तीन प्रस्तावित बदलावों से केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता पर सवाल
नेपाल की संसदीय वित्त समिति ने नेपाल राष्ट्र बैंक अधिनियम में ऐसे बदलावों को मंजूरी दी है, जिनसे केंद्रीय बैंक के प्रमुखों का गारंटीकृत कार्यकाल पांच वर्ष से घटकर तीन वर्ष हो जाएगा, मुद्रा, बैंकिंग और वित्त पर निर्देश जारी करने का सरकार का अधिकार बरकरार रहेगा और सरकारी आर्थिक नीति को समर्थन देना केंद्रीय बैंक का स्पष्ट उद्देश्य बनेगा।
विषय-सूची
- तीन प्रस्तावित बदलावों से केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता पर सवाल
- मौजूदा कानून में वास्तव में क्या प्रावधान हैं
- प्रस्तावित नीति-क्रम में बदलाव कैसे आया
- सरकार का निर्देश देने का अधिकार क्यों अहम है
- कम अवधि का गारंटीकृत कार्यकाल, आगे बढ़ाने का विकल्प
- वित्त सचिव के बोर्ड में होने पर मतभेद
- अधिकारी सुधार के उद्देश्य का बचाव करते हैं
- व्यापक सुधार का दायरा स्वायत्तता से आगे
- विधायी प्रक्रिया और अनसुलझे सवाल
- मुख्य बिंदु
समिति ने नेपाल के विक्रम संवत कैलेंडर के अनुसार 31 भाद्र 2083 को अपनी रिपोर्ट मंजूर की। उसके बदलाव सरकार के पेश किए गए विधेयक के प्रावधानों से अलग हैं। उस विधेयक में निर्देश देने का अधिकार हटाने और पांच वर्ष का कार्यकाल बनाए रखने का प्रस्ताव था। समिति के प्रस्तावित स्वरूप के तहत सरकार प्रदर्शन के आधार पर गवर्नर, डिप्टी गवर्नरों और निदेशकों का कार्यकाल दो साल बढ़ा सकती है।
यह अंतर अहम है: पांच वर्ष की गारंटीकृत नियुक्ति अब तीन वर्ष की नियुक्ति होगी, जिसके बाद कार्यकाल बढ़ाने की संभावना तो होगी, लेकिन इसके लिए सरकार की मंजूरी जरूरी होगी। समिति के आलोचकों का तर्क है कि इससे केंद्रीय बैंक के प्रमुख सरकार पर अधिक निर्भर हो सकते हैं, ठीक उस समय जब उन्हें अलोकप्रिय फैसले लेने की गुंजाइश चाहिए।
समिति की रिपोर्ट अपने आप में लागू कानून नहीं है। अब विवाद इस बात पर है कि संशोधन आगे बढ़ने के साथ संसद इन प्रावधानों को बरकरार रखेगी, उनमें बदलाव करेगी या उन्हें खारिज कर देगी। अंतिम मतदान की कोई तारीख तय नहीं की गई है।
यह विवाद सुधार के घोषित उद्देश्य और उसके प्रस्तावित नतीजे के बीच के अंतर को भी उजागर करता है। वित्त मंत्रालय ने शुरुआत में संशोधन को केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता मजबूत करने, वित्तीय निगरानी बेहतर बनाने और डिजिटल बैंकिंग के अनुरूप कानून को अद्यतन करने के उपाय के तौर पर पेश किया था। अब समिति के कई सदस्यों का कहना है कि मंजूर प्रावधान राजनीतिक नियंत्रण बढ़ाएंगे।
मौजूदा कानून में वास्तव में क्या प्रावधान हैं
केंद्रीय बैंक द्वारा प्रकाशित नेपाल राष्ट्र बैंक अधिनियम में पहले से ही सरकारी आर्थिक नीति के साथ सहयोग करना जरूरी है। हालांकि, धारा 4(2) इस सहयोग को एक शर्त के अधीन रखती है: इससे बैंक के वैधानिक उद्देश्यों पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ना चाहिए।
मौजूदा उद्देश्य सिर्फ महंगाई कम रखने तक सीमित नहीं हैं। धारा 4(1) में कीमतों और भुगतान संतुलन की स्थिरता बनाए रखने के लिए मौद्रिक और विदेशी मुद्रा नीति, वित्तीय सेवाओं तक पहुंच और बैंकिंग एवं वित्तीय स्थिरता, वित्तीय प्रणाली में जनता का भरोसा तथा सुरक्षित, मजबूत और कुशल भुगतान प्रणाली शामिल हैं। भुगतान संतुलन की स्थिरता का संबंध किसी देश के बाकी दुनिया के साथ वित्तीय लेन-देन से है, जिसमें व्यापार और अन्य अंतरराष्ट्रीय भुगतान शामिल हैं।
बैंक के प्रशासन में सरकार की औपचारिक भूमिका भी पहले से है। धारा 9 के अनुसार सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच संबंध वित्त मंत्रालय के माध्यम से होने चाहिए। धारा 14 में सात सदस्यीय बोर्ड का प्रावधान है, जिसमें गवर्नर, वित्त सचिव, दो डिप्टी गवर्नर और सरकार द्वारा नियुक्त तीन निदेशक शामिल हैं।
धारा 18 गवर्नर, डिप्टी गवर्नरों और निदेशकों के लिए पांच वर्ष का कार्यकाल तय करती है। धारा 29 बोर्ड को मौद्रिक और विदेशी मुद्रा नीति बनाने की जिम्मेदारी देती है। यही प्रावधान बहस का आधार तय करते हैं: संस्थागत रूप से बैंक सरकार से अलग नहीं है, लेकिन उसके उद्देश्य, जिम्मेदारियां और नियुक्ति की अवधि निर्धारित हैं।
प्रस्तावित नीति-क्रम में बदलाव कैसे आया
सरकार के पेश किए गए विधेयक में प्रस्तावित धारा 4 के तहत सबसे पहले कीमतों की स्थिरता रखी गई थी। कीमतों की स्थिरता पर प्रतिकूल असर डाले बिना बैंकिंग, वित्तीय और बाहरी क्षेत्र की स्थिरता बनाए जाने की बात थी। एक अलग उपधारा में यह जरूरी किया गया था कि सरकारी आर्थिक नीति को समर्थन तभी दिया जाए, जब इससे पहले बताए गए उद्देश्यों को नुकसान न पहुंचे।
इस ढांचे में प्राथमिकताओं का क्रम तय था। सरकार के साथ सहयोग जरूरी था, लेकिन सरकारी नीति से टकराव की स्थिति में बैंक अपनी प्राथमिक जिम्मेदारियों का हवाला दे सकता था। मौद्रिक नीति का संबंध मुद्रा, ऋण और ब्याज दरों से है; राजकोषीय नीति का संबंध सरकारी करों, खर्च और उधारी से है। दोनों के बीच तालमेल जरूरी है, लेकिन उनकी तात्कालिक प्राथमिकताएं अलग हो सकती हैं।
राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के सांसद और वित्त समिति के अध्यक्ष डॉ. कृष्णहरि बुधाथोकी ने सरकारी नीति को समर्थन देने से जुड़ी भाषा में बदलाव का प्रस्ताव रखा। अंततः समिति ने तीन घोषित उद्देश्यों को मंजूरी दी: कीमतों की स्थिरता बनाए रखना, बैंकिंग, वित्तीय और बाहरी क्षेत्र की स्थिरता बनाए रखना तथा सरकारी आर्थिक नीति को लागू करने में समर्थन देना।
इसलिए चिंता यह नहीं है कि सरकार के साथ सहयोग पहली बार कानून में शामिल हो रहा है। यह पहले से मौजूद है। विवादित बदलाव यह है कि सरकारी सहयोग को बैंक के अन्य उद्देश्यों के अधीन रखने वाली स्पष्ट सुरक्षा को कथित तौर पर हटाया जा रहा है। तीनों जिम्मेदारियों को एक साथ रखने से इनके बीच टकराव होने पर बैंक को कम स्पष्ट कानूनी मार्गदर्शन मिल सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकार की हर आर्थिक नीति अपने आप मौद्रिक फैसलों पर हावी हो जाएगी। अंतिम शब्दावली और बाकी सुरक्षा प्रावधान मायने रखेंगे। लेकिन इससे यह समझ आता है कि विरोधी इस बदलाव को बैंक की भूमिका को दोहराने वाला सामान्य संशोधन भर क्यों नहीं मानते।
सरकार का निर्देश देने का अधिकार क्यों अहम है
सरकार के विधेयक में धारा 106(ग) को निरस्त करने का प्रस्ताव था, जिसके तहत सरकार नेपाल राष्ट्र बैंक को मुद्रा, बैंकिंग और वित्त के मामलों में निर्देश दे सकती है। संशोधन विधेयक के खंड 68 में मौजूदा अधिनियम की धारा 91 के साथ इस प्रावधान को निरस्त करने का प्रस्ताव था।
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) के सांसद गुरु प्रसाद बराल ने खंड 68 हटाने के लिए संशोधन पेश किया। वित्त समिति ने अंततः धारा 106(ग) को बरकरार रखने का फैसला किया और इस तरह निर्देश देने का वह अधिकार भी बना रहा, जिसे सरकार के विधेयक में हटाने का प्रस्ताव था।
राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की सांसद नितिमा भंडारी कार्की ने इस फैसले का बचाव किया। उन्होंने कहा कि मौजूदा प्रावधान से कोई समस्या नहीं हुई है और सरकारी नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों को समर्थन देने के लिए केंद्रीय बैंक की गतिविधियों को व्यवस्थित करने के लिहाज से इसे बरकरार रखना उचित है। उन्होंने इसे सरकारी आर्थिक नीति को समर्थन देना केंद्रीय बैंक का उद्देश्य बनाने के फैसले से भी जोड़ा।
आलोचक इन दोनों बातों के मेल पर ध्यान देते हैं। सरकारी नीति को समर्थन देने की बाध्यता और निर्देश जारी करने के अधिकार से कार्यपालिका को केंद्रीय बैंक के फैसलों पर प्रभाव डालने के दो कानूनी रास्ते मिल सकते हैं। पहले से मौजूद अधिकार को बनाए रखना नया अधिकार बनाने से अलग है, लेकिन बैंक के उद्देश्यों में बदलाव उस संदर्भ को बदल सकता है जिसमें यह अधिकार इस्तेमाल होता है।
कम अवधि का गारंटीकृत कार्यकाल, आगे बढ़ाने का विकल्प
सरकार के पेश किए गए विधेयक में मौजूदा पांच वर्ष के कार्यकाल को बदलने का प्रस्ताव नहीं था। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के सांसद सुनील खड़का ने गवर्नर, डिप्टी गवर्नरों और निदेशकों के लिए चार वर्ष का कार्यकाल सुझाया था। समिति ने इसके बजाय तीन वर्ष तय किए, साथ ही प्रदर्शन के आधार पर दो वर्ष का कार्यकाल बढ़ाने की संभावना रखी।
इस तरह कार्यकाल का गारंटीकृत हिस्सा मौजूदा पांच साल की तुलना में दो वर्ष, यानी 40 प्रतिशत, घट जाएगा। कार्यकाल बढ़ाने की मंजूरी पाने वाला व्यक्ति फिर भी पांच वर्ष पद पर रह सकता है, लेकिन अंतिम दो वर्ष मूल नियुक्ति के बजाय सरकार के एक और फैसले पर निर्भर होंगे।
यूएमएल सांसद और समिति सदस्य प्रो. डॉ. पुष्प कंडेल ने कहा कि वह इस व्यवस्था के विरोध में थे, क्योंकि कार्यकाल बढ़ाने की इच्छा रखने वाला गवर्नर सरकार की कृपा बनाए रखने के लिए बाध्य महसूस कर सकता है। उनकी आपत्ति गवर्नर कुल कितने साल पद पर रह सकता है, इस सवाल के बजाय कार्यकाल के नवीनीकरण से पैदा होने वाले प्रोत्साहन को लेकर है।
नेपाली कांग्रेस के समिति सदस्य खड़ग शाही ने कहा कि दो वर्ष का और भी छोटा कार्यकाल विचाराधीन था और विरोध के चलते तीन वर्ष तय हुए। उन्होंने यह भी कहा कि बैंक के बाहर से तीन डिप्टी गवर्नर नियुक्त करने के प्रस्ताव शामिल थे। ये चर्चाओं के बारे में उनके बयान हैं, इस बात की पुष्टि नहीं कि हर प्रस्ताव मंजूर रिपोर्ट में शामिल है।
शाही ने आरोप लगाया कि कार्यकाल में बदलाव का मकसद पहले से नियुक्त गवर्नर को समय से पहले हटाने की गुंजाइश बनाना था। इस आरोप से सरकार का इरादा साबित नहीं होता। विवरण यह स्पष्ट नहीं करता कि छोटा कार्यकाल मौजूदा पदाधिकारियों पर लागू होगा या सिर्फ भविष्य की नियुक्तियों पर। इसके तात्कालिक असर का आकलन करने के लिए यह अहम अंतर है।
वित्त सचिव के बोर्ड में होने पर मतभेद
बोर्ड में वित्त सचिव की जगह भी मतभेद का एक मुद्दा है। नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद परशुराम तामांग ने कहा कि सचिव को हटाने का प्रस्ताव वित्त मंत्रालय ने स्वीकार नहीं किया और समिति के मंजूर बदलावों में भी इसे जगह नहीं मिली।
समिति की शुरुआती चर्चा में गवर्नर डॉ. बिश्वनाथ पौडेल ने अलग रुख अपनाया था। उन्होंने बोर्ड की मौजूदा सदस्यता और योग्यता संबंधी व्यवस्था बनाए रखने का समर्थन किया। उनका कहना था कि वित्त मंत्रालय ने बैंक के काम में दखल नहीं दिया है और सचिव की मौजूदगी से संवाद तथा कामकाज की प्रभावशीलता बेहतर हुई है।
ये रुख अलग-अलग सवालों से जुड़े हैं। पौडेल ने बताया कि उनके अनुभव में यह व्यवस्था कैसे काम करती रही है। विरोधियों का तर्क था कि कानूनी ढांचा बैंक को तब भी सुरक्षा दे, जब भविष्य में सरकार के साथ संबंध कम सहयोगपूर्ण हों। संवाद सुचारु रहने का अनुभव अपने आप यह तय नहीं करता कि सरकार के पास कितना औपचारिक अधिकार होना चाहिए।
तामांग ने मौद्रिक नीति समिति बनाने, बैंक की वार्षिक रिपोर्ट संसद में पेश करने और सरकार का निर्देश देने का अधिकार हटाने का प्रस्ताव भी दिया था। उन्होंने कहा कि समिति की रिपोर्ट मंजूर होने पर उन्होंने लिखित असहमति दर्ज कराई और संसद की बहस के दौरान स्वायत्तता का मुद्दा उठाते हुए संशोधन मांगेंगे।
अधिकारी सुधार के उद्देश्य का बचाव करते हैं
1 श्रावण 2083 को हुई समिति की शुरुआती चर्चा में वित्त मंत्री डॉ. स्वर्णिम वाग्ले ने कहा था कि संशोधन का मकसद अधिनियम को अधिक स्पष्ट, व्यवस्थित और मौजूदा परिस्थितियों के अनुकूल बनाना है, जबकि उसकी बुनियादी संरचना और उद्देश्यों में कोई बड़ा बदलाव नहीं करना है।
वाग्ले ने कहा कि केंद्रीय बैंक के अधिकारियों की नियुक्ति और उन्हें हटाने की व्यवस्थित प्रक्रियाओं से राजनीतिक दबाव या मनमाने तबादलों और बर्खास्तगी का जोखिम घटता है, जो सामान्य सरकारी सेवा प्रशासन में संभव हैं। उन्होंने यह भी कहा कि संशोधन से बोर्ड के कर्तव्यों और अधिकारों पर स्पष्टता आएगी।
पौडेल ने अलग से 10 साल के अनुभव की अनिवार्यता समेत अतिरिक्त योग्यता शर्तों के प्रस्तावों को अव्यावहारिक बताते हुए उनका विरोध किया। उन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि को भी गैरजरूरी माना। ऐसी अवधि पद छोड़ने के बाद कुछ नौकरियों या नियुक्तियों पर रोक लगाती है, आम तौर पर हितों के टकराव को सीमित करने के लिए। ये मुद्दे भर्ती और आचरण से जुड़े हैं, जबकि सरकार के निर्देशों और नवीकरणीय कार्यकालों पर बहस अलग है।
पूर्व संसदीय सचिव डॉ. सोम बहादुर थापा ने कहा कि समिति के विवादित बदलावों का दोष सिर्फ सांसदों पर नहीं मढ़ना चाहिए। उनका मानना था कि विधायी प्रक्रिया में कौन-से प्रावधान बने रहेंगे, इस पर सरकारों का काफी व्यावहारिक प्रभाव होता है। तामांग ने भी तर्क दिया कि कुछ प्रस्तावों पर वित्त मंत्रालय का विरोध इस नतीजे के लिए कार्यपालिका के समर्थन का संकेत देता है। ये नामित प्रतिभागियों और पर्यवेक्षकों के आकलन हैं, हर बातचीत के दस्तावेजी सबूत नहीं।
व्यापक सुधार का दायरा स्वायत्तता से आगे
वित्त मंत्रालय के पहले के मसौदे में संशोधन को वित्त वर्ष 2082/083 के बजट, नेपाल राष्ट्र बैंक की 2022 से 2026 तक की चौथी रणनीतिक योजना और मौद्रिक नीति की प्रतिबद्धताओं से जोड़ा गया था। उसमें अधिक स्वायत्तता, प्रभावी निगरानी और संस्थागत जिम्मेदारियों की स्पष्टता को सुधार के लक्ष्य बताया गया था।
मसौदे में डिजिटल बैंकों को मान्यता देने का प्रस्ताव भी था। इन्हें ऐसी लाइसेंस प्राप्त संस्थाओं के रूप में परिभाषित किया गया था जो भौतिक शाखाओं या नेटवर्क के बिना डिजिटल माध्यमों से वित्तीय लेन-देन करती हैं। इसमें डिजिटल मुद्रा से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देने, वित्तीय संस्थाओं की परिभाषाएं अद्यतन करने, लेखांकन और रिपोर्टिंग सुधारने तथा संकटग्रस्त बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के समाधान की व्यवस्था स्पष्ट करने की कोशिश भी शामिल थी।
अन्य प्रस्तावित बदलावों में जोखिम आधारित निगरानी और प्रांतीय सरकारों, स्थानीय प्राधिकरणों, सहकारी संस्थाओं तथा व्यवसायों के साथ समन्वय शामिल था। जोखिम आधारित निगरानी का अर्थ है उन संस्थाओं या गतिविधियों पर अधिक नियामकीय ध्यान देना जिनसे नुकसान या अस्थिरता का खतरा अधिक माना जाता है, बजाय हर संस्था के साथ एक जैसा व्यवहार करने के।
धारा 27 में प्रस्तावित बदलाव के तहत यदि मौजूदा गवर्नर की मृत्यु हो जाए, वह इस्तीफा दे, निलंबित हो, विदेश यात्रा पर हो, छुट्टी ले या किसी अन्य कारण से काम न कर सके, तो सरकार को वरिष्ठ डिप्टी गवर्नर को कार्यवाहक गवर्नर नियुक्त करना होगा। यह प्रावधान नेतृत्व की निरंतरता से जुड़ा है, जो स्थायी नियुक्ति की अवधि से अलग मुद्दा है।
स्वायत्तता पर विवाद तय कर सकता है कि ये व्यापक सुधार कैसे काम करेंगे। डिजिटल वित्त या बैंक निगरानी के स्पष्ट नियम भी ऐसे संस्थान द्वारा लागू किए जाएंगे, जिसके नेतृत्व के प्रोत्साहनों और सरकार से संबंधों को नए सिरे से परिभाषित किया जा रहा है। हालांकि शुरुआती मसौदे के सभी प्रस्तावों को समिति की अंतिम रिपोर्ट के पुष्ट प्रावधान नहीं मानना चाहिए।
विधायी प्रक्रिया और अनसुलझे सवाल
यह संशोधन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की विस्तारित ऋण सुविधा (ईसीएफ) के तहत नेपाल की प्रतिबद्धताओं से भी जुड़ा है। यह आर्थिक सुधारों को समर्थन देने वाला ऋण कार्यक्रम है। सुधार से जुड़े विवरण में केंद्रीय बैंक की अधिक स्वायत्तता, बोर्ड से वित्त सचिव को हटाना और सरकार का निर्देश देने का अधिकार समाप्त करना इन प्रतिबद्धताओं के हिस्से बताए गए हैं। यहां यह स्थापित नहीं है कि समिति का प्रस्तावित स्वरूप कार्यक्रम की शर्तों को पूरा करता है या नहीं।
घटनाक्रम बताता है कि स्वायत्तता पर केंद्रित मसौदा किस तरह विवादित समिति रिपोर्ट तक पहुंचा। जहां तारीख दी गई है, वहां नीचे नेपाल के विक्रम संवत कैलेंडर का इस्तेमाल किया गया है:
- वित्त मंत्रालय ने मसौदा तैयार किया और विधेयक आगे बढ़ाने से पहले जनता से सुझाव मांगे।
- 1 श्रावण 2083 को वित्त समिति ने वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले और गवर्नर बिश्वनाथ पौडेल के साथ शुरुआती चर्चा की।
- 31 भाद्र 2083 को समिति ने एक रिपोर्ट मंजूर की, जिसमें सरकारी निर्देशों को बरकरार रखा गया और दो वर्ष के संभावित विस्तार के साथ तीन वर्ष के कार्यकाल की सिफारिश की गई।
- तामांग ने कहा कि उन्होंने लिखित असहमति दी है और संसद में आगे बदलाव मांगेंगे।
संसद में अंतिम मतदान की तारीख, कार्यकाल बढ़ाने के विस्तृत प्रदर्शन मानदंड या मौजूदा पदाधिकारियों के लिए स्पष्ट संक्रमण व्यवस्था तय नहीं है। ये कमियां अहम हैं, क्योंकि नियुक्ति संबंधी सुरक्षा इस बात पर निर्भर करती है कि प्रदर्शन का आकलन कौन करेगा, कौन-से मानक लागू होंगे और क्या नियम मौजूदा नेतृत्व पर असर डालेंगे।
अब केंद्रीय सवाल स्पष्ट है: संसद सरकार के साथ सहयोग को बरकरार रखते हुए स्पष्ट सीमाएं बनाए रख सकती है, या ऐसी व्यवस्था स्वीकार कर सकती है जिसमें नीति को समर्थन, निर्देश देने के अधिकार और विवेकाधीन कार्यकाल विस्तार एक साथ काम करें। समिति की मंजूरी ने बहस को आगे बढ़ाया है, लेकिन अंतिम कानून तय नहीं किया है।
मुख्य बिंदु
- मौजूदा अधिनियम में पांच वर्ष का कार्यकाल है और सरकारी नीति को समर्थन देने की शर्त यह है कि बैंक के उद्देश्यों की रक्षा हो।
- वित्त समिति ने प्रदर्शन के आधार पर दो वर्ष के संभावित विस्तार के साथ तीन वर्ष के कार्यकाल की सिफारिश की है।
- समिति ने मुद्रा, बैंकिंग और वित्त पर बैंक को निर्देश देने का सरकार का अधिकार बरकरार रखा है।
- समिति के प्रस्तावित स्वरूप के तहत सरकारी आर्थिक नीति को समर्थन देना केंद्रीय बैंक का स्पष्ट उद्देश्य बनेगा।
- वित्त सचिव बोर्ड में बने रहेंगे। गवर्नर बिश्वनाथ पौडेल ने इस व्यवस्था का बचाव किया है।
- कई सांसद बदलावों का विरोध कर रहे हैं और समिति की रिपोर्ट अभी लागू कानून नहीं है।
- अंतिम मतदान की तारीख, कार्यकाल विस्तार के मानदंड और मौजूदा पदाधिकारियों पर नियमों का असर स्पष्ट नहीं है।






