नेपाल में आसपास की आग और अपनी सड़कों का धुआँ
मौसम विज्ञानी बिनोद पोखरेल ने चेतावनी दी है कि भारत में फसल अवशेष जलाने से उठने वाला धुआँ नेपाल का वायु प्रदूषण बढ़ा सकता है, अगर हवाएँ उसे सीमा पार ले आएँ। तराई में प्रदूषण बढ़ रहा है और काठमांडू में हवा की गुणवत्ता बिगड़ रही है। उनकी तत्काल अपील नेपाल के भीतर कदम उठाने की है: कचरा जलाना बंद करें, वाहनों का रखरखाव करें और अत्यधिक धुआँ छोड़ने वाले वाहनों पर रोक लगाएँ।
विषय-सूची
- नेपाल में आसपास की आग और अपनी सड़कों का धुआँ
- चेतावनी में हवा का रुख क्यों मायने रखता है
- किसान धान की फसल के अवशेष क्यों जलाते हैं
- क्षेत्रीय प्रदूषण के आँकड़े क्या बताते हैं
- क्षेत्र में गिरफ्तारियाँ और आपात उपाय
- मशीनें और सूक्ष्मजीव आग के विकल्प देते हैं
- फसलें बदलने से आग के पीछे का दबाव घटता है
- मुख्य बातें
यह चेतावनी उन दो समस्याओं को जोड़ती है जिनके लिए अलग-अलग उपायों की जरूरत है। नेपाल अपने वाहनों और खुले में जलने वाली आग से होने वाले प्रदूषण को कम कर सकता है, जबकि भारतीय खेतों से आने वाला धुआँ सीमा पार की कृषि पद्धतियों और उसे लेकर चलने वाले मौसम पर निर्भर करता है। लोगों को दोनों समस्याओं का सामना एक ही समय पर करना पड़ सकता है।
पोखरेल ने कहा कि धुंध और धुआँ देश को प्रभावित करने लगे हैं और आने वाले दिनों में प्रदूषण बढ़ सकता है। भारत की सीमा से लगे नेपाल के दक्षिणी मैदानी इलाकों, तराई में प्रदूषण पहले से बढ़ रहा है, जबकि राजधानी के हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं।
उनके बयान के साथ वायु गुणवत्ता की कोई संख्यात्मक रीडिंग, चेतावनी की तारीख या भारत से आने वाले प्रदूषण के हिस्से का अनुमान नहीं दिया गया। नीचे चर्चा किए गए भारत और पाकिस्तान में प्रवर्तन के आँकड़ों में भी कैलेंडर तारीख नहीं है, इसलिए वे नेपाल के मौजूदा हालात का माप नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संदर्भ देते हैं।
IQAir की एक अलग रीडिंग के मुताबिक, शुक्रवार सुबह काठमांडू का AQI 182 था। 8 फागुन 2082 की तारीख वाली इस रिपोर्ट में हवा को अस्वास्थ्यकर श्रेणी में रखा गया। हवा में मौजूद बारीक कण PM2.5 का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन की सुरक्षित दिशानिर्देश सीमा से 16.5 गुना बताया गया। काठमांडू घाटी के सबसे प्रदूषित इलाकों में त्रिपुरेश्वर, बालकोट, कोटेश्वर और कुमारीपाटी की पहचान की गई।
नेपाल के लोगों के लिए व्यावहारिक संदेश तत्काल है। हवा का रुख बदलने का इंतजार करने से स्थानीय उत्सर्जन कम नहीं होता। कचरे में आग लगाने से बचना या अत्यधिक धुआँ छोड़ने वाले वाहन की मरम्मत कराना, प्रदूषण को उसके स्रोत पर कम करता है, भले ही समुदाय कहीं और से आने वाले धुएँ को नियंत्रित न कर सकें।
चेतावनी में हवा का रुख क्यों मायने रखता है
पोखरेल ने कहा कि भारत से धुआँ तभी नेपाल तक आ सकता है, जब हवाएँ अनुकूल हों। फसल के खेतों में आग से धुआँ वातावरण में फैलता है और हवा की धाराएँ उसे उन खेतों से दूर ले जा सकती हैं जहाँ से वह उठा था। राष्ट्रीय सीमा इस आवाजाही में कोई भौतिक बाधा नहीं बनती।
मौसम का असर इस बात पर भी पड़ता है कि लोगों के आसपास कितना प्रदूषण जमा होता है। उत्तर भारत में तापमान गिरने और ठंडी हवा के निर्माण की धूल, वाहनों के धुएँ और अन्य धुएँ को फँसाने से सर्दियों की शुरुआत के आसपास प्रदूषण बार-बार बढ़ता है। प्रदूषण कितना छोड़ा जाता है और उसे फैलाने वाली परिस्थितियाँ, दोनों मायने रखती हैं।
इसलिए काठमांडू और तराई में बदलते हालात के बीच स्थानीय वायु गुणवत्ता पर ध्यान देने की जरूरत है। पोखरेल ने लोगों और समुदायों से प्रदूषण पर नजर रखने और सावधानी बरतने की अपील की। इसके साथ ही अधिकारियों को उत्सर्जन नियंत्रित करने के प्रयास करने चाहिए।
उनकी सिफारिशें एक साथ कई समूहों की जिम्मेदारी तय करती हैं। घरों में कचरा जलाने से बचा जा सकता है, वाहन मालिक नियमित रखरखाव करा सकते हैं और अधिकारी अत्यधिक धुआँ छोड़ने वालों पर कार्रवाई कर सकते हैं। ये कदम नेपाल के भीतर प्रदूषण के स्रोतों से निपटते हैं, जबकि बाहर से आने वाले धुएँ का जोखिम बना रहता है।
किसान धान की फसल के अवशेष क्यों जलाते हैं
भारत के पंजाब और हरियाणा में किसानों को गेहूँ बोने से पहले धान के खेत जल्दी खाली करने पड़ते हैं। पराली से आशय कटाई के बाद खेत में बची डंठलों और पौधों के अन्य हिस्सों से है। इसे जलाने से खेत तेजी से साफ हो जाता है और किसानों को बड़े पैमाने पर अवशेष इकट्ठा करने तथा ढोने का खर्च नहीं उठाना पड़ता।
टाटा-कॉर्नेल इंस्टीट्यूट के संस्थापक निदेशक प्रभु पिंगली, अर्थशास्त्र शोधकर्ता पायल सेठ और एसोसिएट निदेशक भास्कर मित्रा ने 29 नवंबर 2021 के अपने विश्लेषण में इस प्रथा की वजह क्षेत्र की धान-गेहूँ फसल प्रणाली को बताया। हरित क्रांति के दौरान शुरू की गई किस्मों से एक ही जमीन पर एक साल के भीतर दोनों फसलें उगाना संभव हुआ।
पश्चिमी सिंधु-गंगा के मैदान में धान की खेती के लिए भूजल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। मानसून की बारिश के साथ तालमेल बिठाने के लिए बुवाई जून के अंत तक खिसकने से किसानों के पास धान की कटाई और गेहूँ की बुवाई के बीच कम समय बचा। फसल अवशेष हटाना बुवाई के कैलेंडर के खिलाफ दौड़ बन गया।
डंठल हटाने में श्रम और पैसा लगता है। जब किसानों को ऐसी सामग्री इकट्ठा करने, बाँधने और ढोने के लिए भुगतान करना पड़े जिसका उन्हें तुरंत कोई खास मूल्य न मिले, तो उसे जलाना सस्ता विकल्प बना रहता है। इस तरह प्रदूषण की समस्या खेती की लागत, पानी के उपयोग और लगातार बोई जाने वाली फसलों के समय से जुड़ी है।
क्षेत्रीय प्रदूषण के आँकड़े क्या बताते हैं
2021 के विश्लेषण में फसल अवशेष जलाने को भारत के कुल वायु प्रदूषण का 15 प्रतिशत बताया गया। लेखकों ने इस अनुमान के आधार पर खेती के तरीकों में बदलाव की दलील दी। इनमें उन इलाकों में धान की खेती घटाना भी शामिल था जहाँ यह फसल जल संसाधनों पर दबाव डालती है।
दिल्ली के हालात दिखाते हैं कि खेतों का धुआँ शहरी उत्सर्जन के साथ मिल सकता है। क्षेत्रीय अधिकारियों द्वारा बताए गए प्रवर्तन अभियान के दौरान, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने मंगलवार सुबह वायु गुणवत्ता सूचकांक 320 दर्ज किया, जो भारत की ‘बहुत खराब’ श्रेणी में आता है। भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने प्रतिकूल मौसम के कारण आने वाले दिनों में भी इस श्रेणी के बने रहने की आशंका जताई।
वायु गुणवत्ता सूचकांक, यानी AQI, प्रदूषण की माप को एक संख्या और श्रेणी में बदलता है, जिसे लोग आसानी से समझ और देख सकते हैं। दिल्ली की रीडिंग के साथ बताए गए भारतीय पैमाने पर 0 से 50 को अच्छा माना जाता है, जबकि 300 से 400 ‘बहुत खराब’ श्रेणी है। 320 की रीडिंग प्रदूषण की गंभीर समस्या का संकेत देती है।
उस समय शहरों के लाइव प्रदूषण क्रम में दिल्ली, लाहौर के बाद दूसरे स्थान पर थी। दोनों शहर खेतों की आग, यातायात और अन्य स्रोतों से होने वाले दहन सहित कई तरह के प्रदूषण से जूझ रहे थे। उनका अनुभव नेपाल के लिए यह समझने का ठोस क्षेत्रीय उदाहरण है कि कृषि से उठने वाला धुआँ घनी आबादी वाले इलाकों में पैदा होने वाले प्रदूषण को कैसे बढ़ा सकता है।
क्षेत्र में गिरफ्तारियाँ और आपात उपाय
हरियाणा के कैथल इलाके में पुलिस ने पराली जलाने से जुड़ी 22 शिकायतें दर्ज कीं और कम से कम 16 लोगों को गिरफ्तार किया। एक नाम से पहचाने जाने वाले पुलिस उपाधीक्षक बिरभान ने कहा कि गिरफ्तार लोगों को जमानत पर छोड़ दिया गया। पूरे हरियाणा में करीब 100 किसानों के खिलाफ जांच चल रही थी और 300 से अधिक पर जुर्माना लगाया गया था।
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में पुलिस ने पराली और कचरा जलाने, प्रतिबंधित ईंट भट्ठों और धुआँ छोड़ने वाले वाहनों के खिलाफ कार्रवाई में 182 शिकायतें दर्ज कीं और 71 लोगों को गिरफ्तार किया। इन आँकड़ों में प्रदूषण से जुड़े कई तरह के अपराध शामिल हैं, इसलिए वहाँ चलाए गए अभियान की व्यापक तस्वीर मिलती है।
दिल्ली प्रशासन ने धूल से निपटने के लिए सड़कों पर पानी छिड़कने, सार्वजनिक बस और मेट्रो सेवाएँ बढ़ाने तथा कारों का इस्तेमाल हतोत्साहित करने के लिए पार्किंग शुल्क बढ़ाने के आदेश दिए। पाकिस्तान की पंजाब सरकार ने भी कृत्रिम बारिश और अन्य उपायों के लिए संसाधन आवंटित किए। प्रांतीय वरिष्ठ मंत्री मरियम औरंगज़ेब ने कृत्रिम बारिश के हर अभियान की लागत 50 लाख से 70 लाख पाकिस्तानी रुपये बताई।
पर्यावरणविद विमलेंदु झा ने कहा कि दिल्ली की आपात प्रतिक्रिया को प्रदूषण के स्रोतों के खिलाफ लगातार कार्रवाई का सहारा मिलना चाहिए। उन्होंने कहा:
ये केवल आपात उपाय हैं...वायु प्रदूषण कम करने के लिए ऐसे तदर्थ उपायों के बजाय दीर्घकालिक और व्यापक समाधान की जरूरत है,
नेपाल के सामने भी इससे जुड़ा व्यावहारिक विकल्प है। प्रदूषण की किसी घटना के दौरान उठाए गए कदम तत्काल हालात से निपट सकते हैं, जबकि कचरा जलाने और धुआँ छोड़ने वाले वाहनों पर नियमित नियंत्रण से अगली घटना शुरू होने से पहले उत्सर्जन कम किया जा सकता है।
मशीनें और सूक्ष्मजीव आग के विकल्प देते हैं
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने पूसा नाम का सूक्ष्मजीवी उपचार विकसित किया, जो फसल अवशेषों के अपघटन की प्रक्रिया तेज करता है। 2021 के विश्लेषण में बताया गया कि इससे पराली 25 दिनों में खाद में बदल जाती है। इस तरह उसे धुएँ के रूप में हवा में भेजने के बजाय मिट्टी में वापस मिलाया जा सकता है।
एक दूसरा विकल्प हैप्पी सीडर है। यह ट्रैक्टर से जुड़ी मशीन है, जो खेत में बची धान की पराली को संभालते हुए गेहूँ की बुवाई करती है। यह नई बोई गई जमीन पर पराली की परत बिछाती है, जो मिट्टी की सतह पर ढकी रहती है। इससे किसान अवशेष जलाए बिना बुवाई कर सकते हैं।
खेती का कैलेंडर इन विकल्पों की सीमाएँ समझने में मदद करता है। 25 दिन वाला उपचार तभी काम आएगा जब दो फसलों के बीच पर्याप्त समय हो। मशीनरी की परिचालन लागत होती है और खेत साफ करने की जरूरत के समय किसानों के लिए उसे हासिल करना और इस्तेमाल करना संभव होना चाहिए।
पराली से ईंधन के रूप में इस्तेमाल होने वाला अल्कोहल, इथेनॉल भी बनाया जा सकता है। राज्य सरकारों ने इस सामग्री का इस्तेमाल करने वाली डिस्टिलरियों को सहयोग दिया है, लेकिन किसानों को इसे इकट्ठा करने, गट्ठर बाँधने और ढोने का खर्च फिर भी उठाना पड़ता है। पराली का उपयोग होने लगने से उसे बेचना, जलाने के मुकाबले अपने आप सस्ता या आसान नहीं हो जाता।
नेपाल के लिए ये बातें बताती हैं कि आग रोकने की अपील के साथ भारत में व्यावहारिक सहयोग क्यों जरूरी है। किसानों को उपलब्ध समय के भीतर फसल अवशेष संभालने का किफायती तरीका चाहिए, साथ ही जलाने पर रोक लगाने वाले नियम भी।
फसलें बदलने से आग के पीछे का दबाव घटता है
पिंगली, सेठ और मित्रा ने पश्चिमी सिंधु-गंगा के मैदान में धान की खेती घटाने और कम पानी वाली फसलें बढ़ाने का सुझाव दिया। इनमें मक्का, मूँगफली और मूँग, उड़द तथा अरहर जैसी दालें शामिल हैं। उनकी दलील में स्वच्छ हवा को भूजल पर कम दबाव और अधिक विविध खाद्य आपूर्ति से जोड़ा गया।
हरियाणा की ‘मेरा पानी मेरी विरासत’ योजना इसका एक वित्तीय उदाहरण थी। नवंबर 2021 में बताए गए प्रावधान के अनुसार, खरीफ यानी मानसूनी फसल के मौसम में धान के लिए इस्तेमाल की गई आधे से अधिक जमीन पर फसल विविधीकरण करने वाले पात्र किसानों को प्रति एकड़ 7,000 भारतीय रुपये दिए जाते थे। उस समय तक 98,000 किसान पंजीकरण करा चुके थे।
ऐसा बदलाव टिकेगा या नहीं, यह किसानों की आय पर निर्भर करता है। धान को सरकारी खरीद और मूल्य समर्थन जैसी पहले से स्थापित व्यवस्थाओं का लाभ मिलता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य वह कीमत है जिसकी घोषणा सरकार किसानों को सहारा देने के लिए करती है, हालांकि खरीद व्यवस्था तक पहुँच फसल और स्थान के अनुसार अलग-अलग होती है।
लेखकों ने वैकल्पिक फसलों के लिए भरोसेमंद खरीदार और प्रतिस्पर्धी कीमतें सुनिश्चित करने की अपील की। उन्होंने इन फसलों की खरीद में निजी निवेश बढ़ाने का भी सुझाव दिया। किसानों को अगली फसल चुनते समय भरोसा होना चाहिए कि वे अपनी उपज बेच सकेंगे और आय सुरक्षित रख पाएँगे।
नेपाल की तत्काल प्रतिक्रिया घर के भीतर के कदमों पर टिकी है: खुले में कचरा जलाना कम करना, वाहनों का रखरखाव करना और स्थानीय वायु गुणवत्ता पर नजर रखना। सीमा पार, फसल अवशेष संभालने के किफायती तरीके और धान के व्यावहारिक विकल्प हवा के साथ आने के लिए उपलब्ध धुएँ को कम कर सकते हैं। दोनों स्रोतों पर काम करने से समुदायों को बाहर से आने वाले धुएँ या स्थानीय उत्सर्जन को अलग-अलग देखने की तुलना में अधिक व्यापक प्रतिक्रिया मिलती है।
मुख्य बातें
- मौसम विज्ञानी बिनोद पोखरेल ने चेतावनी दी कि अनुकूल हवा चलने पर भारत में फसल जलाने से उठा धुआँ नेपाल पहुँच सकता है। तराई और काठमांडू में प्रदूषण बढ़ रहा है।
- 8 फागुन 2082 की तारीख वाली रिपोर्ट में IQAir ने शुक्रवार सुबह काठमांडू का AQI अस्वास्थ्यकर 182 दर्ज किया। PM2.5 का स्तर WHO की सुरक्षित दिशानिर्देश सीमा से 16.5 गुना बताया गया।
- उन्होंने लोगों और अधिकारियों से कचरा जलाना बंद करने, वाहनों का रखरखाव करने और स्थानीय वायु गुणवत्ता पर नजर रखने की अपील की।
- धान की कटाई और गेहूँ की बुवाई के बीच कम समय उत्तर भारत के किसानों द्वारा फसल अवशेष जलाने की एक वजह है।
- पूसा सूक्ष्मजीवी उपचार और हैप्पी सीडर विकल्प देते हैं, लेकिन उनके इस्तेमाल पर समय, मशीनरी और ढुलाई की लागत का असर पड़ता है।
- हरियाणा की फसल विविधीकरण योजना में पात्र किसानों को प्रति एकड़ 7,000 भारतीय रुपये देने की पेशकश थी। नवंबर 2021 तक 98,000 किसानों ने पंजीकरण कराया था।
- नेपाल अपने उत्सर्जन पर कार्रवाई कर सकता है, जबकि क्षेत्रीय कृषि बदलाव बाहर से आने वाले धुएँ के संभावित स्रोत को कम कर सकते हैं।






