एक प्रायोगिक उपचार ट्यूमर के आसपास के तरल को निशाना बनाता है
सिंगापुर के वैज्ञानिकों ने 21 प्राथमिक कैंसर प्रकारों के 397 नमूनों का विश्लेषण करने के बाद E8 नाम का एक प्रायोगिक नैनोबॉडी विकसित किया है। उन्होंने दो ऐसे प्रोटीन की पहचान की जो पेट की अंदरूनी परत में कैंसर को बढ़ने में मदद करते हैं। 10 मरीजों के ऊतक पर किए गए परीक्षणों में ट्यूमर कोशिकाओं का करीब 70% खत्म हो गया। इससे उन मरीजों के लिए उपचार विकसित करने की शुरुआती उम्मीद जगी है जिनके पास विकल्प बहुत कम हैं।
विषय-सूची
- एक प्रायोगिक उपचार ट्यूमर के आसपास के तरल को निशाना बनाता है
- पेट के तरल को उपचार का लक्ष्य क्यों बनाया गया
- 397 नमूनों में दो प्रोटीन उभरे
- शुरुआती परीक्षणों में E8 का प्रदर्शन
- कई मरीज गहन उपचार नहीं करा सकते
- एक मरीज का अनुभव बताता है कि और विकल्पों की जरूरत क्यों है
- 2016 में शुरू शोध से मनुष्यों पर परीक्षण की योजना तक
- यह खोज मरीजों के लिए क्या बदल सकती है
- मुख्य बिंदु
यह शोध पेरिटोनियल मेटास्टेसिस पर केंद्रित है। इसमें कैंसर पेट, कोलन या अंडाशय जैसे किसी अंग से फैलकर पेरिटोनियम तक पहुंचता है। पेरिटोनियम पेट की गुहा को ढकने वाली झिल्ली है। शोध दल के अनुसार, इस उन्नत अवस्था के मरीजों की औसत जीवन प्रत्याशा नौ महीने से कम होती है।
E8 अभी विकास के चरण में है। दल को उम्मीद है कि पांच साल के भीतर इसका परीक्षण लोगों पर शुरू किया जा सकेगा। मनुष्यों में इसकी सुरक्षा, प्रभावशीलता और जीवनकाल पर संभावित लाभ का आकलन होना अभी बाकी है।
इस सहयोग का नेतृत्व नेशनल कैंसर सेंटर सिंगापुर ने किया। इसमें एजेंसी फॉर साइंस, टेक्नोलॉजी एंड रिसर्च का इंस्टीट्यूट ऑफ मॉलिक्यूलर एंड सेल बायोलॉजी, सिंगापुर जनरल हॉस्पिटल और नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर का योंग लू लिन स्कूल ऑफ मेडिसिन शामिल थे। निष्कर्ष सितंबर में मॉलिक्यूलर कैंसर पत्रिका में प्रकाशित हुए।
पेट के तरल को उपचार का लक्ष्य क्यों बनाया गया
जलोदर यानी पेट में असामान्य रूप से तरल जमा होना, पेरिटोनियम तक फैले कैंसर की एक आम विशेषता है। तरल बढ़ने से दर्द हो सकता है। इसमें ऐसे पदार्थ भी होते हैं जो कैंसर कोशिकाओं को जीवित रहने और बढ़ने में मदद करते हैं। इसलिए यह महज परेशान करने वाला लक्षण नहीं, बल्कि बीमारी की प्रक्रिया का हिस्सा है।
सिंगापुर के शोधकर्ताओं ने 2016 में पेट की झिल्ली तक कैंसर के फैलाव की जांच शुरू की। उनके शोध का ध्यान ट्यूमर के आसपास के माहौल पर गया, जिसमें उसे घेरने वाला तरल भी शामिल है।
शोध के वरिष्ठ लेखक और सिंगापुर जनरल हॉस्पिटल तथा नेशनल कैंसर सेंटर सिंगापुर में सारकोमा, पेरिटोनियल और दुर्लभ ट्यूमर विभाग के प्रमुख जॉनी ओंग ने इस तरीके को समझाते हुए कहा:
"इसके बाद यह अवधारणा प्रमाणित हुई कि ट्यूमर को बढ़ने या फैलने से रोकने के लिए हम ट्यूमर कोशिकाओं के बजाय तरल को निशाना बना सकते हैं। हमारा प्रस्ताव था कि तरल में 'एजेंट' मिलाए जाएं, ताकि कैंसर कोशिकाओं की बढ़ने की क्षमता खत्म हो," उन्होंने कहा।
इसका व्यावहारिक विचार कैंसर को आसपास के माहौल से मिलने वाले सहारे को बाधित करना है। ट्यूमर को बढ़ते रहने के लिए सिर्फ घातक कोशिकाएं काफी नहीं होतीं। पास के तरल में मौजूद पदार्थ उसे बनाए रखने में मदद कर सकते हैं, जिससे शोधकर्ताओं को हस्तक्षेप का एक और रास्ता मिलता है।
397 नमूनों में दो प्रोटीन उभरे
दल ने अपने आंकड़ों में प्रोटीन और जैविक प्रक्रियाओं की जांच के लिए आणविक प्रोफाइलिंग का इस्तेमाल किया। आणविक प्रोफाइलिंग में किसी नमूने के जैविक घटकों को मापा जाता है, ताकि पता चले कि कौन-सी प्रक्रियाएं सक्रिय हैं और किन्हें दवा से निशाना बनाया जा सकता है।
जलोदर में PAI-1 और S100A10 ट्यूमर के विकास को बढ़ाने वाले दो प्रमुख कारक के रूप में सामने आए। प्रोटीन कोशिकाओं के भीतर और आसपास कई तरह के काम करते हैं। इस शोध में कैंसर की वृद्धि में सहायक प्रोटीनों की पहचान से वैज्ञानिकों को जांच के लिए विशिष्ट लक्ष्य मिले।
इसके बाद शोधकर्ताओं ने प्रायोगिक नैनोबॉडी के लिए इन दोनों में से एक प्रोटीन को लक्ष्य चुना। E8 को कैंसर को सहारा देने वाले एक खास प्रोटीन को रोकने के लिए बनाया गया है। पारंपरिक कीमोथेरेपी की तरह यह तेजी से विभाजित होती कोशिकाओं पर व्यापक हमला नहीं करता।
आंकड़ों में 21 प्राथमिक कैंसर प्रकारों का शामिल होना पेरिटोनियल मेटास्टेसिस की एक अहम विशेषता भी दिखाता है: अलग-अलग अंगों में शुरू हुए कैंसर अंततः पेट की एक ही जगह में फैल सकते हैं। इस साझा माहौल का अध्ययन कर दल अलग-अलग मूल वाले कैंसरों में वृद्धि के समान तरीके तलाश सका।
शुरुआती परीक्षणों में E8 का प्रदर्शन
नैनोबॉडी किसी खास लक्ष्य को पहचानने के लिए तैयार किया गया छोटा एंटीबॉडी अंश होता है। एंटीबॉडी खास अणुओं से जुड़कर काम करते हैं; शोधकर्ता इस क्षमता का उपयोग किसी प्रोटीन की गतिविधि में बाधा डालने के लिए कर सकते हैं। E8 इस तरीके से पेट के तरल में ट्यूमर की वृद्धि से जुड़े प्रोटीन को निशाना बनाता है।
वैज्ञानिकों ने तीन प्रणालियों में उपचार का परीक्षण किया: प्रयोगशाला में उगाई गई कैंसर कोशिकाएं, पशु मॉडल और हायल्यूरोनिक एसिड से बने हाइड्रोजेल में संरक्षित उन्नत पेट के कैंसर के नमूने। हाइड्रोजेल जेली जैसी संरचना वाला ऐसा पदार्थ है जो पानी को थामे रखता है और प्रयोगों के दौरान ऊतक को सहारा दे सकता है।
मानव ऊतक के परीक्षणों में 10 मरीजों के नमूने इस्तेमाल किए गए और ट्यूमर कोशिकाओं का करीब 70% खत्म पाया गया। यह नतीजा प्रायोगिक नमूनों की कोशिकाओं से जुड़ा है। मरीजों पर परीक्षण उपचार के प्रति लोगों की प्रतिक्रिया मापने का अगला जरूरी चरण है।
ओंग ने तीनों प्रायोगिक प्रणालियों के नतीजों का वर्णन करते हुए कहा:
"तीनों में इस उपचार ने बहुत कम विषाक्तता के साथ ट्यूमर की वृद्धि को प्रभावी ढंग से रोका," उन्होंने कहा।
दल को उम्मीद है कि किसी खास प्रोटीन को निशाना बनाने वाले उपचार के दुष्प्रभाव पारंपरिक कीमोथेरेपी से कम होंगे। विषाक्तता के शुरुआती नतीजे आगे विकास का समर्थन करते हैं, जबकि क्लिनिकल परीक्षण लोगों पर इसके प्रभावों का आकलन करेंगे। मरीजों के लिए उम्मीद है कि कम उपचार बोझ के साथ कैंसर को नियंत्रित करने का एक और तरीका मिलेगा।
कई मरीज गहन उपचार नहीं करा सकते
ओंग ने हाइपरथर्मिक इंट्रापेरिटोनियल कीमोथेरेपी, जिसे आमतौर पर HIPEC कहा जाता है, को इस स्थिति का मौजूदा सबसे अच्छा उपचार बताया। इसमें दिखाई देने वाले ट्यूमर हटाने के लिए ऑपरेशन किया जाता है और बची हुई कैंसर कोशिकाओं पर हमला करने के लिए पेट की गुहा में गर्म कीमोथेरेपी दी जाती है।
उन्होंने कहा कि आमतौर पर 10 में से नौ मरीज इस उपचार के लिए उपयुक्त नहीं होते। दूसरे शब्दों में, आम तौर पर करीब 10 में से एक मरीज ही इसके योग्य होता है, जिससे बड़ी संख्या में मरीजों को दूसरे विकल्पों की जरूरत रहती है।
E8 को इसी उपचार-अंतर को भरने के लिए विकसित किया जा रहा है। उद्देश्य सीमित विकल्पों वाले मरीजों को लक्षित उपचार देना है, जिससे बार-बार कीमोथेरेपी पर उनकी निर्भरता संभावित रूप से कम हो सके। मौजूदा उपचारों के साथ इसका इस्तेमाल कैसे होगा, यह क्लिनिकल विकास के नतीजों पर निर्भर करेगा।
बीमारी का फैलाव इस उपचार-अंतर को बड़ा बनाता है। ओंग के अनुसार, दुनियाभर में हर साल पेरिटोनियल कैंसर के 12 लाख से अधिक मामलों का निदान होता है। बीमारी के किसी चरण में करीब 70% अंडाशय के कैंसर, 40% पेट के कैंसर और 30% कोलोरेक्टल कैंसर पेरिटोनियम तक फैल जाते हैं।
एक मरीज का अनुभव बताता है कि और विकल्पों की जरूरत क्यों है
सेवानिवृत्त अकाउंटेंट 76 वर्षीय येओ सेर कियांग को 2017 में तीसरे चरण का अंडाशय कैंसर होने का पता चला। उनके गर्भाशय और अंडाशय निकालने के लिए ऑपरेशन किया गया, जिसके बाद 10 महीने तक कीमोथेरेपी चली।
बाद में कैंसर लौट आया और पेरिटोनियम तक फैल गया। इसके बाद उन्हें कई ऑपरेशन और कीमोथेरेपी के और दौर से गुजरना पड़ा। उनका अनुभव दिखाता है कि बीमारी लौटने पर उपचार बार-बार जीवन का हिस्सा बन सकता है।
येओ ने शोध के दूसरे चरण के लिए जलोदर का नमूना दान किया। उनका योगदान प्रयोगशाला के काम को सीधे उस तरल से जोड़ता है जिसे शोधकर्ता समझने और निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
मरीजों के दान से वैज्ञानिकों को बीमारी से सीधे मिले नमूनों का अध्ययन करने का मौका मिलता है। इस परियोजना में जलोदर से पेट के ट्यूमर के आसपास के माहौल को समझने में मदद मिली, जबकि संरक्षित कैंसर ऊतक ने प्रायोगिक उपचार की जांच के लिए एक और परिस्थिति उपलब्ध कराई।
2016 में शुरू शोध से मनुष्यों पर परीक्षण की योजना तक
दल अब क्लिनिकल ग्रेड विकास पर काम कर रहा है और उपचार को मानव शोध में संभावित इस्तेमाल के लिए तैयार कर रहा है। यह चरण प्रयोगशाला के प्रायोगिक काम को क्लिनिकल परीक्षण के योग्य उत्पाद से जोड़ता है।
ओंग ने कहा कि शोधकर्ताओं को पांच साल के भीतर लोगों पर पहला परीक्षण शुरू होने की उम्मीद है। उन्होंने सीमित विकल्पों वाले मरीजों के लिए उपचार विकसित करने की कोशिश में इस नैनोबॉडी को सबसे आगे का उम्मीदवार बताया।
मुख्य पड़ाव इस प्रकार हैं:
- 2016: दल ने पेट की झिल्ली तक कैंसर के फैलने की जांच शुरू की।
- 2017: येओ को तीसरे चरण का अंडाशय कैंसर होने का पता चला; बाद में उन्होंने शोध के लिए जलोदर दान किया।
- सितंबर: निष्कर्ष मॉलिक्यूलर कैंसर में प्रकाशित हुए।
- अगला चरण: क्लिनिकल ग्रेड विकास, जिसका लक्ष्य पांच साल के भीतर लोगों पर पहला परीक्षण शुरू करना है।
इस परीक्षण का उद्देश्य मरीजों में सुरक्षा और प्रभावशीलता की जांच करना है। इसी चरण से पता चलेगा कि प्रयोगशाला के उत्साहजनक नतीजे पेरिटोनियल मेटास्टेसिस से जूझ रहे लोगों के लिए उपयोगी उपचार बन सकते हैं या नहीं।
यह खोज मरीजों के लिए क्या बदल सकती है
NUS मेडिसिन के सर्जरी विभाग के प्रोफेसर जिमी सो ने इस खोज को उत्साहजनक बताया, क्योंकि इससे पेट के कैंसर की एक आम और अक्सर जानलेवा जटिलता का उपचार मिल सकता है।
सो ने मरीजों के लिए इस लक्ष्य को व्यक्त करते हुए कहा:
हमें उम्मीद है कि यह शोध अंततः उपचार के बेहतर विकल्प और इस कठिन स्थिति का सामना कर रहे मरीजों के लिए नई उम्मीद लेकर आएगा।
यह शोध समस्या के दो पहलुओं को जोड़ता है: पेट के तरल में ट्यूमर की वृद्धि में मदद करने वाले कारकों की पहचान और उस प्रक्रिया को रोकने के लिए बनाई गई दवा का विकास। 397 नमूनों से लक्ष्यों की पहचान में मदद मिली; तीन प्रायोगिक प्रणालियों ने दल को प्रस्तावित उपचार जांचने के तरीके दिए।
बार-बार सर्जरी या कीमोथेरेपी का सामना कर रहे मरीजों के लिए लक्ष्य स्पष्ट है: ऐसा एक और उपचार विकल्प जो कम हानिकारक प्रभावों के साथ ट्यूमर की वृद्धि नियंत्रित करे। E8 ने शुरुआती प्रायोगिक पड़ाव हासिल किया है और मनुष्यों पर नियोजित परीक्षण इस लक्ष्य की दिशा में अगला कदम है।
मुख्य बिंदु
- सिंगापुर के शोधकर्ताओं ने E8 नाम का प्रायोगिक नैनोबॉडी विकसित किया है, जो पेट के तरल में कैंसर की वृद्धि को सहारा देने वाले प्रोटीन को निशाना बनाता है।
- 21 प्राथमिक कैंसर प्रकारों के 397 नमूनों के विश्लेषण में PAI-1 और S100A10 वृद्धि के प्रमुख कारक के रूप में सामने आए।
- 10 मरीजों के ऊतक पर किए गए परीक्षणों में ट्यूमर कोशिकाओं का करीब 70% खत्म पाया गया।
- दल के अनुसार, प्रयोगशाला की कोशिकाओं, पशु मॉडल और संरक्षित मानव ऊतक में उपचार ने बहुत कम विषाक्तता के साथ ट्यूमर की वृद्धि रोकी।
- जॉनी ओंग के अनुसार, आमतौर पर 10 में से नौ मरीज पेट में गर्म कीमोथेरेपी के साथ की जाने वाली सर्जरी के लिए उपयुक्त नहीं होते।
- शोधकर्ताओं को पांच साल के भीतर लोगों पर पहला परीक्षण शुरू करने की उम्मीद है।






