खाद्य कीमतों ने महंगाई को RBI की ऊपरी सीमा के करीब पहुंचाया
भारत में खुदरा महंगाई सितंबर 2026 में बढ़कर 5.54% हो गई, जबकि खाद्य महंगाई 7.74% तक पहुंच गई और प्याज की कीमतें एक साल पहले के मुकाबले दोगुने से अधिक हो गईं। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा 12 अक्टूबर को जारी अनंतिम आंकड़ों के मुताबिक, देश की महंगाई दर भारतीय रिजर्व बैंक की 6% की ऊपरी सहनशीलता सीमा से महज 0.46 प्रतिशत अंक नीचे रही।
विषय-सूची
- खाद्य कीमतों ने महंगाई को RBI की ऊपरी सीमा के करीब पहुंचाया
- सितंबर में कीमतें बढ़ीं, केवल पिछले साल के मुकाबले नहीं
- प्याज के दामों में उछाल, खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भारी अंतर
- ग्रामीण परिवारों पर अधिक कीमत वृद्धि का असर
- बड़े राज्यों में तमिलनाडु की महंगाई सबसे अधिक
- माल ढुलाई, रेस्तरां और बहुमूल्य धातुओं से भी दबाव
- मौसम और आयात लागत से परिदृश्य जटिल
- RBI ने सख्त मौद्रिक नीति की ओर रुख किया
- CPI की नई श्रृंखला में तुलना सावधानी से जरूरी
- अगली कसौटी फसल की आवक और अक्टूबर के आंकड़े
- मुख्य बातें
अगस्त की संशोधित 4.83% दर से हुई यह बढ़ोतरी 2026 में जारी लगातार वृद्धि का हिस्सा है। जनवरी में 2.74% रहने के बाद से महंगाई हर महीने बढ़ी है और लगातार चार महीनों से RBI के 4% लक्ष्य से ऊपर है। सितंबर की दर अगस्त से 0.71 प्रतिशत अंक अधिक रही, यानी 71 आधार अंक की वृद्धि।
महंगाई का दबाव सभी जगह एक जैसा नहीं था। ग्रामीण महंगाई 6.08% रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 4.88% थी। पांच लाख से अधिक आबादी वाले राज्यों में तमिलनाडु में कुल महंगाई 6.81% और खाद्य महंगाई 10.62% रही, जो सबसे ऊंची दरें थीं।
ये आंकड़े RBI के 7 अक्टूबर के उस फैसले के बाद आए हैं, जिसमें उसने अपनी प्रमुख रेपो दर 25 आधार अंक बढ़ाकर 5.50% कर दी थी। खाद्य वस्तुओं की कमी, महंगा तेल और कमजोर रुपया अब यह परख रहे हैं कि घरों और कर्ज लेने वालों पर अधिक दबाव डाले बिना कीमतों के दबाव को काबू में रखने के लिए यह बढ़ोतरी पर्याप्त होगी या नहीं।
सितंबर में कीमतें बढ़ीं, केवल पिछले साल के मुकाबले नहीं
संयुक्त उपभोक्ता मूल्य सूचकांक अगस्त के 108.74 से बढ़कर सितंबर में 109.49 हो गया, यानी महीने के दौरान लगभग 0.69% की वृद्धि हुई। यह इसलिए अहम है क्योंकि कुल महंगाई दर कीमतों की तुलना पिछले महीने से नहीं, बल्कि एक साल पहले के उसी महीने से करती है।
तुलना का आधार कम होने पर कीमतों में कोई बड़ी नई वृद्धि न होने के बावजूद सालाना महंगाई बढ़ सकती है। इसे आधार प्रभाव कहते हैं। सूचकांक में सितंबर की वृद्धि दिखाती है कि स्थिति में गिरावट केवल 2025 में असामान्य रूप से कम कीमतों का सांख्यिकीय असर नहीं थी।
आनंद राठी समूह के मुख्य अर्थशास्त्री सुजन हजरा ने खाद्य कीमतों में महीने-दर-महीने हुई वृद्धि को इस बात का प्रमाण बताया कि महंगाई में हालिया तेजी पूरी तरह आधार प्रभाव के कारण नहीं थी। सालाना खाद्य महंगाई अगस्त के 5.97% से बढ़कर सितंबर में 7.74% हो गई, यानी 1.77 प्रतिशत अंक की वृद्धि।
कुल महंगाई दर दो सर्वेक्षणों के पूर्वानुमानों के बीच रही। 5 से 7 अक्टूबर के बीच 41 अर्थशास्त्रियों के सर्वेक्षण में 5.40% का अनुमान लगाया गया था। अनुमान 4.90% से 5.90% तक थे। 19 अर्थशास्त्रियों के एक अन्य सर्वेक्षण में 5.6% का पूर्वानुमान था। इस तरह सितंबर की दर पहले पूर्वानुमान से 0.14 प्रतिशत अंक अधिक रही, लेकिन दूसरे से थोड़ी कम थी।
प्याज के दामों में उछाल, खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भारी अंतर
प्याज की महंगाई अगस्त के 48.78% से उछलकर 108.09% हो गई। सितंबर के इस आंकड़े का मतलब है कि प्याज की कीमतें एक साल पहले के स्तर से थोड़ी अधिक दोगुनी थीं। इसका मतलब यह नहीं है कि अगस्त से सितंबर के बीच कीमतें दोगुनी हो गईं। यह अंतर सालाना आधार पर सभी वस्तुओं की महंगाई के आंकड़ों पर लागू होता है।
लहसुन की महंगाई 43.60% से बढ़कर 54.62% हो गई, जबकि नींबू की महंगाई 15.15% से बढ़कर 36.41% रही। अदरक की महंगाई 73.82% से घटकर 62.85% हुई, हालांकि सितंबर 2025 की तुलना में यह अब भी काफी अधिक थी।
कुछ सब्जियां एक साल पहले के मुकाबले सस्ती रहीं। आलू के दाम 11.50% नीचे थे, टमाटर के दाम 8.62% गिरे और भिंडी तथा नारियल की कीमतों में क्रमशः 4.48% और 3.99% की गिरावट आई। इन गिरावटों के बावजूद खाद्य महंगाई तेज हुई।
टमाटर यह भी दिखाते हैं कि किसी श्रेणी की कीमतों में गिरावट के बावजूद सालाना महंगाई दर पर ऊपर की ओर दबाव कैसे बढ़ सकता है। टमाटर की सालाना कीमत गिरावट अगस्त के 31.09% से घटकर सितंबर में 8.62% रह गई। आलू की अपस्फीति 13.15% से घटकर 11.50% हुई। कीमतें पिछले साल के स्तर से नीचे तो रहीं, लेकिन सालाना तुलना से मिलने वाली राहत कम हो गई।
बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने खाद्य वस्तुओं पर बढ़े दबाव की बड़ी वजह नई फसल के मौसम से पहले घटते भंडार को बताया। उन्होंने कहा:
फिलहाल महंगाई मुख्य रूप से पुराने भंडार घटने के कारण बढ़ी है, क्योंकि हम नए मौसम की ओर बढ़ रहे हैं। इसलिए फसल की आवक अहम है,
उनके आकलन के मुताबिक, अगली महंगाई रीडिंग में आने वाली फसल की आवक का समय और मात्रा अहम होंगे। आंकड़े कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज करते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि इसमें मौसम से हुए नुकसान, भंडार में कमी या परिवहन लागत का कितना योगदान रहा।
ग्रामीण परिवारों पर अधिक कीमत वृद्धि का असर
ग्रामीण कुल महंगाई अगस्त के 5.24% से बढ़कर सितंबर में 6.08% हो गई, यानी 0.84 प्रतिशत अंक की वृद्धि। शहरी महंगाई 0.57 प्रतिशत अंक बढ़कर 4.31% से 4.88% रही। दोनों के बीच का अंतर 0.93 से बढ़कर 1.20 प्रतिशत अंक हो गया।
खाद्य महंगाई के आंकड़ों में भी ऐसा ही अंतर दिखा। ग्रामीण खाद्य महंगाई 6.17% से बढ़कर 8.06% रही, जबकि शहरी खाद्य महंगाई 5.64% से बढ़कर 7.18% हो गई। सितंबर में ग्रामीण खाद्य महंगाई शहरी दर से 0.88 प्रतिशत अंक अधिक थी, जबकि अगस्त में यह अंतर 0.53 अंक था।
खाद्य और पेय पदार्थों की व्यापक श्रेणी में महंगाई 7.36% रही। ग्रामीण और शहरी दरें क्रमशः 7.71% और 6.75% थीं। यह श्रेणी उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक से अलग है, इसलिए इसके आंकड़ों को 7.74% की राष्ट्रीय खाद्य महंगाई दर के बराबर नहीं मानना चाहिए।
ग्रामीण महंगाई का 6% से ऊपर होना यह नहीं दर्शाता कि राष्ट्रीय महंगाई दर RBI की सीमा पार कर गई। राष्ट्रीय संयुक्त दर 5.54% रही। यह जरूर दिखाता है कि अलग-अलग जगहों के परिवारों को कीमतों में काफी अलग दर से बढ़ोतरी का सामना करना पड़ा।
बड़े राज्यों में तमिलनाडु की महंगाई सबसे अधिक
पांच लाख से अधिक आबादी वाले राज्यों में तमिलनाडु की कुल महंगाई दर 6.81% रही, जो सबसे अधिक थी। इसके बाद ओडिशा 6.70%, मध्य प्रदेश 6.68%, तेलंगाना 6.64% और आंध्र प्रदेश 6.29% पर रहे। ये सभी दरें राष्ट्रीय स्तर से अधिक थीं।
तमिलनाडु की 10.62% खाद्य महंगाई राष्ट्रीय खाद्य महंगाई दर से 2.88 प्रतिशत अंक अधिक थी। सबसे अधिक खाद्य महंगाई वाले पांच राज्यों में आंध्र प्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक और महाराष्ट्र भी शामिल थे, हालांकि इन राज्यों की अलग-अलग खाद्य महंगाई दरें नहीं बताई गईं।
अन्य बड़े राज्यों में कुल महंगाई दर उत्तर प्रदेश में 6.08%, कर्नाटक में 5.86%, राजस्थान में 5.71% और महाराष्ट्र में 5.18% रही। तमिलनाडु की दर महाराष्ट्र से 1.63 प्रतिशत अंक अधिक थी। इससे पता चलता है कि एक राष्ट्रीय आंकड़ा क्षेत्रीय स्तर के बड़े अंतर को छिपा सकता है।
इन रैंकिंग को समझते समय आबादी की सीमा पर ध्यान देना जरूरी है। यह तुलना बड़े राज्यों में सबसे ऊंची दरों की पहचान करती है, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की पूरी रैंकिंग नहीं देती। ये आंकड़े अपने आप में हर राज्य की स्थिति के कारण भी स्पष्ट नहीं करते।
माल ढुलाई, रेस्तरां और बहुमूल्य धातुओं से भी दबाव
महंगाई केवल सब्जियों तक सीमित नहीं थी। रेस्तरां और आवास सेवाओं में महंगाई अगस्त के 8.38% से बढ़कर 9.36% हो गई। परिवहन महंगाई 4.60% से बढ़कर 5.01% रही। परिवहन के भीतर माल ढुलाई सेवाओं में महंगाई 14.73% रही, जबकि निजी परिवहन में यह 7.46% थी।
परिवहन श्रेणी के बाहर भी माल ढुलाई की लागत अहम है, क्योंकि खाद्य और अन्य वस्तुओं को बाजारों तक पहुंचाना पड़ता है। शिपिंग और वितरण खर्च बढ़ने से खुदरा कीमतों पर असर पड़ सकता है, हालांकि सितंबर की रिपोर्ट यह नहीं बताती कि खाद्य कीमतों में वृद्धि का कितना हिस्सा इस वजह से आया।
व्यक्तिगत देखभाल, सामाजिक सुरक्षा और विविध वस्तुओं एवं सेवाओं की श्रेणी में 12 प्रमुख श्रेणियों में सबसे अधिक 13.75% महंगाई रही। हालांकि यह दर अगस्त के 15.17% से कम थी। चांदी के आभूषणों की महंगाई भी 106.81% से घटकर 87.80% रही, लेकिन यह अब भी असाधारण रूप से ऊंची थी।
अन्य श्रेणियों में अपेक्षाकृत मध्यम वृद्धि दर्ज की गई। शिक्षा सेवाओं में महंगाई 3.94%, कपड़ों और जूतों में 3.93%, साज-सज्जा और घरेलू उपकरणों में 3.11% तथा आवास, पानी, बिजली, गैस और अन्य ईंधनों में 2.74% रही। सूचना और संचार में 2.44%, मनोरंजन, खेल और संस्कृति में 2.16% तथा स्वास्थ्य में 1.40% महंगाई रही। पान, तंबाकू और नशीले पदार्थों की दर 4.80% थी।
ICRA ने मुख्य महंगाई का अनुमान 4.6% लगाया, जबकि अगस्त में यह 4.16% थी। कम उतार-चढ़ाव वाले कीमतों के दबाव को समझने में मदद के लिए मुख्य महंगाई में खाद्य और ईंधन को शामिल नहीं किया जाता। यह रेटिंग एजेंसी का अनुमान था, मंत्रालय की कुल CPI दर से अलग। RBI ने मार्च 2027 में समाप्त होने वाले वित्त वर्ष के लिए औसत मुख्य महंगाई 4.4% रहने का अनुमान लगाया था।
मौसम और आयात लागत से परिदृश्य जटिल
महंगाई में यह वृद्धि कमजोर दक्षिण-पश्चिम मानसूनी बारिश और अल नीनो की स्थितियों के बीच हुई है। इससे फसल उत्पादन और जलाशयों में पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी है। भारत मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, जून से सितंबर के दौरान हुई बारिश एक दशक से अधिक समय में सबसे कम, 2001 के बाद चौथी सबसे कम और 1901 के बाद 13वीं सबसे कम थी।
महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, पंजाब और हरियाणा के कुछ हिस्सों में गंभीर सूखे की स्थिति बताई गई। जलाशयों में पानी का कम स्तर रबी फसल के लिए भी जोखिम पैदा करता है, जो मानसून के बाद बोई जाती है। खरीफ फसलों की नई आवक से कुछ तात्कालिक कमी दूर हो सकती है, लेकिन पानी की कम उपलब्धता कृषि क्षेत्र की अनिश्चितता को लंबा खींच सकती है।
ऊर्जा लागत से अलग दबाव है। अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष तथा होर्मुज जलडमरूमध्य से माल ढुलाई पर जोखिम के बीच ब्रेंट कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहा। कुछ रिपोर्टों में ब्रेंट का भाव 103 डॉलर से अधिक बताया गया, जो अक्टूबर में 12% से 14% की वृद्धि के बाद का स्तर था।
भारत की आयातित तेल पर भारी निर्भरता के कारण अंतरराष्ट्रीय कीमत और विनिमय दर, दोनों अहम हैं। डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग 7% गिरा था, जिससे डॉलर में तय खरीद की घरेलू लागत बढ़ गई। तेल की ऊंची कीमतें खुदरा ईंधन कीमतों पर पूरा असर पड़ने से पहले ही माल ढुलाई और उत्पादन लागत को प्रभावित कर सकती हैं।
RBI ने कहा है कि खाद्यान्न का पर्याप्त बफर और सरकार के कदम मौसम से जुड़े कुछ दबाव को कम कर सकते हैं। राहत कितनी होगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है। महंगी ऊर्जा और कम बारिश अलग जोखिम हैं, जिन्हें ऊंची ब्याज दर सीधे दूर नहीं कर सकती।
RBI ने सख्त मौद्रिक नीति की ओर रुख किया
7 अक्टूबर की बढ़ोतरी से रेपो दर 5.25% से बढ़कर 5.50% हो गई। फरवरी 2023 के बाद यह पहली बढ़ोतरी थी। रेपो दर वह प्रमुख दर है जिस पर RBI बैंकों को कर्ज देता है। इसमें बदलाव से उधारी की लागत प्रभावित हो सकती है, जिसमें परिवर्तनीय ब्याज दर वाले ऋण भी शामिल हैं। हालांकि असर का समय हर ऋण की शर्तों पर निर्भर करता है।
2025 में कुल 125 आधार अंकों की दर कटौती के बाद और लगातार चार समीक्षाओं में दर 5.25% पर बनाए रखने के बाद केंद्रीय बैंक ने संतुलित सख्ती का रुख अपनाया। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने संकेत दिया कि अगला कदम दर बढ़ाना या उसे स्थिर रखना हो सकता है। निकट भविष्य में दर कटौती की संभावना नहीं है।
RBI ने मार्च 2027 में समाप्त होने वाले वित्त वर्ष के लिए महंगाई का अनुमान 5.0% से बढ़ाकर 5.2% कर दिया। उसने सितंबर तिमाही के लिए 4.9%, दिसंबर तिमाही के लिए 6.0% और मार्च तिमाही के लिए 5.7% का अनुमान लगाया। अगले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में महंगाई 5.6% रहने का अनुमान था। मल्होत्रा ने कहा कि अगले तीन तिमाहियों में औसत महंगाई करीब 5.8% रह सकती है।
कोटक महिंद्रा बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री उपासना भारद्वाज ने आने वाले महीनों में महंगाई 6% से ऊपर जाने की उम्मीद जताई और आगे और सख्ती का अनुमान लगाया। उन्होंने कहा:
हम रेपो दर में 50 आधार अंकों की अतिरिक्त बढ़ोतरी की उम्मीद करते हैं। अगर भू-राजनीतिक जोखिम कम नहीं हुए तो दर और बढ़ने का जोखिम रहेगा,
अन्य पूर्वानुमान भी इसी दिशा में थे। ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की एलेक्जेंड्रा हरमन प्रसाद ने दिसंबर और फरवरी में 25-25 आधार अंकों की बढ़ोतरी की उम्मीद जताई, जबकि एलारा सिक्योरिटीज की गरिमा कपूर ने मार्च 2027 के अंत तक दो और बढ़ोतरी का अनुमान लगाया। ये अर्थशास्त्रियों के पूर्वानुमान हैं, RBI के घोषित फैसले नहीं।
CPI की नई श्रृंखला में तुलना सावधानी से जरूरी
सितंबर की रिपोर्ट में CPI का आधार वर्ष 2024 है, जिसने 2012 की जगह ली है। इसमें 2023-24 के घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण से मिले खर्च के पैटर्न के आधार पर उपभोग की वस्तुओं की टोकरी को अद्यतन किया गया है। नया आधार वर्ष संदर्भ बिंदु बदलता है और अलग-अलग खरीदारी को दिए जाने वाले महत्व में भी बदलाव कर सकता है।
2024 आधार वर्ष पर ऐतिहासिक CPI गणनाओं के मुताबिक, अक्टूबर 2024 में महंगाई 6.21% थी, जिससे सितंबर 2026 के बाद की दर सबसे ऊंची रही। हालांकि, रिपोर्टों में इस नतीजे को अलग-अलग तरह से बताया गया है: 21, 22 या 23 महीनों का उच्चतम स्तर। सबसे सटीक विवरण यह है कि पुनर्गणित श्रृंखला में यह अक्टूबर 2024 के बाद की सबसे ऊंची दर और 2026 में अब तक की सबसे ऊंची दर थी।
पिछले वर्ष से तुलना के आंकड़ों में भी अंतर है। 2024 की पुनर्गणित श्रृंखला सितंबर 2025 की महंगाई 1.41% बताती है, जबकि एक अन्य रिपोर्ट में 1.54% का आंकड़ा दिया गया है। यह बताए बिना कि किस श्रृंखला का इस्तेमाल हुआ है, इन आंकड़ों को एक समान नहीं मानना चाहिए। दिसंबर 2024 में 8.39% खाद्य महंगाई पुराने 2012 आधार पर मापी गई थी, इसलिए सितंबर की 7.74% दर से इसकी तुलना करते समय भी यही सावधानी जरूरी है।
अगस्त की कुल महंगाई दर पहले 4.82% बताई गई थी और बाद में संशोधित कर 4.83% की गई। संशोधित आंकड़े के आधार पर सितंबर में 71 आधार अंकों की वृद्धि हुई। 4.82% का उल्लेख करने वाली रिपोर्टें पहले जारी आंकड़े पर आधारित हैं।
मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 1,407 शहरी बाजारों और 1,465 गांवों से कीमतों के आंकड़े जुटाए। सितंबर में ग्रामीण और शहरी, दोनों बाजारों में जवाब की दर 100% रही। इसके बावजूद रिपोर्ट अनंतिम है।
अगली कसौटी फसल की आवक और अक्टूबर के आंकड़े
इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च के मुख्य अर्थशास्त्री देवेंद्र पंत ने प्रतिकूल आधार प्रभाव के चलते अक्टूबर में महंगाई करीब 6% रहने का अनुमान लगाया। ब्रिकवर्क रेटिंग्स में शोध प्रमुख राजीव शरण ने आने वाले महीनों में महंगाई 5.5% से 6.5% के आसपास रहने की उम्मीद जताई और चेताया कि खाद्य कीमतों का ऊंचा बने रहना और बढ़ती ब्याज दरें घरेलू बजट तथा ऋण चुकाने की क्षमता पर दबाव डाल सकती हैं।
वृद्धि के पूर्वानुमान तुलनात्मक रूप से मजबूत बने हुए हैं। मार्च 2027 में समाप्त होने वाले वित्त वर्ष के लिए RBI और विश्व बैंक ने 7.1% वृद्धि का अनुमान लगाया, जबकि एशियाई विकास बैंक ने सितंबर के एशियन डेवलपमेंट आउटलुक में 7.0% वृद्धि का अनुमान दिया। जून तिमाही में वृद्धि 7.8% रही थी। इन अनुमानों से उपभोक्ताओं पर दबाव कम नहीं होता, लेकिन ये RBI के सामने मौजूद चुनौती को रेखांकित करते हैं: महंगाई पर काबू रखते हुए अर्थव्यवस्था को जरूरत से ज्यादा धीमा होने से बचाना।
आगे की तात्कालिक घटनाक्रम-श्रृंखला यह है:
- जनवरी 2026: नई CPI श्रृंखला के तहत कुल महंगाई 2.74% रही।
- जून 2026: महंगाई 4.38% पर पहुंची और RBI के 4% लक्ष्य से ऊपर लगातार चार महीने रहने की अवधि शुरू हुई।
- 7 अक्टूबर: RBI ने रेपो दर बढ़ाकर 5.50% की।
- 12 अक्टूबर: मंत्रालय ने सितंबर की 5.54% अनंतिम महंगाई दर जारी की।
- 12 नवंबर: अक्टूबर 2026 के CPI महंगाई आंकड़े जारी होने तय हैं।
- दिसंबर: अर्थशास्त्रियों को उम्मीद है कि अगली मौद्रिक नीति समीक्षा में और सख्ती पर विचार होगा।
ब्याज दर में और बढ़ोतरी का कोई फैसला नहीं हुआ है। अगली रिपोर्ट दिखाएगी कि नई फसल की आवक से राहत मिलती है या नहीं, परिवहन और सेवा क्षेत्र की महंगाई में तेजी जारी रहती है या नहीं, और कम तुलना आधार सालाना दर को कितना बढ़ाता है।
मुख्य बातें
- सितंबर में खुदरा महंगाई बढ़कर अनंतिम रूप से 5.54% रही, जबकि अगस्त की संशोधित दर 4.83% थी।
- खाद्य महंगाई 7.74% तक पहुंची और प्याज की कीमतें एक साल पहले के मुकाबले 108.09% बढ़ीं।
- ग्रामीण महंगाई 6.08% रही, जबकि शहरी महंगाई 4.88% थी।
- पांच लाख से अधिक आबादी वाले राज्यों में तमिलनाडु सबसे ऊपर रहा। वहां कुल महंगाई 6.81% और खाद्य महंगाई 10.62% थी।
- RBI ने 7 अक्टूबर को रेपो दर बढ़ाकर 5.50% की और मार्च 2027 में समाप्त होने वाले वित्त वर्ष के लिए सालाना महंगाई 5.2% रहने का अनुमान लगाया।
- आगे ब्याज दरें बढ़ने की बात अभी पूर्वानुमान है, फैसला नहीं। अक्टूबर की महंगाई के आंकड़े 12 नवंबर को जारी होने हैं।






