लाखों नोटिस के बाद सबूत के लिए नई मांगें
दिल्ली में मतदाता सूची की विशेष समीक्षा के दौरान आधार कार्ड जमा करने वाले मतदाताओं से अब और दस्तावेज़ मांगे जा रहे हैं, जबकि स्थानीय चुनावकर्मियों ने उनके पतों का सत्यापन कर उन्हें पंजीकृत बनाए रखने की सिफारिश की थी। नए सिरे से की जा रही जांच उन लोगों को प्रभावित कर रही है जिनके रिकॉर्ड पुराने मतदाता सूची रिकॉर्ड से नहीं जोड़े जा सके। इनमें बुजुर्ग निवासी भी हैं, जिनका कहना है कि उनके पास दूसरे दस्तावेज़ बहुत कम हैं।
विषय-सूची
- लाखों नोटिस के बाद सबूत के लिए नई मांगें
- चुनावकर्मियों के मुताबिक उनसे क्या करने को कहा गया
- विवाद के केंद्र में आधार क्यों है
- पुराने मतदाता रिकॉर्ड खोजने की प्रक्रिया
- दो अलग समय-सारिणियों पर ध्यान देना जरूरी
- पंजीकरण बनाए रखने की कीमत प्रवासी कामगारों को चुकानी पड़ती है
- निवासियों ने वर्षों से जारी असफल आवेदनों का ब्यौरा दिया
- यह फैसला कौन करता है कि मतदाता सूची में किसका नाम रहेगा?
- आधिकारिक प्रक्रिया में मतदाताओं के लिए क्या प्रावधान हैं
- मुख्य बातें
नोटिस प्रक्रिया में वर्णित मसौदा सूची में शामिल लगभग 97 लाख मतदाताओं में से 33.1 लाख को नोटिस मिले। यह मसौदा मतदाता सूची का करीब 34% है। इनमें से 13.9 लाख नोटिस पुराने मतदाता सूची रिकॉर्ड से जुड़ाव न मिलने के बारे में थे, जबकि बाकी 19.2 लाख नोटिस तार्किक विसंगतियों, यानी दर्ज जानकारी में असंगतियों, से संबंधित थे।
दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय की ओर से साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, 33.1 लाख मामलों में से 94% से अधिक को अंतिम मतदाता सूची में शामिल करने के लिए चिह्नित किया गया था। इसके बावजूद बूथ स्तर के अधिकारी, जिन्हें BLO कहा जाता है, बताते हैं कि केवल आधार देने वाले मतदाताओं को निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों और उनके सहायकों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली प्रणाली में अब भी चिह्नित किया जा रहा है।
मुख्य सवाल यह है कि जब किसी मतदाता के पास पहचान दस्तावेज़ और स्थानीय सत्यापन की अनुकूल रिपोर्ट हो, लेकिन अन्य रिकॉर्ड न हों, तो अधिकारी उसकी पात्रता का आकलन कैसे करते हैं। चुनाव अधिकारियों के अनुसार, भारतीय नागरिकता, कम से कम 18 वर्ष की आयु और निर्वाचन क्षेत्र में सामान्य निवास पात्रता की शर्तें हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि पुराने मतदाता सूची रिकॉर्ड से जुड़ाव न मिलना और तार्किक विसंगतियां अपने आप में पात्रता को प्रभावित नहीं करतीं।
चुनावकर्मियों के मुताबिक उनसे क्या करने को कहा गया
दिल्ली भर के BLO ने कहा कि निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों, यानी ERO, ने उन्हें मतदाताओं के पास दोबारा जाने और अतिरिक्त दस्तावेज़ जुटाने का निर्देश दिया, जबकि पहले की क्षेत्रीय रिपोर्टों और लिखित घोषणाओं में पात्रता तथा वर्षों से वहां रहने की पुष्टि की जा चुकी थी। कुछ ने बताया कि उनसे यह साबित करने को कहा गया कि मतदाता बांग्लादेशी या रोहिंग्या नहीं हैं।
चुनाव अधिकारियों ने ऐसे निर्देश देने से इनकार किया और कहा कि मतदाता सूची में कथित अवैध प्रवासियों की पहचान करने वाला कोई रिकॉर्ड तैयार नहीं किया जा रहा था। एक ERO ने कहा कि शुरुआती गणना के दौरान दिए गए निर्देशों में विदेशी नागरिकों की पहचान करना शामिल था, लेकिन कुछ ही समय बाद वे निर्देश बदल गए और ऐसी कोई सूची नहीं बनाई जा रही थी।
कई चुनावकर्मियों ने बताया कि उन्हें यह स्पष्ट नहीं था कि समीक्षा के लिए कौन-से दस्तावेज़ पर्याप्त होंगे। एक ने कहा कि पहले उपलब्ध कोई भी दस्तावेज़ जुटाने और सत्यापन की घोषणा देने को कहा गया था, लेकिन बाद में नागरिकता का सबूत मांगने को कहा गया। एक अन्य ने बताया कि पासपोर्ट जमा कर चुके मतदाता से भी फिर दस्तावेज़ मांगे गए।
बुजुर्गों और उन लोगों के लिए, जो कभी स्कूल नहीं गए, शैक्षणिक प्रमाणपत्र या दूसरे रिकॉर्ड ढूंढना मुश्किल हो सकता है। पूर्वोत्तर दिल्ली के एक BLO ने कहा कि कुछ मतदाताओं के पास कोई अतिरिक्त दस्तावेज़ नहीं था और उनके बैंक खाते भी नहीं थे। बार-बार की जा रही मुलाकातों के चलते निवासी और क्षेत्रीय कर्मचारी, दोनों ही, यह स्पष्ट समझे बिना उन्हीं मामलों को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर जरूरी क्या है।
विवाद के केंद्र में आधार क्यों है
आधार एक पहचान दस्तावेज़ है, जबकि मतदाता पंजीकरण के लिए नागरिकता, आयु और निवास के बारे में फैसला करना भी जरूरी है। एक वरिष्ठ चुनाव अधिकारी ने कहा कि केवल आधार पर्याप्त नहीं है, लेकिन यदि ERO BLO की क्षेत्रीय रिपोर्ट से संतुष्ट हो, तो वह फिर भी मतदाता को पात्र मान सकता है।
दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की SIR 2026 FAQ में अलग-अलग चरणों वाली प्रक्रिया बताई गई है। शुरुआती घर-घर सर्वेक्षण के दौरान गणना फॉर्म के साथ किसी दस्तावेज़ की जरूरत नहीं होती और उस फॉर्म में आधार नंबर देना वैकल्पिक है। बाद में, जब ERO नोटिस जारी करता है, तब सहायक दस्तावेज़ मांगे जा सकते हैं।
FAQ में सहायक दस्तावेज़ों की 12 प्रविष्टियां सूचीबद्ध हैं। इसकी 12वीं प्रविष्टि आधार के बारे में है और कहती है कि 9 सितंबर, 2025 के निर्वाचन आयोग के निर्देश लागू होंगे। चुनावकर्मियों द्वारा बताई गई नोटिस प्रक्रिया में 11 निर्धारित दस्तावेज़ों का उल्लेख है, जिनमें जन्म प्रमाणपत्र, शैक्षणिक प्रमाणपत्र और पासपोर्ट शामिल हैं। इसलिए आधिकारिक FAQ सूची को अलग तरह से प्रस्तुत करता है और आधार को उसके लिए निर्धारित अलग निर्देशों के तहत रखता है।
FAQ की अन्य प्रविष्टियों में स्थायी निवास प्रमाणपत्र, सक्षम अधिकारियों द्वारा जारी जाति प्रमाणपत्र, सरकारी जमीन या मकान आवंटन प्रमाणपत्र, राज्य या स्थानीय प्राधिकरणों द्वारा तैयार परिवार रजिस्टर, और सरकारी रोजगार या पेंशन के कुछ रिकॉर्ड शामिल हैं। इसमें सरकारी निकायों और बैंकों, डाकघरों तथा भारतीय जीवन बीमा निगम जैसी संस्थाओं द्वारा 1 जुलाई, 1987 से पहले जारी किए गए निर्दिष्ट रिकॉर्ड भी शामिल हैं।
नोटिस का जवाब दे रहे निवासी के लिए व्यावहारिक सवाल यह है कि ERO स्थानीय सत्यापन के साथ किन रिकॉर्डों को स्वीकार करेगा। अधिकारी की व्याख्या में संतोषजनक क्षेत्रीय रिपोर्ट को मानने की गुंजाइश है, जबकि BLO द्वारा बताए गए अनुरोधों से संकेत मिलता है कि कुछ मामलों में फिर से कागजी कार्रवाई के लिए कहा जा रहा है।
पुराने मतदाता रिकॉर्ड खोजने की प्रक्रिया
आधिकारिक FAQ में वर्णित प्रक्रिया से पहले दिल्ली में पिछला विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) 2002 में हुआ था। FAQ मतदाताओं से उस सूची में खोज करने और जहां लागू हो, अपना विवरण या दूसरे राज्यों में पहले हुए पुनरीक्षणों में अपने रिश्तेदारों की प्रविष्टियों से जोड़ने को कहता है।
2002 के बाद दिल्ली आए मतदाता को किसी दूसरे राज्य की संबंधित पुरानी सूची खोजनी पड़ सकती है। फॉर्म में रिश्तेदार का नाम, राज्य, विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र, मतदान केंद्र और क्रम संख्या जैसी जानकारी मांगी जाती है। इन प्रविष्टियों को खोजने के लिए ऐसी जानकारी की जरूरत पड़ सकती है, जिसका परिवारों ने दशकों से इस्तेमाल न किया हो।
FAQ के अनुसार, मतदाता परिवार के किसी भी पक्ष के माता-पिता या दादा-दादी के जरिए जुड़ाव दिखा सकते हैं। किसी विवाहित महिला का नाम यदि पुरानी सूची में न हो, तो उसके पति के माता-पिता के बजाय उसके अपने माता-पिता या दादा-दादी का विवरण देना निर्दिष्ट है।
जो मतदाता अपनी या किसी पात्र रिश्तेदार की प्रविष्टि नहीं खोज पाते, वे अपना व्यक्तिगत विवरण देकर फॉर्म लौटा सकते हैं और पुरानी सूची की जानकारी वाला हिस्सा खाली छोड़ सकते हैं। FAQ कहता है कि ERO का नोटिस मिलने पर उन्हें निर्धारित दस्तावेज़ देना होगा। इस तरह पुराने रिकॉर्ड से जुड़ाव न मिलने पर व्यक्ति को सत्यापन के अगले चरण में भेजा जाता है।
दो अलग समय-सारिणियों पर ध्यान देना जरूरी
नोटिस प्रक्रिया में शामिल 33.1 लाख मतदाताओं के मामलों के निपटारे की समय-सीमा बढ़ाकर 15 दिसंबर कर दी गई थी। अंतिम मतदाता सूची 22 दिसंबर को प्रकाशित होनी थी। इस प्रक्रिया में 25 सितंबर की एक चेतावनी भी शामिल थी, जिसमें कमजोर आधार पर नाम हटाने से मना किया गया था, और 1 अक्टूबर की एक बैठक भी, जिसमें BLO की घोषणाएं स्वीकार करने पर चर्चा हुई थी।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी के FAQ में SIR 2026 के लिए स्पष्ट रूप से अलग समय-सारिणी दी गई है, जो 4 नवंबर, 2026 को समाप्त होती है। इस समय-सारिणी और दिसंबर की समय-सीमाओं के बीच संबंध स्पष्ट नहीं किया गया है। मतदाताओं को अपने नोटिस या उन पर लागू आधिकारिक समय-सारिणी में दी गई समय-सीमा का पालन करना चाहिए।
- 25 सितंबर, नोटिस प्रक्रिया में: मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने मामूली आधार पर नाम हटाने के खिलाफ चेतावनी दी और पूरी तरह सत्यापन करने का निर्देश दिया।
- 1 अक्टूबर, उसी प्रक्रिया में: BLO ने बताया कि बैठक में कहा गया था कि निर्धारित दस्तावेज़ न होने पर उनकी घोषणाएं स्वीकार की जा सकती हैं।
- 15 दिसंबर और 22 दिसंबर, उसी प्रक्रिया में: नोटिसों के निपटारे की बढ़ाई गई समय-सीमा और अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन की निर्धारित तारीख।
- 30 जून से 17 अगस्त, 2026: आधिकारिक FAQ की समय-सारिणी के तहत घर-घर दौरे।
- 31 अगस्त, 2026: मसौदा मतदाता सूची का प्रकाशन और दावे, आपत्तियों तथा नोटिसों के चरण की शुरुआत।
- 30 सितंबर और 29 अक्टूबर, 2026: दावों और आपत्तियों की समय-सीमा, तथा नोटिसों और उनके निपटारे की समय-सीमा।
- 4 नवंबर, 2026: FAQ के तहत अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन।
पंजीकरण बनाए रखने की कीमत प्रवासी कामगारों को चुकानी पड़ती है
दिल्ली के प्रवासी कामगारों के दस्तावेज़ अक्सर उनके गृहनगर से जुड़े होते हैं, जबकि वे अपने कामकाजी जीवन का अधिकांश समय राजधानी में बिताते हैं। कुछ लोग नियमित रूप से राज्यों के बीच यात्रा करते हैं, जबकि अन्य अपना मूल पंजीकरण इसलिए बनाए रखते हैं क्योंकि दिल्ली में उनका आवास या रोजगार अनिश्चित है।
74 वर्षीय सीतापंत झा 1974 से दिल्ली में रह रहे हैं, लेकिन उनके दस्तावेज़ बिहार से जुड़े हैं। वह पहले वोट देने दरभंगा जाते थे, लेकिन पिछले दो साल से ऐसा नहीं कर पाए हैं। पुनरीक्षण की जानकारी न होने के कारण उन्हें लगा कि उनका नाम बिहार की मतदाता सूची में बना हुआ है।
गोविंदपुरी में कारखाने में सहायक के रूप में काम करने वाले 28 वर्षीय मनोज यादव ने बताया कि किसी दस्तावेज़ पर दर्ज पता रोजमर्रा के काम की मांगों से कैसे टकरा सकता है:
मेरे आधार पर बिहार का पता है, लेकिन मैं यहां दिनभर काम करता हूं। मेरी जगह लाइन में कौन खड़ा होगा?
कैब चालक विक्रम सिंह ने कहा कि लंबी कतारों और मकान मालिकों से पत्र लाने की मांग को काम के घंटों के बीच पूरा करना मुश्किल था। बिहार की घरेलू कामगार सीता ने बताया कि चिकित्सकीय आपातस्थिति के कारण वह यात्रा नहीं कर सकीं और एक BLO ने उनसे कहा कि प्रक्रिया के लिए उनकी मौजूदगी जरूरी है।
आधिकारिक FAQ में अनुपस्थिति से निपटने के कुछ तरीके बताए गए हैं। इसके अनुसार, कहीं और काम कर रहे व्यक्ति की ओर से परिवार का कोई वयस्क सदस्य गणना फॉर्म भरकर उस पर हस्ताक्षर कर सकता है। ऑनलाइन जमा करने की प्रक्रिया भी बताई गई है। इसके लिए पंजीकृत मोबाइल नंबर और मतदाता सूची तथा आधार रिकॉर्ड में नामों का मेल जरूरी है। इसलिए जिन परिवारों के दस्तावेज़ गुम हैं या विवरण मेल नहीं खाते, उन्हें अतिरिक्त व्यावहारिक बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।
निवासियों ने वर्षों से जारी असफल आवेदनों का ब्यौरा दिया
दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास रंगपुरी पहाड़ी के कई निवासियों का कहना है कि पंजीकरण से जुड़ी समस्याएं मौजूदा पुनरीक्षण से पहले ही शुरू हो गई थीं। उनके अनुभव बताते हैं कि दस्तावेज़ों की नई मांग पहले से लंबित आवेदनों या रिकॉर्ड खोने की पुरानी समस्या के ऊपर आ सकती है।
19 वर्षीय शाहीन ने बताया कि महरौली की घोसिया कॉलोनी में उनका पुराना घर ढहा दिए जाने पर उनके दस्तावेज़ खो गए थे। बाद में घर बदलते समय आधार की पर्ची भी गुम हो गई। इसके कुछ ही समय बाद उनके पिता का निधन हो गया और परिवार को दस्तावेज़ दोबारा हासिल करने में कठिनाई हुई।
बानो और इशाक खान 2008 में शादी के बाद छतरपुर से अलीगढ़ चले गए और 2014 में दिल्ली लौट आए। उन्होंने आधार और PAN का विवरण तो अपडेट किया, लेकिन अपना मतदाता पंजीकरण स्थानांतरित नहीं कराया। बाद में छतरपुर की मतदाता सूची से उनके नाम हटा दिए गए। उनका कहना है कि दोबारा पंजीकरण कराने की कोशिशें बिना स्पष्ट कारण बताए खारिज कर दी गईं।
रंगपुरी पहाड़ी को कवर करने वाले बिजवासन के ERO चिरंजी लाल मीणा ने आवेदनों के खारिज होने के लिए दस्तावेज़ गलत तरीके से अपलोड करने या आवेदकों के अपील की समय-सीमा चूकने को जिम्मेदार ठहराया। कार्यालय का पक्ष समझाते हुए उन्होंने कहा:
अगर आपके सभी दस्तावेज़ सही हैं, तो आवेदन खारिज होने की कोई वजह नहीं है।
56 वर्षीय आशिक अली ने कहा कि वह 1980 से पहले से दिल्ली में रह रहे हैं और 2000 से वहां वोट देते रहे हैं। उनका, उनके बेटे और बहू का पंजीकरण रद्द होने के बाद उन्होंने फॉर्म जमा किए और उनसे कहा गया कि कोई व्यक्ति सत्यापन के लिए आएगा। उनका कहना है कि सत्यापन के लिए कोई नहीं आया।
यह फैसला कौन करता है कि मतदाता सूची में किसका नाम रहेगा?
पात्रता का फैसला ERO करते हैं, जबकि BLO स्थानीय दौरे कर सत्यापन रिपोर्ट सौंपते हैं। अधिकारियों ने कहा कि यदि ERO किसी मतदाता के दस्तावेज़ों से संतुष्ट न हो, तो वह कारण दर्ज करने वाले लिखित आदेश के जरिए उस व्यक्ति को अपात्र ठहरा सकता है।
शुरुआती प्रशासनिक रिपोर्ट में 350 मतदाताओं को अपात्र पाया गया था। इसके बाद 25 सितंबर को मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के पत्र में कमजोर आधार पर नाम हटाने के खिलाफ चेतावनी दी गई और पूरी तरह सत्यापन करने को कहा गया। BLO ने बताया कि 1 अक्टूबर की बैठक में कहा गया था कि मतदाताओं के पास निर्धारित रिकॉर्ड न होने पर उनकी घोषणाएं स्वीकार की जा सकती हैं।
पश्चिम बंगाल में नाम हटाए जाने के रुझानों पर नजर रखने वाले स्वतंत्र शोध संगठन सबर इंस्टीट्यूट के सह-संस्थापक साबिर अहमद ने व्यापक प्रक्रिया की तेजी पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि पहले जिस प्रक्रिया को पूरा करने में कम से कम एक साल लगता था, उसे अब तीन महीने में करने की कोशिश हो रही है, जिससे कुछ प्रवासी कामगारों को सुनवाई के लिए घर लौटना पड़ रहा है।
अहमद ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल कर तार्किक विसंगतियां चिह्नित करने वाली प्रक्रिया में नामों के मेल न खाने से जारी नोटिसों का भी जिक्र किया। निर्वाचन आयोग ने इस चिह्नांकन के पीछे इस्तेमाल की गई तकनीक या खरीद संबंधी जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। निवासियों को फिर भी सत्यापन प्रक्रिया के तहत इन नोटिसों का जवाब देना पड़ता है, जहां स्पष्टीकरण की गुणवत्ता और रिकॉर्ड में सुधार का अवसर सीधे तौर पर मायने रखते हैं।
आधिकारिक प्रक्रिया में मतदाताओं के लिए क्या प्रावधान हैं
मुख्य निर्वाचन अधिकारी के FAQ के अनुसार, गणना फॉर्म लेने के लिए BLO को कम से कम तीन बार दौरा करना चाहिए। मतदाताओं को फॉर्म की दूसरी प्रति पर पावती मिलनी चाहिए और उसे संभालकर रखना चाहिए। 1950 मतदाता हेल्पलाइन, फॉर्म पर छपे BLO के संपर्क विवरण और जिला तथा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के सहायता केंद्रों से मदद ली जा सकती है। SEWA Delhi भी निवासियों को दस्तावेज़ जुटाने में मदद कर रहा है।
FAQ के अनुसार, फॉर्म लौटाना जरूरी है: मसौदा मतदाता सूची में केवल उन्हीं मतदाताओं को शामिल किया जाता है जिनके भरे हुए फॉर्म प्राप्त होते हैं। यदि फॉर्म वापस नहीं मिलता, तो BLO को यह पता लगाने के निर्देश हैं कि संबंधित व्यक्ति अनुपस्थित है, उसका निधन हो चुका है, वह कहीं और चला गया है या उसकी एक से अधिक प्रविष्टियां हैं।
मसौदा सूची में नाम न होने पर पात्र लोग दावों और आपत्तियों की अवधि के दौरान घोषणा और सहायक दस्तावेज़ों के साथ फॉर्म 6 जमा कर सकते हैं। FAQ में स्थान बदल चुके लोगों को नए पते पर पंजीकरण के लिए भी यही रास्ता अपनाने को कहा गया है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 17 और 18 एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में या एक ही निर्वाचन क्षेत्र में एक से अधिक बार पंजीकरण पर रोक लगाती हैं।
मतदाताओं से कहा गया है कि फॉर्म जमा करने के भरोसे रहने के बजाय प्रकाशन के बाद मसौदा सूची में अपना नाम जांचें। FAQ के अनुसार, अंतिम सूची में भी नाम न मिलने पर आवेदक 15 दिनों के भीतर संबंधित जिला निर्वाचन अधिकारी या जिला मजिस्ट्रेट के पास अपील कर सकता है। पहले से ही बार-बार चक्कर लगा रहे निवासियों के लिए ये जांच और समय-सीमाएं पंजीकरण की समस्या सुलझाने का अगला अवसर तय करती हैं।
मुख्य बातें
- नोटिस प्रक्रिया में मसौदा मतदाता सूची के लगभग 97 लाख मतदाताओं में से 33.1 लाख, यानी करीब 34%, को नोटिस मिले।
- BLO का कहना है कि अनुकूल क्षेत्रीय सत्यापन के बावजूद आधार जमा करने वाले कुछ मतदाताओं से नए दस्तावेज़ मांगे जा रहे हैं।
- अधिकारी बांग्लादेशी या रोहिंग्या लोगों को निशाना बनाने वाली जांच के निर्देश देने से इनकार करते हैं और कहते हैं कि ऐसी कोई सूची तैयार नहीं की जा रही है।
- आधिकारिक SIR 2026 FAQ में गणना फॉर्म पर आधार नंबर देना वैकल्पिक है और गणना के दौरान किसी दस्तावेज़ की जरूरत नहीं है।
- FAQ में सहायक दस्तावेज़ों की 12 प्रविष्टियां हैं और आधार पर निर्वाचन आयोग के अलग निर्देश लागू होते हैं।
- नोटिस प्रक्रिया में बताई गई दिसंबर की समय-सीमाएं FAQ में दी गई 4 नवंबर, 2026 की अंतिम प्रकाशन तारीख से अलग हैं।
- प्रवासी और दस्तावेज़ खो चुके या पुराने दस्तावेज़ों वाले निवासियों को यात्रा का खर्च, काम छूटने और बार-बार आवेदन करने जैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
- मसौदा सूची से नाम छूटे पात्र लोगों के लिए FAQ में फॉर्म 6 और अंतिम सूची से नाम छूटने पर 15 दिनों के भीतर अपील का प्रावधान है।






