छह कर्मचारियों के पक्ष में पांच संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का निष्कर्ष
श्रीलंका के मानवाधिकार आयोग ने पाया है कि कलमुनाई नॉर्थ बेस अस्पताल ने स्वास्थ्य सहायक के रूप में कार्यरत छह मुस्लिम महिलाओं के धार्मिक परिधान पर पाबंदी लगाकर पांच संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया। 12 अक्टूबर के उसके फैसले में महिलाओं को अस्पताल लौटने का विकल्प देने और ऐसे राष्ट्रीय नियम बनाने की सिफारिश की गई है, जिनके तहत सरकारी वर्दी के साथ धार्मिक परिधान पहनने की अनुमति हो।
विषय-सूची
- छह कर्मचारियों के पक्ष में पांच संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का निष्कर्ष
- विवाद कैसे शुरू हुआ
- वर्दी संबंधी दलील क्यों खारिज हुई
- संवैधानिक निष्कर्षों का अर्थ
- उत्पीड़न और तबादलों पर अलग कार्रवाई जरूरी
- अस्पताल से क्या करने को कहा गया
- राष्ट्रीय परिपत्र और पहचान की सुरक्षा
- पहले की पाबंदियां बताती हैं कि स्पष्टता क्यों जरूरी है
- क्या अब भी अनसुलझा है
- मुख्य बातें
यह विवाद पूर्वी प्रांत के अम्पारा जिले के सरकारी अस्पताल में नवनियुक्त 36 स्वास्थ्य सहायकों में से छह शिकायतकर्ताओं से जुड़ा था। भर्ती हुई महिलाओं में नौ मुस्लिम थीं। अस्पताल अधिकारियों के निर्देश के बाद तीन महिलाओं ने अपने अतिरिक्त कपड़े उतार दिए, जबकि छह ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। आयोग ने पाया कि निर्देश मानने वाली तीन महिलाओं का भी बिना किसी औचित्य के तबादला किया गया।
महिलाओं ने कहा कि उन्हें निर्धारित वर्दी के साथ पहने जाने वाले सिर ढकने के कपड़े, पूरी बांह की कमीज और पतलून उतारने को कहा गया। साथ ही चेतावनी दी गई कि निर्देश न मानने पर वे हाजिरी रजिस्टर पर हस्ताक्षर नहीं कर सकेंगी। उनके मुताबिक, उनसे कहा गया कि वे कपड़े बदलें, तबादला स्वीकार करें या इस्तीफा दें।
आयोग ने अस्पताल के 1989 और 2022 के लोक प्रशासन परिपत्रों पर भरोसे को खारिज करते हुए कहा कि इनमें से किसी में भी विवादित धार्मिक परिधान पर स्पष्ट रोक नहीं थी। उसे ऐसा कोई सबूत भी नहीं मिला कि ये परिधान किसी वैध उद्देश्य के लिए खतरा थे। आयोग ने यह भी कहा कि उसी जिले के एक अन्य सरकारी अस्पताल में इसी तरह के कपड़ों की अनुमति थी।
यह फैसला केवल वर्दी को लेकर असहमति तक सीमित नहीं है। इसमें रोजगार तक पहुंच, कथित उत्पीड़न, अनुशासनात्मक जांच के बिना तबादले और महिलाओं के एक खास समूह पर लागू नियमों के भेदभावपूर्ण असर पर विचार किया गया है। आयोग ने इस व्यवहार को नस्ल, धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव बताया, हालांकि उसे स्पष्ट भेदभावपूर्ण मंशा का कोई सबूत नहीं मिला।
फैसले पर अमल की स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। प्रगति संबंधी रिपोर्ट जमा करने की समयसीमा के बारे में भी खबरों में मतभेद है: ज्यादातर में 11 नवंबर 2026 की तारीख दी गई है, जबकि एक अन्य रिपोर्ट में 19 नवंबर 2026 बताया गया है।
विवाद कैसे शुरू हुआ
महिलाओं को स्वास्थ्य मंत्रालय ने नियुक्त किया था। आयोग के निष्कर्षों पर आधारित खबरों के अनुसार, उन्होंने 6 अगस्त 2026 को अस्पताल में काम शुरू किया और परिचय सत्र के दौरान उन्हें निर्देश दिए गए। एक पहले की रिपोर्ट में कहा गया है कि 10 अगस्त को पाली शुरू होने से पहले हिजाब उतारने का निर्देश दिया गया था। ये तारीखें अलग-अलग घटनाओं की हो सकती हैं, लेकिन इसकी पुष्टि नहीं हुई है।
महिलाओं को सलाह देने वाले वकील मुबारक अज्जाम ने कहा कि 13 अगस्त को आयोग में पांच शिकायतें दर्ज की गई थीं। यह संख्या अक्टूबर के निष्कर्षों में पहचानी गई छह शिकायतकर्ताओं से अलग है। पहले की एक रिपोर्ट में नौ महिलाओं के शिकायत करने की बात भी कही गई थी, जबकि फैसले में नौ मुस्लिम भर्ती महिलाओं और उन छह महिलाओं के बीच अंतर किया गया है जिनके अधिकारों के उल्लंघन की जांच की गई।
रिपोर्टों में बताई गई घटनाओं का क्रम:
- 6 अगस्त 2026: आयोग के निष्कर्षों पर आधारित खबरों के अनुसार, नवनियुक्त सहायकों ने काम शुरू किया।
- 10 अगस्त: एक पहले की रिपोर्ट में इस दिन पाली से पहले हिजाब उतारने का निर्देश दिए जाने की बात कही गई है।
- 13 अगस्त: अज्जाम ने कहा कि पांच शिकायतें दर्ज की गई थीं और मौलिक अधिकार याचिका की तैयारी चल रही थी।
- 12 अक्टूबर: आयोग ने निष्कर्ष जारी किए कि अस्पताल ने छह महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन किया।
- नवंबर 2026: प्रगति रिपोर्ट मांगी गई; खबरों में 11 और 19 नवंबर, दोनों तारीखें दी गई हैं।
मौलिक अधिकार याचिका का अज्जाम का उल्लेख सार्वजनिक अधिकारियों के उल्लंघनों को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपनाए जाने वाले एक अलग रास्ते से जुड़ा था। ऐसी याचिका की तैयारी से यह साबित नहीं होता कि उसे दायर किया गया या अदालत ने विवाद पर फैसला सुनाया।
वर्दी संबंधी दलील क्यों खारिज हुई
अस्पताल के प्रतिनिधियों ने आयोग के कलमुनाई क्षेत्रीय कार्यालय से कहा कि वे लोक प्रशासन के परिपत्रों को लागू कर रहे थे और अन्य कर्मचारियों की शिकायतों पर कार्रवाई कर रहे थे। अस्पताल के अध्यक्ष चंद्रसेकरम राजन ने अलग से वर्ष 2000 में जारी वर्दी संबंधी दिशानिर्देश का हवाला दिया।
राजन ने उस दिशानिर्देश का बचाव करते हुए कहा कि यह स्वास्थ्यकर्मियों के लिए एक समान मानक है और:
जाति, जातीयता, धर्म या भाषा के आधार पर भेद किए बिना सभी पर समान रूप से लागू होता है।
कलमुनाई में लगाई गई पाबंदियों को लेकर आयोग इस नतीजे पर नहीं पहुंचा। उसने पाया कि संबंधित 1989 और 2022 के परिपत्रों में धार्मिक रूप से सिर ढकने या अतिरिक्त शालीनता वाले कपड़े पहनने पर रोक नहीं थी। आयोग ने अस्पताल की व्याख्या को मनमाना, अनुचित और भेदभावपूर्ण बताया।
वर्ष 2000 के दिशानिर्देश और दोनों परिपत्र अलग-अलग दस्तावेज हैं। खबरों में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि 2000 का दिशानिर्देश फैसले में जांचे गए दस्तावेजों से किस तरह जुड़ा था। इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि तीनों में एक जैसी शर्तें थीं।
पास के अस्पताल में इसी तरह के परिधान की अनुमति होना भी अहम था। इससे पता चला कि जिले के दूसरे अस्पताल में धार्मिक कपड़े और आधिकारिक वर्दी साथ पहने जा रहे थे, यानी उन्हें स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे के विपरीत नहीं माना जा रहा था। आयोग को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला कि कलमुनाई की कर्मचारियों के कपड़ों से किसी वैध उद्देश्य को खतरा था।
संवैधानिक निष्कर्षों का अर्थ
आयोग ने श्रीलंका के संविधान के अनुच्छेद 10, 12(1), 12(2), 14(1)(e) और 14(1)(g) का उल्लंघन पाया। ये प्रावधान मिलकर धार्मिक आस्था, समानता, भेदभाव से सुरक्षा, धर्म के पालन और वैध रोजगार के अधिकारों की रक्षा करते हैं।
अनुच्छेद 10 विचार, विवेक और धर्म की स्वतंत्रता की रक्षा करता है। अनुच्छेद 14(1)(e) धर्म या आस्था को व्यक्त करने के अधिकार की रक्षा करता है, यानी अभ्यास और पालन के जरिए उसे जाहिर करने के अधिकार की। इस मामले में परिधान को लेकर विवाद का संबंध महिलाओं की अपने काम के दौरान धार्मिक आस्था व्यक्त करने की क्षमता से था।
अनुच्छेद 12(1) कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 12(2) भेदभाव से सुरक्षा देता है। अनुच्छेद 14(1)(g) वैध पेशा अपनाने की स्वतंत्रता से संबंधित है। इसलिए निष्कर्षों में धार्मिक परिधान और महिलाओं के रोजगार पर उसके असर, दोनों पर विचार किया गया।
आयोग के भेदभाव को अंतर्संबंधित बताने का अर्थ है कि महिलाओं के साथ व्यवहार उनकी पहचान के आपस में जुड़े पहलुओं, इस मामले में नस्ल, धर्म और लिंग, से प्रभावित था। आयोग के निष्कर्ष के लिए यह साबित करना जरूरी नहीं था कि अधिकारियों ने खुले तौर पर भेदभावपूर्ण मंशा जाहिर की थी। आयोग ने कहा कि पाबंदियों का असर भेदभावपूर्ण था।
यह मानवाधिकार आयोग का फैसला है, जिसमें सार्वजनिक अधिकारियों को सिफारिशें दी गई हैं; यह सुप्रीम कोर्ट का प्रकाशित फैसला नहीं है। क्या तय हुआ है और किस पर अब भी प्रशासनिक कार्रवाई जरूरी है, यह समझने में यह अंतर अहम है।
उत्पीड़न और तबादलों पर अलग कार्रवाई जरूरी
शिकायतकर्ताओं ने मौखिक उत्पीड़न और डराने-धमकाने के आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि अस्पताल अधिकारियों ने कपड़ों संबंधी निर्देश मानने के विकल्प के तौर पर तबादले, दूसरे कर्मचारियों के साथ आपसी तबादले या इस्तीफे की पेशकश की। आयोग ने पाया कि अनुशासनात्मक जांच के बिना उनका तबादला करना उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन था।
निष्कर्षों में महिलाओं के मदद मांगने के बाद के व्यवहार का भी उल्लेख है। आयोग के पास जाने के बाद अस्पताल ने अनुशासनात्मक कार्रवाई की धमकी वाला पत्र जारी किया और अन्य कर्मचारियों को कामकाज के समय अस्पताल परिसर में उनके खिलाफ प्रदर्शन करने दिया।
इन घटनाओं से मामला कपड़ों को लेकर शुरुआती निर्देश से आगे बढ़ता है। ये इस बात से जुड़ी हैं कि निर्देश को चुनौती देने पर कर्मचारियों के साथ कैसा व्यवहार हुआ और शिकायतों पर विचार के दौरान क्या उनके लिए कार्यस्थल तक पहुंच बनी रही।
आयोग के अनुसार, जिन तीन मुस्लिम भर्ती महिलाओं ने अपने अतिरिक्त कपड़े उतार दिए थे, उनका भी बिना औचित्य तबादला किया गया। यानी निर्देश मानने से भी यह सुनिश्चित नहीं हुआ कि वे अपने मूल कार्यस्थल पर बनी रह सकें।
आयोग ने उत्पीड़न के आरोपों की पूरी और निष्पक्ष जांच की सिफारिश की। इस सिफारिश को ऐसी पूरी हो चुकी जांच नहीं समझना चाहिए जिसमें खास कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय की गई हो। ऐसी किसी जांच का नतीजा सामने नहीं आया है।
अस्पताल से क्या करने को कहा गया
आयोग ने अस्पताल निदेशक डॉ. के. सुकुनन को चार सिफारिशें दीं। इनमें परिधान नियमों को स्पष्ट करना, कथित दुर्व्यवहार की जांच करना और शिकायतकर्ताओं को लौटने का विकल्प देना शामिल है।
- प्रशासनिक कर्मचारियों को लिखित निर्देश जारी किए जाएं कि कर्मचारी निर्धारित वर्दी के साथ सिर ढकने के कपड़े, पूरी बांह की कमीज और पतलून पहन सकते हैं।
- अस्पताल के कर्मचारियों पर उत्पीड़न के आरोपों की पूरी और निष्पक्ष जांच की जाए।
- छह शिकायतकर्ताओं को लिखित रूप में कलमुनाई नॉर्थ बेस अस्पताल में काम पर लौटने का विकल्प दिया जाए।
- लौटने वाली किसी भी शिकायतकर्ता को विवादित धार्मिक परिधान पहनने की अनुमति दी जाए।
लौटने का प्रस्ताव महिलाओं के लिए एक विकल्प है, अस्पताल में फिर से काम शुरू करने का निर्देश नहीं। लिखित प्रस्ताव से उन शर्तों का रिकॉर्ड भी मिलेगा जिनके तहत वे लौट सकती हैं।
रिपोर्टों से यह पुष्टि नहीं होती कि प्रस्ताव दिए जा चुके हैं या नहीं, कोई महिला लौटना चाहती है या नहीं, अथवा अस्पताल ने लिखित स्पष्टीकरण जारी किया है या नहीं। फैसले की प्रतियां स्वास्थ्य मंत्री और लोक प्रशासन मंत्रालय के सचिव को भेजी गईं।
राष्ट्रीय परिपत्र और पहचान की सुरक्षा
आयोग ने लोक प्रशासन मंत्रालय से एक नया परिपत्र जारी करने को भी कहा, जिसके तहत सरकारी कर्मचारी अपनी बुनियादी वर्दी के साथ धार्मिक परिधान पहन सकें, बशर्ते उनकी पहचान स्पष्ट रूप से की जा सके। कई खबरों में कहा गया है कि यह प्रस्ताव 26 जून 2019 के लोक प्रशासन परिपत्र संख्या 13/2019 पर आधारित है।
परिपत्र एक प्रशासनिक निर्देश होता है, जो सरकारी संस्थानों को बताता है कि किसी नीति को कैसे लागू करना है। राष्ट्रीय स्तर का निर्देश अलग-अलग अस्पतालों या विभागों को परिधान नियमों की परस्पर विरोधी व्याख्या करने से रोक सकता है, जैसा आयोग द्वारा बताए गए कलमुनाई और दूसरे अस्पताल के बीच हुआ।
पहचान की शर्त इस सिफारिश का अहम हिस्सा है। हिजाब बाल और गर्दन ढकता है, जबकि नकाब चेहरे को ढकता है। आयोग के प्रस्ताव में धार्मिक परिधान की अनुमति के साथ यह शर्त भी है कि अधिकारियों की पहचान की जा सके। इसे पहचान की जरूरतों की परवाह किए बिना हर तरह के आवरण की अनुमति के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने पहले ही राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके से सरकारी सेवाओं और सार्वजनिक स्थानों पर हिजाब पहनने को लेकर राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग की थी। उनकी मांग में कहा गया था:
एक स्पष्ट नीति बनाई जाए, जो पूरे देश में लागू हो
कालुतारा के राइट्स डिफेंडर्स ग्रुप के रवि अल्विस ने भी बार-बार होने वाले विवाद रोकने के लिए राष्ट्रीय नीति की मांग की थी। आयोग की सिफारिश से अब लोक प्रशासन मंत्रालय के विचार के लिए एक ठोस प्रशासनिक उपाय सामने आया है, लेकिन किसी नए परिपत्र या उसे अपनाने की पुष्टि की गई तारीख की खबर नहीं है।
पहले की पाबंदियां बताती हैं कि स्पष्टता क्यों जरूरी है
सिस्टरहुड इनिशिएटिव का दिसंबर 2024 में प्रकाशित लैंगिक इस्लामोफोबिया पर विश्लेषण सार्वजनिक रोजगार और शिक्षा में मुस्लिम महिलाओं पर पहले लगाई गई पाबंदियों का वर्णन करता है। यह नागरिक समाज का विवरण है, सरकारी फैसला नहीं।
इसमें कहा गया है कि 2019 के एक परिपत्र ने सार्वजनिक सेवाओं में हिजाब, नकाब और अबाया पर पाबंदी लगाई थी। मुस्लिम महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार आयोग की पैरवी के बाद इसे रद्द कर दिया गया। यह इतिहास रद्द की गई पाबंदी और अब लागू किए जा रहे वर्दी नियमों के बीच अंतर स्पष्ट करने की जरूरत दिखाता है।
विश्लेषण में 2019 के ईस्टर रविवार हमलों के बाद चेहरे को ढकने वाले आवरण पर अस्थायी पाबंदियों, पाबंदी हटने के बाद भी चेहरे के आवरण पर रोक लगाने वाले जारी नोटिसों और बाद में पाबंदी फिर लागू करने के प्रस्तावों का भी वर्णन है। इसमें प्रस्तावित कैबिनेट उपाय के संदर्भ में पूर्व सार्वजनिक सुरक्षा मंत्री सरथ वीरसेकरा का नाम लिया गया है।
परिधान को लेकर विवादों का असर शिक्षा पर भी पड़ा है। दिसंबर 2024 के विश्लेषण में कहा गया है कि त्रिंकोमाली की 70 मुस्लिम लड़कियों को हिजाब से जुड़ी पहचान की पुष्टि संबंधी चिंताओं के चलते एडवांस्ड लेवल परीक्षा के नतीजे नहीं दिए गए। एक अलग रिपोर्ट कहती है कि आयोग ने 26 जून को फैसला दिया कि करीब 70 लड़कियों के नतीजे रोकना उनके अधिकारों का उल्लंघन था। इन दोनों विवरणों का आपसी संबंध, और क्या वे एक ही कार्यवाही के बारे में हैं, स्पष्ट नहीं है।
सिस्टरहुड इनिशिएटिव मुस्लिम समुदाय के भीतर के दबावों का भी वर्णन करता है। इनमें 2023 में अकुराना मस्जिद के अधिकारियों की सलाह शामिल है कि संभावित सुरक्षा खतरे के कारण रमजान के दौरान अबाया और चेहरे के आवरण न पहने जाएं और मस्जिद न जाएं। इसकी व्यापक चर्चा में विवाह कानून सुधार का अटकना और कार्यकर्ताओं बिस्लिया भुट्टो तथा जुवैरिया मोहिदीन का उत्पीड़न भी शामिल है। ये अलग-अलग मुद्दे हैं, लेकिन बताते हैं कि मुस्लिम महिलाओं को प्रभावित करने वाले फैसलों को धार्मिक समुदायों के बीच एक विवाद तक सीमित नहीं किया जा सकता।
क्या अब भी अनसुलझा है
आयोग ने चेतावनी दी कि धार्मिक परिधान पर मनमानी पाबंदियों से कार्यस्थल का माहौल प्रतिकूल हो सकता है, समुदायों के बीच तनाव बढ़ सकता है और राष्ट्रीय मेल-मिलाप कमजोर पड़ सकता है। कलमुनाई के निष्कर्ष इसका ठोस उदाहरण पेश करते हैं: सरकारी नौकरियों पर नियुक्त महिलाओं को ऐसी पाबंदियों का सामना करना पड़ा, जिन्हें आयोग ने कानून में निर्धारित नहीं पाया।
व्यावहारिक नतीजा कई अलग-अलग कार्रवाइयों पर निर्भर है। अस्पताल को लिखित परिधान स्पष्टीकरण, काम पर लौटने के प्रस्ताव और उत्पीड़न की जांच संबंधी सिफारिशों पर जवाब देना है। मंत्रालय को राष्ट्रीय परिपत्र के प्रस्ताव पर जवाब देना है। निष्कर्ष जारी हो जाने भर से इन कदमों को पूरा नहीं माना जाना चाहिए।
रिपोर्ट जमा करने की समयसीमा भी स्पष्ट करने की जरूरत है। राष्ट्रीय परिपत्र की सिफारिश पर केंद्रित रिपोर्ट समेत कई खबरों में 11 नवंबर 2026 की तारीख दी गई है। अस्पताल संबंधी निष्कर्षों के एक अधिक विस्तृत विवरण में 19 नवंबर 2026 बताया गया है। लागू तारीख की पुष्टि न होने तक इस अंतर को स्पष्ट रखा जाना चाहिए।
इस फैसले से महिलाओं के अधिकारों और वर्दी नियमों की अस्पताल की व्याख्या पर आयोग का रुख स्पष्ट होता है। इस रुख से रोजगार के विकल्प बहाल होंगे और सरकारी कार्यस्थलों पर एक जैसे नियम लागू होंगे या नहीं, यह अस्पताल और मंत्रालय के जवाबों पर निर्भर करता है।
मुख्य बातें
- मानवाधिकार आयोग ने पाया कि कलमुनाई नॉर्थ बेस अस्पताल ने छह मुस्लिम स्वास्थ्य सहायकों के पांच संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया।
- 36 नए सहायकों में नौ मुस्लिम महिलाएं थीं। तीन ने परिधान संबंधी निर्देश मान लिए, लेकिन उनका भी बिना औचित्य तबादला किया गया।
- आयोग ने पाया कि उद्धृत 1989 और 2022 के परिपत्रों में विवादित धार्मिक परिधान पर रोक नहीं थी।
- उसने परिधान नियमों का लिखित स्पष्टीकरण देने, उत्पीड़न की निष्पक्ष जांच करने और शिकायतकर्ताओं को लौटने का लिखित विकल्प देने की सिफारिश की।
- प्रस्तावित राष्ट्रीय परिपत्र में वर्दी के साथ धार्मिक परिधान की अनुमति होगी, बशर्ते कर्मचारियों की पहचान स्पष्ट रूप से की जा सके।
- अमल की पुष्टि नहीं हुई है। खबरों में प्रगति रिपोर्ट की समयसीमा 11 या 19 नवंबर 2026 बताई गई है।






