लगभग 22 वर्षों की खोज के बाद अंतिम अवरोहण
नासा की नील गेहरल्स स्विफ्ट वेधशाला, करीब 1,500 किलोग्राम वज़न वाली अंतरिक्ष दूरबीन, बचाव के लगभग 3 करोड़ डॉलर के प्रयास के विफल होने के बाद अनियंत्रित रूप से पृथ्वी पर लौटने के करीब है। भारत के कुछ हिस्से उस विस्तृत अक्षांशीय पट्टी में आते हैं जहां इसके बचे हुए टुकड़े गिर सकते हैं। इस पट्टी में अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा मध्य और दक्षिण अमेरिका के इलाके भी शामिल हैं।
विषय-सूची
- लगभग 22 वर्षों की खोज के बाद अंतिम अवरोहण
- भारत के कौन से हिस्से इस पट्टी में आते हैं?
- क्या बच सकता है और जोखिम कितना बड़ा है?
- सौर गतिविधि ने स्विफ्ट को समय से पहले नीचे क्यों ला दिया
- बचाव के लिए भेजा गया रोबोट दूरबीन तक नहीं पहुंचा
- स्विफ्ट के अंतिम महीनों की अहम तारीखें
- स्विफ्ट के साथ खगोलविद क्या खो रहे हैं
- अंतरिक्ष और भारत से गिरावट पर नज़र
- अंतरिक्ष एजेंसियों के सामने बढ़ती निपटान चुनौती
- मुख्य बातें
अनुमानों में तारीखें अलग-अलग हैं। नासा से जुड़े एक अनुमान के मुताबिक, यह यान 4 नवंबर को पूर्वी समयानुसार तड़के 3:30 बजे, यानी भारत में दोपहर 2 बजे, वायुमंडल में दोबारा प्रवेश कर सकता है। इसमें करीब 11 घंटे की समय-सीमा बताई गई है। वेधशाला पर नज़र रख रही अमेरिकी अंतरिक्ष सेना का अनुमान है कि यह शुक्रवार, 6 नवंबर को या उसके आसपास वायुमंडल में प्रवेश करेगी। वायुमंडलीय खिंचाव से यान की कक्षा में बदलाव के कारण इसका अंतिम समय और स्थान अनिश्चित बना हुआ है।
स्विफ्ट का अधिकांश हिस्सा जलकर नष्ट होने की आशंका है। नासा के मिशन के मुख्य वैज्ञानिक ब्रैड सेंको ने कहा कि टंगस्टन के घने पुर्जे और दूरबीन के दर्पणों के कुछ हिस्से अवरोहण के दौरान बच सकते हैं। बचे हुए टुकड़ों के समुद्र में गिरने की संभावना सबसे अधिक मानी जा रही है।
फिलहाल चिंता वायुमंडल से होकर अंतरिक्ष यान की अंतिम यात्रा को लेकर है। खगोलविदों के लिए, इसका नष्ट होना उस मिशन का अंत भी है जिसने 2,000 से अधिक गामा-किरण विस्फोटों का पता लगाया और करीब 1,400 विस्फोटक तारों का अवलोकन किया। इसने अन्य वेधशालाओं को ऐसी घटनाओं की ओर भी मोड़ा जो किसी और के ध्यान देने से पहले ही फीकी पड़ सकती थीं।
भारत के कौन से हिस्से इस पट्टी में आते हैं?
स्विफ्ट की कक्षा भूमध्य रेखा से करीब 20.6 डिग्री झुकी हुई है। इसलिए इसका रास्ता लगभग 20.6 डिग्री उत्तरी और 20.6 डिग्री दक्षिणी अक्षांश के बीच रहता है। इससे पृथ्वी के मध्य भाग के चारों ओर एक पट्टी बनती है, जिसके भीतर इसका अंतिम अवरोहण हो सकता है।
भारत में यह पट्टी मोटे तौर पर पश्चिमी तट पर दमन से लेकर पूर्वी तट पर ओडिशा के कटक तक खिंची रेखा के दक्षिण के इलाकों को समेटती है। मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु और चेन्नई इसके भीतर हैं। दिल्ली, कोलकाता और उत्तर भारत का बड़ा हिस्सा इसके बाहर है।
किसी शहर का इस पट्टी में होना यह बताता है कि अंतरिक्ष यान की कक्षा उस अक्षांशीय दायरे से गुजरती है। टुकड़े वास्तव में कहां गिरेंगे, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि स्विफ्ट वायुमंडल की सघन परतों में कहां पहुंचेगी, कैसे टूटेगी और उसके बाद टुकड़े किस रास्ते पर जाएंगे। उपयोगी पूर्वानुमान के लिए अवरोहण का समय और उस समय यान की स्थिति, दोनों का अधिक सटीक आकलन करना होगा।
यह पट्टी समुद्र के बड़े हिस्सों से भी गुजरती है। खगोलभौतिकीविद् और डरहम विश्वविद्यालय के मानद प्रोफेसर जोनाथन मैकडॉवेल ने कहा कि उन्हें आश्चर्य होगा अगर दूरबीन के 1,500 किलोग्राम में से 100 किलोग्राम तक भी बचा। यह उसके कुल द्रव्यमान का करीब 6.7 प्रतिशत होगा और दिखाता है कि अवरोहण के दौरान कितनी सामग्री नष्ट हो सकती है।
क्या बच सकता है और जोखिम कितना बड़ा है?
टंगस्टन सीसे से अधिक घना होता है और बहुत ऊंचे तापमान को सह सकता है। सेंको ने इस धातु से बने पुर्जों और दर्पण के टुकड़ों को संभावित रूप से बचने वाला मलबा बताया। सघन हवा में प्रवेश करते समय वेधशाला अत्यधिक गर्मी और यांत्रिक दबाव का सामना करेगी। इससे इसकी संरचना का बड़ा हिस्सा टूटकर जल जाएगा।
ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के खगोलभौतिकीविद् ब्रैड टकर ने बताया कि पृथ्वी की सतह का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा समुद्र और 30 प्रतिशत ज़मीन है, इसलिए मलबे के समुद्र में गिरने की संभावना अधिक है। वास्तविक नतीजा स्विफ्ट की कक्षीय पट्टी के भीतर उसके अंतिम मार्ग पर निर्भर करेगा।
नासा से जुड़े स्विफ्ट के हताहत होने के अनुमान के मुताबिक, ज़मीन पर किसी व्यक्ति के मलबे से घायल होने की संभावना लगभग 2,100 में 1 है। नासा से ही जुड़े एक व्यापक अनुमान में अंतरिक्ष मलबे से किसी व्यक्ति के हताहत होने की संभावना 10,000 में 1 से अधिक नहीं बताई गई है। इन आंकड़ों में तालमेल बैठाने के लिए इस्तेमाल की गई गणना-विधियों और दायरे की जानकारी नहीं दी गई है।
स्विफ्ट का अनुमान संभावित मलबा क्षेत्र में कहीं भी किसी व्यक्ति के घायल होने की आशंका से जुड़ा है। किसी खास निवासी के लिए यह संभावना इससे बहुत कम है। वैज्ञानिकों को लोगों और बुनियादी ढांचे के लिए जोखिम बहुत कम लगता है। अधिकांश सामग्री नष्ट हो जाएगी और बचे हुए टुकड़े संभवतः पानी या कम आबादी वाले इलाकों में गिरेंगे।
सौर गतिविधि ने स्विफ्ट को समय से पहले नीचे क्यों ला दिया
स्विफ्ट पृथ्वी की निचली कक्षा में काम करती थी, जहां वायुमंडल बेहद विरल है, लेकिन पूरी तरह अनुपस्थित नहीं। इस पतली हवा से गुजरते अंतरिक्ष यान पर खिंचाव लगता है। यह हल्का ब्रेक लगाने वाला बल धीरे-धीरे उसकी कक्षीय ऊर्जा घटाता और उसकी ऊंचाई कम करता है।
हाल के वर्षों में बढ़ी सौर गतिविधि ने पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल को गर्म और विस्तृत किया। स्विफ्ट की उड़ान वाली ऊंचाइयों तक अधिक हवा पहुंचने लगी, जिससे खिंचाव बढ़ा और वेधशाला अनुमान से तेज़ी से नीचे उतरने लगी।
गिरती हुई कक्षा अपने पतन को तेज़ कर सकती है। दूरबीन नीचे आती है तो उसे अधिक घनी हवा और ज़्यादा खिंचाव का सामना करना पड़ता है, जिससे वह और नीचे जाती है। पृथ्वी के करीब वायुमंडलीय स्थितियों में छोटे बदलाव भी वायुमंडल में दोबारा प्रवेश के अनुमानित समय को बदल सकते हैं।
स्विफ्ट ने अपना अंतिम अवलोकन 20 अक्टूबर को किया। इसकी ऊंचाई करीब 275 किलोमीटर तक गिरने पर नासा ने वैज्ञानिक कामकाज रोक दिया, क्योंकि खिंचाव के चलते यान अपने लक्ष्यों का अवलोकन करने के लिए पर्याप्त स्थिर नहीं रह पा रहा था। अक्टूबर के आखिर तक इसके सिस्टम बंद कर दिए गए।
बचाव के लिए भेजा गया रोबोट दूरबीन तक नहीं पहुंचा
नासा ने स्विफ्ट की कक्षा ऊंची करने और उसका वैज्ञानिक जीवन बढ़ाने की कोशिश के लिए कैटलिस्ट स्पेस को काम सौंपा। करीब 3 करोड़ डॉलर के इस अनुबंध के तहत कंपनी के लिंक अंतरिक्ष यान में तीन रोबोटिक भुजाएं थीं, जिनका मकसद वेधशाला को पकड़कर ऊंची कक्षा में ले जाना था।
लिंक ने जुलाई 2026 में उड़ान भरी, लेकिन इसके दिशा-नियंत्रण तंत्र में समस्या आ गई। अंतरिक्ष यान इंजीनियरिंग में दिशा से आशय यान के रुख से है: वह किस ओर मुंह किए है। किसी दूसरे पिंड के इतने करीब पहुंचकर उसे पकड़ने के लिए भरोसेमंद नियंत्रण ज़रूरी होता है।
रोबोट स्विफ्ट से करीब 12 से 15 किलोमीटर से अधिक पास नहीं पहुंच पाया। नासा ने अगस्त में पकड़ने और कक्षा ऊंची करने का अभियान रोक दिया। लिंक ने खुद सितंबर में वायुमंडल में दोबारा प्रवेश किया।
बचाव का प्रयास छोड़ दिए जाने के बाद स्विफ्ट ने फिर अवलोकन शुरू किए और ऊर्जावान ब्रह्मांडीय घटनाओं का पता लगाती रही। उसका अंतिम शटडाउन उसकी सिकुड़ती कक्षा की भौतिक सीमाओं के कारण हुआ, न कि बचाव अभियान विफल होते ही विज्ञान का काम तुरंत खत्म हो जाने से।
स्विफ्ट के अंतिम महीनों की अहम तारीखें
स्विफ्ट के आखिरी साल में बचाव की कोशिश, कुछ समय के लिए अवलोकनों की वापसी और अंततः दिशा स्थिर रखने की क्षमता का खत्म होना शामिल था। घटनाओं का यह क्रम बताता है कि खोज करने में सक्षम दूरबीन अपने कामकाजी जीवन के अंत तक कैसे पहुंची।
- 20 नवंबर, 2004: स्विफ्ट को दो साल के नियोजित प्राथमिक मिशन के साथ प्रक्षेपित किया गया।
- जुलाई 2026: कैटलिस्ट स्पेस ने स्विफ्ट को पकड़कर उसकी कक्षा ऊंची करने के लिए लिंक प्रक्षेपित किया।
- अगस्त 2026: लिंक के दिशा-नियंत्रण की समस्या के कारण उसे पकड़ना संभव न होने पर नासा ने बचाव अभियान रोक दिया।
- सितंबर 2026: लिंक ने पृथ्वी के वायुमंडल में दोबारा प्रवेश किया।
- 20 अक्टूबर, 2026: ऊंचाई करीब 275 किलोमीटर तक गिरने पर स्विफ्ट ने अपना अंतिम वैज्ञानिक अवलोकन किया।
- अक्टूबर 2026 के अंत में: वेधशाला के सिस्टम बंद कर दिए गए।
- नवंबर 2026 की शुरुआत: पूर्वानुमानों के मुताबिक स्विफ्ट 4 या 6 नवंबर के आसपास वायुमंडल में दोबारा प्रवेश कर सकती है; उस पर नज़र रखी जा रही है।
यह मिशन लगभग 22 साल चला, यानी मूल रूप से नियोजित अवधि से करीब 11 गुना अधिक। इतने लंबे समय तक काम करने से खगोलविदों को अल्पकालिक और शक्तिशाली घटनाओं का कहीं बड़ा रिकॉर्ड मिला, जो दो साल में खत्म होने वाले मिशन से जुटाना संभव नहीं होता।
स्विफ्ट के साथ खगोलविद क्या खो रहे हैं
स्विफ्ट को ब्रह्मांड के कुछ सबसे ऊर्जावान विस्फोटों की जांच के लिए स्विफ्ट गामा-रे बर्स्ट एक्सप्लोरर के रूप में प्रक्षेपित किया गया था। गामा-किरणें प्रकाश का अत्यंत ऊर्जावान रूप हैं। इनके अल्पकालिक विस्फोट भारी तारों के ढहने या न्यूट्रॉन तारों से जुड़ी टक्करों के साथ हो सकते हैं। न्यूट्रॉन तारे मृत तारों के असाधारण रूप से घने अवशेष होते हैं।
नई पहचानी गई घटना की ओर तेज़ी से मुड़ पाने की वेधशाला की क्षमता के कारण इसका नाम स्विफ्ट पड़ा। गति मायने रखती थी, क्योंकि विस्फोट का संकेत तेज़ी से बदल सकता है और उसके शुरुआती चरणों को देखने का अवसर बहुत कम समय के लिए मिलता है।
नासा स्विफ्ट को हबल स्पेस टेलीस्कोप और जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप समेत अन्य वेधशालाओं के लिए पहली प्रतिक्रिया देने वाला उपकरण मानता था। स्विफ्ट किसी घटना की पहचान कर चेतावनी भेज सकती थी, जिससे ये दूरबीनें उसका अधिक विस्तृत अवलोकन कर सकें। इसके बाद अलग-अलग दूरबीनें उसी घटना को विभिन्न प्रकार के प्रकाश में देख सकती थीं।
इसके वैज्ञानिक रिकॉर्ड में गामा-किरण विस्फोटों और सुपरनोवा से आगे की घटनाएं भी शामिल हैं। स्विफ्ट ने धूमकेतुओं, क्षुद्रग्रहों और पास के तारों को निगलते ब्लैक होल का अवलोकन किया। वैज्ञानिक अब भी यह तय करने में जुटे हैं कि तेज़ पहचान, फुर्ती से दिशा बदलने और अन्य वेधशालाओं को चेतावनी देने की इसकी संयुक्त क्षमता की भरपाई कैसे हो।
स्विफ्ट की नियंत्रण टीम का नेतृत्व करने वाले पेनसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी के खगोलशास्त्री जॉन नॉसेक ने वेधशाला के लंबे समय से अपेक्षित भौतिक अंत का वर्णन किया:
स्विफ्ट के प्रक्षेपण से पहले ही हम जानते थे कि यह दिन आएगा। कम से कम पृथ्वी की निचली कक्षा में, जो ऊपर जाता है उसे नीचे भी आना पड़ता है। और यह अंत विनाशकारी होता है।
अंतरिक्ष और भारत से गिरावट पर नज़र
अमेरिकी अंतरिक्ष सेना स्विफ्ट की घटती कक्षा पर नज़र रख रही है। रडार, दूरबीनों और कक्षीय मापों से निगरानी करने वाले संगठन किसी अंतरिक्ष यान की ऊंचाई, गति और मार्ग का अनुमान लगाते हैं, फिर वायुमंडल में दोबारा प्रवेश की संभावित समय-सीमा को अपडेट करते हैं।
भारत के पास भी वस्तुओं की अंतिम कक्षाओं पर नज़र रखने के उपकरण हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का श्रीहरिकोटा स्थित मल्टी-ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग रडार, जहां संभव हो, वायुमंडल में दोबारा प्रवेश के करीब पहुंच रहे उपग्रहों और रॉकेट के हिस्सों को ट्रैक कर सकता है। इसरो ने यह घोषणा नहीं की है कि वह स्विफ्ट पर नज़र रख रहा है या नहीं।
स्विफ्ट अनियंत्रित रूप से वायुमंडल में लौट रही है। इसका अर्थ है कि प्राकृतिक कक्षीय क्षय इसे नीचे ला रहा है और संचालक इसके अंतिम अवरोहण को दिशा नहीं दे रहे हैं। नियंत्रित वापसी में संचालक किसी वस्तु की कक्षा जानबूझकर बदलकर उसे चुने हुए, दूरस्थ इलाके की ओर भेजते हैं। आमतौर पर यह इलाका समुद्र के ऊपर होता है।
निगरानी से पूर्वानुमान अपडेट होते हैं; दिशा देने के लिए ज़रूरी प्रणोदन और नियंत्रण वाला अंतरिक्ष यान चाहिए। स्विफ्ट के मामले में बचाव प्रयास विफल होने के बाद अंतिम अवरोहण वायुमंडलीय खिंचाव पर निर्भर है। खिंचाव, यान के रुख और टूटने की प्रक्रिया में छोटे बदलाव आखिरी घंटों तक अनुमान को बदल सकते हैं।
अंतरिक्ष एजेंसियों के सामने बढ़ती निपटान चुनौती
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी की सितंबर में प्रकाशित स्पेस एनवायरनमेंट रिपोर्ट 2026 में, 2025 के अंत तक के आंकड़ों के आधार पर, हर दिन औसतन तीन से अधिक साबुत उपग्रहों या रॉकेट के हिस्सों के वायुमंडल में दोबारा प्रवेश करने का रिकॉर्ड दर्ज किया गया। इसमें हर दिन करीब 10 नए पेलोड के प्रक्षेपण का आंकड़ा भी दर्ज था।
इसरो की इंडियन स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस रिपोर्ट 2025 में वायुमंडल में दोबारा प्रवेश की 1,911 घटनाएं दर्ज की गईं: 1,002 अंतरिक्ष यान, 657 मलबे के टुकड़े, 108 रॉकेट के हिस्से और 144 अज्ञात वस्तुएं। इनमें से 12 भारतीय थीं। इन श्रेणियों में पूरी वस्तुएं और उनके टुकड़े, दोनों शामिल हैं। इसलिए यह गिनती केवल साबुत उपग्रहों और रॉकेट के हिस्सों तक सीमित आंकड़े से अधिक व्यापक है।
अप्रैल 2024 में तत्कालीन इसरो अध्यक्ष एस. सोमनाथ द्वारा घोषित भारत की डेब्रिस फ्री स्पेस मिशन्स पहल का लक्ष्य है कि 2030 तक सभी भारतीय अंतरिक्ष भागीदारों के मिशन मलबा-मुक्त हों। इसके दिशानिर्देशों में अंतरिक्ष यान और रॉकेट के हिस्सों का काम पूरा होने पर नियंत्रित वापसी या उन्हें कक्षा से हटाने की बात कही गई है।
अतीत की घटनाएं दिखाती हैं कि निपटान की योजना क्यों अहम है। अप्रैल 2022 में महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में धातु की वस्तुएं गिरीं, लेकिन कोई घायल नहीं हुआ। मार्च 2024 में फ्लोरिडा के नेपल्स में एक घर पर अंतरिक्ष उपकरण का हिस्सा गिरा। नासा ने उस वस्तु की पहचान अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन से 2021 में हटाए गए उपकरण के बैटरी माउंटिंग सपोर्ट के रूप में की। उम्मीद थी कि वह पूरी तरह जल जाएगा।
स्विफ्ट अंतरिक्ष एजेंसियों के सामने मौजूद दो दबावों को एक साथ सामने लाती है: उपयोगी वेधशालाओं को यथासंभव लंबे समय तक चालू रखना और उनकी अंतिम वापसी को सुरक्षित बनाना। अंतरिक्ष यान का संदिग्ध मलबा मिलने पर उसे छुए बिना अधिकारियों को इसकी सूचना दें, क्योंकि उसके टुकड़े खतरनाक हो सकते हैं।
मुख्य बातें
- करीब 3 करोड़ डॉलर की बचाव कोशिश विफल होने के बाद स्विफ्ट अनियंत्रित रूप से वायुमंडल में दोबारा प्रवेश के करीब है।
- पूर्वानुमानों के मुताबिक यह 4 या 6 नवंबर के आसपास लौट सकती है; अंतिम समय और स्थान अब भी अनिश्चित हैं।
- संभावित मलबा क्षेत्र लगभग 20.6 डिग्री उत्तरी और दक्षिणी अक्षांश के बीच फैला है और इसमें भारत के कुछ हिस्से शामिल हैं।
- मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु और चेन्नई इस पट्टी में हैं; दिल्ली और कोलकाता इसके बाहर हैं।
- दूरबीन का अधिकांश हिस्सा जलकर नष्ट हो जाना चाहिए, हालांकि टंगस्टन के पुर्जे और दर्पण के टुकड़े बच सकते हैं।
- बचा हुआ मलबा समुद्र में गिरने की संभावना सबसे अधिक है और वैज्ञानिकों के मुताबिक किसी व्यक्ति के लिए खतरा बहुत कम है।
- स्विफ्ट के लगभग 22 साल के काम में 2,000 से अधिक गामा-किरण विस्फोटों और करीब 1,400 विस्फोटक तारों का अध्ययन शामिल है।






