ज़मीन की धमकियों से आलू की बुवाई का विवाद अभियोजकों तक पहुंचा
उज़्बेकिस्तान के किसान परिषद ने 9 अक्टूबर, 2026 को अभियोजकों से संपर्क कर आरोपों पर कानूनी आकलन मांगा कि पिस्केंट जिले के गवर्नर मुफ़ज्ज़र अरिपोव ने आलू की खेती को लेकर हुई बैठक में किसानों का अपमान किया और उनकी ज़मीन लेने की धमकी दी। बिज़नेस ओम्बड्समैन ने भी कहा कि उसने मामला निगरानी में ले लिया है और कानूनी आकलन करेगा।
विषय-सूची
- ज़मीन की धमकियों से आलू की बुवाई का विवाद अभियोजकों तक पहुंचा
- रिकॉर्डिंग में कथित तौर पर क्या दर्ज हुआ
- एक सेमिनार, टकराव और अक्टूबर की अपील
- एक खास आपूर्तिकर्ता को लेकर आरोप
- जिला करीब 1,000 हेक्टेयर में बुवाई क्यों चाहता था
- ज़मीन के दायित्वों से बर्ताव की शिकायत का निपटारा नहीं होता
- किसान परिषद ने जिन कानूनी संरक्षणों का हवाला दिया
- ओम्बड्समैन का हस्तक्षेप और शिकायत के माध्यम
- मिलते-जुलते मामलों में अधिकारियों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं
- मुख्य बिंदु
यह विवाद ताशकंद क्षेत्र के पिस्केंट में 18 जुलाई को हुई बैठक और गेहूं की कटाई के बाद करीब 1,000 हेक्टेयर में देर से आलू बोने की जिला योजना से जुड़ा है। किसानों का आरोप है कि अरिपोव ने उन पर एक खास कंपनी से बीज आलू खरीदने का दबाव डाला। जिला प्रशासन ने अलग स्पष्टीकरण दिया: कुछ किसान निर्धारित फसल बोने में विफल रहे थे और उन्होंने अपने भूखंड ऐसे दूसरे लोगों को बेच दिए, जिन्होंने भी आलू नहीं बोए।
इन परस्पर विरोधी बयानों के चलते अधिकारियों के सामने दो अलग सवाल हैं: क्या किसानों ने ज़मीन के इस्तेमाल से जुड़े दायित्वों का उल्लंघन किया, और क्या अधिकारियों ने बुवाई के निर्देश लागू कराने के लिए गैरकानूनी दबाव डाला। प्रशासन ने कहा कि कृषि कार्यों की तात्कालिकता बैठक में हर तरह के बर्ताव को उचित नहीं ठहराती और किसानों के साथ व्यवहार तथा उनके फोन जब्त किए जाने की शिकायतों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
अपील का उल्लेख करने वाले विवरणों में पिस्केंट मामले पर अभियोजन पक्ष का कोई निष्कर्ष, अदालत का फैसला या अनुशासनात्मक कार्रवाई घोषित नहीं की गई है। परिषद का अनुरोध और ओम्बड्समैन का हस्तक्षेप जांच की दिशा में उठाए गए कदम हैं, न कि इस बात का निर्धारण कि कथित दुर्व्यवहार साबित हो चुका है।
रिकॉर्डिंग में कथित तौर पर क्या दर्ज हुआ
बताया जाता है कि 18 जुलाई की बैठक की एक ऑडियो रिकॉर्डिंग अक्टूबर में सार्वजनिक हुई। विवरणों के अनुसार, अरिपोव सूची से किसानों के नाम पुकारते, उन्हें खड़े होने का आदेश देते और कुछ लोगों पर अपमानजनक टिप्पणियां तथा धमकियां करते सुनाई देते हैं। बताया गया है कि वहां महिलाएं भी मौजूद थीं।
उज़्बेक फ़ोरम के 9 अक्टूबर के बैठक के विवरण में जिला गवर्नर अरिपोव के नाम से दर्ज वे शब्द शामिल हैं, जिनमें किसानों की ज़मीन लेने की धमकी दी गई:
अगर मैं कल तुम्हारी ज़मीन ले लूं, तो देखना क्या होता है।
खबरों के मुताबिक, रिकॉर्डिंग में किसानों की जान को खतरा पहुंचाने की धमकी भी है। इस आरोप से विवाद छूटी हुई बुवाई के लक्ष्यों पर मतभेद से कहीं अधिक गंभीर हो जाता है, हालांकि कथित शब्दों का कानूनी अर्थ और उनके परिणामों का आकलन अभी होना बाकी है।
बताया जाता है कि जिला अभियोजक और जिला पुलिस विभाग के प्रमुख कमरे में मौजूद थे। उनकी कथित मौजूदगी बैठक की परिस्थितियां स्थापित करने के लिए प्रासंगिक है, लेकिन इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि दोनों में से किसी अधिकारी ने गवर्नर की बातों का समर्थन किया या किसानों के खिलाफ कार्रवाई की।
कथित तौर पर किसानों को उनके फोन ले लिए जाने के बाद बैठक में आने दिया गया। फिर भी एक रिकॉर्डिंग सामने आई। जिला प्रशासन ने कहा कि फोन जब्त किए जाने के आरोप की साक्ष्यों के आधार पर अलग से जांच होनी चाहिए। यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि इसका आदेश किसने दिया, ऐसा क्यों हुआ और इसे कैसे अंजाम दिया गया।
एक सेमिनार, टकराव और अक्टूबर की अपील
प्रशासन के अनुसार, पहले हुए एक सेमिनार के बाद बुवाई के निर्देशों का पालन न किए जाने पर यह बैठक बुलाई गई थी। घटनाक्रम के मुताबिक, उस सेमिनार और विवादित बैठक के बीच 16 दिन का अंतर था, जबकि बैठक और परिषद की अपील के बीच लगभग तीन महीने बीते।
- अप्रैल 2024: मुफ़ज्ज़र अरिपोव पिस्केंट जिले के गवर्नर बने। इससे पहले वह ताशकंद क्षेत्रीय प्रशासन में संगठनात्मक और कार्मिक समूह के प्रमुख थे।
- 2 जुलाई, 2026: जिला प्रशासन ने खेत प्रबंधकों के लिए आलू बोने, अधिक उपज देने वाली किस्में चुनने और सौंपे गए कार्य पूरे करने पर एक व्यावहारिक सेमिनार आयोजित किया।
- 18 जुलाई, 2026: गेहूं की कटाई के बाद खाली हुई ज़मीन पर दूसरी फसल लगाने को लेकर बैठक हुई। बताया जाता है कि विवादित रिकॉर्डिंग इसी बैठक की है।
- 9 अक्टूबर, 2026: रिकॉर्डिंग की खबरें सामने आईं, किसान परिषद ने अभियोजकों से अपील की और जिला प्रशासन ने अपना स्पष्टीकरण जारी किया।
बैठक की तारीख किसानों की बाद की उन शिकायतों को समझने में अहम है, जिनमें गेहूं की बुवाई में दखल का आरोप लगाया गया। जुलाई की बैठक गेहूं की कटाई के बाद आलू लगाने को लेकर थी; बाद में एक किसान के बयान में गेहूं की दोबारा बुवाई में दिक्कतों का ज़िक्र था। ये फसल चक्र के अलग-अलग चरण हैं, इसलिए ज़रूरी नहीं कि दोनों एक ही बुवाई कार्य के परस्पर विरोधी विवरण हों।
एक खास आपूर्तिकर्ता को लेकर आरोप
बैठक में शामिल एक किसान ने आरोप लगाया कि गवर्नर उन लोगों से ज़मीन लेने की कोशिश कर रहे थे, जिन्होंने एक खास कंपनी से आलू नहीं खरीदे थे, और अभियोजक कार्यालय का डर दिखा रहे थे। इन विवरणों में कंपनी का नाम नहीं है और न ही किसी खरीद अनुबंध या लिखित निर्देश में किसी आपूर्तिकर्ता का उल्लेख किया गया है।
किसान के रूप में पहचाने गए, लेकिन नाम न बताए गए बैठक के एक सहभागी ने कथित खरीद दबाव और खेती के काम पर उसके असर, दोनों का ज़िक्र किया। उज़्बेक फ़ोरम ने उनका बयान अंग्रेज़ी में प्रकाशित किया:
अब वह उन लोगों से ज़मीन लेने की कोशिश कर रहे हैं जिन्होंने उस कंपनी से आलू नहीं खरीदे, और उन्हें अभियोजक कार्यालय की धमकी दे रहे हैं। काम करना असंभव हो गया है। हमें अब गेहूं बोना है, लेकिन वह उसमें भी बाधा डाल रहे हैं।
यह आरोप प्रशासन के इस दावे से अलग है कि किसानों ने बस आलू नहीं बोए। किसी फसल को उगाने का निर्देश देना और एक ही कारोबारी से बुवाई की सामग्री खरीदने का दबाव डालना दो अलग बातें हैं। यह तय करना कि क्या किसी खास आपूर्तिकर्ता को अनिवार्य किया गया था, यह स्पष्ट करने में मदद करेगा कि विवाद सिर्फ फसल योजना तक सीमित था या किसानों के कारोबारी फैसलों में दखल भी दिया गया।
प्रशासन का स्पष्टीकरण इस आरोप का समाधान नहीं करता। उसमें बुवाई योजना, ज़मीन के इस्तेमाल की जिम्मेदारियों और भूखंडों के कथित हस्तांतरण का ज़िक्र है, लेकिन अनिवार्य आपूर्तिकर्ता के बारे में विस्तार से जवाब नहीं दिया गया। ऐसी कोई रिपोर्टेड जांच भी नहीं है जिसमें यह साबित हुआ हो कि आलू खरीदने से इनकार करने पर वास्तव में किसी किसान की ज़मीन ली गई।
जिला करीब 1,000 हेक्टेयर में बुवाई क्यों चाहता था
पिस्केंट प्रशासन ने कहा कि देर से आलू बोने की उसकी योजना का मकसद घरेलू आपूर्ति बढ़ाना, कीमतें स्थिर रखना और सर्दियों के लिए भंडार तैयार करना था। प्रस्तावित फसल के लिए अनाज की खेती के बाद उपलब्ध करीब 1,000 हेक्टेयर ज़मीन का इस्तेमाल होना था। दूसरी फसल का अर्थ है पहली फसल कटने के बाद उसी ज़मीन पर एक और फसल उगाना।
अधिकारियों के अनुसार, 2 जुलाई के सेमिनार में खेत प्रबंधकों को आलू की किस्मों से परिचित कराया गया और बुवाई के तरीकों, अधिक उपज देने वाली किस्मों तथा उनसे पूरे किए जाने वाले कार्यों पर चर्चा हुई। प्रशासन के मुताबिक, कुछ किसान बाद में योजना का पालन करने में विफल रहे और खाली हुए भूखंड दूसरों को बेच दिए, जिन्होंने वहां आलू नहीं लगाए।
प्रशासन ने पहले मौसम में आलू उगाने का एक अलग लक्ष्य भी बताया: 650 हेक्टेयर, जिसमें 520 हेक्टेयर किसान जोतों पर और 130 हेक्टेयर देहक़ान जोतों पर थे। देहक़ान जोतें छोटी कृषि जोतों की एक श्रेणी हैं। इस पहले मौसम के क्षेत्र से 20,800 टन उपज का लक्ष्य रखा गया था।
इन आंकड़ों के अनुसार, पहले मौसम के बुवाई लक्ष्य का 80 प्रतिशत किसान जोतों और 20 प्रतिशत देहक़ान जोतों पर था। 20,800 टन की नियोजित उपज को 650 हेक्टेयर से भाग देने पर प्रति हेक्टेयर 32 टन की औसत उपज का लक्ष्य निकलता है। ये योजना के आंकड़े हैं, वास्तविक उपज हासिल होने का प्रमाण नहीं।
देर से आलू बोने की करीब 1,000 हेक्टेयर की योजना, पहले मौसम के 650 हेक्टेयर लक्ष्य से लगभग 350 हेक्टेयर बड़ी थी। दोनों आंकड़े अलग-अलग मौसमों की योजनाओं के हैं, इसलिए इन्हें एक ही बुवाई क्षेत्र के परस्पर विरोधी अनुमान नहीं मानना चाहिए। देर से आलू बोने का कितना लक्ष्य पूरा हुआ या कितना उत्पादन घटा, इसका कोई आंकड़ा नहीं दिया गया है।
ज़मीन के दायित्वों से बर्ताव की शिकायत का निपटारा नहीं होता
जिला प्रशासन ने ज़ोर देकर कहा कि ज़मीन किसानों की निजी संपत्ति नहीं थी और उसका उपयोग कानून में तय प्रक्रियाओं के अनुसार होना चाहिए। उसका तर्क था कि किसानों की जिम्मेदारी है कि वे ज़मीन का इस्तेमाल उसके निर्धारित उद्देश्य और दायित्वों के अनुरूप करें, न कि केवल अपनी पसंद के आधार पर।
इस रुख से बुवाई न होने और भूखंडों की कथित बिक्री को लेकर प्रशासन की चिंता समझ में आती है। लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि बैठक में दिए गए हर निर्देश कानूनी थे या गवर्नर केवल ज़मीन लेने की मंशा जाहिर करके उसे अपने कब्ज़े में ले सकता था। इस विवाद के विवरणों में ज़मीन वापस लेने का कोई खास आदेश या पूरी की गई कानूनी प्रक्रिया नहीं बताई गई है।
कथित बिक्री के बारे में भी स्पष्टीकरण ज़रूरी है। प्रशासन कहता है कि किसानों ने ज़मीन के भूखंड बेचे, जबकि साथ ही यह भी कहता है कि वे निजी संपत्ति नहीं थे। अनुबंधों या अन्य दस्तावेज़ों के बिना यह तय करना संभव नहीं कि किस चीज़ का, किन शर्तों पर हस्तांतरण हुआ या कोई प्रतिबंधित लेनदेन किया गया था या नहीं।
प्रशासन ने स्वयं कृषि लक्ष्य और उसे लागू कराने के तरीके को अलग-अलग माना। उसने कहा कि किसानों के अधिकारों और जनहित, दोनों का सम्मान होना चाहिए और सौंपे गए कार्यों का महत्व बैठक में हुए बर्ताव को अपने आप उचित नहीं ठहराता। इस स्वीकारोक्ति के बाद किसानों के साथ व्यवहार की शिकायत जांच के लिए खुली रहती है, भले ही अधिकारी बाद में कुछ किसानों की विफलता साबित कर दें।
किसान परिषद ने जिन कानूनी संरक्षणों का हवाला दिया
किसान परिषद ने अपनी अपील को व्यक्तिगत मान-सम्मान और गरिमा के संरक्षण पर आधारित किया। उसने उज़्बेकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 26 का हवाला देते हुए कहा कि मानव सम्मान और गरिमा अक्षुण्ण हैं और उन्हें ठेस पहुंचाने का कोई औचित्य स्वीकार्य नहीं है।
परिषद ने प्रशासनिक दायित्व संहिता के अनुच्छेद 41 का भी हवाला दिया। उसके बयान के अनुसार, किसी व्यक्ति के मान-सम्मान और गरिमा का जानबूझकर अपमान, जो बेइज्जती की श्रेणी में आता है, आधार गणना राशि के 20 से 40 गुना तक जुर्माने से दंडनीय है। आधार गणना राशि एक वैधानिक इकाई है, जिसका इस्तेमाल जुर्माने और अन्य भुगतानों की गणना के लिए किया जाता है।
इस सीमा से जुड़ी इकाई का लागू मूल्य जाने बिना जुर्माने की कोई मौद्रिक रकम नहीं निकाली जानी चाहिए। इससे भी अहम बात यह है कि इस प्रावधान का हवाला देने का अर्थ यह नहीं कि जुर्माना लगाया जा चुका है। पहले अधिकारियों को तथ्यों का आकलन करना होगा और तय करना होगा कि दायित्व के लिए कानूनी शर्तें पूरी हुईं या नहीं।
परिषद ने कहा कि इस तरह के बर्ताव को कारोबारी इकाई के कामकाज में गैरकानूनी दखल माना जा सकता है और इससे उज़्बेकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए उसकी अपील सिर्फ आपत्तिजनक भाषा तक सीमित नहीं है: वह यह जांच भी चाहती है कि कृषि कारोबारों के खिलाफ आधिकारिक अधिकार का कथित तौर पर कैसे इस्तेमाल किया गया।
ओम्बड्समैन का हस्तक्षेप और शिकायत के माध्यम
बिज़नेस ओम्बड्समैन ने कहा कि मामला उसकी निगरानी में है और उसका कानूनी आकलन किया जाएगा। उसने कारोबारियों को याद दिलाया कि उनके मान-सम्मान और गरिमा को कानून का संरक्षण प्राप्त है और जानबूझकर अपमान करने पर दायित्व तय हो सकता है।
अपमान या अधिकारों के उल्लंघन का सामना करने वाले किसानों और कारोबारियों को 1100 के छोटे टेलीफोन नंबर पर संपर्क करने को कहा गया। संपर्क के अन्य माध्यम +998712020898 और [email protected] बताए गए।
ओम्बड्समैन का हस्तक्षेप और परिषद की अभियोजकों से अपील दो अलग-अलग कदम हैं। दोनों में से किसी घोषणा में सुनवाई की तारीख, फैसले की समय-सीमा या किसी औपचारिक जांच का दायरा नहीं बताया गया। यह भी स्पष्ट नहीं है कि जुलाई की बैठक में जिला अभियोजक की कथित मौजूदगी अपील पर कार्रवाई को प्रभावित करेगी या नहीं।
मिलते-जुलते मामलों में अधिकारियों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं
पिस्केंट के आरोप अन्य जिलों में धमकियों, उत्पादन संबंधी मांगों और ज़मीन या कृषि मशीनरी तक पहुंच को लेकर सामने आए विवादों के बाद आए हैं। उज़्बेक फ़ोरम ने जुलाई 2026 में बुखारा क्षेत्र के ओलोत जिले के किसान कोमिलजोन एर्गाशेव की एक वीडियो अपील का विवरण दिया। उन्होंने कहा था कि अपना कोटा पूरा करने के बाद भी गवर्नर नार्गिज़ा नेमातोवा ने उनसे 20 टन और गेहूं देने की मांग की।
एर्गाशेव का आरोप था कि उनके इनकार के बाद गवर्नर ने उनके खेतों में कंबाइन हार्वेस्टर जाने से रोक दिया। उनका बयान आलू खरीदने के बजाय अतिरिक्त अनाज की मांग से जुड़ा है, लेकिन इसमें भी प्रशासनिक अधिकार के कथित इस्तेमाल से किसान की जरूरी काम करने की क्षमता प्रभावित होने का आरोप है।
अन्य रिपोर्टेड रिकॉर्डिंग्स में कुवा के गवर्नर हलीमजोन उमरोव और मुज़राबोत के गवर्नर अब्दुल्ला मामातकुलोव के मामले शामिल थे। उमरोव पर एक बैठक में नहीं आने के बाद किसान का अपमान करने और उससे ज़मीन छोड़ने की मांग करने का आरोप लगा। मामातकुलोव पर 15 जून की बैठक समेत गेहूं उत्पादन के कोटे को लेकर किसानों को धमकाने का आरोप था।
खबरों के अनुसार, भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी की संस्तुतियों के बाद दोनों जिला गवर्नरों को चेतावनी दी गई थी। पड़ोस के युवा नेताओं के अपमान से जुड़े एक अलग मामले में, नूराफ़शोन के युवा मामलों के अधिकारी मिर्करीम अहमदजोनोव ने आंतरिक जांच और अपनी गलती स्वीकार करने के बाद नौकरी का अनुबंध गंवा दिया।
इन मामलों से पता चलता है कि कथित दुर्व्यवहार पर रोजगार और अनुशासन से जुड़ी अलग-अलग कार्रवाइयां हुई हैं। इससे यह तय नहीं होता कि पिस्केंट में कौन-सा दंड उचित होगा, यदि कोई दंड बनता भी हो। मुख्य अनसुलझे सवाल अब भी रिकॉर्डिंग की प्रामाणिकता और उसका पूरा संदर्भ, आपूर्तिकर्ता को अनिवार्य करने का आरोप, फोन जब्त करने की कार्रवाई और यह हैं कि क्या किसी धमकी के बाद ज़मीन को लेकर वास्तव में कोई फैसला किया गया।
मुख्य बिंदु
- किसान परिषद ने 9 अक्टूबर, 2026 को अभियोजकों से अपील कर पिस्केंट के गवर्नर मुफ़ज्ज़र अरिपोव के कथित बर्ताव का कानूनी आकलन मांगा।
- बताया जाता है कि विवादित बैठक 18 जुलाई को हुई थी और इसमें गेहूं की कटाई के बाद आलू बोने पर चर्चा हुई।
- किसानों ने अपमान, ज़मीन और जान की धमकियों, फोन जब्त किए जाने तथा एक खास कंपनी से बीज आलू खरीदने के दबाव का आरोप लगाया।
- प्रशासन ने करीब 1,000 हेक्टेयर में देर से आलू बोने की योजना का हवाला दिया और आरोप लगाया कि कुछ किसान बुवाई में विफल रहे तथा उन्होंने भूखंड दूसरों को बेच दिए।
- पहले मौसम की एक अलग योजना में 650 हेक्टेयर और 20,800 टन उपज का लक्ष्य था, यानी प्रति हेक्टेयर 32 टन।
- प्रशासन ने कहा कि कृषि प्राथमिकताएं हर तरह के बर्ताव को उचित नहीं ठहरातीं और शिकायतों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
- बिज़नेस ओम्बड्समैन ने मामला निगरानी में लिया। कोई अंतिम कानूनी निष्कर्ष या फैसले की समय-सीमा घोषित नहीं की गई है।






