फैसलाबाद में हिरासत के फैसले से चिंता
पाकिस्तान की एक अदालत ने 13 वर्षीय लड़की की हिरासत उस व्यक्ति को सौंप दी है जिस पर उसके अपहरण का आरोप है। उम्र के रिकॉर्ड में विरोधाभास, लड़की पर खुद को वयस्क बताने का दबाव डालने के आरोप और उसके धर्म परिवर्तन तथा विवाह के दस्तावेजों की वैधता पर सवालों के बावजूद यह फैसला सुनाया गया।
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फैसलाबाद की एक सत्र अदालत ने 25 जुलाई 2026 को यह फैसला दिया, जिसकी मानवाधिकार रक्षकों और ईसाई अधिकार समूहों ने निंदा की है। फैसलाबाद मामले में लड़की का नाम सार्वजनिक नहीं किया गया है। खबरों के मुताबिक, उसे आरोपी के पास उसकी कथित पत्नी के रूप में भी लौटाया गया। आरोपी को जमानत दे दी गई।
अधिकारों के लिए काम करने वाले लोगों ने चेतावनी दी है कि इस फैसले से बच्ची को दोबारा हिंसा, डराने-धमकाने और यौन शोषण का खतरा हो सकता है। वे पंजाब के अधिकारियों से हस्तक्षेप करने, लड़की की सुरक्षा सुनिश्चित करने और हिरासत पर कोई अंतिम फैसला लेने से पहले आधिकारिक जन्म रिकॉर्ड तथा अन्य सबूतों की ठीक से जांच करने की अपील कर रहे हैं।
इस मामले ने पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों की लड़कियों के अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और विवाह को लेकर व्यापक चिंताएं फिर बढ़ा दी हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि कथित आरोपी अक्सर धर्म परिवर्तन के प्रमाणपत्रों, विवाह दस्तावेजों और अदालत में दर्ज बयानों के सहारे अपहरण को स्वैच्छिक विवाह के रूप में पेश करते हैं।
फैसलाबाद का मामला 12 जून को शुरू हुआ, जब मोहसिन लियाकत ने कथित तौर पर लड़की का अपहरण किया। उसके परिवार ने रज़ा आबाद पुलिस थाने में घटना की सूचना दी और पुलिस ने पाकिस्तान दंड संहिता की धारा 365 बी के तहत प्राथमिकी दर्ज की। यह प्रावधान विवाह या यौन शोषण के लिए किसी महिला के अपहरण से संबंधित है।
करीब दो सप्ताह बाद पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लड़की को उसकी हिरासत से छुड़ाया। उसे फैसलाबाद पुलिस की लैंगिक हिंसा इकाई की सुरक्षा में रखा गया और फिर दार-उल-अमान भेज दिया गया, जो जोखिम में पड़ी महिलाओं और लड़कियों के लिए सरकारी आश्रय गृह है।
विरोधाभासी दस्तावेज मामले के केंद्र में
अधिकार रक्षकों के अनुसार, लड़की ने 27 जून को अदालत को बताया कि आरोपी के परिवार ने उसे वयस्क बताने के लिए सिखाया और उस पर दबाव डाला। दबाव डालने का यह आरोप विवाद का अहम हिस्सा है, क्योंकि किसी बच्चे का ऐसा बयान, जो कथित अपहरणकर्ता की हिरासत या प्रभाव में दिया गया हो, सावधानीपूर्ण सुरक्षा उपायों के बिना उसकी स्वतंत्र सहमति का सबूत नहीं माना जा सकता।
खबरों के मुताबिक, आरोपी पक्ष ने धर्म परिवर्तन का प्रमाणपत्र और विवाह प्रमाणपत्र पेश किया, जिनमें लड़की की जन्मतिथि जून 2008 दर्ज थी। उसके परिवार ने इस तारीख पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह पारिवारिक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाती, जिसमें उसके माता-पिता का विवाह 2012 में होना भी शामिल है।
विरोधाभासी दस्तावेजों को देखते हुए अदालत ने लड़की की उम्र का आकलन करने के लिए चिकित्सकीय जांच का आदेश दिया और कार्यवाही जारी रहने तक उसे दार-उल-अमान में रखने का निर्देश दिया। अधिकार समूहों का कहना है कि सबूतों की जांच के दौरान बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिहाज से यह फैसला उचित था।
इसलिए सत्र अदालत के बाद में आरोपी को हिरासत सौंपने और लड़की का पति होने के उसके दावे को स्वीकार करने से वे स्तब्ध रह गए। कार्यकर्ताओं का कहना है कि अदालत ने आधिकारिक जन्म रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजी सबूतों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया, जबकि उन दस्तावेजों को जरूरत से ज्यादा तवज्जो दी जिनके फर्जी होने का आरोप है।
मानवाधिकार कार्यकर्ता अशिकनाज़ खोखर ने कहा कि नाबालिग पीड़ितों से जुड़े मामलों में अदालतों को दस्तावेजी सबूतों की सावधानी से पुष्टि करनी चाहिए। खोखर ने कहा कि जब बच्चे को धमकी दी गई हो, उस पर दबाव डाला गया हो या उसे नियंत्रण में रखा गया हो, तो केवल नाबालिग का बयान या कथित सहमति हिरासत का फैसला तय नहीं कर सकती।
वॉइस फॉर जस्टिस के अध्यक्ष जोसेफ जैनसन ने कहा कि अदालत में वकीलों ने इस्लाम छोड़ने पर लड़की को सज़ा की धमकी दी। जैनसन ने कथित व्यवहार को कानूनी और धार्मिक अधिकार का गंभीर दुरुपयोग बताया। उन्होंने पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज़ शरीफ से उस अन्याय के खिलाफ कार्रवाई करने की अपील की जिसे उन्होंने वैधानिक बलात्कार और बच्ची को उसके माता-पिता से अलग करने का मामला बताया।
धर्म परिवर्तन से सुरक्षा क्यों जटिल हो सकती है
पाकिस्तान की कानूनी व्यवस्था में बच्चों, महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के प्रावधान हैं। लेकिन कार्यकर्ताओं का कहना है कि व्यवहार में इन प्रावधानों को लागू करना मुश्किल हो सकता है, जब अपहृत लड़की को इस्लाम धर्म अपनाने वाली और विवाहित महिला के रूप में पेश किया जाता है।
धर्म परिवर्तन के कारण सुनवाई का ध्यान अपहरण, बंधक बनाए जाने और शोषण के मूल आरोपों से हट सकता है। इसके बाद लड़की से पूछा जा सकता है कि क्या वह उस व्यक्ति के साथ रहना चाहती है जो उसे ले गया था, जबकि वह बच्ची हो सकती है और उसे उस व्यक्ति या उसके रिश्तेदारों से धमकियां मिली हो सकती हैं।
अधिकारों के लिए काम करने वाले वकीलों का कहना है कि पहले यह जांचना चाहिए कि क्या लड़की का अपहरण हुआ, क्या उसकी उम्र कानूनन विवाह के योग्य थी, क्या धर्म परिवर्तन दबाव से मुक्त था और क्या वह सुरक्षित तथा स्वतंत्र रूप से अपनी बात कह सकती है। उनका तर्क है कि कथित पीड़िता से आरोपी और उसके समर्थकों से अलग बातचीत होनी चाहिए और उसे स्वतंत्र वकील, अभिभावक तथा मनोवैज्ञानिक देखभाल उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
पाकिस्तान उन अंतरराष्ट्रीय समझौतों का पक्षकार है जिनके तहत बच्चों को अपहरण, जबरन विवाह और शोषण से बचाना जरूरी है। बाल अधिकारों पर कन्वेंशन बच्चे के विचार, विवेक और धर्म की स्वतंत्रता को मान्यता देता है और यह भी कहता है कि बच्चों से जुड़े फैसलों में उनके सर्वोत्तम हितों को मार्गदर्शक बनाया जाए। नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय वाचा धर्म की स्वतंत्रता की रक्षा करती है और आस्था के मामलों में दबाव डालने पर रोक लगाती है।
अधिकारों के लिए काम करने वालों का कहना है कि इन गारंटियों के तहत अपहरण के आरोपी किसी वयस्क को सिर्फ धर्म परिवर्तन का प्रमाणपत्र पेश करके या असुरक्षित बच्चे के बयान का सहारा लेकर हिरासत नहीं मिल सकती। वे इस विचार को भी खारिज करते हैं कि शारीरिक यौवन से वैध विवाह के लिए जरूरी मानसिक परिपक्वता साबित होती है।
पंजाब का कानून तय करता है अधिक कड़ा मानक
यह फैसला पंजाब के पंजाब बाल विवाह निषेध अधिनियम 2026 अपनाने के कुछ ही समय बाद आया है। कानून के तहत विवाह की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष है और बच्चे से जुड़ा विवाह गैर-जमानती अपराध है। यह अदालतों को विवाह से संबंधित कार्यवाही में बच्चों के सर्वोत्तम हितों को केंद्र में रखने का निर्देश भी देता है।
मानवाधिकार कार्यकर्ता लाला रॉबिन डैनियल ने कहा कि कमजोर जांच और अदालतों के असंगत फैसले बाल संरक्षण के नए कानूनों के उद्देश्य को कमजोर कर रहे हैं। उनका तर्क है कि बाल विवाह और उससे जुड़े यौन संबंधों को आपराधिक मामला माना जाना चाहिए, न कि वैवाहिक स्थिति के दावों के सहारे संरक्षण दिया जाना चाहिए।
यह कानूनी विवाद ऐसे अंतर को सामने लाता है जिसने पहले के मामलों में भ्रम पैदा किया है। कोई कानून बच्चे से विवाह करने वाले व्यक्ति पर आपराधिक दंड लगा सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि विवाह को अपने आप अमान्य घोषित करे। आलोचकों का कहना है कि इस खामी से आरोपी व्यक्ति वैवाहिक अधिकार या हिरासत का दावा कर सकता है, जबकि उस पर लड़की का अपहरण करने और उसे विवाह के लिए मजबूर करने के आरोप हों।
वकील और धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधि ऐसे कानून की मांग कर रहे हैं जो दबाव में कराए गए धर्म परिवर्तन को स्पष्ट रूप से अपराध घोषित करे और यह साफ करे कि धमकी, बंधक बनाए जाने या छल के तहत बच्चा धर्म परिवर्तन या विवाह के लिए वैध सहमति नहीं दे सकता। वे जन्म पंजीकरण, स्कूल रिकॉर्ड, राष्ट्रीय पहचान रिकॉर्ड और पारिवारिक दस्तावेजों की जांच के लिए मजबूत प्रक्रियाएं भी चाहते हैं।
ऐसे सुरक्षा उपाय उन समुदायों में खास तौर पर जरूरी हैं जहां जन्म पंजीकरण में देरी होती है या रिकॉर्ड अधूरे रहते हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रमाणपत्र का न होना किसी वयस्क को यह दावा करने की छूट नहीं देना चाहिए कि बच्चा उम्र में बड़ा है। साथ ही, विवादित दस्तावेजों को पारदर्शी प्रक्रिया के तहत जांचना चाहिए, न कि सिर्फ इसलिए स्वीकार करना चाहिए कि वे वयस्क के दावे का समर्थन करते हैं।
एक अलग मामला बढ़ा रहा है अंतरराष्ट्रीय दबाव
फैसलाबाद का फैसला ऐसे समय आया है जब लाहौर की ईसाई लड़की मारिया शहबाज़ से जुड़े एक अलग मामले पर अंतरराष्ट्रीय चिंता बढ़ रही है। खबरों के मुताबिक, जुलाई 2025 में अपहरण, इस्लाम धर्म अपनाने और उससे कहीं अधिक उम्र के एक मुस्लिम व्यक्ति से विवाह के समय शहबाज़ 13 वर्ष की थी। कानूनी पैरवी से जुड़ी रिपोर्टों में उस व्यक्ति की पहचान 30 वर्षीय शेहरयार अहमद के रूप में की गई है।
इस मामले की अदालत में समयरेखा फैसलाबाद मामले से अलग रही है। पाकिस्तान की संघीय संवैधानिक अदालत ने पहले फैसला दिया था कि शहबाज़ उस व्यक्ति के साथ रह सकती है, जबकि उसके परिवार का कहना था कि आधिकारिक रिकॉर्ड से साबित होता है कि वह नाबालिग थी और विवाह प्रमाणपत्र फर्जी था। सबूतों की नए सिरे से जांच और उसकी हिरासत जारी रखने की मांग करते हुए परिवार की समीक्षा याचिका पर 24 जुलाई को सुनवाई तय की गई थी।
वकील मुहम्मद साकिब जिलानी ने तर्क दिया है कि मुख्य सवाल यह नहीं है कि कोई ईसाई महिला किसी मुस्लिम पुरुष से विवाह कर सकती है या नहीं। उनका कहना है कि अहम सवाल यह हैं कि क्या विवाह की कानूनी उम्र से कम बच्चा वैध विवाह कर सकता है और क्या दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत दर्ज बयान को कथित अपहरण और दबाव की परिस्थितियों में स्वैच्छिक सहमति का सबूत माना जा सकता है।
यूरोपीय संसद के 9 जुलाई के प्रस्ताव में शहबाज़ के मामले का जिक्र किया गया और पाकिस्तान से अपहृत तथा जबरन धर्म परिवर्तन कराई गई अल्पसंख्यक लड़कियों से जुड़े आरोपों की जांच करने की अपील की गई। प्रस्ताव में अधिकारियों से पीड़ितों को स्वतंत्र कानूनी प्रतिनिधित्व, मनोवैज्ञानिक सहायता और परिवारों तक पहुंच देने का आग्रह किया गया। इसमें उन परिवारों की शिकायतें दर्ज करने के लिए राष्ट्रीय तंत्र बनाने की भी मांग की गई जिनकी बेटियां लापता हो जाती हैं या जिनका कथित तौर पर उनकी इच्छा के खिलाफ धर्म परिवर्तन कराया जाता है।
वॉइस फॉर जस्टिस ने 2019 से 2025 के बीच नाबालिग ईसाई लड़कियों के कथित अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन, विवाह और यौन शोषण से जुड़े 210 मामले दर्ज होने की जानकारी दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, दर्ज मामलों में से 89 प्रतिशत पंजाब में हुए। वकालत करने वाले समूहों ने अलग से अनुमान लगाया है कि पाकिस्तान में हर साल 1,000 से अधिक नाबालिग लड़कियों को जबरन धर्म परिवर्तन और विवाह के लिए मजबूर किया जाता है। हालांकि, सटीक आंकड़े जुटाना मुश्किल है, क्योंकि कई परिवारों को धमकियों और सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ता है या पुलिस कार्रवाई नहीं करती।
सुरक्षा के लिए परिवारों की मुश्किल लड़ाई
दूसरे मामलों की रिपोर्ट बताती हैं कि किसी लड़की को कथित अपहरणकर्ता के पास लौटाने वाले अदालत के आदेश के लंबे समय तक असर हो सकते हैं। कुछ मामलों में, लड़की के भाग जाने के बाद पुलिस ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया क्योंकि आरोपी अब भी उसे अपनी पत्नी बताता रहा। दूसरे परिवारों ने शिकायत दर्ज कराने या फर्जी विवाह रिकॉर्ड को चुनौती देने के बाद धमकियां मिलने की सूचना दी है।
ईसाई नेताओं और अधिकार समूहों का कहना है कि अल्पसंख्यक परिवारों के पास अक्सर कई स्तरों की अदालतों में अपील जारी रखने के लिए जरूरी धन और कानूनी सहायता नहीं होती। कार्यवाही के दौरान लड़की को रिश्तेदारों से अलग भी रखा जा सकता है, जिससे उसके लिए खुलकर बोलना या परामर्श पाना मुश्किल हो जाता है।
कैपुचिन कमीशन फॉर जस्टिस, पीस एंड इकोलॉजी के निदेशक फादर लाज़र असलम ने इस चलन को धार्मिक अल्पसंख्यकों में डर का कारण बताया है। उन्होंने और समुदाय के अन्य प्रतिनिधियों ने सरकार से अपहृत लड़कियों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करने और अपहरण को छिपाने के लिए धर्म परिवर्तन का इस्तेमाल करने वालों पर मुकदमा चलाने की अपील की है।
कार्रवाई की मांग कर रहे समूहों का कहना है कि लड़की को छुड़ाए जाने के बाद भी उसकी सुरक्षा जारी रहनी चाहिए। पीड़िता को फिर से जीवन संवारने के लिए सुरक्षित आवास, चिकित्सा उपचार, मनोवैज्ञानिक देखभाल, शिक्षा और बदले की कार्रवाई से सुरक्षा की जरूरत है। उनका कहना है कि किसी बच्चे को उसके अपहरण के आरोपी वयस्क के पास लौटाना बचाव के उद्देश्य को ही विफल कर देता है।
फैसलाबाद मामले में कार्यकर्ता प्रांतीय सरकार, पुलिस और उच्च अदालतों से हिरासत के आदेश की समीक्षा करने, उपलब्ध सभी रिकॉर्ड से लड़की की उम्र की पुष्टि करने, कथित फर्जी दस्तावेजों की जांच करने और अदालत में धमकियों के दावों की पड़ताल करने की मांग कर रहे हैं। जैनसन ने कहा है कि अगर लड़की को उसके परिवार के पास नहीं लौटाया गया तो वह संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संसद समेत अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सामने यह मामला उठाएंगे।
यह मामला क्या तय कर सकता है
अब यह विवाद सिर्फ एक हिरासत आदेश तक सीमित नहीं है। यह कसौटी है कि क्या पाकिस्तान के हाल ही में मजबूत किए गए बाल विवाह नियम तब भी लागू होंगे जब किसी परिवार के सुरक्षा के दावे को चुनौती देने के लिए धर्म परिवर्तन और कथित विवाह का सहारा लिया जाए।
विश्वसनीय समीक्षा के लिए धार्मिक आस्था के सवाल को अपहरण और शोषण के आरोपों से अलग रखना होगा। लड़की की उम्र भरोसेमंद रिकॉर्ड से तय करनी होगी, यह जांचना होगा कि उसके बयान स्वतंत्र रूप से दिए गए थे या नहीं और यह सुनिश्चित करना होगा कि उससे आरोपी या उसके परिवार के दबाव के बिना बात की जाए।
अधिकार रक्षकों का कहना है कि सरकार को अल्पसंख्यक लड़कियों से जुड़े मामलों के लिए विशेष प्रक्रिया बनानी चाहिए, पुलिस जांच बेहतर करनी चाहिए, शिकायतों को अनदेखा करने वाले अधिकारियों को दंडित करना चाहिए और जबरन धर्म परिवर्तन को अलग आपराधिक अपराध घोषित करना चाहिए। वे यह भी चाहते हैं कि अदालतें कथित विवाह के आधार पर मूल आपराधिक आरोपों का निपटारा होने से पहले हिरासत तय करने के बजाय बच्चे के कल्याण को पहली प्राथमिकता दें।
लड़की के परिवार का समर्थन कर रहे संगठनों के अनुसार, जुलाई के हिरासत फैसले ने उसे असुरक्षित स्थिति में छोड़ दिया है। उनके लिए उसकी सुरक्षा तत्काल प्राथमिकता है। व्यापक चिंता यह है कि क्या कानूनी संस्थाएं बच्चों की रक्षा उनके धर्म, लिंग या परिवार की आय से परे जाकर करेंगी।
मुख्य बातें
- फैसलाबाद की सत्र अदालत ने 13 वर्षीय लड़की की हिरासत उसके अपहरण के आरोपी व्यक्ति को सौंप दी।
- आरोपी को जमानत भी मिली और उसे लड़की का कथित पति बताया गया।
- अधिकार समूह उन दस्तावेजों पर सवाल उठा रहे हैं जिनमें लड़की को वयस्क बताया गया था, और उसके धर्म परिवर्तन तथा विवाह की वैधता पर संदेह जता रहे हैं।
- कार्यकर्ताओं का कहना है कि धमकी या दबाव की आशंका होने पर बच्चे का बयान स्वतंत्र सहमति साबित नहीं कर सकता।
- पंजाब का 2026 का कानून विवाह की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष तय करता है और बाल विवाह को गैर-जमानती अपराध बनाता है।
- यूरोपीय संसद ने पाकिस्तान से अल्पसंख्यक लड़कियों की रक्षा करने और अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन तथा बाल विवाह के आरोपों की जांच करने की अपील की है।






