हर छह में से एक व्यक्ति आधिकारिक गरीबी रेखा से नीचे
2025 के घरेलू आय और व्यय सर्वेक्षण की पहली तिमाही के प्रारंभिक निष्कर्षों के अनुसार, श्रीलंका की राष्ट्रीय गरीबी दर 16% पर पहुंच गई, यानी करीब 34.2 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं। जनगणना और सांख्यिकी विभाग के मुताबिक, परिवारों की औसत आय बढ़कर 120,266 रुपये प्रति माह हो गई, फिर भी उनकी क्रय शक्ति 2019 के मुकाबले लगभग 8% कम थी।
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ये आंकड़े देश की आर्थिक सुधार प्रक्रिया के पीछे का दबाव उजागर करते हैं: परिवारों को रुपये ज्यादा मिल रहे हैं, लेकिन उन रुपयों से कम चीजें खरीदी जा सकती हैं। आय वितरण के मध्य में आने वाले परिवार की क्रय शक्ति 2019 की तुलना में और अधिक, 11.1% घटी।
गरीबी का असर भी असमान रूप से फैला है। बागान क्षेत्र में गरीबी दर सबसे अधिक 23% दर्ज की गई, जबकि आधिकारिक गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों में करीब 29 लाख ग्रामीण इलाकों में रहते थे। शहरी क्षेत्रों में गरीबी दर काफी कम, 7.8% थी।
ये निष्कर्ष प्रारंभिक हैं और पूरे 2025 के बजाय पहली तिमाही को कवर करते हैं। 16 अक्टूबर 2026 को दिए गए बाद के संसदीय बयान के अनुसार, पूरा सर्वेक्षण प्रकाशित करने का समय अक्टूबर से बढ़ाकर दिसंबर 2026 कर दिया गया था, क्योंकि अधिकारी आंकड़ों की जांच और प्रसंस्करण जारी रखे हुए थे।
परिवारों और नीति-निर्माताओं के सामने दो जुड़ी हुई समस्याएं हैं: बुनियादी जरूरतें पूरी करने की लागत तेजी से बढ़ी है और कल्याणकारी सहायता तय करने के लिए जरूरी विस्तृत जानकारी तैयार होने में ज्यादा समय लग रहा है।
आय बढ़ने पर भी खरीद क्षमता क्यों घटी
सर्वेक्षण के अनुसार, परिवारों की औसत मासिक आय 120,266 रुपये और औसत खर्च 116,191 रुपये था। दोनों आंकड़े मौजूदा कीमतों पर पैसे की रकम बताते हैं। अर्थशास्त्री इन्हें नाममात्र मूल्य कहते हैं।
क्रय शक्ति एक अधिक व्यावहारिक बात मापती है: उस रकम से वास्तव में कितना भोजन, परिवहन और दूसरी वस्तुएं व सेवाएं खरीदी जा सकती हैं। महंगाई के हिसाब से आय को समायोजित करने से 2019 से तुलना की जा सकती है, और ऊंची कीमतों को जीवन स्तर में सुधार नहीं माना जाता।
इस आधार पर परिवारों की औसत आय लगभग 8% घटी। सीधे शब्दों में कहें तो 2019 में जिस आय से 100 इकाई वस्तुएं और सेवाएं खरीदी जा सकती थीं, समायोजन के बाद उससे करीब 92 इकाइयां ही खरीदी जा सकती थीं, भले ही मिलने वाले रुपयों की संख्या बढ़ गई हो।
आय वितरण के मध्य में आने वाले परिवार की क्रय शक्ति में 11.1% की गिरावट, दबाव की एक और तस्वीर पेश करती है। यह मध्य मान, जिसे माध्यिका कहा जाता है, आय के आधार पर परिवारों को दो बराबर समूहों में बांटता है। इसके विपरीत, औसत आय को बहुत अधिक कमाई वाले परिवार ऊपर खींच सकते हैं।
माध्यिका में गिरावट, औसत गिरावट से करीब 3 प्रतिशत अंक अधिक थी। दोनों आंकड़े मिलकर दिखाते हैं कि क्रय शक्ति का नुकसान सिर्फ गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आय वितरण के मध्य वर्ग तक भी पहुंचा।
बुनियादी जरूरतों की लागत दोगुने से भी अधिक
प्रारंभिक निष्कर्षों में इस्तेमाल की गई आधिकारिक गरीबी रेखा 16,417 रुपये प्रति व्यक्ति प्रति माह थी, जबकि 2019 में यह 6,966 रुपये थी। यानी इसमें 9,451 रुपये या करीब 136% की बढ़ोतरी हुई।
गरीबी रेखा वह मौद्रिक सीमा है जो बुनियादी जरूरतें पूरी करने की लागत दर्शाती है। गरीबी अनुपात उन लोगों का हिस्सा है जिनका मापा गया जीवन स्तर इस सीमा से नीचे है। 16% की राष्ट्रीय दर का अर्थ है कि हर छह में से करीब एक व्यक्ति आधिकारिक गरीबी रेखा से नीचे था।
चार सदस्यों वाले परिवार के लिए प्रति व्यक्ति सीमा को चार से गुणा करने पर मासिक रकम 65,668 रुपये होती है। 2019 के आंकड़े के आधार पर यह 27,864 रुपये थी। यह साधारण उदाहरण दिखाता है कि इस आकार के परिवार के लिए मानक लागत कितनी तेजी से बढ़ी है।
विभाग ने सितंबर के लिए 17,742 रुपये की राष्ट्रीय गरीबी रेखा भी बताई, हालांकि उस अपडेट में वर्ष का उल्लेख नहीं था। यह रकम प्रारंभिक सर्वेक्षण निष्कर्षों में बताई गई 16,417 रुपये की सीमा से 1,325 रुपये या करीब 8.1% अधिक थी।
सितंबर का अपडेट उस महीने की लागत सीमा बताता है। इसके नीचे कितने लोग आते हैं, यह जानने के लिए सीमा के साथ-साथ परिवारों के खर्च की जानकारी भी चाहिए। इसीलिए आय और व्यय सर्वेक्षण महत्वपूर्ण है।
गरीबी सबसे अधिक कहां केंद्रित है
बागान क्षेत्र की 23% गरीबी दर, शहरी दर 7.8% से लगभग तीन गुना थी। ग्रामीण दर 17.3% थी, जो शहरी आंकड़े से करीब 2.2 गुना है। ये अंतर दिखाते हैं कि देशभर में आर्थिक कठिनाई का असर कितना असमान है।
गरीबी में रहने वाले लोगों की सबसे बड़ी संख्या ग्रामीण इलाकों में है: देशभर के कुल 34.2 लाख लोगों में से करीब 29 लाख। इन गोल किए गए आंकड़ों के आधार पर, आधिकारिक गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले सभी लोगों में ग्रामीण निवासियों की हिस्सेदारी करीब 85% है।
बागान और ग्रामीण क्षेत्रों के आंकड़े कल्याण नीति की अलग-अलग जरूरतें सामने रखते हैं। बागान क्षेत्र की आबादी में गरीबी का अनुपात सबसे अधिक है, जबकि मदद की जरूरत वाले लोगों की संख्या ग्रामीण इलाकों में सबसे ज्यादा है। ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने वाले कार्यक्रम को दोनों बातों का ध्यान रखना होगा।
जिलों की गरीबी रेखाएं भी अलग-अलग हैं, क्योंकि बुनियादी जरूरतों की लागत जगह के हिसाब से बदलती है। सितंबर के आंकड़ों में कोलंबो की सीमा सबसे अधिक, 19,136 रुपये प्रति व्यक्ति प्रति माह थी। इसके बाद गम्पहा में 19,037 रुपये और कालुतारा में 18,624 रुपये थी।
मोनरागला में जिले की सीमा सबसे कम, 16,965 रुपये थी। कोलंबो का आंकड़ा इससे 2,171 रुपये या करीब 12.8% अधिक था। जिला-स्तरीय सीमाएं स्थानीय लागत बताती हैं, जबकि क्षेत्र के अनुसार गरीबी दर बताती है कि संबंधित सीमा से नीचे कितने निवासी हैं। जीवन-यापन की लागत और परिवारों के संसाधन लोगों पर कहां दबाव डालते हैं, यह समझने के लिए दोनों जरूरी हैं।
घरेलू बजट में गुंजाइश बहुत कम
116,191 रुपये का औसत मासिक खर्च, 120,266 रुपये की औसत मासिक आय का करीब 96.6% था। दोनों औसत रकम घटाने पर 4,075 रुपये बचते हैं।
यह छोटा अंतर सर्वेक्षण में दिख रहे दबाव को समझने में मदद करता है। जब नियमित खर्च पहले ही संसाधनों का बड़ा हिस्सा ले लेते हैं, तो अचानक आए बिल के लिए परिवार के पास कम गुंजाइश बचती है। आय वितरण के अलग-अलग स्तरों पर परिवारों के बजट में काफी फर्क होगा।
2019 की तुलना में अधिक रुपये खर्च करने से वास्तविक खपत में भी बहुत कम बदलाव आया है। बढ़ती कीमतों का हिसाब लगाने के बाद खर्च में बढ़ोतरी मामूली थी। इसलिए नकद खर्च का बड़ा हिस्सा काफी अधिक लागत चुकाने में गया, न कि बहुत ज्यादा अतिरिक्त चीजें खरीदने में।
आय और खर्च के आंकड़े उस आर्थिक सुधार की तस्वीर पेश करते हैं जिसे परिवार अपने बजट में महसूस करते हैं। नकद आय बढ़ने के साथ क्रय शक्ति घट सकती है, जबकि जरूरी चीजों पर अधिक खर्च करने के बावजूद परिवारों को रोजमर्रा की जिंदगी में बहुत कम सुधार महसूस हो सकता है।
पूरा सर्वेक्षण प्रकाशित करने में देरी क्यों हुई
वित्त, योजना और आर्थिक विकास मंत्रालय के अधीन जनगणना और सांख्यिकी विभाग ने पूरे 2025 के सर्वेक्षण के लिए 12 महीनों में श्रीलंका के 25,000 परिवारों से जानकारी जुटाई। पहली तिमाही के निष्कर्ष इस लंबी प्रक्रिया की शुरुआती तस्वीर पेश करते हैं।
बाद में संसद की सार्वजनिक वित्त समिति ने गरीबी, आय वितरण और परिवारों के कल्याण के साथ सर्वेक्षण की भी समीक्षा की। संसद के 16 अक्टूबर 2026 के बयान में बताया गया कि पूरी रिपोर्ट के प्रकाशन में और समय क्यों लगेगा:
अधिकारियों ने समिति को बताया कि रिपोर्ट मूल रूप से अक्टूबर 2026 में जारी होनी थी, लेकिन आंकड़ों की सफाई में जटिलताओं, कंप्यूटरीकरण में देरी, स्वीकृत पदों के खाली रहने और आर्थिक सर्वेक्षण से जुड़े काम के कारण प्रकाशन की तारीख बढ़ाकर दिसंबर 2026 कर दी गई है,
आंकड़ों की सफाई का अर्थ है परिणामों की गणना से पहले सर्वेक्षण प्रविष्टियों में त्रुटियों, छूटी हुई जानकारी और विसंगतियों की जांच करना। अधिकारियों ने समिति को बताया कि सफाई, सत्यापन और विश्लेषण का काम अब भी जारी था।
मुख्य तारीखें और मानक इस प्रकार हैं:
- 2019: क्रय शक्ति की तुलना का वर्ष; आधिकारिक गरीबी रेखा 6,966 रुपये प्रति व्यक्ति प्रति माह थी।
- 2025 की पहली तिमाही: सर्वेक्षण के प्रारंभिक निष्कर्षों में गरीबी दर 16% बताई गई, जिससे करीब 34.2 लाख लोग प्रभावित थे।
- 2025 के दौरान: पूरे सर्वेक्षण के लिए 12 महीनों में 25,000 परिवारों से जानकारी जुटाई गई।
- 16 अक्टूबर 2026: संसद ने प्रकाशन में देरी की घोषणा की।
- दिसंबर 2026: पूरी रिपोर्ट जारी करने का संशोधित महीना।
पूरी रिपोर्ट से पहली तिमाही के नतीजों के मुकाबले अधिक विस्तृत तस्वीर मिलने की उम्मीद है, जिसमें पूरे वर्ष के दौरान परिवारों की परिस्थितियां शामिल होंगी।
कल्याणकारी सहायता के लिए आंकड़ों का क्या अर्थ है
सार्वजनिक वित्त समिति ने यह भी देखा कि गरीबी रेखा की गणना में इस्तेमाल की जाने वाली उपभोक्ता वस्तुओं की टोकरी मौजूदा जीवन-यापन की लागत और बुनियादी जरूरतों को दर्शाती है या नहीं। उपभोक्ता वस्तुओं की टोकरी में तय वस्तुएं और सेवाएं शामिल होती हैं, जिनके आधार पर अनुमान लगाया जाता है कि लोगों को कितना खर्च करना पड़ता है।
कीमतों को अपडेट करने से पता चलता है कि आज उस टोकरी की लागत कितनी है। उसकी सामग्री की समीक्षा एक अलग सवाल उठाती है: क्या इसमें शामिल वस्तुएं और सेवाएं अब भी लोगों की बुनियादी जरूरतों के अनुरूप हैं? समिति ने आधारभूत आंकड़ों और टोकरी, दोनों की जांच की जरूरत बताई।
चर्चा में श्रीलंका का कल्याणकारी कार्यक्रम अस्वेसुमा भी एक अहम मुद्दा था। समिति ने लाभार्थियों की पहचान के लिए इस्तेमाल होने वाली जानकारी में परिवारों की मौजूदा आय और खर्च को दर्शाने की जरूरत पर जोर दिया।
प्रारंभिक निष्कर्ष इस काम को ठोस रूप देते हैं। गरीबी में गिने गए लोगों में करीब 85% ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं, बागान क्षेत्र में गरीबी दर सबसे अधिक है और आय वितरण के मध्य में आने वाले परिवार की क्रय शक्ति औसत परिवार से अधिक घटी है। ये रुझान बताते हैं कि सहायता कहां जरूरी है और वित्तीय दबाव कितने व्यापक स्तर पर फैला है।
परिवारों के सटीक रिकॉर्ड अहम हैं, क्योंकि सहायता संबंधी फैसले इस बात पर निर्भर करते हैं कि अभी किसे मदद की जरूरत है। दिसंबर में रिपोर्ट जारी होना देश की सांख्यिकीय तस्वीर को अधिक पूर्ण बनाने की अगली निर्धारित प्रक्रिया है। वहीं, प्रारंभिक आंकड़े पहले ही दिखा चुके हैं कि बुनियादी जरूरतों की बढ़ी लागत ने परिवारों की वित्तीय स्थिति कमजोर की है।
मुख्य बातें
- 2025 की पहली तिमाही के प्रारंभिक निष्कर्षों में गरीबी दर 16% बताई गई, जिससे करीब 34.2 लाख लोग प्रभावित थे।
- परिवारों की औसत मासिक आय बढ़कर 120,266 रुपये हो गई, लेकिन क्रय शक्ति 2019 के स्तर से करीब 8% कम थी।
- आय वितरण के मध्य में आने वाले परिवार की क्रय शक्ति 11.1% घटी।
- सर्वेक्षण में बताई गई गरीबी रेखा 2019 के 6,966 रुपये से बढ़कर 16,417 रुपये प्रति व्यक्ति प्रति माह हो गई।
- बागान क्षेत्र में गरीबी दर सबसे अधिक, 23% थी; ग्रामीण इलाकों में गरीबी में रहने वाले करीब 29 लाख लोग थे।
- पूरे 2025 के सर्वेक्षण की रिपोर्ट को आगे की प्रक्रिया और सत्यापन के लिए अक्टूबर से बढ़ाकर दिसंबर 2026 कर दिया गया।






