इंडोनेशिया के पहले परमाणु स्थल की तलाश में बाटम भी शामिल
इंडोनेशिया अपने पहले परमाणु बिजलीघर के लिए रियाउ द्वीपसमूह में बाटम और हलमहेरा, कालीमंतन तथा सुमात्रा के स्थानों का अध्ययन कर रहा है। स्थल का फैसला 2027 तक होने की उम्मीद है। इस तलाश में अलग-अलग क्षमता और समयसीमा वाले कई प्रस्ताव शामिल हैं: 2032 तक शुरू करने के लक्ष्य वाला 250 मेगावाट का शुरुआती बिजलीघर, दो क्षेत्रों में 500 मेगावाट आवंटित करने वाली राष्ट्रीय बिजली योजना और उत्तरी हलमहेरा में 200 मेगावाट की प्रस्तावित तैरती इकाई।
विषय-सूची
- इंडोनेशिया के पहले परमाणु स्थल की तलाश में बाटम भी शामिल
- योजनाओं में 250, 500 और 200 मेगावाट के आंकड़े क्यों हैं
- 28 संभावित स्थल, और भी स्थान विचाराधीन
- हलमहेरा के लिए रूस और इंडोनेशियाई निवेशक का प्रस्ताव
- उत्तरी हलमहेरा के स्थानीय नेताओं को बिजली और रोजगार की उम्मीद
- स्थल चयन से बिजली आपूर्ति तक का सख्त समयबद्ध कार्यक्रम
- सुरक्षा नियम और विदेशी साझेदार अहम
- बड़े विस्तार में परमाणु ऊर्जा की शुरुआत छोटी हिस्सेदारी से
- घरेलू अनुसंधान भी कार्यक्रम का हिस्सा
- मुख्य बातें
डाउनस्ट्रीमिंग और ऊर्जा संक्रमण के समन्वय मंत्री बाहलिल लाहादालिया ने 26 अक्टूबर, 2026 को जकार्ता में ऊर्जा और खनिज संसाधन मंत्रालय में अपने संबोधन के दौरान बाटम का नाम लिया। उन्होंने कहा कि किसी परियोजना पर निर्माण का फैसला व्यवहार्यता अध्ययनों के बाद होगा। इन अध्ययनों में जांचा जाता है कि कोई परियोजना किसी खास स्थान पर सुरक्षित, तकनीकी रूप से व्यावहारिक और आर्थिक रूप से संभव है या नहीं।
बाहलिल ने कहा कि परमाणु ऊर्जा के विकास के लिए इंडोनेशिया ने कई देशों के साथ सहयोग स्थापित किया है। स्थल की तलाश का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा:
इंडोनेशिया सरकार ने परमाणु बिजलीघरों के लिए कई देशों के साथ सहयोग किया है। फिलहाल अध्ययन किए जा रहे संभावित स्थलों में से एक रियाउ द्वीपसमूह में है।
इसलिए बाटम एक संभावित स्थल है, निर्माण के लिए तय स्थान नहीं। बाहलिल ने उत्तर मालुकु के हलमहेरा, कालीमंतन और सुमात्रा को भी अध्ययनाधीन क्षेत्र बताया। हलमहेरा प्रस्ताव के लिए रूस के साथ सहयोग का आकलन किया जा रहा है।
तत्काल काम इन क्षेत्रीय विकल्पों में से किसी एक को चुनकर स्थल तय करना, परियोजना की रूपरेखा बनाना और विकास प्रक्रिया को मंजूरी देना है। उप ऊर्जा मंत्री यूलियोट तंजुंग ने कहा कि सरकार को पहले स्थल तय करना होगा, उसके बाद ही वह सरकारी बिजली कंपनी पीएलएन से परियोजना ठेकेदार चुनने के लिए निविदा आयोजित करने को कह सकती है।
योजनाओं में 250, 500 और 200 मेगावाट के आंकड़े क्यों हैं
पीएलएन की 2025 से 2034 तक की विद्युत आपूर्ति व्यवसाय योजना, जिसे इंडोनेशियाई संक्षिप्त नाम आरयूपीटीएल से जाना जाता है, सुमात्रा को 250 मेगावाट और कालीमंतन को 250 मेगावाट परमाणु क्षमता आवंटित करती है। दोनों मिलाकर 500 मेगावाट, यानी 0.5 गीगावाट होते हैं।
बाहलिल ने पहले अपेक्षाकृत कम, 250 मेगावाट क्षमता से शुरुआत करने की मंशा बताई थी। निर्माण 2027 में शुरू हो सकता है और इसे 2032 तक पूरा करने का लक्ष्य है। यूलियोट ने शुरुआती 500 मेगावाट को बिजली ग्रिड से जोड़ने के लिए 2032 से 2034 तक की व्यापक अवधि बताई।
ये आंकड़े योजना प्रक्रिया के अलग-अलग स्तर दिखाते हैं: शुरुआती विकास के लिए 250 मेगावाट और पीएलएन की योजना में दो क्षेत्रीय आवंटनों के तहत कुल 500 मेगावाट। उत्तरी हलमहेरा के प्रस्तावित तैरते बिजलीघर की अलग रूपरेखा है: 200 मेगावाट, जो 100-100 मेगावाट की दो इकाइयों से मिलेगा। अधिकारियों ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि यह प्रस्ताव सुमात्रा और कालीमंतन के आवंटनों में कैसे शामिल होगा।
मेगावाट से पता चलता है कि कोई बिजलीघर किस दर से बिजली पैदा कर सकता है। साल भर में वास्तव में कितनी बिजली मिलेगी, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि संयंत्र कितनी बार चलता है और रखरखाव या ईंधन भरने के लिए कब बंद होता है। इसलिए घोषित क्षमता प्रस्तावित इकाइयों का आकार बताती है, जबकि वास्तविक उत्पादन चुनी गई रूपरेखा और संचालन व्यवस्था पर निर्भर करेगा।
28 संभावित स्थल, और भी स्थान विचाराधीन
यूलियोट ने 22 अक्टूबर को कहा था कि सरकार ने 28 संभावित स्थल तैयार किए हैं और तैरते परमाणु बिजलीघरों के विकल्पों समेत अन्य स्थानों पर विचार कर रही है। उन्होंने पहले से विचाराधीन क्षेत्रों में बांका द्वीप, पूर्वी कालीमंतन और पश्चिमी कालीमंतन का नाम लिया।
बाहलिल पहले कह चुके थे कि सुमात्रा और कालीमंतन में व्यवहार्यता जांच हो चुकी है और फिलहाल इन्हें प्राथमिकता दी गई है। 26 अक्टूबर को उनके बयान से बाटम और हलमहेरा पर भी लोगों का ध्यान गया, हालांकि फैसला आगे के अध्ययन पर निर्भर रहेगा।
अगला प्रक्रियागत कदम स्थल का चयन है। यूलियोट के बताए क्रम के अनुसार, इसके बाद पीएलएन परियोजना का काम करने वाली कंपनी चुनने के लिए निविदा आयोजित करेगा। संभावित क्षेत्रों के समुदायों के लिए, चयन के बाद प्रस्ताव किसी खास स्थानीय विकास प्रक्रिया की ओर बढ़ेगा, जिसमें परमिट और पर्यावरण संबंधी आवश्यकताएं शामिल हैं।
तैरते बिजलीघरों के विकल्प तलाश को एक नया आयाम देते हैं। सरकार केवल जमीन पर बने रिएक्टर पर विचार करने के बजाय तैरती इकाइयों पर स्थापित संयंत्रों की भी जांच कर रही है। इन प्रस्तावों के लिए भी एक तय स्थान और परमाणु सुरक्षा, संरक्षा तथा पर्यावरण संबंधी जरूरी मंजूरियां चाहिए।
हलमहेरा के लिए रूस और इंडोनेशियाई निवेशक का प्रस्ताव
राष्ट्रीय स्तर पर चल रही व्यापक स्थल तलाश की तुलना में उत्तरी हलमहेरा प्रस्ताव की व्यावसायिक रूपरेखा अधिक स्पष्ट है। रूस की सरकारी परमाणु कंपनी रोसाटॉम और इंडोनेशिया की पीटी पेम्बांगकित लिस्ट्रिक नुक्लिर ने 16 अक्टूबर, 2026 को मॉस्को में रूसी ऊर्जा सप्ताह के दौरान सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए।
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत 100-100 मेगावाट क्षमता वाली दो एफपीयू-100 तैरती बिजली इकाइयां दी जाएंगी। इनकी कुल 200 मेगावाट बिजली उत्तर मालुकु के उत्तरी हलमहेरा को आपूर्ति की जाएगी। पीटी पेम्बांगकित लिस्ट्रिक नुक्लिर सरकारी बिजली कंपनी पीएलएन से अलग कंपनी है।
इन तैरती इकाइयों में आरआईटीएम श्रृंखला के रिएक्टर लगाने की योजना है। इस श्रृंखला के रिएक्टर परमाणु ऊर्जा से चलने वाले रूसी आइसब्रेकरों पर इस्तेमाल किए जा चुके हैं। तैरता परमाणु संयंत्र ऐसी संरचना पर लगे रिएक्टर से बिजली पैदा करता है, जो पानी पर तैरती है। बिजली का इस्तेमाल तट पर रहने वाले उपभोक्ताओं के लिए होता है।
निवेशक रोमो नितियुदो वाच्यो, जिन्हें हाजी रॉबर्ट के नाम से भी जाना जाता है, पीटी पेम्बांगकित लिस्ट्रिक नुक्लिर के माध्यम से इस परियोजना को आगे बढ़ा रहे हैं। आगे बढ़ने से पहले परियोजना को व्यवहार्यता अध्ययन, परमिट, परमाणु सुरक्षा और संरक्षा मानकों का अनुपालन तथा पर्यावरण संरक्षण की जरूरत होगी।
बाहलिल ने कहा कि हलमहेरा के लिए रूस के साथ सहयोग पर अध्ययन किया जा रहा है। समझौते में प्रस्ताव के लिए कंपनियों और तकनीक का नाम दिया गया है, लेकिन निर्माण होगा या नहीं, यह सरकारी मंजूरी और विकास से जुड़ा बाकी काम तय करेगा।
उत्तरी हलमहेरा के स्थानीय नेताओं को बिजली और रोजगार की उम्मीद
उत्तरी हलमहेरा के रीजेंट पिएत हेन बाबुआ ने 26 अक्टूबर को प्रस्तावित निवेश का समर्थन किया। उनका कहना था कि परमाणु बिजली उत्पादन बड़े पैमाने पर स्थिर बिजली उपलब्ध करा सकता है और क्षेत्र की दीर्घकालीन ऊर्जा जरूरतें पूरी करने में मदद कर सकता है।
पिएत ने कम मात्रा में ईंधन से काफी बिजली पैदा करने की परमाणु ऊर्जा की क्षमता को रेखांकित किया। परमाणु संयंत्र में रिएक्टर के भीतर निकलने वाली ऊर्जा से गर्मी पैदा होती है, जिसका इस्तेमाल बिजली बनाने में किया जाता है। बिजली उत्पादन की इस प्रक्रिया में ईंधन जलाने से सीधे कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं होता।
स्थानीय विधायकों, गेरिंद्रा पार्टी के इकसान वान और नेशनल मैंडेट पार्टी के जुमार माफोलोई ने भी निवेश का समर्थन किया। जुमार ने उम्मीद जताई कि इससे और निवेश आएगा तथा स्थानीय लोगों, खासकर युवाओं के लिए रोजगार पैदा होगा।
इन उम्मीदों से पता चलता है कि यह प्रस्ताव स्थानीय स्तर पर क्यों आकर्षक है: अधिक बिजली से उद्योग और अन्य आर्थिक गतिविधियों को मदद मिल सकती है। प्रकाशित योजनाओं में परियोजना की लागत, बिजली की कीमत या स्थानीय रोजगार की संख्या नहीं बताई गई है। आकलन जारी रहने के बीच इन व्यावहारिक जानकारियों के बिना स्थानीय निवासी रह गए हैं।
स्थल चयन से बिजली आपूर्ति तक का सख्त समयबद्ध कार्यक्रम
यूलियोट के अनुमान के मुताबिक परमाणु बिजलीघर बनाने में सात से दस साल लगेंगे। उनका कहना है कि स्थल की तैयारी जल्दी शुरू होनी चाहिए, जिससे समयसीमा पर दबाव पड़ता है, खासकर तब जब अध्ययन और स्थल का फैसला अभी बाकी है।
अगर निर्माण 2027 में शुरू होकर 2032 में पूरा होता है, तो इसके लिए करीब पांच साल मिलेंगे। वहीं, 2027 में शुरू होने की स्थिति में यूलियोट का अनुमान 2034 से 2037 के बीच पूरा होने का संकेत देता है। समयसीमा चुनी गई परियोजना पर और इस पर निर्भर करेगी कि अधिकारी निर्माण की शुरुआत किसे मानते हैं और उससे पहले कितना काम पूरा होता है।
मुख्य तारीखें दिखाती हैं कि व्यावसायिक चर्चा, स्थल की तैयारी और राष्ट्रीय योजना एक साथ आगे बढ़ रही हैं:
- 26 मई, 2025: पीएलएन की 2025 से 2034 तक की बिजली आपूर्ति योजना मंजूर हुई, जिसमें परमाणु बिजली उत्पादन भी शामिल है।
- 15 अक्टूबर, 2026: बाहलिल ने बैंटन के तांगेरांग में ऊर्जा सुरक्षा संगोष्ठी में विदेशी परमाणु तकनीक के प्रस्तावों पर चर्चा की।
- 16 अक्टूबर, 2026: रोसाटॉम और पीटी पेम्बांगकित लिस्ट्रिक नुक्लिर ने मॉस्को में सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए।
- 22 अक्टूबर, 2026: यूलियोट ने कहा कि पीएलएन की परियोजना निविदा से पहले स्थल चयन होना चाहिए और 28 संभावित स्थलों का ब्योरा दिया।
- 26 अक्टूबर, 2026: बाहलिल ने अध्ययनाधीन बाटम और अन्य क्षेत्रों का नाम लिया।
- 2027: सरकार को इसी साल तक पहले स्थल का फैसला कर लेने की उम्मीद है; बाहलिल ने निर्माण शुरू होने की संभावित तारीख के रूप में भी 2027 का जिक्र किया है।
- 2032 से 2034: अधिकारियों ने पहली परमाणु क्षमता के चालू होने के लिए यह अवधि बताई है, जिसमें 2032 पहले का लक्ष्य है।
सुरक्षा नियम और विदेशी साझेदार अहम
इंडोनेशिया रूस, अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान समेत देशों के साथ परमाणु सहयोग पर चर्चा कर रहा है। 15 अक्टूबर की संगोष्ठी में बाहलिल ने जर्मनी और कनाडा को भी उन देशों में शामिल बताया, जिन्होंने परमाणु तकनीक में सहयोग की पेशकश की है।
बाहलिल ने कहा कि संभावित साझेदारों के पास जांची-परखी क्षमता और सिद्ध अनुभव होना चाहिए। उनके बताए दृष्टिकोण में स्थल और अंतरराष्ट्रीय साझेदार, दोनों के चयन के लिए तकनीकी और सुरक्षा मूल्यांकन अहम हैं।
इंडोनेशिया का परमाणु नियामक, बीएपीईटीईएन, कानूनी ढांचा तैयार करने में भी शामिल है। इसके सुरक्षा आकलन विभाग के उप प्रमुख हेंद्रा सुबेकती ने कहा कि सरकार सुरक्षा, तैयारी, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और कानून लागू करने से जुड़े प्रावधान शामिल करने के लिए परमाणु ऊर्जा पर 1997 के कानून नंबर 10 में संशोधन कर रही है।
इन क्षेत्रों में अलग-अलग जिम्मेदारियां आती हैं। सुरक्षा में संयंत्र का भरोसेमंद संचालन और दुर्घटनाओं से बचाव शामिल है। संरक्षा का मतलब जानबूझकर किए गए खतरों से बचाव है, जबकि तैयारी में आपात स्थिति से निपटने की क्षमता आती है। इंडोनेशिया को बिजलीघर बनाने के साथ-साथ ये व्यवस्थाएं भी तैयार करनी होंगी।
बड़े विस्तार में परमाणु ऊर्जा की शुरुआत छोटी हिस्सेदारी से
पीएलएन की योजना 2034 तक 69.5 गीगावाट अतिरिक्त क्षमता जोड़ने का लक्ष्य रखती है। योजना के अनुसार इसमें 42.6 गीगावाट नई और नवीकरणीय ऊर्जा से, 10.3 गीगावाट भंडारण से और 16.6 गीगावाट जीवाश्म ईंधन से आएंगे। जीवाश्म ईंधन वाले हिस्से में 10.3 गीगावाट गैस और 6.3 गीगावाट कोयले से होंगे।
नियोजित 0.5 गीगावाट परमाणु क्षमता 69.5 गीगावाट की कुल बढ़ोतरी का करीब 0.7 प्रतिशत है। इससे पता चलता है कि इंडोनेशिया के पहले बिजलीघर पर काफी ध्यान दिए जाने के बावजूद व्यापक बिजली विस्तार में शुरुआती परमाणु कार्यक्रम का हिस्सा कितना छोटा होगा।
भंडारण का काम बिजली उत्पादन से अलग है। इसमें पहले पैदा की गई ऊर्जा रखी जाती है और जरूरत पड़ने पर जारी की जाती है। नई उत्पादन क्षमता के साथ भंडारण को शामिल करना यह दिखाता है कि बिजली की उपलब्धता के समय का प्रबंधन भी जरूरी है, केवल यह नहीं कि कितनी उत्पादन क्षमता लगाई गई है।
परमाणु ऊर्जा का दीर्घकालीन लक्ष्य इससे कहीं बड़ा है। राष्ट्रीय ऊर्जा अनुमानों में 2060 तक 35 से 42 गीगावाट परमाणु क्षमता और इंडोनेशिया के प्राथमिक ऊर्जा मिश्रण में इसकी 12.1 प्रतिशत तक हिस्सेदारी की परिकल्पना है। प्राथमिक ऊर्जा में बिजली या इस्तेमाल के अन्य रूपों में बदलने से पहले की ऊर्जा शामिल होती है, इसलिए यह प्रतिशत केवल बिजली उत्पादन से अधिक व्यापक माप पर आधारित है।
35 से 42 गीगावाट तक पहुंचने के लिए पीएलएन की योजना में शुरुआती 0.5 गीगावाट से 70 से 84 गुना अधिक परमाणु क्षमता चाहिए होगी। इसलिए पहली परियोजनाएं एक बहुत लंबे विस्तार की शुरुआत होंगी, जिसके लिए आगे और स्थल, निवेश तथा निर्माण की जरूरत होगी।
घरेलू अनुसंधान भी कार्यक्रम का हिस्सा
राज्य सचिव प्रासेत्यो हादी ने कहा कि राष्ट्रीय अनुसंधान और नवाचार एजेंसी, बीआरआईएन, तथा अन्य सरकारी संस्थाएं परमाणु अनुसंधान को ऊर्जा और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों की ओर निर्देशित कर रही हैं। बीआरआईएन ने 6 अगस्त को राष्ट्रपति भवन में परमाणु अनुसंधान और नवाचारों को प्रस्तुत किया। इसमें परमाणु बिजलीघर को समर्थन देने के उद्देश्य से किया जा रहा काम भी शामिल था।
शोधकर्ताओं ने इंडोनेशिया में 89,000 टन तक यूरेनियम और 143,000 टन तक थोरियम के संभावित भंडार का भी जिक्र किया। ये सामग्री परमाणु ऊर्जा के लिए उपयोगी हैं, हालांकि जमीन के भीतर मौजूद संसाधन को रिएक्टर में इस्तेमाल होने वाले ईंधन में बदलने के लिए कई औद्योगिक चरणों की जरूरत होती है।
अनुसंधान प्रयास और विदेशी साझेदारों के साथ बातचीत, दोनों एक ही कार्यक्रम के अलग-अलग हिस्सों पर काम करते हैं। बीआरआईएन का काम घरेलू वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमता से जुड़ा है, जबकि मौजूदा बिजलीघर प्रस्तावों में स्थल चुनना, तकनीक हासिल करना, निर्माण की व्यवस्था करना और नियामकीय आवश्यकताएं पूरी करना शामिल है।
बाटम, हलमहेरा और अन्य संभावित क्षेत्रों के लिए अगला ठोस पड़ाव स्थल का फैसला है। इससे तय होगा कि किस जगह परियोजना का विस्तृत विकास आगे बढ़ेगा और प्रतिस्पर्धी समयसीमाओं व क्षमताओं में से कौन-सी इंडोनेशिया के पहले चालू परमाणु बिजलीघर का रूप लेगी।
मुख्य बातें
- इंडोनेशिया बाटम, हलमहेरा और सुमात्रा तथा कालीमंतन के स्थलों का आकलन कर रहा है। पहले स्थल का फैसला 2027 तक होने की उम्मीद है।
- पीएलएन की योजना सुमात्रा और कालीमंतन को 250-250 मेगावाट आवंटित करती है, यानी कुल 500 मेगावाट।
- अधिकारियों ने शुरुआती संचालन के लिए 2032 और 2032 से 2034 तक की व्यापक अवधि बताई है।
- रोसाटॉम और पीटी पेम्बांगकित लिस्ट्रिक नुक्लिर उत्तरी हलमहेरा के लिए कुल 200 मेगावाट क्षमता वाली दो तैरती इकाइयों का प्रस्ताव कर रहे हैं।
- हलमहेरा परियोजना के लिए आगे अध्ययन, परमिट और परमाणु सुरक्षा, संरक्षा तथा पर्यावरण संबंधी मंजूरियां जरूरी हैं।
- इंडोनेशिया अपने परमाणु ऊर्जा कानून में बदलाव की तैयारी कर रहा है और 2060 तक 35 से 42 गीगावाट परमाणु क्षमता का दीर्घकालीन लक्ष्य रखता है।






