भारत के सुप्रीम कोर्ट ने बाल यौन शोषण सामग्री हटाने के लिए साझा डेटाबेस बनाने का आदेश दिया, इंटरनेट पर व्यापक प्रतिबंध खारिज किए

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India's Supreme Court Orders Shared Database to Remove Child Sexual Abuse Material, Rejects Blanket Internet Bans

बच्चों को ऑनलाइन रहने की अनुमति के साथ साझा पहचान प्रणाली

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को राष्ट्रीय हैश और यूआरएल सूची डेटाबेस बनाने का आदेश दिया है, ताकि मंच विभिन्न सेवाओं पर बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार की पुष्टि की गई सामग्री की पहचान कर उसे हटा सकें। प्रत्येक प्रविष्टि का कम से कम तीन प्रशिक्षित मानव विश्लेषकों द्वारा स्वतंत्र आकलन होना चाहिए। डेटाबेस में आपत्तिजनक तस्वीरें या वीडियो नहीं, बल्कि उनके डिजिटल पहचान-चिह्न और इंटरनेट पते रखे जाएंगे।

विषय-सूची
  1. बच्चों को ऑनलाइन रहने की अनुमति के साथ साझा पहचान प्रणाली
  2. मंचों पर अलग-अलग सामग्री हटाना क्यों नाकाफी है
  3. राष्ट्रीय डेटाबेस कैसे काम करेगा
  4. प्रविष्टि स्वीकार करने से पहले तीन मानवीय आकलन
  5. किन कार्रवाइयों की रिपोर्ट दो घंटे में देनी होगी?
  6. शिकायत प्रशिक्षित व्यक्ति तक पहुंचनी चाहिए
  7. विज्ञापन और सदस्यता से होने वाली कमाई की जांच
  8. अदालत ने बच्चों पर व्यापक प्रतिबंध क्यों खारिज किया
  9. सुरक्षा योजना में स्कूलों की भी भूमिका
  10. 10 दिसंबर से पहले सरकार को क्या करना होगा
  11. मुख्य बिंदु

15 अक्टूबर, 2026 के 136 पृष्ठों के आदेश में सोशल मीडिया कंपनियों के लिए रिपोर्टिंग की समय-सीमाएं भी तय की गई हैं, सुलभ शिकायत प्रणालियों की मांग की गई है और स्कूलों में डिजिटल सुरक्षा शिक्षा शुरू करने को कहा गया है। सरकार को अगली सुनवाई, 10 दिसंबर, 2026 तक, कार्यान्वयन की प्रगति का विवरण देते हुए हलफनामा दाखिल करना होगा।

न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और के. विनोद चंद्रन ने Just Rights for Children Alliance & Anr. v. S. Harish & Ors. मामले में ये निर्देश दिए। यह आदेश उन अर्जियों के बाद आया, जिनमें 23 सितंबर, 2024 के अदालत के फैसले का पालन न किए जाने का आरोप लगाया गया था।

पीठ ने प्रौद्योगिकी कंपनियों पर अधिक कर्तव्य तय करने के साथ यह संवैधानिक निष्कर्ष भी दिया कि बच्चों को इंटरनेट तक पहुंचने और उसका इस्तेमाल करने का मौलिक अधिकार है। उसने उम्र के आधार पर व्यापक प्रतिबंधों का समर्थन नहीं किया और इसके बजाय माता-पिता के मार्गदर्शन, अधिक सुरक्षित खाता सेटिंग तथा आपत्तिजनक सामग्री बनाने, प्रसारित करने या उससे लाभ कमाने वालों के खिलाफ कार्रवाई को प्राथमिकता दी।

मंचों पर अलग-अलग सामग्री हटाना क्यों नाकाफी है

अदालत ने मौजूदा व्यवस्था की एक व्यावहारिक कमजोरी की पहचान की। जब कोई कंपनी आपत्तिजनक सामग्री का पता लगाकर उसे हटाती है, तो वही तस्वीर, वीडियो या लिंक किसी दूसरे मंच पर बना रह सकता है, क्योंकि उस मंच ने स्वतंत्र रूप से उसकी पहचान नहीं की होती।

सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 का नियम 4(4) उस सामग्री का उल्लेख करता है जिसे संबंधित मध्यस्थ ने पहले अपने कंप्यूटर संसाधनों से हटाया हो। पीठ ने माना कि यह तरीका विभिन्न सेवाओं पर समन्वित पहचान में मदद के लिए बहुत सीमित है।

अर्जियों में उन कथित सशुल्क प्रचारों की ओर भी ध्यान दिलाया गया, जो लिंक और बाहरी वेबसाइटों के जरिए उपयोगकर्ताओं को आपत्तिजनक सामग्री तक पहुंचाते थे। भारत में जांचे गए 84 विज्ञापनों में से 55 की सूचना एक मंच की रिपोर्टिंग प्रणाली के जरिए दी गई। इन 55 में से 43 को उस मंच के विज्ञापन मानकों के अनुरूप माना गया, यानी रिपोर्ट किए गए विज्ञापनों का लगभग 78 प्रतिशत।

अदालत के अनुसार, समस्या में बार-बार अपलोड की जाने वाली सामग्री और उन रास्तों, दोनों की भूमिका थी जिनके जरिए उपयोगकर्ताओं को शोषण की ओर भेजा जा रहा था। इसलिए उसकी रूपरेखा में पहले से ज्ञात सामग्री की पहचान, बाहरी पतों की जांच, पुलिस को रिपोर्ट करना और सामग्री के प्रसार से हुई कमाई की जांच शामिल है।

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राष्ट्रीय डेटाबेस कैसे काम करेगा

राष्ट्रीय हैश और यूआरएल सूची डेटाबेस भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र, जिसे I4C कहा जाता है, के सहयोग पोर्टल में चलाया जा सकता है या अलग भंडार के रूप में बनाया जा सकता है। सहयोग फिलहाल शिकायतों और सामग्री हटाने के नोटिसों को संबंधित पक्षों तक पहुंचाता है; प्रस्तावित डेटाबेस पुष्टि की गई आपत्तिजनक सामग्री की पहचान के लिए साझा संदर्भ प्रणाली जोड़ेगा।

हैश किसी फाइल से बना डिजिटल पहचान-चिह्न है, जिसे फिंगरप्रिंट की तरह समझा जा सकता है। मंच इन पहचान-चिह्नों का मिलान करके ऐसी सामग्री पहचान सकते हैं जिसकी पहचान कहीं और पहले ही हो चुकी हो। परसेप्चुअल हैशिंग इससे आगे जाकर आकार बदलने या फॉर्मेट बदलने के बाद भी मिलती-जुलती तस्वीरों या वीडियो का पता लगाने में मदद करती है।

यूआरएल इंटरनेट का पता होता है। इन पतों को सूची में रखने से मंच उन लिंक के खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं जो उपयोगकर्ताओं को आपत्तिजनक सामग्री वाली ज्ञात जगहों तक पहुंचाते हैं। यह तब भी मददगार है जब सामग्री उस मंच के बाहर रखी गई हो जहां लिंक मौजूद है।

सरकार को बड़े सोशल मीडिया मध्यस्थों के लिए परसेप्चुअल हैश मिलान और यूआरएल सूची के इस्तेमाल पर दिशानिर्देश या मानक संचालन प्रक्रियाएं बनानी होंगी। अदालत ने ऐसे दिशानिर्देशों को प्राथमिकता दी जिन्हें प्रौद्योगिकी में बदलाव के साथ समय-समय पर संशोधित किया जा सके।

मंच डेटाबेस की प्रविष्टियों के साथ अपनी सेवाओं का मिलान करेंगे, जबकि कानून प्रवर्तन एजेंसियां साझा पहचान-चिह्नों का उपयोग करके ऑनलाइन अन्य जगहों पर मिलती-जुलती सामग्री खोजेंगी। इस तरह पुष्टि की गई सामग्री पर कई सेवाओं में कार्रवाई हो सकेगी, बजाय इसके कि हर कंपनी को पहचान की प्रक्रिया नए सिरे से शुरू करनी पड़े।

प्रविष्टि स्वीकार करने से पहले तीन मानवीय आकलन

अदालत ने डेटाबेस में किसी सामग्री को दर्ज करने से पहले सत्यापन के कई चरण अनिवार्य किए हैं। सॉफ्टवेयर शुरुआती छंटाई कर सकता है, लेकिन कम से कम तीन प्रशिक्षित मानव विश्लेषकों को स्वतंत्र रूप से आकलन करना होगा कि सामग्री बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री (CSEAM) है या नहीं।

प्रविष्टियां एन्क्रिप्टेड माध्यमों से जमा करनी होंगी। भंडार में केवल संबंधित हैश और यूआरएल रखे जाएंगे, साथ ही आकलन का रिकॉर्ड, पहुंच लॉग और स्वतंत्र ऑडिट भी होंगे। गलत प्रविष्टियां तुरंत हटानी होंगी।

डेटाबेस की प्रविष्टियों के आधार पर सामग्री हटाए जाने से प्रभावित लोगों को शिकायत निवारण प्रक्रिया उपलब्ध होनी चाहिए। हटाने के नोटिस में कार्रवाई का आधार समझाया जाना चाहिए, ताकि व्यक्ति जान सके कि मंच से संपर्क करना है या डेटाबेस का रखरखाव करने वाली संस्था से।

ये सुरक्षा उपाय एक प्रभावशाली साझा पहचान प्रणाली को गलतियों को सुधारने के रास्ते से जोड़ते हैं। चूंकि किसी प्रविष्टि से कई मंचों पर कार्रवाई हो सकती है, इसलिए शुरुआती आकलन की सटीकता हर बाद की सामग्री हटाने की कार्रवाई के लिए महत्वपूर्ण है।

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किन कार्रवाइयों की रिपोर्ट दो घंटे में देनी होगी?

अदालत ने नई पहचानी गई सामग्री और राष्ट्रीय डेटाबेस में पहले से दर्ज सामग्री के लिए अलग-अलग प्रक्रियाएं तय की हैं। इस व्यवस्था में अज्ञात स्रोत वाली सामग्री का अर्थ है ऐसी सामग्री जिसका आकलन मंच अपनी पहचान प्रणाली या शिकायत प्रक्रिया के जरिए कर रहा हो। ज्ञात सामग्री वह है जिसका मिलान डेटाबेस की पुष्टि की गई प्रविष्टि से हुआ हो।

  • जब कोई मंच स्वतंत्र रूप से अज्ञात स्रोत वाली सामग्री की पहचान करके उसे हटाता है, तो उसे दो घंटे के भीतर इसकी रिपोर्ट देनी होगी।
  • जब शिकायत के बाद सामग्री हटाई जाती है, तो शिकायत का निपटारा होते ही मंच को रिपोर्ट देनी होगी और किसी भी स्थिति में निपटारे के दो घंटे के भीतर रिपोर्ट देनी होगी।
  • जब सामग्री डेटाबेस की किसी मौजूदा प्रविष्टि से मेल खाती है, तो मंच को उसे तुरंत निष्क्रिय करके हटाना होगा और ऐसी सभी कार्रवाइयों की एक समेकित रिपोर्ट हर सप्ताह देनी होगी।

इस प्रक्रिया के तहत नई पहचानी गई सामग्री को हटाने और उसकी रिपोर्ट देने से पहले मंचों को उसका सत्यापन करना होगा। उन्हें भारतीय कानून के तहत नामित अधिकारियों को सूचित करना होगा। इसमें, जहां लागू हो, यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण नियम, 2020 के नियम 11 के अनुसार विशेष किशोर पुलिस इकाई, स्थानीय पुलिस या साइबर अपराध पोर्टल शामिल हैं। अगर डेटाबेस का नामित निकाय कोई अलग प्राधिकरण है, तो उसे भी सूचित करना होगा।

दो घंटे की समय-सीमा सामग्री हटाने या शिकायत का निपटारा होने के बाद रिपोर्ट देने पर लागू होती है। डेटाबेस में पहले से पुष्टि की गई सामग्री से मेल मिलने पर साप्ताहिक रिपोर्ट की प्रक्रिया लागू होगी और सामग्री तुरंत हटाना भी अनिवार्य होगा।

सितंबर 2024 के फैसले में पहले ही रिपोर्टिंग के कर्तव्यों को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 से जोड़ा गया था। यह धारा उपयोगकर्ताओं द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के लिए सशर्त दायित्व-सुरक्षा देती है, जिसे आम तौर पर सेफ हार्बर कहा जाता है। अदालत ने कहा कि यह सुरक्षा पाने के लिए मध्यस्थों को उचित सावधानी बरतनी होगी और बाल संरक्षण कानून के तहत रिपोर्टिंग के दायित्वों का पालन करना होगा।

शिकायत प्रशिक्षित व्यक्ति तक पहुंचनी चाहिए

मंचों को CSEAM रिपोर्ट करने के लिए अलग और स्पष्ट नाम वाली श्रेणी देनी होगी, जिस तक दो चरणों में पहुंचा जा सके। रिपोर्ट करते समय अनिवार्य व्यक्तिगत विवरण दिए बिना गुमनाम रहने की सुविधा होनी चाहिए। शिकायत अधिकारी की जानकारी वेबसाइटों और ऐप में आसानी से मिलनी चाहिए।

हर शिकायत की प्राप्ति की पुष्टि 24 घंटे के भीतर करनी होगी और एक संदर्भ संख्या देनी होगी। प्रशिक्षित शिकायत अधिकारी को उसकी समीक्षा करनी होगी और शिकायतकर्ता को निर्णय तथा उसके कारण बताने होंगे। शुरुआती छंटाई में स्वचालित साधन मदद कर सकते हैं, लेकिन शिकायत की समीक्षा की जिम्मेदारी प्रशिक्षित अधिकारी की होगी।

अदालत ने ऐसे एकसमान प्रारूप में रिपोर्ट देने को भी कहा जिसे कंप्यूटर प्रणालियां संसाधित कर सकें। एकसमान रिपोर्टिंग से अधिकारियों को उपयोगी रूप में जानकारी मिलेगी और उन्हें अलग-अलग कंपनियों के प्रारूपों का मिलान नहीं करना पड़ेगा।

केंद्र सरकार से कहा गया कि उचित संशोधनों के जरिए मध्यस्थों के लिए जवाबदेही संबंधी आवश्यकताओं का विस्तार किया जाए। उपयोगकर्ताओं के लिए अपेक्षित बदलाव स्पष्ट है: रिपोर्ट दर्ज करने का सुलभ रास्ता, शिकायत को ट्रैक करने की सुविधा और की गई कार्रवाई के कारणों सहित निर्णय।

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विज्ञापन और सदस्यता से होने वाली कमाई की जांच

पीठ ने मध्यस्थों को निर्देश दिया कि वे CSEAM और अन्य प्रतिबंधित हानिकारक सामग्री को पेवॉल या सदस्यता के जरिए सीधे या परोक्ष रूप से पेश किए जाने, होस्ट किए जाने, अपलोड किए जाने, प्रचारित किए जाने या प्रसारित होने से रोकें। पेवॉल भुगतान की ऐसी बाधा है जिसे पार करके ही उपयोगकर्ता सामग्री देख सकते हैं।

अदालत ने कहा कि इन सेवाओं के जरिए वितरित प्रतिबंधित सामग्री से हुई कमाई जब्त करके सरकार के हवाले की जानी चाहिए। उसने सरकार से जरूरी रूपरेखा विकसित करने और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम तथा उसके नियमों के तहत कर्तव्यों के उल्लंघन पर दंडात्मक मौद्रिक जुर्माने पर विचार करने को कहा।

जुर्माने का स्तर उल्लंघन की गंभीरता, अवधि और बारंबारता के साथ कंपनी के आकार और कारोबार के अनुरूप होना चाहिए। इससे कार्रवाई में बार-बार हुई चूक और जिम्मेदार कारोबारी के पैमाने, दोनों का ध्यान रखा जा सकेगा।

आदेश में ऐसे इलेक्ट्रॉनिक सामग्री पर भी विचार किया गया है जो शोषण को संभव बनाती है, जिसमें तस्वीरों को बदलकर आपत्तिजनक सामग्री बनाने या उपयोगकर्ताओं को ऐसी सामग्री तक पहुंचाने वाले औजारों के विज्ञापन शामिल हैं। अदालत ने माना कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और नियमों का नियामक दायरा केवल दृश्य चित्रण तक सीमित नहीं है। उसने धारा 67B(d) और नियम 3(1)(b) का उल्लेख किया।

आदेश से पहले इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने अदालत को बताया था कि उसने CSEAM को बढ़ावा देने वाले सशुल्क विज्ञापनों को लेकर जुलाई 2026 में Meta के अनुपालन अधिकारी को नोटिस जारी किया था। ये कार्यवाहियां जारी थीं। सरकार के विवरण के अनुसार, चर्चाओं के बाद Google और Meta भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों को सीधे मामलों की रिपोर्ट करने पर सहमत हुए थे।

अदालत ने बच्चों पर व्यापक प्रतिबंध क्यों खारिज किया

पीठ ने इंटरनेट तक पहुंच और उसके इस्तेमाल को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। इसे अनुच्छेद 19(1)(a) के साथ पढ़ा गया, जो वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है। अदालत ने कहा कि उम्र चाहे जो भी हो, बच्चों को ये अधिकार प्राप्त हैं।

न्यायमूर्ति पारदीवाला और चंद्रन ने अपने आदेश में सुरक्षा और पहुंच के संबंध को समझाते हुए कहा:

हमारे बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोध में नहीं हैं। हमारे बच्चे दोनों के हकदार हैं।

अदालत का तर्क था कि प्रतिबंध के बाद बच्चे गुप्त रूप से इंटरनेट का इस्तेमाल जारी रख सकते हैं और कम विनियमित सेवाओं की ओर जा सकते हैं। धमकी या चालाकी का सामना कर रहा बच्चा मदद मांगने से हिचक सकता है, क्योंकि उसे ऑनलाइन जाने के लिए सजा मिलने का डर होगा।

पीठ ने उन प्रणालियों को लेकर निजता संबंधी चिंताएं भी जताईं जिनमें हर उपयोगकर्ता को संवेदनशील जानकारी का व्यापक संग्रह और निगरानी करके अपनी उम्र साबित करनी पड़े। इसके बजाय उसने माता-पिता की सहमति, मार्गदर्शन और निगरानी के साथ बच्चों के लिए अलग मोड का सुझाव दिया।

संभावित सेटिंग्स में डिफॉल्ट रूप से निजी खाते, अनजान वयस्कों के संपर्क पर सीमाएं और विज्ञापन व सामग्री पर नियंत्रण शामिल हैं। किशोरावस्था से कम उम्र के बच्चों के लिए अदालत ने माता-पिता की सहमति सत्यापित करने के अनुपातिक तरीके सुझाए। उसने विस्तृत व्यवस्था केंद्र सरकार पर छोड़ी और वयस्क सामग्री वाली वेबसाइटों सहित स्वाभाविक रूप से हानिकारक सेवाओं पर लक्षित प्रतिबंधों की गुंजाइश रखी।

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सुरक्षा योजना में स्कूलों की भी भूमिका

अदालत ने निर्देश दिया कि हर उम्र के अनुरूप डिजिटल सुरक्षा और यौन शिक्षा को मुख्य पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए। पाठों में सहमति, सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श, स्वस्थ संबंध, निजी जानकारी की सुरक्षा, ऑनलाइन शोषण और दुर्व्यवहार की रिपोर्ट करने के तरीकों को शामिल किया जाना चाहिए।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद तथा राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषदों को बाल मनोवैज्ञानिकों, शिक्षकों और पालन-पोषण विशेषज्ञों के साथ मिलकर सामग्री तैयार करनी होगी। अदालत ने स्कूलों में हेल्पलाइन नंबर प्रदर्शित करने और प्राथमिक स्तर से जागरूकता कार्यक्रम शुरू करने को भी कहा।

बच्चों के लिए इसका अर्थ है खतरे को पहचानना और किसी भरोसेमंद वयस्क को बताना सीखना, साथ ही उन तकनीकी उपायों के बारे में जानना जिन्हें कंपनियों से लागू करने की अपेक्षा है। शिक्षा का यह हिस्सा उन स्थितियों को संबोधित करता है जिनमें मंच द्वारा किसी तस्वीर या लिंक की पहचान से पहले ही बच्चा चालाकी या धमकी भरे व्यवहार का सामना कर सकता है।

अदालत की शब्दावली भी नुकसान पर इसी जोर को दर्शाती है। सितंबर 2024 के फैसले में उसने संसद से POCSO अधिनियम में "बाल अश्लीलता" शब्द को ऐसी भाषा से बदलने पर विचार करने को कहा था जो बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री का वर्णन करे, ताकि अपराधों की प्रकृति को अधिक सटीक रूप से बताया जा सके।

10 दिसंबर से पहले सरकार को क्या करना होगा

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा विधि और न्याय मंत्रालय को दिशानिर्देशों, मानक संचालन प्रक्रियाओं और सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में उपयुक्त बदलावों के जरिए इस रूपरेखा को लागू करने के कदम उठाने होंगे। जहां जरूरी हो, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में भी बदलाव करना होगा। सरकार के हलफनामे में प्रगति का विवरण होना चाहिए, जिसमें मध्यस्थों द्वारा फिलहाल इस्तेमाल किए जा रहे तकनीकी साधन भी शामिल हों।

इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने पहले ही महिला और बाल विकास मंत्रालय, गृह मंत्रालय, दूरसंचार विभाग और अन्य हितधारकों के साथ मिलकर तैयार किया गया मसौदा प्रक्रिया-पत्र दाखिल किया था। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसे अंतिम रूप देने के लिए और समय मांगा।

कार्यवाही कई चरणों में आगे बढ़ी है:

  • 23 सितंबर, 2024: सुप्रीम कोर्ट ने CSEAM पर अपना पिछला फैसला दिया, जिसमें मध्यस्थों के रिपोर्टिंग कर्तव्य भी शामिल थे।
  • फरवरी 2026: सरकार ने मध्यस्थ नियमों में संशोधन करके CSEAM से जुड़े उचित सावधानी के विशिष्ट दायित्व जोड़े।
  • जुलाई 2026: इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने ऐसी सामग्री को बढ़ावा देने वाले सशुल्क विज्ञापनों को लेकर Meta के अनुपालन अधिकारी को नोटिस जारी किया।
  • 14 अगस्त, 2026: अदालत ने अनुपालन में गंभीर चूकों पर चिंता दर्ज की।
  • 15 अक्टूबर, 2026: पीठ ने डेटाबेस, रिपोर्टिंग, शिक्षा और जवाबदेही की रूपरेखा जारी की।
  • 10 दिसंबर, 2026: अदालत में मामले की अगली सुनवाई तय है। सरकार को तब तक प्रगति का हलफनामा दाखिल करना होगा।

आदेश में डेटाबेस शुरू करने की कोई तारीख या मौद्रिक जुर्माने की अंतिम राशि तय नहीं की गई है। दिसंबर की सुनवाई में सरकार को साझा पहचान, भरोसेमंद रिपोर्टिंग और बच्चों के लिए अधिक सुरक्षित ऑनलाइन पहुंच की दिशा में उठाए गए कदमों का विवरण देना होगा।

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मुख्य बिंदु

  • राष्ट्रीय डेटाबेस में पुष्टि की गई बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार सामग्री के हैश और यूआरएल रखे जाएंगे, सामग्री स्वयं नहीं।
  • प्रस्तावित हर प्रविष्टि का कम से कम तीन प्रशिक्षित मानव विश्लेषकों द्वारा स्वतंत्र आकलन अनिवार्य होगा।
  • निर्धारित सामग्री हटाने की कार्रवाइयों की रिपोर्ट दो घंटे के भीतर देनी होगी; डेटाबेस की मौजूदा प्रविष्टियों से मेल मिलने पर सामग्री तुरंत हटानी होगी और साप्ताहिक रिपोर्ट देनी होगी।
  • मंचों को 24 घंटे के भीतर शिकायत मिलने की पुष्टि करनी होगी और प्रशिक्षित व्यक्ति से उसकी समीक्षा करानी होगी।
  • अदालत ने पेवॉल और सदस्यता के जरिए सामग्री बांटने पर रोक लगाई तथा जुर्माने और प्रतिबंधित कमाई से निपटने की रूपरेखा बनाने को कहा।
  • बच्चों का इंटरनेट तक पहुंचने का मौलिक अधिकार बना रहेगा; व्यापक प्रतिबंधों के बजाय लक्षित सुरक्षा उपायों को प्राथमिकता दी गई है।
  • सरकार को 10 दिसंबर, 2026 की सुनवाई तक कार्यान्वयन की प्रगति की रिपोर्ट देनी होगी।
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