टीके के दो डिज़ाइनों में सुरक्षा और बचाव, दोनों का ध्यान रखा गया
जीका के दो प्रायोगिक टीकों, MutB और MutC, ने एक ही बार टीका लगाए जाने के बाद चूहों को जीका वायरस से बचाया, गर्भवती चूहों से उनके भ्रूणों तक संक्रमण पहुंचने से रोका और ऐसा प्रतिरक्षा सीरम बनाया जिसने बताए गए प्रयोगों में डेंगू वायरस के चारों सीरोटाइप में से किसी से भी संक्रमण नहीं बढ़ाया। 15 जुलाई, 2021 को Nature Immunology में प्रकाशित इस अध्ययन ने टीका बनाने की एक कठिन समस्या पर काम किया: एक वायरस के खिलाफ बनी एंटीबॉडी कभी-कभी उससे संबंधित वायरस के संक्रमण को और गंभीर कर सकती हैं।
विषय-सूची
- टीके के दो डिज़ाइनों में सुरक्षा और बचाव, दोनों का ध्यान रखा गया
- एंटीबॉडी सुरक्षा संबंधी चिंता क्यों बन सकती हैं
- संक्रमणों का क्रम मायने रखता है
- प्रोटीन को नुकसान पहुंचाए बिना लक्ष्य बदलना
- चूहों पर किए गए प्रयोगों में क्या हुआ
- डेंगू के चारों सीरोटाइप की जांच
- प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया कैसे बदली
- समयक्रम और साक्ष्यों की सीमाएं
- मुख्य बातें
इस नतीजे और रीसस बंदरों में mRNA टीके को लेकर किए गए दावे के बीच अंतर समझना जरूरी है। MutB और MutC अध्ययन में चिंपैंज़ी एडेनोवायरस वेक्टर इस्तेमाल किए गए, जिन्हें AdC7 नाम दिया गया था, और प्रयोग चूहों पर किए गए। यह mRNA टीके का अध्ययन नहीं था और इसमें रीसस बंदरों पर प्रयोगों की कोई रिपोर्ट नहीं थी। इसके नतीजे सुरक्षित एंटीजन डिज़ाइन की एक रणनीति को समर्थन देते हैं; वे यह निष्कर्ष नहीं देते कि mRNA टीके ने प्राइमेट या मनुष्यों में यह जोखिम घटाया है।
चीनी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र ने अपने 2021 के शोध सारांश में बताया कि शोधकर्ताओं ने जीका के एनवेलप प्रोटीन में तीन अहम अमीनो एसिड बदले। इसका उद्देश्य प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को डेंगू संक्रमण बढ़ाने से जुड़े एंटीबॉडी लक्ष्य से हटाना और साथ ही उन लक्ष्यों को बनाए रखना था जो जीका से बचाव पैदा करते हैं।
इस टीम में चीनी विज्ञान अकादमी के सूक्ष्मजीव विज्ञान संस्थान के गाओ फू, दाई लियानपान और यान जिंगहुआ संबंधित लेखक थे। दाई, हैनान मेडिकल यूनिवर्सिटी के श्यू कुन और बीजिंग इंस्टीट्यूट्स ऑफ लाइफ साइंस के ली जिनहे संयुक्त रूप से प्रथम लेखक थे। उनके शोधपत्र का शीर्षक था: डेंगू संक्रमण की वृद्धि खत्म करने के लिए इम्यूनोडोमिनेंस स्विच के जरिए तैयार किए गए सुरक्षात्मक जीका टीके।
एंटीबॉडी सुरक्षा संबंधी चिंता क्यों बन सकती हैं
एंटीबॉडी-निर्भर संक्रमण वृद्धि, या ADE, तब होती है जब एंटीबॉडी किसी वायरस से जुड़ती हैं, लेकिन उसे प्रभावी ढंग से निष्क्रिय नहीं कर पातीं और उसे कुछ प्रतिरक्षा कोशिकाओं में प्रवेश करने में मदद करती हैं। इन कोशिकाओं पर ऐसे रिसेप्टर होते हैं जो वायरस से जुड़ी एंटीबॉडी को पहचानते हैं। संक्रमण रोकने के बजाय, यह परस्पर क्रिया संवेदनशील कोशिकाओं में संक्रमण बढ़ा सकती है।
जीका और डेंगू के मामले में यह चिंता खास तौर पर प्रासंगिक है, क्योंकि उनके सतही प्रोटीन पर एंटीबॉडी के कुछ लक्ष्य समान हैं। दोनों वायरस एडीज़ एजिप्टी मच्छरों से भी फैल सकते हैं और इनके प्रसार वाले क्षेत्र एक-दूसरे से मिलते हैं। इसलिए जीका से बचाव के लिए बनाए गए टीके का मूल्यांकन इस बात के लिए भी जरूरी है कि बाद में होने वाले डेंगू संक्रमण पर उसका क्या असर हो सकता है।
2018 में प्रकाशित और PubMed Central पर उपलब्ध अकादमिक समीक्षा जीका वायरस के टीके में Dengvaxia से मिली एक व्यावहारिक चेतावनी का वर्णन है। जिन बच्चों को पहले डेंगू संक्रमण नहीं हुआ था, उनमें इस डेंगू टीके के बाद गंभीर डेंगू जटिलताओं की आशंका उन बच्चों से अधिक थी जिन्हें टीका नहीं लगा था। इसके बाद फिलीपींस में इसका इस्तेमाल रोक दिया गया। यह अनुभव दिखाता है कि टीके की सुरक्षा का आकलन करते समय पहले हुए संक्रमण की स्थिति क्यों मायने रख सकती है।
इससे यह साबित नहीं होता कि फ्लैविवायरस के खिलाफ हर टीके में यही खतरा होता है। येलो फीवर और जापानी एन्सेफलाइटिस वायरस उसी व्यापक वायरस समूह में आते हैं, लेकिन यहां चर्चा किए गए साक्ष्य खास एंटीबॉडी प्रतिक्रियाओं, टीका डिज़ाइनों और संक्रमणों के क्रम से संबंधित हैं। ADE को इस परिवार के सभी टीकों के लिए सार्वभौमिक बाधा मानना इन निष्कर्षों से आगे जाना होगा।
संक्रमणों का क्रम मायने रखता है
2018 की समीक्षा में डेंगू के प्रति प्रतिरक्षा के बाद जीका संक्रमण और जीका के प्रति प्रतिरक्षा के बाद डेंगू संक्रमण के बीच अंतर बताया गया था। ये अलग-अलग जैविक स्थितियां हैं; एक के नतीजों से दूसरे की अपने-आप व्याख्या नहीं की जा सकती।
उस समय, पहले से डेंगू प्रतिरक्षा वाले रीसस बंदरों पर किए गए प्रयोगों में जीका के संपर्क के बाद वायरस का स्तर या बीमारी बढ़ने के संकेत नहीं मिले थे। मनुष्यों के शुरुआती साक्ष्यों से भी यह नहीं पता चला था कि पहले से डेंगू प्रतिरक्षा वाले लोगों में जीका की बीमारी अधिक गंभीर होती है। हालांकि, इसके उलट क्रम में, अमानव प्राइमेट्स पर अध्ययनों में पहले जीका से संक्रमित पशुओं को डेंगू के सीरोटाइप 2 के संपर्क में लाने पर वायरस का स्तर और सूजन के संकेत बढ़े हुए पाए गए थे।
2021 तक, चीनी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र के सारांश में Science में 2020 में प्रकाशित मनुष्यों पर एक समूह-अध्ययन का हवाला दिया गया। उसमें पाया गया कि पहले हुआ जीका संक्रमण बाद में होने वाले डेंगू संक्रमण की गंभीरता बढ़ाता है। इस बाद के निष्कर्ष ने जीका टीका विकसित करते समय डेंगू सुरक्षा की जांच करने की जरूरत और मजबूत की। लेकिन यह अपने-आप में यह साबित नहीं करता कि कोई खास जीका टीका गंभीर डेंगू का कारण बनेगा।
प्रोटीन को नुकसान पहुंचाए बिना लक्ष्य बदलना
शोधकर्ताओं ने फ्यूज़न लूप पर ध्यान दिया, जो जीका के एनवेलप प्रोटीन का एक हिस्सा है और E प्रोटीन भी कहलाता है। एपिटोप अणु का वह खास हिस्सा है जिसे एंटीबॉडी पहचानती है। फ्यूज़न लूप में ऐसा एपिटोप होता है जो ऐसी एंटीबॉडी को आकर्षित कर सकता है जो संबंधित वायरसों से तो जुड़ती हैं, लेकिन उन्हें भरोसेमंद ढंग से निष्क्रिय नहीं करतीं।
इस क्षेत्र को बस बदल देने से एक और समस्या पैदा हो सकती है। संबंधित वायरसों में फ्यूज़न लूप काफी हद तक संरक्षित रहता है, यानी विकासक्रम के दौरान उसका अनुक्रम समान बना रहा है। इसे बिना सावधानी बदला जाए तो प्रोटीन की संरचना को नुकसान पहुंच सकता है और उपयोगी प्रतिरक्षा पैदा करने की टीके की क्षमता घट सकती है।
इसके बजाय, टीम ने जीका के फ्यूज़न लूप अनुक्रम की जगह कीटों तक सीमित एक विकासक्रम में दूर के फ्लैविवायरस से मिलता-जुलता अनुक्रम लगाया। इस बदलाव से ADE से जुड़ी एंटीबॉडी के बंधन के लिए अहम तीन अमीनो एसिड बदल गए। इसके बाद शोधकर्ताओं ने बदले हुए प्रोटीनों की जांच सुरक्षात्मक एंटीबॉडी और संक्रमण वृद्धि से जुड़ी एंटीबॉडी के साथ की। वे ऐसे डिज़ाइन तलाश रहे थे जो लाभकारी पहचान बनाए रखें और अवांछित पहचान हटाएं।
चुने गए दो डिज़ाइन, MutB और MutC, को AdC7 टीकों में शामिल किया गया। एडेनोवायरस वेक्टर वह माध्यम है जो एंटीजन के लिए आनुवंशिक निर्देश पहुंचाता है। mRNA टीका ऐसे निर्देश पहुंचाने के लिए मैसेंजर RNA का इस्तेमाल करता है। दोनों प्रतिरक्षा तंत्र के सामने डिज़ाइन किया गया एंटीजन पेश कर सकते हैं, लेकिन ये टीके के अलग-अलग प्लेटफॉर्म हैं। एक प्लेटफॉर्म के नतीजे दूसरे के प्रदर्शन को साबित नहीं करते।
चूहों पर किए गए प्रयोगों में क्या हुआ
एक बार टीका लगाए जाने के बाद MutB और MutC, दोनों ने चूहों को प्रायोगिक जीका संक्रमण से बचाया। चीनी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र के सारांश के अनुसार, जांचे गए लक्षित ऊतकों में वायरस नहीं मिला। इसमें इस प्रतिक्रिया को स्टेरिलाइजिंग इम्युनिटी बताया गया है, यानी ऐसा मजबूत बचाव जो सिर्फ लक्षण कम करने के बजाय संक्रमण को पता लगाने योग्य स्तर तक पहुंचने से रोकता है।
गर्भवती चूहों में टीकों ने भ्रूणों तक संक्रमण पहुंचने से भी रोका। जांची गई अपरा और भ्रूण के मस्तिष्क में वायरस की मात्रा का पता नहीं चला। यह एक अहम नतीजा था, क्योंकि गर्भावस्था के दौरान संक्रमण से जीका के सबसे गंभीर प्रभावों में माइक्रोसेफली और जन्मजात अन्य विकार शामिल हैं।
इन नतीजों को उनके प्रायोगिक संदर्भ तक ही सीमित रखना चाहिए। जांचे गए चूहों के ऊतकों में वायरस का पता न चलना इस बात का प्रमाण नहीं है कि टीका मनुष्यों में भ्रूण के हर संक्रमण को रोक देगा। सारांश में पशुओं की संख्या, पता लगाने की विस्तृत सीमाएं या बचाव कितने समय तक रहा, इसकी जानकारी नहीं दी गई है, जिससे प्रभाव के आकार और टिकाऊपन का पूरा आकलन हो सके।
गर्भावस्था से जुड़ा यह नतीजा इस सवाल से भी आगे जाता है कि क्या टीका खून में वायरस का स्तर घटाता है। 2018 की समीक्षा में बताया गया था कि पहले के कुछ टीका और एंटीबॉडी प्रयोगों में संक्रमण काफी घटा, लेकिन कुछ अपरा या भ्रूण के ऊतकों में जीका RNA फिर भी पता चला। मां को संक्रमण से बचाना और भ्रूण तक वायरस पहुंचने को पूरी तरह रोकना, आपस में जुड़े हुए नतीजे हैं, लेकिन एक-दूसरे के समान नहीं।
डेंगू के चारों सीरोटाइप की जांच
टीम ने प्रयोगशाला और पशु, दोनों तरह के प्रयोगों से जांचा कि टीका लगाए गए पशुओं का सीरम डेंगू संक्रमण बढ़ा सकता है या नहीं। डेंगू के चार सीरोटाइप हैं; सुरक्षा के इस आकलन में वायरस के इन अलग-अलग रूपों पर अलग से विचार करना जरूरी है। MutB और MutC के बताए गए नतीजों में चारों शामिल थे।
बदले हुए टीके पाने वाले पशुओं के सीरम में वर्णित परीक्षणों के दौरान डेंगू ADE नहीं दिखा। सीरम ट्रांसफर प्रयोगों में भी, जिनमें टीका लगाए गए पशुओं का सीरम दूसरे पशुओं को दिया गया, MutB या MutC से जुड़ी संक्रमण वृद्धि नहीं पाई गई। ऐसे प्रयोग प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया के दूसरे हिस्सों से एंटीबॉडी के योगदान को अलग करके देखने में मदद करते हैं।
अपरिवर्तित, यानी वाइल्ड टाइप, संरचना से तुलना अहम थी। उस संरचना से जुड़े सीरम ने पशु प्रयोगों में बीमारी को और गंभीर किया और मृत्यु जल्दी हुई। यह अंतर इस विचार को समर्थन देता है कि एंटीजन डिज़ाइन ने एंटीबॉडी प्रतिक्रिया का व्यवहार बदला, न कि केवल जीका से बचाने वाला टीका तैयार किया।
जांचे गए हालात में ADE का पता न चलना, हर संभावित स्थिति में ADE न होने के बराबर नहीं है। आगे के अध्ययनों में एंटीबॉडी की मात्रा, पहले हुए संक्रमणों और टीकाकरण के बाद गुजरे समय को ध्यान में रखना होगा। 2018 की समीक्षा में खास तौर पर प्राइमेट अध्ययनों और क्लिनिकल ट्रायल में पहले से मौजूद फ्लैविवायरस एंटीबॉडी को सावधानी से मापने की जरूरत बताई गई थी।
प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया कैसे बदली
यह जानने के लिए कि बदले हुए डिज़ाइनों का असर अलग क्यों था, शोधकर्ताओं ने चूहों के लिम्फ नोड में एंटीजन-विशिष्ट कोशिकाओं से अलग-अलग B सेल रिसेप्टरों के अनुक्रम का विश्लेषण किया। B कोशिकाएं एंटीबॉडी बनाती हैं और उनके रिसेप्टर यह समझने में मदद करते हैं कि एंटीजन के कौन-से हिस्से प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया पर हावी हैं।
वाइल्ड टाइप टीके के साथ विश्लेषित B सेल रिसेप्टरों में 60% से अधिक तीन समूहों के जर्मलाइन जीन का इस्तेमाल करते थे। विरासत में मिले ये जीन खंड एंटीबॉडी की पहचान करने वाले क्षेत्रों को बनाने में मदद करते हैं। MutB और MutC में जीन के इस्तेमाल का पैटर्न अधिक फैला हुआ था, जिससे अपरिवर्तित एंटीजन के साथ दिखने वाला संकेंद्रण टूट गया।
इसके बाद टीम ने उन प्रमुख समूहों से प्रतिनिधि एंटीबॉडी तैयार कीं। वाइल्ड टाइप टीके से पैदा हुई एंटीबॉडी ने फ्यूज़न लूप को लक्ष्य बनाया, डेंगू के चारों सीरोटाइप से जुड़ीं और ADE का काफी प्रभाव दिखाया। MutB और MutC से पैदा हुई प्रमुख एंटीबॉडी डेंगू सीरोटाइप से बहुत कम जुड़ीं और बताए गए परीक्षणों में ADE नहीं दिखा।
MutC के संरचनात्मक विश्लेषण से इसका भौतिक कारण समझ में आया। बदले हुए प्रोटीन ने E प्रोटीन की वह जोड़ीदार व्यवस्था बनाए रखी, जो सुरक्षात्मक एंटीबॉडी की पहचान के लिए अहम है। बदले हुए फ्यूज़न लूप पर आणविक आकार और विद्युत आवेश में बदलाव ने संक्रमण वृद्धि से जुड़ी एंटीबॉडी के बंधन में बाधा डाली। रिसेप्टर विश्लेषण, एंटीबॉडी परीक्षण और संरचनात्मक अध्ययन मिलकर शोधपत्र में बताए गए इम्यूनोडोमिनेंस स्विच को समझाते हैं: प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया पहले हावी रहने वाले लक्ष्य से हट गई।
समयक्रम और साक्ष्यों की सीमाएं
ये निष्कर्ष कई वर्षों में फैली शोध प्रक्रिया का हिस्सा हैं। तारीखों को अलग-अलग रखने से पहले के क्लिनिकल ट्रायल की जानकारी या बाद के चूहा-प्रयोगों के नतीजों को प्राइमेट टीके की नई उपलब्धि के रूप में पेश करने से बचा जा सकता है।
- 2015 से 2016: जीका महामारी अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल बनी; भ्रूण को होने वाला नुकसान एक प्रमुख चिंता था।
- 2016 के बाद: चीनी शोध दल ने जीका E प्रोटीन की संरचनाओं और सुरक्षात्मक एंटीबॉडी का अध्ययन किया, जिससे एंटीजन को नए सिरे से डिज़ाइन करने की नींव पड़ी।
- 2018: अकादमिक समीक्षा में टीका परीक्षणों, पशुओं में बचाव के अध्ययनों और डेंगू संक्रमण बढ़ने तथा भ्रूण को बचाने से जुड़ी अनसुलझी चिंताओं का वर्णन किया गया।
- 2020: चीनी रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र के सारांश में उद्धृत मानव समूह-अध्ययन ने पहले हुए जीका संक्रमण को बाद में अधिक गंभीर डेंगू से जोड़ा।
- 15 जुलाई, 2021: MutB और MutC का अध्ययन Nature Immunology में ऑनलाइन प्रकाशित हुआ।
2018 की समीक्षा में mRNA, DNA और निष्क्रिय वायरस टीकों सहित कई प्लेटफॉर्म पर जीका के 13 जारी टीका परीक्षणों का उल्लेख था। ये आंकड़े उस समय की स्थिति बताते हैं, मौजूदा परीक्षणों की नहीं। इसी तरह, 2021 के विवरणों में कहा गया था कि तब तक जीका का कोई टीका मंजूर नहीं हुआ था; इससे आज की नियामक स्थिति साबित नहीं होती।
MutB और MutC के नतीजों में मनुष्यों पर प्रभावकारिता, लोगों में गर्भावस्था के दौरान सुरक्षा का डेटा या क्लिनिकल परीक्षण का समयक्रम शामिल नहीं है। आगे की किसी सुनवाई, नियामक फैसले या परीक्षण शुरू होने की तारीख नहीं बताई गई है। आगे के आकलन में बचाव कितने समय तक रहता है, पहले हुआ डेंगू संक्रमण, गर्भावस्था के दौरान सुरक्षा और समय के साथ एंटीबॉडी की ताकत बदलने पर प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया अनुकूल बनी रहती है या नहीं, इन बातों पर विचार करना होगा।
इसलिए यह उपलब्धि खास तौर पर एक बात तक सीमित है: एंटीजन में सोच-समझकर किए गए बदलाव ने चूहों के प्रयोगों में जीका से बचाव बनाए रखते हुए डेंगू संक्रमण की पता लगाने योग्य वृद्धि को खत्म किया। यह डिज़ाइन रणनीति के पक्ष में साक्ष्य देता है, लेकिन प्राइमेट परीक्षण, क्लिनिकल जांच और नियामक समीक्षा जैसे अलग-अलग चरण अभी बाकी हैं।
मुख्य बातें
- MutB और MutC, AdC7 वेक्टर वाले टीके थे जिनकी चूहों में जांच हुई थी; ये रीसस बंदरों पर जांचे गए mRNA टीके नहीं थे।
- एक बार टीका लगाने से चूहे जीका से बचे और बताए गए प्रयोगों में भ्रूण के ऊतकों तक संक्रमण का पता लगाने योग्य प्रसार रुका।
- जांचे गए हालात में प्रतिरक्षा सीरम ने डेंगू के चारों सीरोटाइप में से किसी के खिलाफ ADE नहीं दिखाया।
- डिज़ाइन में E प्रोटीन के फ्यूज़न लूप के तीन अहम अमीनो एसिड बदले गए और सुरक्षात्मक एंटीबॉडी के लक्ष्य बनाए रखे गए।
- B सेल और संरचनात्मक विश्लेषण ने डेंगू संक्रमण बढ़ाने से जुड़ी एंटीबॉडी से दूर हुई प्रतिक्रिया का समर्थन किया।
- अध्ययन 15 जुलाई, 2021 को प्रकाशित हुआ था और इससे मनुष्यों में सुरक्षा या प्रभावकारिता साबित नहीं हुई।






