हिंसा का छिपा हुआ सिलसिला
लीज़ा शम्स की हत्या की शुरुआत उनके घर के भीतर सालों से जारी दुर्व्यवहार से हुई। मौत से कुछ हफ्ते पहले, 33 वर्षीय अफगान महिला ने आवाज़ संदेश रिकॉर्ड किए, जिनमें उन्होंने रिश्तेदारों से अपने लिए दुआ करने को कहा और पति की मारपीट का ब्योरा दिया। इसमें गर्भवती होने के दौरान उन पर किया गया हमला भी शामिल था। उन्होंने बताया कि उन्हें कई दिनों तक सबसे अलग रखा गया और इतनी बुरी तरह चोटें आईं कि वे मुश्किल से खा या बोल पाती थीं।
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1 फरवरी को पड़ोसियों ने चीखें सुनीं। लीज़ा के पिता को वीडियो कॉल आया और उन्होंने देखा कि उनका जबड़ा टूट गया था। उनकी बहनें उन्हें काबुल के एक अस्पताल ले गईं, जहां पहुंचने के करीब एक घंटे बाद उनकी मौत हो गई। चिकित्सा रिकॉर्ड में उनके गाल की हड्डियों और साइनस की दीवारों में कई फ्रैक्चर के साथ-साथ चेहरे और शरीर पर चोट के निशान और सूजन दर्ज की गई।
इन चोटों के बावजूद, फॉरेंसिक रिपोर्ट में चूहे मारने वाले ज़हर को मौत का संभावित कारण बताया गया। शव का पोस्टमॉर्टम नहीं किया गया। खबरों के मुताबिक, लीज़ा के ससुराल वालों ने दावा किया कि उन्होंने आत्महत्या की थी, जबकि उनके पिता को लगता है कि उनकी हत्या की गई। अफगानिस्तान में परिवारों और स्वास्थ्यकर्मियों का कहना है कि हिंसक परिस्थितियों में महिलाओं की मौत होने पर अक्सर उसे आत्महत्या दर्ज कर दिया जाता है। ऐसा वर्गीकरण आगे की जांच रोक सकता है।
लीज़ा का मामला अफगान पत्रकारों की गुप्त रूप से की गई पड़ताल में सामने आए एक व्यापक चलन को दर्शाता है। उनकी जांच में अगस्त 2021 में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद से 10 प्रांतों में मारी गई महिलाओं और लड़कियों के 231 मामले दर्ज किए गए। ये आंकड़े देशभर में हुई कुल मौतों को नहीं दर्शाते। वे दिखाते हैं कि परिवारों के भीतर हिंसा, कमज़ोर जांच और अधिकारियों का डर मिलकर किस तरह हत्यारों को सज़ा से बचा सकते हैं।
जांच में क्या सामने आया
इन मामलों को स्थानीय मीडिया की 174 खबरों और पत्रकारों द्वारा सीधे पहचाने गए 57 मामलों से संकलित किया गया। पीड़ितों की उम्र पांच से 65 वर्ष के बीच थी। कई मामलों में परिवारों या गवाहों ने पति, पिता, भाई और अन्य रिश्तेदारों के नाम आरोपियों के तौर पर बताए।
231 मौतों में से 53 को आधिकारिक तौर पर आत्महत्या दर्ज किया गया। केवल 58 गिरफ्तारियां दर्ज हुईं, यानी करीब हर चार मामलों में से एक में गिरफ्तारी हुई। संदिग्धों को हिरासत में लिए जाने पर भी कुछ को कुछ ही दिनों में रिहा कर दिया गया। सबसे अधिक मामले दर्ज करने वाले प्रांतों में जवज़जान में 36, हेरात में 32, बदख्शां में 28 और ग़ज़नी में 26 मामले थे।
ज़्यादातर पीड़ित घरों में मारी गईं, जहां बाहरी लोगों के लिए हिंसा का पता लगाना मुश्किल होता है। इनमें करीब 165 गृहिणियां थीं, जिनकी अपनी कोई आय या शिकायत दर्ज कराने के लिए कोई औपचारिक पद नहीं था। पुरुष रिश्तेदारों पर निर्भरता के कारण हिंसक विवाह से निकल पाना लगभग असंभव हो सकता है, खासकर तब जब आश्रय गृह, अदालतें और पुलिस सेवाएं उपलब्ध न हों।
जवज़जान के एक स्वास्थ्यकर्मी ने पत्रकारों को बताया कि अस्पताल लाई गईं और आत्महत्या की शिकार बताई गईं कई महिलाओं के शरीर पर घाव और चोट के निशान थे। ऐसी जानकारियां हर मौत का कारण साबित नहीं कर सकतीं, लेकिन महिलाओं के खिलाफ हिंसा को दर्ज करने और उसकी जांच करने में गंभीर कमियों की ओर इशारा करती हैं।
सुरक्षा क्यों कमज़ोर हुई
तालिबान के सत्ता पर कब्ज़े से पहले भी अफगान महिलाओं को बड़े पैमाने पर घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ता था। यूएन विमेन अफगानिस्तान जेंडर इंडेक्स के मुताबिक, 2018 में सर्वेक्षण में शामिल करीब 35 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि उन्हें पिछले वर्ष अपने साथी से हिंसा झेलनी पड़ी थी। वैश्विक आंकड़ा 13 प्रतिशत था।
अगस्त 2021 के बाद तालिबान ने महिला मामलों के मंत्रालय, महिलाओं के खिलाफ हिंसा के लिए विशेष अभियोजक कार्यालय और देश के आश्रय गृहों के नेटवर्क को भंग कर दिया। करीब 250 महिला न्यायाधीशों को उनके पदों से हटा दिया गया, जबकि महिला अभियोजकों को घर भेज दिया गया। महिलाओं ने अपने कानूनी मामलों में सीधे पक्षकार के तौर पर कार्रवाई करने का अधिकार भी खो दिया, जिससे माताएं अपनी बेटियों की ओर से मामले आगे नहीं बढ़ा सकीं।
कानूनी रूप से बाहर रखे जाने के व्यावहारिक परिणाम भी हैं। तख़ार प्रांत में 23 वर्षीय एक महिला की मां ने बताया कि उनके पति ने कथित तौर पर महिला को चाकू मारा और आग लगा दी थी। स्थानीय अदालत ने मां को कानूनी अधिकार पति को सौंपने का आदेश दिया। मामले में बहुत कम प्रगति हुई है।
तालिबान की आपराधिक संहिता में घरेलू हिंसा और उससे बचकर निकलने के बीच भी कठोर असमानता है। पत्नी को पीटने और फ्रैक्चर या घाव जैसी साफ़ दिखने वाली चोटें पहुंचाने वाले पति को अधिकतम 15 दिन की जेल हो सकती है। बिना अनुमति अपने मायके जाने वाली पत्नी और उसे वापस भेजने से इनकार करने वाले रिश्तेदारों को तीन महीने की जेल हो सकती है।
इस व्यवस्था में सुरक्षा मांगने वाला परिवार ही सज़ा के खतरे में पड़ सकता है। इससे हिंसक पतियों को घर छोड़कर भागने वाली महिलाओं को आश्रय देने से उनके रिश्तेदारों को रोकने का एक ताकतवर ज़रिया भी मिलता है।
दखल देने वाले परिवार भी निशाना बन सकते हैं
हिंसा झेल रही महिला के लिए खतरा वहीं खत्म नहीं होता। बेटियों और बहनों की रक्षा करने की कोशिश करने वाले रिश्तेदारों को भी हिंसा का सामना करना पड़ सकता है, खासकर जब कथित हमलावर तालिबान से जुड़ा हो।
कंधार में एक 14 वर्षीय लड़की की कथित तौर पर एक बहुत अधिक उम्र के व्यक्ति से शादी के बाद हत्या कर दी गई। हिंसा झेलने के बाद वह अपने पिता के घर भाग गई। जब अक्टूबर 2024 में उसका पति उसे वापस ले जाने आया, तो उसने मना कर दिया। आरोप है कि पति ने उसे गोली मारकर हत्या कर दी। मदद के लिए दौड़ा उसका छोटा भाई भी गोली का शिकार हुआ और एक हफ्ते बाद उसकी मौत हो गई। तालिबान ने मामला दर्ज किया, लेकिन समूह में काम कर रहे पति को कभी गिरफ्तार नहीं किया गया।
सर-ए-पोल प्रांत में 16 वर्षीय सारा और उनकी मां चमन की एक स्थानीय तालिबान अधिकारी ने गोली मारकर हत्या कर दी। उस अधिकारी ने सारा की सगाई जबरन तय कराई थी। ईरान में प्रशिक्षित डॉक्टर चमन ने तयशुदा दहेज के बिना बेटी को सौंपने से इनकार कर दिया था। आरोप है कि अधिकारी ने दोनों मां-बेटी को गोली मारने से पहले राइफल से उनकी पिटाई की। बाद में उसे पकड़ लिया गया और वह अब भी हिरासत में है।
ये मामले दिखाते हैं कि सत्तारूढ़ आंदोलन के भीतर किसी की हैसियत न्याय तक पहुंच को कैसे प्रभावित कर सकती है। किसी संदिग्ध का पद, स्थानीय प्रभाव या किसी कमांडर से संबंध तय कर सकता है कि मामला अदालत तक पहुंचेगा या नहीं। किसी अधिकारी को चुनौती देने या कथित अपराध को सार्वजनिक करने पर परिवारों को अक्सर बहुत कम सुरक्षा मिलती है।
पाबंदियों से डर का व्यापक माहौल
घरेलू हत्याएं महिलाओं की आवाजाही, काम, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन पर पाबंदियों की व्यापक व्यवस्था के बीच होती हैं। लड़कियों के माध्यमिक स्कूल और विश्वविद्यालय जाने पर रोक अब भी है। महिलाओं के रोज़गार पर भी सीमाएं लगाई गई हैं, जिनमें सहायता संगठनों के साथ काम करना शामिल है। कपड़ों और सार्वजनिक जगहों तक पहुंच से जुड़े नियमों को सदाचार के प्रचार और दुराचार की रोकथाम मंत्रालय लागू करता है।
संयुक्त राष्ट्र ने संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों के लिए काम करने वाली अफगान महिलाओं को सीधे तौर पर जान से मारने की धमकियां दिए जाने की भी जानकारी दी है। तालिबान अधिकारियों ने कहा कि उनके कर्मी इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं और जांच चल रही है, जबकि गृह मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने धमकियां दिए जाने से इनकार किया। यह विवाद दिखाता है कि जब अधिकारी सुरक्षा संस्थानों और सूचना तक पहुंच, दोनों पर नियंत्रण रखते हों, तो जवाबदेही तय करना कितना मुश्किल होता है।
शिक्षा और रोज़गार पर पाबंदियों से महिलाओं के पास आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने या मदद मांगने के रास्ते कम रह जाते हैं। जो महिला काम नहीं कर सकती, स्वतंत्र रूप से यात्रा नहीं कर सकती या सार्वजनिक रूप से बोल नहीं सकती, उसके पास हिंसक घर छोड़ने का कोई सुरक्षित रास्ता शायद न हो। डर पड़ोसियों, डॉक्टरों और रिश्तेदारों को भी वह सब बताने से रोक सकता है जो उन्हें पता है।
231 मामलों का दस्तावेज़ीकरण करने वाले पत्रकारों को परिवारों से संपर्क करने की कोशिश के दौरान धमकियां मिलीं। कई रिश्तेदारों ने साक्षात्कार देने से इनकार कर दिया। उनके पिता के मुताबिक, लीज़ा को अस्पताल ले जाने वाली उनकी बहनों को बाद में तालिबान ने तलब किया और वे छिप गईं।
अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही की कोशिशें
अफगानिस्तान की घरेलू न्याय व्यवस्था पीड़ितों को कुछ ही भरोसेमंद रास्ते देती है। अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने व्यापक उत्पीड़न के एक पैटर्न के हिस्से के रूप में महिलाओं के साथ हो रहे व्यवहार की जांच शुरू कर दी है।
जनवरी 2025 में अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के अभियोजक ने तालिबान के सर्वोच्च नेता हैबतुल्लाह अखुंदज़ादा और मुख्य न्यायाधीश अब्दुल हकीम हक्कानी के लिए गिरफ्तारी वारंट मांगे। मांगे गए आरोपों का संबंध लिंग के आधार पर उत्पीड़न के मानवता-विरोधी अपराध से है। अभियोजक ने कहा कि यह मानने के उचित आधार हैं कि तालिबान की नीतियों ने महिलाओं और लड़कियों को शिक्षा, आवाजाही, अभिव्यक्ति, पारिवारिक जीवन और निजी स्वायत्तता समेत कई अधिकारों से वंचित किया है।
ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि अफगान अदालतों के कार्रवाई न करने पर यह मामला जवाबदेही का रास्ता मुहैया करा सकता है। आईसीसी की जांच में 1 मई 2003 के बाद से अफगानिस्तान में हुए कथित अपराध शामिल हैं। अदालत का काम संघर्ष के अन्य पक्षों के अपराधों की भी जांच कर सकता है, हालांकि अपनी प्राथमिकताएं तय करने के तरीके को लेकर पीड़ितों और अधिकार समूहों ने उसकी आलोचना की है।
आईसीसी की प्रक्रिया अफगान पत्रकारों द्वारा दर्ज की गई अलग-अलग हत्या के मामलों से स्वतंत्र है। इससे अपने आप यह तय नहीं होता कि किसी खास महिला की हत्या किसने की। इसकी अहमियत इस बात की जांच में है कि क्या वरिष्ठ नेताओं ने ऐसी नीतियां बनाने या बनाए रखने में मदद की, जो व्यापक उत्पीड़न के दायरे में आती हैं।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय दबाव स्थानीय सुरक्षा की जगह नहीं ले सकता। महिलाओं को सुरक्षित आश्रय गृह, स्वतंत्र जांचकर्ता, अदालतों तक पहुंच और अपने नाम से मामले दर्ज कराने की क्षमता चाहिए। दुर्व्यवहार की शिकायत करने पर परिवारों को बदले की कार्रवाई से सुरक्षा भी चाहिए।
आंकड़े क्या नहीं दिखा सकते
जांच के मामले अफगानिस्तान के 34 में से केवल 10 प्रांतों के हैं। कई मौतों की न तो पुलिस को खबर दी जाती है, न पीड़ित अस्पताल पहुंचती हैं और न ही उनका कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड बनता है। कुछ परिवार आत्महत्या के वर्गीकरण को स्वीकार कर सकते हैं, क्योंकि उसे चुनौती देने पर उन्हें धमकियों, सामाजिक दबाव या बदले की कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
आधिकारिक राष्ट्रीय आंकड़ों की कमी के कारण सालाना दर का भरोसेमंद अनुमान लगाना या केवल इस नमूने के आधार पर देशभर में बढ़ोतरी साबित करना असंभव है। सबूत एक दोहराता हुआ पैटर्न ज़रूर दिखाते हैं: घरों में मारी गई महिलाएं, जिनकी चोटों पर सवाल उठाए जाते हैं या जिन्हें किसी और श्रेणी में दर्ज किया जाता है, कम गिरफ्तारियां और मदद मांगने वाले रिश्तेदारों को सीमित सुरक्षा।
लीज़ा के पिता ने जांच के लिए दबाव बनाने की कोशिश में उनकी रिकॉर्डिंग, अस्पताल का वीडियो और चिकित्सा दस्तावेज़ सोशल मीडिया पर जारी किए हैं। एक संदेश में लीज़ा ने कहा कि उन्हें दम घुटता महसूस होता है और डर है कि उनके बच्चे अपने माता-पिता को झगड़ते देखते हुए बड़े होंगे। उनके शब्द किसी एक हिंसक घटना से कहीं अधिक बताते हैं। वे उस ज़िंदगी का रिकॉर्ड हैं जिसमें बार-बार होने वाला दुर्व्यवहार घर की रोज़मर्रा की हकीकत बन गया था।
उनके पिता का कहना है कि सार्वजनिक रूप से बोलने के कारण उनके परिवार के लिए खतरा बढ़ गया है। उनका मानना है कि तालिबान ऐसे मामलों पर सार्वजनिक चर्चा नहीं चाहता। पूरे अफगानिस्तान में परिवारों के लिए चुप्पी कुछ समय तक सुरक्षा दे सकती है, जबकि आवाज़ उठाने पर तलब किए जाने, धमकियों या और हिंसा का सामना करना पड़ सकता है।
मुख्य बातें
- पत्रकारों ने अगस्त 2021 से 10 प्रांतों में अफगान महिलाओं और लड़कियों की हत्याओं के 231 मामले दर्ज किए।
- गाली-गलौज या दुर्व्यवहार के आरोपों और अन्य संदिग्ध सबूतों के बावजूद, 53 मौतों को आधिकारिक तौर पर आत्महत्या दर्ज किया गया।
- केवल 58 गिरफ्तारियां दर्ज हुईं और संदिग्धों को अक्सर जल्दी रिहा कर दिया गया।
- तालिबान ने उन प्रमुख संस्थानों, न्यायाधीशों, अभियोजकों और आश्रय गृहों को हटा दिया जो पहले महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों को संभालते थे।
- अंतरराष्ट्रीय अभियोजक तालिबान के वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ लिंग के आधार पर उत्पीड़न के आरोपों पर कार्रवाई कर रहे हैं।
- दर्ज मामले पूरी तस्वीर का केवल एक हिस्सा हैं; संभव है कि कई मौतें आधिकारिक रिकॉर्ड में शामिल न हों।






