न्यायाधीशों ने सीमित जानकारी साझा करने पर लिखित स्पष्टीकरण मांगा
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 2 नवंबर, 2026 को नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) को निर्देश दिया कि वह लिखित रूप में बताए कि NEET-PG के प्रश्न जारी करने से परीक्षा की निष्पक्षता कैसे प्रभावित हो सकती है। सुनवाई में उम्मीदवारों की एक व्यावहारिक समस्या पर ध्यान दिया गया: वे प्रश्नों के पहचान नंबर और उत्तरों की जानकारी देख सकते हैं, लेकिन अपने परिणाम की जांच के लिए जरूरी प्रश्न नहीं देख सकते।
विषय-सूची
- न्यायाधीशों ने सीमित जानकारी साझा करने पर लिखित स्पष्टीकरण मांगा
- उम्मीदवार क्या देखना चाहते हैं
- प्रश्नों का क्रम बदलना क्यों मायने रखता है
- NBEMS का कहना है कि प्रश्न बैंक की सुरक्षा जरूरी
- अदालत को सामान्य दलील से अधिक चाहिए
- दलील में दूसरी परीक्षाओं और ऑनलाइन बिक रहे प्रश्न-पत्रों का जिक्र
- मामला इस मुकाम तक कैसे पहुंचा
- परीक्षा देने वाले डॉक्टरों के लिए क्या दांव पर है
- मुख्य बिंदु
न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि प्रश्नों को गोपनीय रखने के लिए बोर्ड की दलील से वह पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। NBEMS ने कहा कि उसका प्रश्न बैंक सीमित है और हर साल प्रश्न प्रकाशित करने से पांच से छह साल में पूरा संग्रह उजागर हो सकता है।
यह विवाद स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के लिए राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा, यानी NEET-PG, से जुड़ा है। डॉक्टर स्नातकोत्तर चिकित्सा प्रशिक्षण में प्रवेश के लिए इस परीक्षा में प्रतिस्पर्धा करते हैं। याचिकाकर्ता ऐसा रिकॉर्ड चाहते हैं जो उनके द्वारा हल किए गए हर प्रश्न को उनके चुने हुए उत्तर, सही उत्तर और दिए गए अंकों से जोड़े।
अदालत ने NBEMS को लिखित दलीलों के जरिए अपनी नीति को उचित ठहराने का निर्देश दिया। मांगी गई जानकारी साझा करने पर अंतिम फैसला, दलीलें दाखिल करने की समय-सीमा और अगली सुनवाई की तारीख तय नहीं की गई।
उम्मीदवार क्या देखना चाहते हैं
डेमोक्रेटिक मेडिकल एसोसिएशन ने एक याचिका दायर कर अन्य राहतों के साथ यह मांग की है कि परीक्षा के तुरंत बाद व्यक्तिगत OMR उत्तर-पत्रक, प्रश्न-पत्र और संबंधित उत्तर कुंजी उम्मीदवारों के लॉगिन खातों पर अपलोड किए जाएं। OMR उन उत्तर-पत्रकों को कहा जाता है जिन पर चिह्नित जवाब इलेक्ट्रॉनिक रूप से पढ़े जा सकते हैं; एसोसिएशन की मांगी गई राहत में यही शब्द इस्तेमाल हुआ है।
चुनौती NBEMS के एक सुधारात्मक नोटिस से भी जुड़ी है, जो उत्तर कुंजी और दर्ज जवाबों को मास्टर प्रश्न-पत्र के प्रश्न पहचान नंबरों तक सीमित करता है। याचिकाकर्ता चाहते हैं कि असल प्रश्न उसी क्रम में दिखाए जाएं जिसमें हर उम्मीदवार ने उन्हें देखा था, साथ ही चिह्नित जवाब, सही उत्तर और प्राप्त अंक भी दिए जाएं।
उम्मीदवार के लिए ये जानकारियां एक पूरी कड़ी बनाती हैं: क्या पूछा गया, उसने क्या चुना, बोर्ड ने किसे सही माना और उसी आधार पर अंक कैसे दिए गए। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में प्रश्न ही नहीं दिखता, जिससे इस कड़ी की जांच करना मुश्किल हो जाता है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शिखिल सूरी ने अदालत को बताया कि साझा की गई जानकारी में मास्टर सेट के प्रश्न और उत्तर शामिल थे, जबकि दूसरे सेट तैयार करने के लिए इस्तेमाल किए गए प्रश्न केवल पहचान नंबरों के रूप में दिखाए गए। इसलिए मांग अलग-अलग प्रश्नों से कटे हुए उत्तरों की सूची के बजाय हर उम्मीदवार का पूरा व्यक्तिगत रिकॉर्ड देने की है।
प्रश्नों का क्रम बदलना क्यों मायने रखता है
NBEMS ने पीठ को बताया कि प्रश्नों को अलग-अलग सेट में बदलकर रखने के कारण उम्मीदवारों को प्रश्न-पत्र के अलग-अलग संस्करण मिलते हैं। उसके पोर्टल पर प्रश्न आईडी, उत्तरों की स्थिति और सही जवाब दिए जाते हैं, लेकिन प्रश्नों का पाठ नहीं दिखाया जाता।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उत्तर विकल्पों का क्रम भी बदला जाता है। क्रम बदलने पर उम्मीदवार को यह भरोसेमंद तरीका चाहिए कि परीक्षा के दौरान स्क्रीन पर दिखे प्रश्न को बाद में दर्ज उत्तर से जोड़ सके। प्रश्न को दिया गया नंबर बोर्ड की प्रणाली में उसकी पहचान करता है, लेकिन उम्मीदवारों का कहना है कि अपने प्रदर्शन की समीक्षा के लिए उन्हें प्रश्न का पूरा पाठ चाहिए।
उत्तर कुंजी में वे जवाब दिए जाते हैं जिन्हें परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था सही मानती है। उम्मीदवार की उत्तर-पत्रक में दर्ज होता है कि उसने कौन-सा विकल्प चुना। असल प्रश्नों के साथ दोनों दिखाने से डॉक्टर अपने जवाबों की बोर्ड के उत्तरों से तुलना कर सकेंगे और समझ सकेंगे कि अंक कैसे तय हुए।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार मौजूदा प्रारूप की पुष्टि नहीं की जा सकती, क्योंकि जानकारी उन प्रश्नों से अलग है जिन्हें उम्मीदवारों को हल करना याद है। उनकी मांगी गई व्यवस्था में प्रश्न, चुना हुआ जवाब, मान्य उत्तर और अंक एक ही उम्मीदवार के रिकॉर्ड में होंगे।
NBEMS का कहना है कि प्रश्न बैंक की सुरक्षा जरूरी
NBEMS ने गोपनीयता का बचाव करते हुए कहा कि स्नातकोत्तर प्रश्न बैंक सीमित संसाधन है, जिसे भारत भर के विशेषज्ञों की मदद से तैयार किया गया है। उसके वकील ने कहा कि प्रश्न राष्ट्रीय संपत्ति बन जाते हैं और उन्हें बार-बार प्रकाशित करने से धीरे-धीरे पूरा संग्रह उजागर हो सकता है।
बोर्ड के वकील ने अदालत को बताया कि प्रश्न तैयार करने वाले लोगों के पास कॉपीराइट नहीं रहता, क्योंकि प्रश्न राष्ट्रीय संपत्ति बन जाते हैं। भविष्य की परीक्षाओं में प्रश्न बैंक की सुरक्षा और उसके इस्तेमाल को जारी रखने के पक्ष में बोर्ड ने यह दलील दी।
NBEMS ने जोखिम की एक स्पष्ट समय-सीमा बताई: हर साल प्रश्न जारी किए जाने पर पांच से छह साल में पूरा बैंक सामने आ सकता है। उसे चिंता है कि कोटा सहित अन्य जगहों के कोचिंग संस्थान प्रश्न इकट्ठा कर सकते हैं और उम्मीदवारों को उत्तर याद करने का प्रशिक्षण दे सकते हैं।
बोर्ड ने इस चिंता को उन डॉक्टरों की परीक्षा लेने के उद्देश्य से जोड़ा जो आगे चलकर जनस्वास्थ्य से जुड़े काम करेंगे। उसका तर्क है कि परीक्षा में चिकित्सा संबंधी समझ और निर्णय क्षमता परखी जानी चाहिए, जबकि प्रश्नों के ज्ञात संग्रह तक पहुंच मिलने से रटने को बढ़ावा मिल सकता है।
अब लिखित जवाब में यह बताना होगा कि मांगी गई जानकारी साझा करने से यह चिंता कैसे जुड़ती है। उम्मीदवार परीक्षा देने के बाद प्रश्नों तक पहुंच चाहते हैं; NBEMS का कहना है कि बाद में प्रश्न जारी करने से आने वाले वर्षों की परीक्षाओं की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
अदालत को सामान्य दलील से अधिक चाहिए
न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने बोर्ड की दलील की पर्याप्तता पर सवाल उठाया और पूछा कि NEET-PG में अन्य परीक्षाओं से अलग तरीका क्यों अपनाया जाना चाहिए। सुनवाई के दौरान NBEMS के वकील से उन्होंने कहा:
पारदर्शिता का क्या होगा? आप जो कर रहे हैं, उसके बारे में आपको कहीं अधिक स्पष्टीकरण देना होगा।
न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने बोर्ड से यह भी कहा कि पीठ को उसकी नीति के पीछे के कारणों का अधिक विस्तृत ब्यौरा चाहिए:
हम पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। आपको हमें ठीक-ठीक बताना होगा कि आप किसी भी दूसरी परीक्षा से अलग रुख क्यों अपना रहे हैं।
जानकारी साझा करने पर पाबंदियों का बचाव करते हुए NBEMS के वकील ने दूसरे देशों और AIIMS में परीक्षा की व्यवस्थाओं का जिक्र किया। न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने कहा कि विदेशों में अपनाई जाने वाली व्यवस्थाएं भारत के लिए आदर्श नहीं हैं और इस परीक्षा पर केंद्रित स्पष्टीकरण मांगा।
अदालत के निर्देश के बाद अगला कदम NBEMS को उठाना है। बोर्ड को लिखित रूप में बताना होगा कि उम्मीदवारों को प्रश्न अपने पास रखने देने से स्नातकोत्तर NEET परीक्षाओं की निष्पक्षता को नुकसान कैसे पहुंच सकता है। इससे पीठ को नीति की समीक्षा के लिए अधिक ठोस आधार मिलेगा।
दलील में दूसरी परीक्षाओं और ऑनलाइन बिक रहे प्रश्न-पत्रों का जिक्र
याचिकाकर्ताओं ने JEE, CLAT और AIIMS INI-CET का उदाहरण दिया, जहां उम्मीदवारों को उनके हल किए गए क्रम में व्यक्तिगत उत्तर-पत्रक मिलते हैं। उन्होंने NEET-PG में भी इसी तरह का रिकॉर्ड देने की मांग के समर्थन में इन उदाहरणों का हवाला दिया।
ये तुलनाएं एक ठोस व्यवस्था से जुड़ी हैं: क्या उम्मीदवार को सिर्फ पहचान नंबर और जवाब दिखते हैं, या उसकी अपनी परीक्षा के प्रश्नों और जवाबों का पढ़ने योग्य पूरा ब्यौरा भी मिलता है। NBEMS को बताना होगा कि उसके प्रश्न बैंक के लिए अलग व्यवस्था क्यों जरूरी है।
मामले में पेश एक वकील ने अदालत को यह भी बताया कि पिछले वर्षों के NEET-PG प्रश्न-पत्र Amazon पर आसानी से बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। वकील ने सवाल उठाया कि जब पुराने प्रश्न-पत्र के रूप में पेश की जा रही सामग्री व्यावसायिक तौर पर बेची जा रही है, तो उम्मीदवारों से प्रश्न रोकने का तर्क क्या है।
सुनवाई के दौरान Amazon से जुड़ी यह बात दलील के रूप में उठाई गई। अदालत के सामने तत्काल मुद्दा बोर्ड की जानकारी साझा करने की नीति और आधिकारिक परीक्षा रिकॉर्ड के जरिए उम्मीदवारों को मिलने वाली जानकारी है।
मामला इस मुकाम तक कैसे पहुंचा
जानकारी साझा करने की मांग पर परीक्षाओं से जुड़ी याचिकाओं के एक बड़े समूह के साथ विचार किया जा रहा है। डेमोक्रेटिक मेडिकल एसोसिएशन का मामला फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन और यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट की याचिकाओं के साथ सूचीबद्ध है। ये याचिकाएं नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के कामकाज से जुड़े ढांचागत मुद्दों को चुनौती देती हैं।
इस सुनवाई में NEET-PG की जानकारी साझा करने की नीति का बचाव NBEMS को करना है। संबंधित कार्यवाहियां मामले की पृष्ठभूमि हैं, जबकि 2 नवंबर को जारी निर्देश में प्रश्न रोकने के कारण बताने को कहा गया है।
- 15 अक्टूबर, 2026: सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीदवारों के लॉगिन खातों के जरिए परीक्षा रिकॉर्ड देने की मांग वाली डेमोक्रेटिक मेडिकल एसोसिएशन की याचिका पर नोटिस जारी किया।
- 2 नवंबर, 2026: न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और आलोक अराधे ने सीमित जानकारी साझा करने पर दलीलें सुनीं और पारदर्शिता को लेकर NBEMS से सवाल किए।
- अगला प्रक्रियात्मक कदम: NBEMS को लिखित दलीलें दाखिल कर बताना होगा कि प्रश्न साझा करने से परीक्षा की निष्पक्षता कैसे प्रभावित हो सकती है।
इस घटनाक्रम में विवाद जानकारी पाने की मांग से आगे बढ़कर परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था से अपनी पाबंदियों का कारण बताने की जरूरत तक पहुंचा है। अगला अहम कदम नीति के बचाव में बोर्ड की लिखित दलीलें हैं।
परीक्षा देने वाले डॉक्टरों के लिए क्या दांव पर है
स्नातकोत्तर सीटों की तलाश कर रहे डॉक्टरों के लिए मांगा गया रिकॉर्ड अपना परिणाम समझना आसान बना देगा। उम्मीदवार किसी प्रश्न को पढ़कर अपना दर्ज विकल्प देख सकेंगे और अंक देने में इस्तेमाल उत्तर से उसकी तुलना कर सकेंगे। उन्हें याददाश्त और पहचान नंबरों के सहारे परीक्षा का ब्यौरा दोबारा बनाने की जरूरत नहीं होगी।
NBEMS को एक दूसरे समूह की भी चिंता है: आने वाले वर्षों में परीक्षा देने वाले उम्मीदवारों की। उसका तर्क है कि गोपनीय प्रश्नों को सुरक्षित रखने से सीमित प्रश्न बैंक के भीतर प्रश्न दोबारा इस्तेमाल किए जाने पर भी चिकित्सा क्षमता की जांच करने वाली परीक्षा को बनाए रखने में मदद मिलती है।
यह मामला दोनों जरूरतों को एक साथ अदालत के सामने रखता है। उम्मीदवार अपने मूल्यांकन की जांच के लिए पर्याप्त जानकारी चाहते हैं। बोर्ड उस सामग्री की सुरक्षा करना चाहता है जिसे वह भविष्य के उम्मीदवारों के मूल्यांकन के लिए जरूरी मानता है। लिखित दलीलों में यह बताना होगा कि उस सामग्री की सुरक्षा के लिए NBEMS की मौजूदा पाबंदियां क्यों जरूरी हैं।
मुख्य बिंदु
- सुप्रीम कोर्ट ने 2 नवंबर, 2026 को NBEMS से NEET-PG में जानकारी साझा करने की नीति पर लिखित स्पष्टीकरण मांगा।
- पोर्टल पर प्रश्नों के पहचान नंबर और उत्तरों की जानकारी दी जाती है, लेकिन प्रश्न नहीं दिखाए जाते।
- याचिकाकर्ता प्रश्नों, चुने गए जवाबों, सही उत्तरों और अंकों वाला व्यक्तिगत रिकॉर्ड चाहते हैं।
- NBEMS का तर्क है कि हर साल प्रश्न जारी करने से पांच से छह साल में उसका सीमित प्रश्न बैंक उजागर हो सकता है।
- पीठ ने कहा कि वह पूरी तरह संतुष्ट नहीं है और पूछा कि NEET-PG को दूसरी परीक्षाओं से अलग क्यों माना जाना चाहिए।
- अदालत ने स्पष्टीकरण मांगा है; जानकारी साझा करने पर अंतिम फैसला अभी बाकी है।






