लाहौर की एक अकूस्टिक प्रस्तुति सरहद पार ले गई क्षेत्रीय गीत
इंस्टाग्राम पर करीब 5 करोड़ व्यूज़ ने पाकिस्तान के एक सराइकी प्रेमगीत को भारत में नए श्रोताओं तक पहुंचा दिया है। लाहौर के गायक शानज़ी सियाल और मोहसिन लशारी की आवाज़ में ‘चलरे चलरे वाल’ खास तौर पर भारतीय पंजाब में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। इसकी धुन ने नई प्रस्तुतियों और 1994 की हिंदी फिल्म के गीत ‘ना कजरे की धार’ से तुलना को प्रेरित किया है।
विषय-सूची
- लाहौर की एक अकूस्टिक प्रस्तुति सरहद पार ले गई क्षेत्रीय गीत
- गीत को नई लोकप्रियता दिलाने वाले गायक
- प्रेमगीत के बोलों का अर्थ
- करोड़ों लोगों की भाषा को मिली नई पहचान
- कवि के विवरण से गीत के रचनाकारों के नाम सामने आए
- कैसेट से पारिवारिक श्रद्धांजलि तक
- श्रोताओं को ‘ना कजरे की धार’ क्यों सुनाई देता है
- नए कलाकार गीत को अलग-अलग समुदायों तक ले जा रहे हैं
- मुख्य बातें
यह दिलचस्पी सिर्फ एक रिकॉर्डिंग तक सीमित नहीं है। भारतीय पंजाबी गायिका सुनंदा शर्मा ने इसकी अपनी प्रस्तुति साझा की है, उत्तर प्रदेश पुलिस के सब-इंस्पेक्टर निशांत मिश्रा ने गिटार बजाते हुए इसे गाया है और पाकिस्तानी गायक ज़ीशान खान रोखड़ी ने अपने दिवंगत पिता शफ़ाउल्लाह खान रोखड़ी को श्रद्धांजलि देते हुए इसे पेश किया है।
इस मौजूदा उत्साह के पीछे एक अधिक पेचीदा इतिहास है। कवि मुहम्मद सलीम बिस्मिल खुद को गीतकार बताते हैं और इसकी पहली रिलीज़ 1998 की बताते हुए गायक के रूप में गुल तारे खेलवी का नाम लेते हैं। एक अन्य विवरण गीत को 1980 के दशक का बताता है और कहता है कि इसे सबसे पहले रोखड़ी ने गाया था। ये अलग-अलग समय-रेखाएं इसलिए अहम हैं क्योंकि श्रोता अब यह भी पूछ रहे हैं कि सराइकी गीत किसने बनाया और इसकी धुन जानी-पहचानी क्यों लगती है।
22 वर्षीय सियाल और 24 वर्षीय लशारी के लिए सबसे बड़ा आश्चर्य भारत से मिली प्रतिक्रिया थी। उनका साथ कई संगीत परियोजनाओं में से एक था, न कि ऐसी प्रस्तुति जिसके बारे में उन्होंने सोचा हो कि वह सरहद पार सनसनी बन जाएगी। इसकी सफलता ने एक क्षेत्रीय भाषा, प्रेमगीत के बोल और कई पीढ़ियों के कलाकारों को एक ही चर्चा में ला दिया है।
गीत को नई लोकप्रियता दिलाने वाले गायक
लशारी स्वतंत्र गायक और गिटारवादक हैं। उनकी जड़ें फ़ैसलाबाद के झंग सियाल से जुड़ी हैं। पेशेवर गायिका सियाल का संबंध ख़ानिवाल ज़िले के मियां चन्नू से है। दोनों लाहौर में रहते हैं। उनकी अकूस्टिक प्रस्तुति में सियाल की आवाज़ के साथ लशारी का गिटार सुनाई देता है।
लशारी ने इस सहयोग और भारत में मिले अप्रत्याशित श्रोताओं के बारे में कहा:
शानज़ी और मैंने संगीत की कुछ परियोजनाओं पर साथ काम किया और 'चलरे वाल' उनमें से एक था। हमें अंदाज़ा नहीं था कि यह भारत में भी वायरल हो जाएगा।
सियाल ने इंस्टाग्राम पर लिखा कि उनके काम को "सरहद पार से बहुत प्यार मिला है।" यह प्रस्तुति इंस्टाग्राम, यूट्यूब और अन्य मंचों पर फैल रही है, जहां श्रोता इसके क्लिप साझा कर रहे हैं और अपने संस्करण रिकॉर्ड कर रहे हैं।
लशारी ने यह भी बताया कि भारतीय श्रोताओं तक पहुंचने वाले पाकिस्तानी संगीतकार के तौर पर इस प्रतिक्रिया का उनके लिए क्या अर्थ है:
हमने बहुत नफ़रत और बहुत दुश्मनी देख ली। अगर हमारा काम दूरियां कम कर रहा है, तो हम खुशकिस्मत हैं।
अकूस्टिक अंदाज़ इस नई लोकप्रियता को एक पहचान देता है, जबकि दूसरे संस्करण भी सामने आ रहे हैं। श्रोता पहले सियाल की आवाज़ और लशारी का गिटार सुनते हैं, फिर जान पाते हैं कि यह गीत सराइकी संगीत की कहीं व्यापक परंपरा का हिस्सा है।
प्रेमगीत के बोलों का अर्थ
‘चलरे चलरे वाल’ एक महिला की नज़र से उसके प्रिय पुरुष का वर्णन करता है, जो उसकी प्रशंसा करती है। शीर्षक उसके लहराते या घुंघराले बालों की ओर इशारा करता है। उसके कंधों पर काली शॉल है और वह लाल रूमाल रखता है। गीत में उसकी खुशबू और जहां भी वह जाता है, वहां लोगों का ध्यान खींचने का भी ज़िक्र है।
बार-बार आने वाली पंक्ति ‘तेरियां रीसां कौन करे’ का मोटे तौर पर अर्थ है, “तुम्हारी अदा की बराबरी कौन कर सकता है?” कुछ संस्करण ‘तेडियां रीसां कौन करे’ नाम से भी जाने जाते हैं। यह नाम उसके बालों के वर्णन के बजाय इसी मुखड़े से लिया गया है।
ये साफ़-सुथरे बिंब समझाते हैं कि गीत उन लोगों को भी क्यों पसंद आ सकता है जिन्हें इसके हर शब्द का अर्थ मालूम नहीं। बाल, कपड़े, खुशबू और प्रशंसा श्रोता के सामने एक स्पष्ट दृश्य रचते हैं, जबकि बार-बार दोहराया गया मुखड़ा गीत की मूल भावना को आसानी से समझने देता है।
अंग्रेज़ी में शीर्षक की कई वर्तनियां मिलती हैं, जिनमें Chalray Chalray Waal और Chhalray Chhalray Waal शामिल हैं। ये लैटिन वर्णमाला में सराइकी ध्वनियों को लिखने के अलग-अलग तरीकों को दर्शाती हैं। इसलिए गीत खोजने वाले श्रोताओं को पुरानी रिकॉर्डिंग थोड़े अलग नामों से मिल सकती हैं।
करोड़ों लोगों की भाषा को मिली नई पहचान
पाकिस्तान की 2023 की जनगणना में कम-से-कम 2.8 करोड़ लोगों ने सराइकी को अपनी पहली भाषा बताया। इसके प्रमुख भाषाई क्षेत्र दक्षिणी पंजाब में हैं, खासकर मुल्तान, बहावलपुर और डेरा गाज़ी खान में। इसके अलावा उत्तरी सिंध, दक्षिणी ख़ैबर पख़्तूनख़्वा और बलूचिस्तान के कुछ हिस्सों में भी इसके बोलने वाले रहते हैं।
सराइकी को आम तौर पर शाहमुखी कही जाने वाली फ़ारसी-अरबी लिपि में लिखा जाता है। पाकिस्तान की जनगणना इसे अलग मातृभाषा के रूप में दर्ज करती है, जबकि पंजाबी से इसके संबंध को लेकर भाषाई और पहचान संबंधी बहस जारी है।
मिलते-जुलते शब्दों के कारण पंजाबी श्रोताओं को गीत के कुछ हिस्से परिचित लग सकते हैं, हालांकि उच्चारण और कुछ शब्द अलग हैं। मिसाल के तौर पर सराइकी का ‘चलरे वाल’ पंजाबी में घुंघराले बालों के लिए इस्तेमाल होने वाले ‘घुंघराले वाल’ के अनुरूप है।
इस गीत को लेकर मौजूदा उत्साह खास तौर पर भारतीय पंजाब में है, लेकिन सराइकी बोलने वाले सबसे बड़े समुदाय पाकिस्तान में हैं। इसलिए कई भारतीय श्रोताओं के लिए यह उस भाषा से परिचय का ज़रिया है जिसके कुछ अंश वे पहचान तो सकते हैं, लेकिन खुद बोलते नहीं। इसकी लोकप्रियता किसी औपचारिक परिचय के बजाय प्रेमगीत के माध्यम से भाषा को रोज़मर्रा के सुनने का हिस्सा बना रही है।
कवि के विवरण से गीत के रचनाकारों के नाम सामने आए
मुहम्मद सलीम बिस्मिल गीत की रचना का एक स्पष्ट विवरण देते हैं। उनका कहना है कि इसे सबसे पहले गुल तारे खेलवी ने गाया और लंदन म्यूज़िक सेंटर मियांवाली ने 1998 में रिलीज़ किया। बिस्मिल यह भी कहते हैं कि उन्होंने ‘ना कजरे की धार’ की धुन पर इसके बोल लिखे।
उनके मुताबिक, शफ़ी अख़्तर वट्टा खेलवी और नसीबो लाल ने इसका युगल गीत रिकॉर्ड किया, जो 1999 में रिलीज़ हुआ। उन्हें लगता है कि उस रिलीज़ के पीछे एनएमसी कंपनी थी। इसके बाद अब्दुल सत्तार ज़ख्मी और मुहम्मद हुसैन बंडियालवी ने भी गीत रिकॉर्ड किया।
गुल तारे खेलवी मियांवाली से जुड़े एक संगीत परिवार से हैं, जिसमें कई पीढ़ियों ने क्षेत्रीय संगीत प्रस्तुत किया है। बिस्मिल का विवरण ‘चलरे चलरे वाल’ को इसी स्थानीय रिकॉर्डिंग जगत में रखता है: पहले कैसेट के रूप में रिलीज़ और फिर दूसरे गायकों की प्रस्तुतियां।
दूसरा इतिहास गीत को 1980 के दशक का बताता है और शफ़ाउल्लाह खान रोखड़ी को इसका पहला गायक मानता है। इसकी सबसे पुरानी रिलीज़ और रचना की पूरी समय-रेखा अभी तय नहीं है। बिस्मिल का विस्तृत विवरण गीतकार और शुरुआती गायक को उस चर्चा में जगह देता है, जिस पर अब तक सबसे नई वायरल प्रस्तुतियां छाई हुई थीं।
बिस्मिल को ‘सोहना रत्ता सलारा यार दा’ समेत अन्य सराइकी गीतों से भी जोड़ा जाता है। उनका कहना है कि गुल तारे खेलवी ने इसे 1995 में रिलीज़ किया था। उनका विवरण कवियों, गायकों और रिकॉर्डिंग कंपनियों के उस नेटवर्क को सामने लाता है, जिसके ज़रिए इंस्टाग्राम से बहुत पहले गीत श्रोताओं तक पहुंचते थे।
कैसेट से पारिवारिक श्रद्धांजलि तक
मुहम्मद हुसैन बंडियालवी और शफ़ाउल्लाह खान रोखड़ी, दोनों ही इस गीत को व्यापक रूप से लोकप्रिय बनाने से गहराई से जुड़े हैं। गीत की प्रस्तुति के इतिहास में उनकी भूमिका बताती है कि कई श्रोता इसे हाल की रिलीज़ के बजाय लोकसंगीत के पुराने पसंदीदा गीत के रूप में क्यों पहचानते हैं।
1966 में मियांवाली ज़िले के रोखड़ी गांव में जन्मे रोखड़ी क्षेत्रीय संगीत की प्रस्तुतियों और अपने गीतों की रिकॉर्डिंग के लिए जाने गए। उनके गीतों में ‘सम्मी मेरी वार’, ‘परदेसी ढोला’ और ‘रोही’ शामिल थे।
एक रिलीज़ सूची में ‘चलरे चलरे वाल’ की उनकी रिकॉर्डिंग की तारीख मार्च 2017 दी गई है। अक्टूबर 2026 में गीत की नई लोकप्रियता तक यह रिकॉर्डिंग नौ साल से भी अधिक पुरानी हो चुकी थी। यह अंतराल दिखाता है कि जब कोई दूसरा गायक उसी गीत को नए श्रोताओं तक पहुंचाता है, तो पुरानी प्रस्तुति फिर से लोगों का ध्यान खींच सकती है।
उनके बेटे ज़ीशान खान रोखड़ी ने पिता को श्रद्धांजलि देते हुए इसका एक संस्करण पेश किया है। नीचे दी गई प्रमुख तारीखें अलग-अलग रिकॉर्डिंग दौरों में गीत के सफ़र को दिखाती हैं:
- 1994: राजीव राय की फिल्म ‘मोहरा’ में ‘ना कजरे की धार’ रिलीज़ हुआ। इसे पंकज उधास और साधना सरगम ने गाया था।
- 1998: बिस्मिल के अनुसार, गुल तारे खेलवी की आवाज़ में उनके सराइकी बोलों का पहला संस्करण इसी साल रिलीज़ हुआ।
- 1999: बिस्मिल के अनुसार, शफ़ी अख़्तर वट्टा खेलवी और नसीबो लाल का युगल गीत इसी साल रिलीज़ हुआ।
- मार्च 2017: रिलीज़ सूची में शफ़ाउल्लाह खान रोखड़ी की रिकॉर्डिंग इसी महीने की बताई गई है।
- अक्टूबर 2026: अकूस्टिक प्रस्तुति और नए संस्करण भारत और पाकिस्तान में व्यापक ध्यान खींचते हैं।
श्रोताओं को ‘ना कजरे की धार’ क्यों सुनाई देता है
भारतीय श्रोताओं ने सराइकी प्रस्तुति को ‘ना कजरे की धार’ से जोड़ा है। पंकज उधास और साधना सरगम का गाया यह मधुर प्रेमगीत ‘मोहरा’ में था। धुन के जाने-पहचाने सुरों ने लोगों को दोनों गीत साथ साझा करने के लिए प्रेरित किया है। इससे सराइकी प्रस्तुति उन लोगों तक भी पहुंची है जो पहले बॉलीवुड की धुन पहचानते थे।
‘ना कजरे की धार’ का इतिहास 1994 की फिल्म से भी पुराना है। कल्याणजी-आनंदजी ने मूल धुन बनाई थी और बोल इंदीवर ने लिखे थे। मुकेश ने इसे 1970 के दशक में रिकॉर्ड किया, लेकिन वह शुरुआती रिकॉर्डिंग उस समय रिलीज़ नहीं हुई थी।
बाद में विजू शाह ने ‘मोहरा’ के लिए इस रचना को नए सिरे से पेश किया। उधास और सरगम ने फिल्मी संस्करण रिकॉर्ड किया। शाह ने मूल धुन को बरकरार रखते हुए उसमें सिंथेसाइज़र, अकूस्टिक गिटार और अधिक दमदार ताल-संगत जोड़ी।
बिस्मिल का यह कहना कि उन्होंने हिंदी गीत की धुन पर सराइकी बोल लिखे, उस संबंध का एक स्पष्ट विवरण देता है जिसे श्रोता अब सुन रहे हैं। इस तरह चर्चा दो इतिहासों को जोड़ती है: बड़ी फिल्म के लिए फिर से पेश की गई हिंदी रचना और कई क्षेत्रीय गायकों के ज़रिए आगे बढ़े सराइकी बोल।
नए कलाकार गीत को अलग-अलग समुदायों तक ले जा रहे हैं
सुनंदा शर्मा की प्रस्तुति ने भारतीय पंजाबी श्रोताओं को इस गीत तक पहुंचने का एक और रास्ता दिया है। पाकिस्तानी श्रोताओं ने भी उनकी प्रस्तुति का स्वागत किया है। इस तरह यह आदान-प्रदान सिर्फ़ एक पाकिस्तानी वीडियो के भारतीय फ़ीड तक पहुंचने से कहीं आगे जाता है।
निशांत मिश्रा की गिटार प्रस्तुति ने गीत को एक और अलग माहौल में पहुंचाया है। उत्तर प्रदेश पुलिस के सब-इंस्पेक्टर ने इसके आकर्षण पर संदेश के साथ अपनी प्रस्तुति साझा की:
यह याद दिलाता है कि संगीत की न कोई सीमा होती है, न भाषाई दीवारें और न सरहदें। यह दिलों को जोड़ता है!
पाकिस्तानी कवि आतिफ़ तौक़ीर इस प्रतिक्रिया को क्षेत्रीय भाषाओं के ज़रिए कायम सांस्कृतिक रिश्तों की अभिव्यक्ति मानते हैं। उन्होंने बताया कि सरहद के दोनों ओर हुई प्रस्तुतियों का उनके लिए क्या अर्थ है:
मेरे लिए, सरहद के दोनों ओर गायकों का इस गीत को अपनाना दिखाता है कि भारत और पाकिस्तान आज भी कितने गहराई से जुड़े हैं। हमारी क्षेत्रीय भाषाएं साझा इतिहास तक पहुंचने के सबसे मज़बूत रास्तों में हैं। कविता और संगीत इस जुड़ाव को रोज़मर्रा की ज़िंदगी तक पहुंचाते हैं और संवाद, सद्भाव तथा शांति के लिए जगह बनाते हैं।
इस बार गीत की लोकप्रियता का कोई एक केंद्र नहीं है: सियाल और लशारी का अकूस्टिक सहयोग, शर्मा की प्रस्तुति, मिश्रा का गिटार वीडियो और ज़ीशान खान रोखड़ी की पारिवारिक श्रद्धांजलि। हर प्रस्तुति श्रोताओं को ऐसे गीत की ओर ले जाती है जिसका सराइकी संगीत में पहले से इतिहास रहा है। बिस्मिल, गुल तारे खेलवी, बंडियालवी और रोखड़ी को याद रखने से इस खोज को धुन के साथ उसका इतिहास भी मिलता है।
मुख्य बातें
- शानज़ी सियाल और मोहसिन लशारी की अकूस्टिक प्रस्तुति ने ‘चलरे चलरे वाल’ को इंस्टाग्राम पर करीब 5 करोड़ व्यूज़ तक पहुंचाने में मदद की है।
- सुनंदा शर्मा, पुलिस सब-इंस्पेक्टर निशांत मिश्रा और ज़ीशान खान रोखड़ी ने अपनी-अपनी प्रस्तुतियां साझा की हैं।
- सराइकी बोलों में प्रिय पुरुष के घुंघराले बाल, काली शॉल और लाल रूमाल का वर्णन है।
- कवि मुहम्मद सलीम बिस्मिल पहली रिलीज़ 1998 की बताते हैं और गायक के रूप में गुल तारे खेलवी का नाम लेते हैं, जबकि एक अन्य समय-रेखा गीत को इससे पहले का बताती है।
- बिस्मिल के अनुसार, उन्होंने ये बोल ‘ना कजरे की धार’ की धुन पर लिखे थे। इस गीत को 1994 की फिल्म ‘मोहरा’ के लिए फिर से पेश किया गया था।
- पाकिस्तान की 2023 की जनगणना में कम-से-कम 2.8 करोड़ लोगों ने सराइकी को अपनी पहली भाषा बताया।






