भारत का कहना है कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते का पहला चरण अंतिम रूप में, लेकिन टैरिफ में बढ़त अब भी अहम

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India Says First Phase of US Trade Pact Finalised, With Tariff Advantage Still Key

कानूनी मसौदे पर काम आगे बढ़ा, लेकिन हस्ताक्षर टैरिफ की शर्तों पर निर्भर

भारत ने 15 अक्टूबर, 2026 को कहा कि अमेरिका के साथ उसके व्यापार समझौते का पहला चरण अंतिम रूप ले चुका है और उस पर कानूनी मसौदा तैयार किया जा रहा है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि समझौता तब लागू किया जाएगा जब भारत को प्रतिस्पर्धी निर्यातकों पर बढ़त मिल जाएगी। इससे अमेरिका की अंतिम टैरिफ संरचना समझौते का केंद्रीय मुद्दा बन गई है।

विषय-सूची
  1. कानूनी मसौदे पर काम आगे बढ़ा, लेकिन हस्ताक्षर टैरिफ की शर्तों पर निर्भर
  2. भारत प्रतिस्पर्धी निर्यातकों पर बढ़त क्यों चाहता है
  3. उत्पादों से जुड़ी बारीकियां अब भी बातचीत के दायरे में
  4. अमेरिकी टैरिफ ढांचे का पुनर्गठन क्यों हो रहा है
  5. रूसी ऊर्जा की खरीद से टैरिफ का एक और जोखिम
  6. निर्यात में बढ़ोतरी से कारोबारियों के लिए दांव बढ़े
  7. रुबियो की यात्रा में ऊर्जा और निवेश पर जोर
  8. यूरोप के लिए भारत ने अलग समयसीमा बताई
  9. अगले चरण को आकार देने वाली तारीखें
  10. मुख्य बातें

बातचीत उस बाजार को लेकर है जिसने अप्रैल से अगस्त के बीच भारत से 42.79 अरब डॉलर का सामान खरीदा, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह आंकड़ा 40.39 अरब डॉलर था। भारत तरजीही पहुंच और अधिक पूर्वानुमेय टैरिफ चाहता है। वहीं, आपातकालीन आर्थिक शक्तियों का इस्तेमाल कर शुल्क लगाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद वॉशिंगटन अपनी व्यापार व्यवस्थाओं की समीक्षा कर रहा है।

वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा कि वार्ताकार समझौते की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने कहा कि व्यापक ढांचा और बड़े मुद्दे तय हो चुके हैं। उनकी टिप्पणियां पर्याप्त प्रगति का संकेत देती हैं, हालांकि कानूनी काम और अलग-अलग उत्पादों पर चर्चा जारी है।

व्यापार आंकड़ों पर एक ब्रीफिंग में अग्रवाल ने तेजी से आगे बढ़ने की भारत की आकांक्षा जाहिर की:

हमें उम्मीद है कि व्यापार समझौते को जल्द से जल्द अंतिम रूप देकर उस पर हस्ताक्षर किए जाएंगे।

हस्ताक्षर और लागू करना अलग-अलग चरण हैं। कानूनी पाठ में बातचीत से तय शर्तों को सटीक प्रतिबद्धताओं में बदलना होगा, जबकि टैरिफ व्यवस्थाएं तय करेंगी कि सीमा पार सामान भेजे जाने पर कारोबारियों को वास्तव में कितना शुल्क देना होगा। अग्रवाल ने कहा कि समयसीमा पर आपसी सहमति बनेगी और यह अमेरिकी टैरिफ संरचना को औपचारिक रूप देने तथा सेक्शन 301 के तहत नतीजों पर निर्भर करेगी। सेक्शन 301 अमेरिकी व्यापार कानून का वह प्रावधान है जिसका इस्तेमाल वॉशिंगटन द्वारा अनुचित मानी जाने वाली व्यापार प्रथाओं पर जवाब देने के लिए किया जाता है।

भारत प्रतिस्पर्धी निर्यातकों पर बढ़त क्यों चाहता है

गोयल ने बांग्लादेश, वियतनाम और इंडोनेशिया को ऐसे प्रतिस्पर्धी निर्यातक बताया जिनके मुकाबले भारत अमेरिकी बाजार में अनुकूल व्यवहार चाहता है। नई दिल्ली चाहती है कि भारतीय कारोबारियों पर प्रतिस्पर्धियों से अधिक टैरिफ न लगे, और जहां संभव हो वहां उन्हें बढ़त मिले।

टैरिफ वह कर है जो किसी उत्पाद के देश में प्रवेश करने पर लगाया जाता है और आम तौर पर आयात करने वाला कारोबारी इसे चुकाता है। अगर समान उत्पादों पर अलग-अलग शुल्क लगते हैं, तो कम टैरिफ वाला उत्पाद आयात करने में सस्ता पड़ सकता है। इससे यह तय हो सकता है कि ऑर्डर किस आपूर्तिकर्ता को मिले, खासकर जब खरीदार कीमतों की बारीकी से तुलना कर रहे हों।

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समझौते को लागू करने की शर्त समझाते हुए गोयल ने कहा:

अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते की पहली खेप को अंतिम रूप दिया जा चुका है और अब इसे अंतिम रूप देने तथा कानूनी मसौदा तैयार करने का काम चल रहा है। हमें उम्मीद है कि हम इसे जल्द अंतिम रूप दे पाएंगे और अपने प्रतिस्पर्धी देशों पर बढ़त मिलने के बाद इसे लागू कर देंगे।

इसलिए भारत की मांग उसके निर्यात पर लागू दर और प्रतिस्पर्धी देशों पर लागू दरों, दोनों से जुड़ी है। भारत के टैरिफ में कमी से निर्यातकों को मदद मिल सकती है, लेकिन उसका व्यावसायिक महत्व इस बात पर भी निर्भर करता है कि अमेरिकी खरीदार को कहीं और से तुलनीय उत्पाद आयात करने पर कितना शुल्क देना होगा।

उत्पादों से जुड़ी बारीकियां अब भी बातचीत के दायरे में

गोर ने नई दिल्ली में ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में बताया कि बातचीत अब अलग-अलग उत्पादों और टैरिफ प्रतिशतों पर पहुंच गई है। उन्होंने कहा कि उन्होंने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीर और गोयल के साथ वार्ता सत्रों में हिस्सा लिया था।

राजदूत ने बातचीत की स्थिति इस तरह बताई:

बड़ी तस्वीर, बड़ा ढांचा और बड़े मुद्दे तय हो चुके हैं।

गोर ने कहा कि छोटे मुद्दों पर बातचीत अब भी जारी है। उन्होंने दोनों अर्थव्यवस्थाओं के आकार, भारत की 1.4 अरब आबादी और इसमें शामिल अनेक उत्पादों तथा क्षेत्रों को उन कारणों में गिनाया जिनकी वजह से प्रतिबद्धताओं पर सहमति बनाने में समय लगता है। बातचीत करीब डेढ़ साल से चल रही थी।

अग्रवाल ने कहा कि वार्ताकारों ने जून के अंत तक अड़चनों की पहचान कर ली थी और तब से मतभेद कम हुए हैं। उत्पादों पर बाकी बातचीत अहम है, क्योंकि व्यापक समझौते में अंततः यह तय करना होगा कि किन वस्तुओं को किस तरह का व्यवहार मिलेगा। कारोबारियों को लागत का हिसाब लगाने और यह तय करने के लिए इन बारीकियों की जरूरत है कि नई व्यापार व्यवस्था के तहत ऑर्डर देना व्यावसायिक रूप से फायदेमंद होगा या नहीं।

अमेरिकी टैरिफ ढांचे का पुनर्गठन क्यों हो रहा है

भारत और अमेरिका फरवरी 2026 में एक ढांचे पर सहमत हुए थे, जिसके तहत भारत के अधिकतर सामान पर टैरिफ 50% से घटकर 18% हो गया था। इससे पहले अगस्त 2025 में बातचीत का एक दौर विफल होने के बाद ऊंची दर लागू की गई थी।

फरवरी का बदलाव 32 प्रतिशत अंक की कटौती थी। सीमा शुल्क के लिए 100 डॉलर मूल्य वाले उत्पाद पर इन दोनों दरों के बीच शुल्क का अंतर 32 डॉलर होता, अन्य लागू लागतों को छोड़कर। इससे पता चलता है कि अंतिम दर का कानूनी आधार और उसकी स्थिरता आयातकों तथा निर्यातकों के लिए क्यों अहम है।

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इसके बाद अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ लगाने के लिए प्रशासन द्वारा आपातकालीन आर्थिक शक्तियों के इस्तेमाल के खिलाफ फैसला सुनाया। गोर ने कहा कि इसके चलते वॉशिंगटन को पिछली व्यापार व्यवस्था के कुछ हिस्सों पर फिर से काम करना पड़ा।

अग्रवाल ने हस्ताक्षर को वॉशिंगटन में चल रहे इस काम से जोड़ा। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपनी टैरिफ संरचना का पुनर्गठन कर रहा है और सेक्शन 301 के तहत नतीजे यह तय करने में मदद करेंगे कि दोनों पक्ष कब आगे बढ़ सकते हैं। भारत तरजीही दरों के साथ स्थिरता भी चाहता है, क्योंकि कई महीनों तक सामान आपूर्ति करने का समझौता करने वाले कारोबार को यह अनुमान लगाना होता है कि इस पूरी अवधि में उसके ग्राहक को कितना शुल्क देना पड़ेगा।

रूसी ऊर्जा की खरीद से टैरिफ का एक और जोखिम

अमेरिका का एक दूसरा नीतिगत फैसला भी बातचीत को प्रभावित कर सकता है: क्या राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप रूसी तेल और गैस की खरीद से जुड़े टैरिफ लगाएंगे। भारत रूसी तेल खरीदना जारी रखे हुए है और अपनी आबादी की जरूरतें पूरी करने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों से ऊर्जा खरीदने के अधिकार का बचाव करता रहा है।

18 सितंबर को हस्ताक्षरित लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026, रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदारों पर 100% तक टैरिफ लगाने की अनुमति देता है। गोर ने कहा कि 100 सदस्यीय सीनेट में इस कानून को 86 वोट मिले थे और इसमें तेल, गैस तथा प्रतिबंधों से बचने के मामले शामिल हैं। शुल्क लगाने के लिए राष्ट्रपति का फैसला जरूरी है। गोर ने कहा कि अब तक इस कानून के तहत किसी देश पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।

गोर को 15 अक्टूबर की अपनी टिप्पणी के करीब 10 दिनों के भीतर फैसला होने की उम्मीद थी। हालांकि, 18 सितंबर को हस्ताक्षर से 30 दिन की बताई गई समयसीमा 18 अक्टूबर के आसपास पूरी होती। फैसले की सटीक तारीख और भारत को किसी छूट का मिलना अभी तय नहीं था। अमेरिका के साथ अंतिम समझौते की तारीख, उत्पादों से जुड़ी बाकी शर्तें और प्रकाशित टैरिफ सूची भी तय नहीं हुई थीं।

राजदूत ने कहा कि भारत को राहत देने का फैसला ट्रंप के हाथ में है। प्रतिबंध लगाने की शक्तियों के प्रशासन द्वारा बताए गए उद्देश्य को समझाते हुए गोर ने कहा:

लक्ष्य किसी को दंडित करना नहीं है। लक्ष्य इस युद्ध को समाप्त करने की कोशिश करना है।

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के अजय श्रीवास्तव ने चेतावनी दी कि वॉशिंगटन रूसी तेल की खरीद पर शुल्क लगाने की धमकी का इस्तेमाल नई दिल्ली पर असमान समझौता स्वीकार करने का दबाव बनाने के लिए कर सकता है। उन्होंने इस चेतावनी को वॉशिंगटन के रूसी डीजल खरीदने के फैसले से जोड़ा। उनके मुताबिक, इससे भारत को राहत मिलने की उम्मीद बढ़ी है, लेकिन टैरिफ दबाव की संभावना बनी हुई है।

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निर्यात में बढ़ोतरी से कारोबारियों के लिए दांव बढ़े

अप्रैल से अगस्त के बीच भारत का अमेरिका को वस्तुओं का निर्यात एक साल पहले की इसी अवधि की तुलना में 2.40 अरब डॉलर बढ़ा। 42.79 अरब डॉलर और 40.39 अरब डॉलर के बताए गए आंकड़ों के आधार पर यह करीब 5.9% की वृद्धि है।

वित्त वर्ष 2025/26 में भारत ने अमेरिका के साथ करीब 34 अरब डॉलर का व्यापार अधिशेष भी दर्ज किया। व्यापार अधिशेष का मतलब है कि कोई देश अपने व्यापारिक साझेदार से जितना खरीदता है, उससे अधिक उसे बेचता है। ये आंकड़े दिखाते हैं कि अमेरिकी ग्राहकों तक पहुंच भारत के लिए कितना बड़ा व्यावसायिक मुद्दा है।

निर्यातक के लिए अनुकूल टैरिफ प्रतिस्पर्धी कीमत रखने में मदद कर सकता है। अधिक पूर्वानुमेयता से आपूर्ति की समय-सारणी तय करना, सामग्री खरीदना और उत्पादन की योजना बनाना भी आसान होता है। अमेरिकी आयातक के लिए स्थिर शुल्क से वस्तुओं की अंतिम लागत का अनुमान लगाना आसान हो जाता है।

अग्रवाल के बताए दोनों लक्ष्य, तरजीही बाजार पहुंच और टैरिफ स्थिरता, इन अलग-अलग जरूरतों को पूरा करते हैं। तरजीही पहुंच का संबंध इस बात से है कि अन्य विकल्पों के मुकाबले भारतीय उत्पादों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है। स्थिरता का मतलब है कि कंपनियां एक खेप से आगे की प्रतिबद्धताएं करते समय उस व्यवहार पर भरोसा कर सकती हैं या नहीं।

रुबियो की यात्रा में ऊर्जा और निवेश पर जोर

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का 17 से 22 अक्टूबर तक भारत और उज्बेकिस्तान का दौरा तय था। इस दौरान वे सरकारी और कारोबारी नेताओं से मिलेंगे और ऊर्जा सहयोग, वाणिज्यिक निवेश तथा व्यापक आर्थिक संबंधों पर चर्चा करेंगे। इस यात्रा में व्यापार समझौते के अंतिम काम के साथ इन मुद्दों पर भी ध्यान रहेगा।

गोर ने वस्तुओं के व्यापार से आगे बढ़कर कारोबारी गतिविधियों का उल्लेख किया। उन्होंने रिलायंस इंडस्ट्रीज की अमेरिका में एक रिफाइनरी स्थापित करने की योजना का हवाला देते हुए इसे 50 साल में देश की ऐसी पहली परियोजना बताया। भारत के डेटा केंद्रों और सेमीकंडक्टर निर्माण में निवेश की चर्चा करते हुए उन्होंने गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी और माइक्रोन का भी नाम लिया। उन्होंने रक्षा उत्पादन में सहयोग का जिक्र भी किया।

ये निवेश दोनों देशों के संबंधों को व्यापक व्यावसायिक आधार देते हैं। रिफाइनरी कच्चे तेल को ईंधन और अन्य उत्पादों में बदलती है; डेटा केंद्रों में कंप्यूटिंग प्रणालियां रखी जाती हैं; और सेमीकंडक्टर कारखानों में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में इस्तेमाल होने वाली चिपें बनती हैं। इन सभी के लिए यह तय करना होता है कि कहां निर्माण करना है, कहां कर्मचारियों को रखना है और आपूर्ति कहां से खरीदनी है।

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ये बातचीत कूटनीतिक तनाव के बीच भी हो रही है। तनाव के कारणों में ट्रंप का बार-बार यह दावा करना शामिल है कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान युद्धविराम कराया था, और ओमान के तट के पास अमेरिकी सेना का एक जहाज पर हमला, जिसमें तीन भारतीय नाविक मारे गए थे। इस कठिन पृष्ठभूमि के बावजूद व्यापार वार्ता जारी है।

यूरोप के लिए भारत ने अलग समयसीमा बताई

गोयल ने यह भी कहा कि भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते पर दिसंबर 2026 में हस्ताक्षर होंगे और यह फरवरी या मार्च 2027 में लागू हो सकता है। इससे यूरोपीय समझौते के लिए कारोबारियों को अमेरिकी समझौते की तुलना में अधिक स्पष्ट समयसीमा मिलती है।

बातचीत पूरी करने, समझौते पर हस्ताक्षर करने और उसे लागू करने के बीच का अंतर यहां उपयोगी है। पहले वार्ताकार शर्तों पर सहमत होते हैं। हस्ताक्षर पक्षों के बीच समझौते को दर्ज करते हैं। लागू होने का अर्थ है कि आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं के बाद उसकी प्रतिबद्धताएं प्रभावी हो जाती हैं।

गोर ने भारत-अमेरिका के करीब डेढ़ साल के वार्ता दौर की तुलना भारत-ईयू प्रक्रिया से की, जिसमें लगभग दो दशक लगे। उनकी तुलना से अमेरिकी वार्ता की गति को लेकर आशावाद झलका, जबकि गोयल की टिप्पणियों में लागू करने से पहले भारत की वांछित व्यावसायिक शर्तों पर जोर रहा।

दोनों बाजारों में ग्राहकों को सेवा देने वाली भारतीय कंपनियों के लिए अगला व्यावहारिक पड़ाव अंतिम टैरिफ सूचियां और वे तारीखें हैं जिनसे संबंधित प्रतिबद्धताएं लागू होंगी। इन ब्योरे से कारोबारियों को अमेरिका और यूरोप के ग्राहकों को आपूर्ति करने की लागत की तुलना करने में मदद मिलेगी।

अगले चरण को आकार देने वाली तारीखें

बातचीत पहले हुई टैरिफ वृद्धि, ढांचागत समझौते और अमेरिका की नई प्रतिबंध शक्तियों के बीच आगे बढ़ी है। प्रमुख पड़ाव ये हैं:

  • अगस्त 2025: बातचीत का पिछला दौर विफल होने के बाद भारत के अधिकतर सामान पर अमेरिकी टैरिफ 50% तक पहुंचा।
  • फरवरी 2026: द्विपक्षीय ढांचे के तहत भारत के अधिकतर सामान पर दर घटकर 18% हुई।
  • जून 2026 का अंत: अग्रवाल के मुताबिक, वार्ताकारों ने अड़चनों की पहचान कर ली थी।
  • 18 सितंबर, 2026: ट्रंप ने रूसी ऊर्जा खरीद से जुड़े टैरिफ लगाने की अनुमति देने वाले कानून पर हस्ताक्षर किए।
  • 15 अक्टूबर, 2026: भारतीय अधिकारियों ने कहा कि पहले चरण का कानूनी मसौदा तैयार किया जा रहा है, जबकि गोर ने कहा कि बड़े मुद्दे तय हो चुके हैं।
  • 17 से 22 अक्टूबर, 2026: रुबियो का भारत और उज्बेकिस्तान दौरा तय था।
  • दिसंबर 2026: गोयल को भारत-ईयू समझौते पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद थी। यह फरवरी या मार्च 2027 में लागू हो सकता है।

भारत और अमेरिका के सामने तत्काल काम कानूनी पाठ पूरा करना और यह तय करना है कि समझौता वॉशिंगटन की संशोधित टैरिफ संरचना के अनुरूप कैसे होगा। भारत की शर्त व्यावसायिक है: अंतिम शर्तों से उसके निर्यातकों को प्रतिस्पर्धी आपूर्तिकर्ताओं के मुकाबले बढ़त मिलनी चाहिए।

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मुख्य बातें

  • भारत का कहना है कि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते का पहला चरण अंतिम रूप ले चुका है और उस पर कानूनी मसौदा तैयार किया जा रहा है।
  • गोयल ने समझौते को लागू करने को भारतीय निर्यातकों के लिए प्रतिस्पर्धी बढ़त हासिल करने से जोड़ा है।
  • फरवरी के ढांचे के तहत भारत के अधिकतर सामान पर टैरिफ 50% से घटकर 18% हुआ।
  • हस्ताक्षर आंशिक रूप से संशोधित अमेरिकी टैरिफ संरचना और सेक्शन 301 के तहत नतीजों पर निर्भर हैं।
  • रूसी ऊर्जा की खरीद से जुड़े संभावित टैरिफ भारत के लिए बड़ा मुद्दा बने हुए हैं।
  • अप्रैल-अगस्त में अमेरिका को भारत का वस्तुओं का निर्यात एक साल पहले की तुलना में करीब 5.9% बढ़ा।
  • गोयल को उम्मीद है कि भारत-ईयू समझौते पर दिसंबर में हस्ताक्षर होंगे और यह फरवरी या मार्च 2027 में लागू हो सकता है।
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