राष्ट्रीय ऊर्जा परियोजना और स्थानीय आजीविका का संकट आमने-सामने
श्रीलंका ने मन्नार प्रायद्वीप में पवन ऊर्जा की नई परियोजनाओं पर रोक लगा दी है, जबकि पहले से मंजूर परियोजनाओं को आगे बढ़ने की अनुमति दी है। ऐसा तब हुआ है जब मछुआरा समुदाय घटती पकड़, घरों में घुसते बाढ़ के पानी और टरबाइन निर्माण से हुए नुकसान को लेकर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। विवाद तटीय विकास परियोजना को लेकर है, जिसके पहले 30 टरबाइनों से 2020 में बिजली की आपूर्ति शुरू हुई थी और अब 14 और टरबाइनों का निर्माण शुरू हो चुका है।
विषय-सूची
- राष्ट्रीय ऊर्जा परियोजना और स्थानीय आजीविका का संकट आमने-सामने
- CEB ने क्या बनाया और क्या वादा किया
- मछुआरे टरबाइनों को क्यों जिम्मेदार मानते हैं
- बाढ़ का पानी घरों, शौचालयों और कुओं तक पहुंचा
- पक्षियों की सुरक्षा भी विवाद का हिस्सा
- क्या रोका गया है और क्या जारी रह सकता है?
- विस्तार के पीछे कीमत का तर्क
- निवासियों ने अदालत में उठाई अपनी आपत्तियां
- मुख्य बातें
राज्य की बिजली कंपनी सीलोन इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड (CEB) के मुताबिक, मूल पवन फार्म में लगभग 141 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश किया गया है। परियोजना योजना में सालाना 380 मिलियन से अधिक यूनिट बिजली उत्पादन और हर साल 285,000 मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन से बचने का अनुमान लगाया गया था। हालांकि, टरबाइनों के पास रहने वाले लोगों की तात्कालिक चिंताएं आमदनी, पीने के पानी और इस बात को लेकर हैं कि बारिश का पानी उनके गांवों से निकल पाएगा या नहीं।
पेसालाई में स्थानीय मछुआरा सहकारी समिति के प्रमुख ए. स्टानिस्लास पेरिस का कहना है कि मछली पकड़ने से होने वाली रोजाना की कमाई, जो पहले 5,000 रुपये तक पहुंचती थी, अब मुश्किल से 1,000 रुपये से अधिक होती है। इन आंकड़ों से पता चलता है कि पहले एक दिन में होने वाली कमाई जुटाने में अब करीब पांच दिन लग सकते हैं।
यह टकराव ऐसे समय सामने आया है जब मध्य पूर्व में युद्ध के कारण ईंधन और बिजली की लागत बढ़ रही है और श्रीलंका पर घरेलू नवीकरणीय ऊर्जा विकसित करने का दबाव बढ़ रहा है। सरकार 2030 तक बिजली का 70 प्रतिशत नवीकरणीय स्रोतों से हासिल करना चाहती है। मन्नार के निवासी सवाल उठा रहे हैं कि यह बुनियादी ढांचा कहां बनाया जा रहा है और इसके प्रभावों का प्रबंधन कैसे किया जा रहा है।
स्थानीय नागरिक समाज समूह OPEnE की प्रमुख हस्तियों में शामिल लेस्ली जेसुराजन ने कहा कि समुदाय की आपत्ति नवीकरणीय ऊर्जा के सिद्धांत को लेकर नहीं, बल्कि परियोजना के स्थान को लेकर है।
सिद्धांत रूप में हम नवीकरणीय ऊर्जा के विरोधी नहीं हैं। लेकिन यहां नहीं। पवन टरबाइन लगाने के लिए और भी बहुत सी जगहें हैं।
CEB ने क्या बनाया और क्या वादा किया
CEB के मन्नार परियोजना के विवरण के मुताबिक, यहां 3.45 मेगावाट क्षमता वाली 30 टरबाइन हैं, जिनकी कुल स्थापित क्षमता 103.5 मेगावाट है। ये टरबाइन मन्नार द्वीप के दक्षिणी तट पर स्थित हैं, जहां बिजली कंपनी ने मानसून के दौरान चलने वाली तेज मौसमी हवाओं का लाभ उठाने की योजना बनाई थी।
मेगावाट से पता चलता है कि कोई बिजली संयंत्र एक समय में कितनी बिजली पैदा कर सकता है। वार्षिक उत्पादन से पता चलता है कि वह समय के साथ कितनी बिजली की आपूर्ति करता है। CEB ने सालाना 380 मिलियन से अधिक यूनिट बिजली उत्पादन का अनुमान लगाया था। यहां एक यूनिट का मतलब एक किलोवाट-घंटा है, जो घरेलू बिजली खपत मापने की मानक इकाई है।
बिजली कंपनी ने इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण का ठेका वेस्टास एशिया पैसिफिक AS को दिया था। मन्नार और अनुराधापुर में पवन फार्म तथा उससे जुड़ी सुविधाओं के लिए एशियाई विकास बैंक के ऋण के जरिए धन जुटाया गया। डेनमार्क की कंपनी COWI AS ने परामर्श सेवाएं दीं।
CEB ने प्रति यूनिट बिजली उत्पादन की लागत पांच अमेरिकी सेंट से कम रहने का अनुमान लगाया था। उसकी योजना में बिजली को राष्ट्रीय ग्रिड में भेजने के प्रबंधन में मदद के लिए पवन पूर्वानुमान प्रणाली भी शामिल थी। साथ ही, पक्षियों का पता लगाने के लिए रडार प्रणाली का प्रावधान था, ताकि जरूरत पड़ने पर चुनिंदा टरबाइनों को रोका जा सके।
परियोजना के विवरण के अनुसार, निर्माण मार्च 2019 में शुरू हुआ और नवंबर 2020 तक पूरा होना तय था। इसमें नई पहुंच सड़कें बनाने और मौजूदा सड़कों के पुनर्वास का भी स्पष्ट उल्लेख है। ये बुनियादी ढांचे अब जल निकासी को लेकर निवासियों की शिकायतों में प्रमुखता से सामने आते हैं।
मछुआरे टरबाइनों को क्यों जिम्मेदार मानते हैं
65 वर्षीय वेंकटासामी कालिमुथु बचपन से मन्नार में मछली पकड़ते आए हैं। हाल ही में ट्रैक्टर की चरखी और 20 लोगों की मदद से किनारे लाई गई मछलियों में कुछ अच्छी मछलियां, छोटी मछलियां और समुद्री शैवाल के गुच्छे थे। उनका कहना है कि टरबाइन लगने से पहले पकड़ इससे कहीं ज्यादा होती थी।
कालिमुथु का मानना है कि घूमते पंखों की परछाईं मछलियों को उथले पानी में आने से रोकती है। उन्होंने अपनी बात इस तरह समझाई:
जब पंखे घूमते हैं, तो उनकी परछाईं पानी पर पड़ती है। इसलिए मछलियां उथले पानी की ओर नहीं आतीं।
मछुआरे भारतीय ट्रॉलर से होने वाली प्रतिस्पर्धा का भी जिक्र करते हैं। उत्तरी मत्स्य सहकारी समितियों के महासंघ के सचिव एन.एम. आलम का कहना है कि पकड़ घटने के कई कारण हो सकते हैं। उन्होंने सरकार की ओर से जांच न किए जाने पर भी सवाल उठाया है।
आलम ने गिरावट को लेकर बनी अनिश्चितता का वर्णन किया:
यह टरबाइनों या कई अन्य कारणों से हो सकता है, लेकिन हम इसे साबित नहीं कर सकते। सरकार भी इसकी जांच नहीं कर रही है।
बाढ़ का पानी घरों, शौचालयों और कुओं तक पहुंचा
ग्रामीण महिला विकास सोसायटी की अध्यक्ष बेनेडिक्ट मैरी विजिलिया तट से करीब 100 मीटर दूर एक गांव में रहती हैं, जो पवन टरबाइनों से घिरा है। उनका कहना है कि पहुंच सड़कों से जुड़े कंक्रीट के आधार और खाइयों ने बारिश के पानी का समुद्र की ओर बहना रोक दिया है।
विजिलिया ने घरों के भीतर पानी बढ़ने की बात कही है और ऐसी तस्वीरें साझा की हैं जिनमें उनका घर करीब एक मीटर पानी में डूबा दिखता है। उनके बयान के मुताबिक, बाढ़ से घरों, पशुधन, फसलों और पीने के पानी के लिए इस्तेमाल होने वाले कुओं को नुकसान पहुंचा है।
उन्होंने बारिश के मौसम के हालात का वर्णन किया:
मानसून की बारिश में पानी हमारी कमर तक आ जाता है और शौचालयों से पानी बाहर बहने लगता है।
मन्नार नागरिक समिति की सदस्य और मन्नार बर्ड्स क्लब की उप सचिव रेबेका मिरांडा का कहना है कि पिछले तीन वर्षों में कुछ समुदायों को चार से पांच महीने तक बाढ़ का सामना करना पड़ा। उन्होंने कुछ गांवों में डेंगू के 189 मामले और दो मौतें होने की जानकारी दी। इसके अलावा, लोगों को बार-बार सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा, फसलें बर्बाद हुईं और बच्चों की पढ़ाई बाधित हुई।
मिरांडा ने कुओं के पानी के स्तर में बदलाव का भी जिक्र किया। उनका कहना है कि पहले मौसम के हिसाब से पानी जमीन से 10 से 20 फीट नीचे होता था, लेकिन अब साल भर यह सात से आठ फीट की गहराई पर मिलता है। उनके बयान से पता चलता है कि अगली बारिश होने से पहले ही पानी सतह के करीब बना रहता है।
मन्नार के कैथोलिक धर्मप्रांत की सामाजिक शाखा कैरिटास वल्वुथायम के निदेशक फादर जी.ए. अरुलराज क्रूस ने मछुआरों के समर्थन में अंतरराष्ट्रीय सामूहिक संगठन ICSF की ओर से प्रकाशित एक विवरण में दांव पर लगी चीजों का जिक्र किया।
यह सिर्फ पर्यावरण की चिंता नहीं, बल्कि जीवित रहने का सवाल है।
उस विवरण में अरिप्पु के लोगों की शिकायतें भी दर्ज हैं। उनका कहना है कि टरबाइन के लिए जमीन अधिग्रहण के बाद जलमार्गों में बदलाव आया, तटीय कटाव बढ़ा और जल निकासी बाधित हुई। जिले भर के निवासी शोर और जमीन पर बढ़ते दबाव को लेकर भी चिंता जता रहे हैं।
पक्षियों की सुरक्षा भी विवाद का हिस्सा
मन्नार जिले में श्रीलंका की मुख्यभूमि का उत्तर-पश्चिमी हिस्सा और उससे एक सेतु मार्ग से जुड़ा द्वीप शामिल है। द्वीप पर स्थित तलाईमन्नार श्रीलंका का भारत के सबसे करीब का बिंदु है। आसपास के समुद्रों पर मछुआरा समुदाय निर्भर हैं, जबकि इस इलाके में वंकलाई पक्षी अभयारण्य और प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवास भी हैं।
मिरांडा के मुताबिक, अनुमान है कि हर साल करीब 15 मिलियन प्रवासी पक्षी मन्नार से होकर गुजरते हैं और उनमें से लगभग एक मिलियन यहीं रहते हैं। उनका यह भी कहना है कि श्रीलंका आने वाली प्रवासी पक्षियों की 250 प्रजातियों में से 150 मन्नार का इस्तेमाल करती हैं। यही आंकड़े बताते हैं कि निवासियों के अभियान में पक्षियों की सुरक्षा केंद्रीय मुद्दा क्यों बन गई है।
CEB का कहना है कि पक्षियों का पता लगाने वाला उसका रडार टकराव से बचने के लिए चुनिंदा टरबाइनों को बंद करने के उद्देश्य से लगाया गया है। मिरांडा इस सुरक्षा उपाय की वास्तविक प्रभावशीलता पर सवाल उठाती हैं और रखरखाव तथा कर्मचारियों की कमी का हवाला देती हैं। उन्होंने दिन के उजाले में जुलाई और अगस्त के दौरान किए गए पर्यावरण सर्वेक्षण की भी आलोचना की। उनका कहना है कि इसमें प्रवास का चरम समय और रात में आने वाले पक्षी छूट गए।
प्रदर्शनकारियों ने मैंग्रोव, मछलियों के प्रजनन क्षेत्रों और संकटग्रस्त समुद्री प्रजातियों के साथ-साथ पक्षियों के उड़ान मार्गों को लेकर भी चिंता जताई है। युवा समूहों ने परियोजना के परमिट रद्द करने और मन्नार द्वीप को पारिस्थितिक क्षेत्र के रूप में संरक्षण देने की मांग की है।
क्या रोका गया है और क्या जारी रह सकता है?
सरकार की मौजूदा नीति के तहत पहले से मंजूर परियोजनाओं को आगे बढ़ने की अनुमति है, जबकि मन्नार में नई परियोजनाओं पर रोक है। इससे विवाद का एक अहम बिंदु सामने आता है: निर्माण बंद कराने की मांग कर रहे निवासियों के बावजूद मौजूदा मंजूरियों के तहत विस्तार जारी है।
इस विकास से जुड़े फैसले एक ही परियोजना रद्द करने तक सीमित नहीं रहे हैं। मुख्य पड़ाव ये हैं:
- मार्च 2019: CEB के मूल मन्नार पवन फार्म का निर्माण शुरू हुआ।
- 2020: पहले 30 टरबाइन राष्ट्रीय बिजली ग्रिड से जुड़े।
- 2025: बिजली की कीमत को लेकर विवाद के बाद सरकार ने भारत के अडानी समूह को 52 और टरबाइन लगाने का दिया गया ठेका रद्द कर दिया।
- 13 अगस्त: कोलंबो में हुई बैठक के बाद अधिकारियों द्वारा समुदाय की चिंताओं की जांच के लिए निर्माण एक महीने रोकने की घोषणा की गई।
- मौजूदा स्थिति: मन्नार की नई परियोजनाओं पर रोक है, जबकि सरकार का कहना है कि पहले से मंजूर परियोजनाएं आगे बढ़ सकती हैं। 14 अतिरिक्त टरबाइनों का निर्माण शुरू हो चुका है।
13 अगस्त की बैठक के बाद जिस विस्तार पर चर्चा हुई, उसे 50 मेगावाट के दूसरे चरण के रूप में बताया गया। राष्ट्रपति अनुर कुमार दिसानायके के साथ हुई चर्चा के एक विवरण में 20 मेगावाट के उस संयंत्र पर अस्थायी रोक का भी जिक्र था, जिसका निर्माण पहले ही शुरू हो चुका था, और 50 मेगावाट के प्रस्तावित संयंत्र का भी। इन विवरणों से अलग-अलग मंजूरियों की सटीक सीमाएं स्पष्ट नहीं होतीं।
ऊर्जा मंत्री अनुर करुणातिलक का कहना है कि बाढ़ कम करने के उपायों की पहचान के लिए व्यवहार्यता अध्ययन किए जा रहे हैं। ऐसे अध्ययनों में देखा जाता है कि प्रस्तावित इंजीनियरिंग कार्य व्यावहारिक हैं या नहीं और उनसे समस्या का समाधान होने की संभावना है या नहीं।
करुणातिलक ने अपेक्षित नतीजे का वर्णन किया:
हम व्यवहार्यता अध्ययन कर रहे हैं। इसे लागू करने के बाद...वे जिस बाढ़ का अभी सामना कर रहे हैं, उसे कम किया जा सकेगा।
राष्ट्रपति के साथ पहले हुई चर्चा में ऊर्जा मंत्री कुमार जयकोडी ने कहा था कि भूमि पुनर्ग्रहण विभाग से बाढ़ के जोखिम पर रिपोर्ट मांगी गई है। दिसानायके ने यह भी कहा था कि परियोजनाओं के लिए केंद्रीय पर्यावरण प्राधिकरण की मंजूरी जरूरी होगी।
विस्तार के पीछे कीमत का तर्क
श्रीलंका सरकार मन्नार की हवाओं को ऐसी बिजली बनाने का तरीका मानती है जिसके लिए हर उत्पादित यूनिट के साथ ईंधन खरीदने की जरूरत नहीं होगी। CEB के मूल अनुमानों में प्रति यूनिट पांच अमेरिकी सेंट से कम उत्पादन लागत और जीवाश्म ईंधन से बनने वाली बिजली में बड़ी कमी, दोनों शामिल थे।
विस्तार पर चर्चा के दौरान मन्नार परियोजना से बिजली की लागत 0.0465 अमेरिकी डॉलर प्रति यूनिट बताई गई, जबकि अडानी समूह से बिजली की लागत 0.0826 अमेरिकी डॉलर प्रति यूनिट बताई गई। इन आंकड़ों के हिसाब से कम कीमत, अडानी की कीमत से करीब 44 प्रतिशत कम है। प्रति किलोवाट-घंटे की कीमत मायने रखती है, क्योंकि ग्रिड के लिए खरीदी जाने वाली लाखों यूनिटों में छोटे-छोटे अंतर भी जुड़कर बड़ा खर्च बन जाते हैं।
निवासियों के लिए इसी विकास की दूसरी तरह की कीमत है: मछली पकड़ने से होने वाली आय का नुकसान, फसलों को क्षति, बार-बार विस्थापन और पीने का पानी जुटाने में कठिनाई। पेरिस की रोजाना की कमाई में गिरावट, 5,000 रुपये तक से घटकर मुश्किल से 1,000 रुपये से अधिक रह जाना, दिखाता है कि बिजली की बचत का तर्क स्थानीय स्तर पर विवाद क्यों नहीं सुलझा पाया है।
स्थानीय अभियानकर्ता पवन ऊर्जा से इतर दबावों का भी जिक्र करते हैं। मन्नार नागरिक समिति के सदस्यों ने जलीय कृषि फार्म, रेत खनन और राज्य के कृषि विकास को इलाके को प्रभावित करने वाली अन्य गतिविधियों के रूप में बताया है। इसलिए उनकी मांगों में अलग-अलग टरबाइनों पर फैसलों के साथ-साथ पूरे मन्नार में जमीन और जलमार्गों के प्रबंधन पर ध्यान देना भी शामिल है।
निवासियों ने अदालत में उठाई अपनी आपत्तियां
कैथोलिक पादरी और मन्नार नागरिक समिति के प्रमुख फादर एस. मार्कस ने निवासियों को श्रीलंका की अदालतों में दो शिकायतें दायर करने में मदद की है। उनके खिलाफ अलग से एक शिकायत दर्ज की गई है।
मार्कस का कहना है कि नुकसान कम करने के पहले के वादों से वे बदलाव नहीं आए जिनकी निवासियों को उम्मीद थी। अदालत में दाखिल शिकायतों से पहले वंकलाई और तलाईमन्नार में मछुआरा समुदायों, युवाओं और चर्च के नेताओं ने प्रदर्शन किए थे।
सरकार ने अध्ययन और नए विकास पर रोक की घोषणा की है, लेकिन जल निकासी के समाधान की समयसीमा या अगली अदालत सुनवाई की तारीख तय नहीं की गई है। निवासी घरों और आजीविका की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं, जबकि ऊर्जा की मंजूर परियोजनाओं को आगे बढ़ने की अनुमति बनी हुई है।
मुख्य बातें
- श्रीलंका ने मन्नार में पवन ऊर्जा की नई परियोजनाओं पर रोक लगाई है, जबकि पहले से मंजूर परियोजनाओं को आगे बढ़ने की अनुमति दी है।
- CEB के मूल पवन फार्म में 30 टरबाइन हैं, इसकी क्षमता 103.5 मेगावाट है और इसमें लगभग 141 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश हुआ है।
- मछुआरा नेताओं ने आय में भारी गिरावट की जानकारी दी है, जबकि निवासियों ने लंबे समय तक बाढ़, फसलों को नुकसान और दूषित कुओं की बात कही है।
- CEB ने सुरक्षा उपायों में पक्षियों का पता लगाने वाले रडार को शामिल किया है; स्थानीय अभियानकर्ता इसके संचालन और पर्यावरण निगरानी पर सवाल उठाते हैं।
- सरकार बाढ़ के समाधान का अध्ययन कर रही है और निवासियों ने अदालत में दो शिकायतें दायर की हैं।
- श्रीलंका का लक्ष्य 2030 तक अपनी 70 प्रतिशत बिजली नवीकरणीय स्रोतों से हासिल करना है।






