभीर अपराध और आतंकवाद से निपटने के लिए गठित RAB जल्द ही मानवाधिकारों के उल्लंघन का पर्याय बन गया। इनमें न्यायेतर हत्याएं, यातना और जबरन गुमशुदगियां शामिल थीं। आयोग ने RAB से जुड़े सैकड़ों मामलों का दस्तावेजीकरण किया, जिनमें पीड़ित अक्सर मृत पाए गए या फिर लापता ही रहे। RAB की खुफिया शाखा गुप्त अभियान चलाती थी और लोगों को कुख्यात टास्क फोर्स फॉर इंटेरोगेशन (TFI) सेल जैसी गुप्त जगहों पर हिरासत में रखती थी, जहां बंदियों को लगातार यातना दी जाती थी।

2021 में अमेरिका द्वारा RAB और उसके कमांडरों पर गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों का हवाला देते हुए प्रतिबंध लगाए जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय जांच-पड़ताल तेज हुई। इन कदमों के बावजूद, RAB के दुराचार की विरासत कानून प्रवर्तन पर जनता के भरोसे को लगातार कमजोर कर रही है और लोकतांत्रिक सुधारों के रास्ते में बड़ी बाधा बनी हुई है।

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पुलिस और डिटेक्टिव ब्रांच: राजनीतिकरण और दंडमुक्ति

बांग्लादेश पुलिस, विशेषकर उसकी डिटेक्टिव ब्रांच, जबरन गुमशुदगियों में केंद्रीय भूमिका निभाती पाई गई, खासकर राजनीतिक अशांति के दौर में। पुलिस का राजनीतिकरण बढ़ता गया और वह एक निष्पक्ष संस्था के बजाय सरकारी नीतियों को लागू करने वाली एजेंसी की तरह काम करने लगी। पीड़ितों में राजनीतिक कार्यकर्ता, विद्यार्थी, शिक्षक, कारोबारी और सरकार के आलोचक शामिल थे। हिरासत में यातना व्यापक थी और न्यायेतर हत्याएं, जिन्हें अक्सर “क्रॉसफायर” की घटनाएं कहा जाता था, पुलिस अभियानों की पहचान बन गईं।

CTTC और DGFI: दमन के औजार बनीं खुफिया एजेंसियां

2016 में स्थापित CTTC और बांग्लादेश की प्रमुख सैन्य खुफिया एजेंसी DGFI, दोनों पर जबरन गुमशुदगी, यातना और मनमानी हिरासत में शामिल होने के आरोप लगे। आयोग ने पाया कि ये एजेंसियां अक्सर “आयनाघर” (आईनों का घर) जैसे कुख्यात गुप्त हिरासत केंद्र चलाती थीं, जहां बंदियों को बाहरी दुनिया से पूरी तरह काटकर रखा जाता और उन पर अत्यधिक अत्याचार किए जाते थे। निगरानी का अभाव और नागरिक मामलों में एजेंसियों का बढ़ता दखल दंडमुक्ति की संस्कृति और लोकतांत्रिक शासन के क्षरण का कारण बना।

NSI और BGB: निगरानी और सीमापार अपहरण

बांग्लादेश की मुख्य नागरिक खुफिया एजेंसी NSI और सीमा सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाली BGB पर भी जबरन गुमशुदगियों में शामिल होने के आरोप लगे। NSI पर राजनीतिक विपक्ष, नागरिक समाज और पत्रकारों की निगरानी करने तथा उन्हें दबाने के आरोप थे, अक्सर बिना किसी कानूनी निगरानी के। BGB को सीमापार प्रत्यर्पणों से जोड़ा गया; कुछ पीड़ितों को विदेशी सुरक्षा एजेंसियों को सौंपा गया, जिससे जवाबदेही सुनिश्चित करने के प्रयास और जटिल हो गए।

गुप्त हिरासत केंद्र: अत्याचार का ढांचा

आयोग ने बांग्लादेश भर में कम से कम 16 गुप्त हिरासत केंद्रों की पहचान की, जिनमें ढाका, चटगांव, नारायणगंज, राजशाही और अन्य शहरों की जगहें शामिल हैं। अक्सर पुलिस या खुफिया एजेंसियों के परिसरों में स्थित इन केंद्रों में पीड़ितों को कई हफ्तों या महीनों तक बाहरी दुनिया से काटकर रखा जाता था। यातना के तरीकों में वॉटरबोर्डिंग, बिजली के झटके देना, पीड़ितों को उल्टा लटकाना और मानसिक उत्पीड़न शामिल थे। इन केंद्रों का अस्तित्व जबरन गुमशुदगियों के व्यवस्थागत स्वरूप और कई सरकारी एजेंसियों की मिलीभगत को उजागर करता है।

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पीड़ितों और उनके परिवारों पर असर

इन अत्याचारों की मानवीय कीमत बहुत गहरी है। जबरन गुमशुदगी के पीड़ितों को यातना और मानसिक आघात झेलना पड़ा और उन्हें आतंकवादी या अपराधी बताकर कलंकित किया गया। कई लोगों को ऑनलाइन असहमति जताने, विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने या महज विपक्षी दलों से जुड़े होने के कारण निशाना बनाया गया। परिवारों को अपने प्रियजनों की स्थिति का पता न होने की पीड़ा के साथ-साथ भारी आर्थिक बोझ भी उठाना पड़ा; हर मामले में कानूनी खर्च औसतन 7 लाख टका तक पहुंच गया।

कुछ पीड़ित कभी वापस नहीं लौटे; दूसरे रिहा हुए, लेकिन डर के कारण खामोश हो गए। आयोग ने जबरन गुमशुदगी के 1,350 से अधिक मामलों की पुष्टि और समीक्षा की। कम से कम 345 लोग अब भी लापता हैं। न्याय और जवाबदेही के अभाव ने परिवारों को लगातार अनिश्चितता और शोक की स्थिति में छोड़ दिया है।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और सुधार की मांग

ह्यूमन राइट्स वॉच, एमनेस्टी इंटरनेशनल और इंटरनेशनल फेडरेशन फॉर ह्यूमन राइट्स (FIDH) सहित अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने असहमति दबाने और जबरन गुमशुदगियां अंजाम देने के लिए बांग्लादेश द्वारा आतंकवाद-रोधी कानूनों के इस्तेमाल की बार-बार निंदा की है। संयुक्त राष्ट्र और सहायता देने वाली सरकारों ने स्वतंत्र जांच, RAB जैसी अत्याचारी इकाइयों को भंग करने और कानून का शासन बहाल करने के लिए व्यापक सुधारों की मांग की है।

हाल के राजनीतिक घटनाक्रम और विधायी बदलाव

हसीना सरकार को सत्ता से हटाए जाने के बाद नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाले अंतरिम प्रशासन ने लोकतांत्रिक सिद्धांतों और मानवाधिकारों के सम्मान को बहाल करने का वादा किया। हालांकि, हाल की विधायी पहलों, जिनमें अवामी लीग पर अस्थायी प्रतिबंध और आतंकवाद-रोधी अधिनियम में संशोधन शामिल हैं, की आलोचना हुई है। आलोचकों का कहना है कि ये पिछले शासन के दमनकारी तरीकों जैसी ही हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच और अन्य संगठनों ने चेताया है कि इन कदमों से बुनियादी स्वतंत्रताएं कमजोर हो सकती हैं और अतीत के अत्याचारों के पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाएगा।

जबरन गुमशुदगियों की जांच कर रहे आयोग को 1,676 से अधिक शिकायतें मिली हैं। आयोग के शुरुआती निष्कर्षों में गुमशुदगियों के पीछे “व्यवस्थित योजना” होने की बात कही गई है, जिसमें ज्यादातर राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाया गया। आयोग ने स्वतंत्र निगरानी तंत्र स्थापित करने, दोषियों पर मुकदमा चलाने और पीड़ितों के परिवारों को सहायता देने सहित तत्काल सुधारों की मांग की है।

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व्यापक प्रभाव: नागरिक गतिविधियों के दायरे और कानून के शासन का क्षरण

आतंकवाद-रोधी अधिनियम के दुरुपयोग और जबरन गुमशुदगियों की प्रथा ने बांग्लादेश में नागरिक गतिविधियों के दायरे पर दहशत का असर डाला है। पत्रकारों, मानवाधिकार रक्षकों और आम नागरिकों को सरकारी अत्याचारों के खिलाफ बोलने पर उत्पीड़न, निगरानी और हिंसा का सामना करना पड़ा है। डिजिटल सुरक्षा अधिनियम और साइबर सुरक्षा अधिनियम जैसे कानूनों का इस्तेमाल ऑनलाइन असहमति को अपराध ठहराने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदी लगाने के लिए किया गया है।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और पैरवी के बावजूद अत्याचार जारी रहे हैं और सुरक्षा बल अक्सर दंडमुक्ति के साथ काम करते रहे हैं। जवाबदेही के अभाव ने संस्थाओं पर जनता का भरोसा खत्म किया है और लोकतंत्र तथा कानून के शासन की बुनियाद कमजोर की है।

सारांश

  • बांग्लादेशी अधिकारियों ने 2009 के आतंकवाद-रोधी अधिनियम का व्यवस्थागत दुरुपयोग कर जबरन गुमशुदगी के पीड़ितों पर मुकदमे चलाए। निशाने पर मुख्य रूप से राजनीतिक विरोधी और असहमति जताने वाले लोग थे।
  • पुलिस, RAB, CTTC, DGFI, NSI और BGB सहित सरकारी एजेंसियां यातना, गुप्त हिरासत और न्यायेतर हत्याओं जैसे व्यापक मानवाधिकार उल्लंघनों में शामिल पाई गईं।
  • अक्सर दबाव डालकर कबूलनामे हासिल किए गए और पीड़ितों को कानूनी सुरक्षा न मिलने में न्यायिक मिलीभगत की भूमिका रही।
  • मुकदमों का समय और संख्या राजनीतिक घटनाओं से गहराई से जुड़ी थी। इससे संकेत मिलता है कि आतंकवाद-रोधी कानूनों का इस्तेमाल वास्तविक सुरक्षा उपायों के बजाय दमन के औजारों के रूप में हुआ।
  • अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने स्वतंत्र जांच, अत्याचारी इकाइयों को भंग करने और व्यापक कानूनी तथा संस्थागत सुधारों की मांग की है।
  • अंतरिम सरकार के हालिया विधायी बदलावों ने लोकतांत्रिक सुधार के वादों के बावजूद दमनकारी तरीकों के जारी रहने की आशंका बढ़ाई है।
  • जबरन गुमशुदगी के पीड़ितों को न्याय और जवाबदेही न मिलने से बांग्लादेश में मानवाधिकारों और कानून का शासन लगातार कमजोर हो रहा है।
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