राष्ट्रीय चेतना में बदलाव
दक्षिण कोरिया के 32 लाख से अधिक लोगों ने लाइलाज बीमारी होने पर जीवनरक्षक उपचार न लेने के लिए औपचारिक रूप से पंजीकरण कराया है। जीवनरक्षक उपचार प्रबंधन राष्ट्रीय एजेंसी की ओर से जारी यह आंकड़ा दर्शाता है कि देश में जीवन के अंतिम पड़ाव को देखने का नजरिया गहराई से बदल रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, पंजीकृत लोगों में लगभग दो-तिहाई महिलाएं हैं। कुल 21.3 लाख महिलाओं और 10.7 लाख पुरुषों ने अपनी इच्छा दर्ज कराई है। 65 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों की संख्या कुल पंजीकरण के दो-तिहाई से ज्यादा है, जो बताता है कि बुजुर्ग आबादी अपने जीवन के अंतिम चरण की योजना सक्रिय रूप से बना रही है।
विषय-सूची
फरवरी 2018 में व्यवस्था शुरू होने के बाद से भागीदारी में लगातार वृद्धि बताती है कि "गरिमापूर्ण मृत्यु" की अवधारणा को लोकप्रियता मिल रही है। पहले वर्ष में पंजीकरण कराने वालों की संख्या लगभग 86,000 थी। अगस्त 2021 तक यह बढ़कर 10 लाख और अक्टूबर 2023 तक 20 लाख हो गई। अगस्त 2025 तक कुल संख्या 30 लाख से अधिक हो गई। इस तेज़ी से बढ़ती स्वीकार्यता से मृत्यु, स्वायत्तता और मृत्यु की चिकित्सा-प्रक्रिया को लेकर सामाजिक नजरिए में बदलाव झलकता है।
हालिया अध्ययन भी इस रुझान की पुष्टि करते हैं। कोरिया इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ एंड सोशल अफेयर्स के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि अधिकांश उत्तरदाता शारीरिक पीड़ा कम करने और परिवार पर आर्थिक बोझ घटाने को प्राथमिकता देते हैं। अध्ययन के मुताबिक, कई कोरियाई लोगों के लिए "अच्छी मृत्यु" का अर्थ अब पारंपरिक, परिवार-केंद्रित रस्मों से कम और व्यक्तिगत सहजता तथा अनावश्यक पीड़ा से बचने से अधिक जुड़ा है।
अध्ययन में कहा गया, "अब कोरियाई लोगों की बढ़ती संख्या के लिए 'अच्छी मृत्यु' परिवार-केंद्रित क्षण से कम और पीड़ा तथा आर्थिक दबाव से मुक्त होने से अधिक जुड़ी है।" यह ऐतिहासिक मान्यताओं से एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है।
जीवन के अंतिम चरण की देखभाल के प्रति यह व्यावहारिक नजरिया दक्षिण कोरिया में चिकित्सा नैतिकता और पारिवारिक संबंधों की तस्वीर बदल रहा है। आबादी की उम्र बढ़ने और चिकित्सा तकनीक के आगे बढ़ने के साथ, आक्रामक उपचार से इनकार करने की क्षमता मरीजों के अधिकारों का अहम हिस्सा बन गई है।
कानूनी ढांचे का विकास
मौजूदा कानूनी व्यवस्था रातोंरात नहीं बनी। यह वर्षों तक चली नैतिक बहसों और उन ऐतिहासिक अदालती मामलों का नतीजा है, जिन्होंने दक्षिण कोरियाई समाज को मृत्यु से जुड़े कठिन सवालों का सामना करने पर मजबूर किया। जीवनरक्षक उपचार संबंधी निर्णय अधिनियम, 2018 तक पहुंचने का रास्ता दो अहम मामलों से होकर गुजरा: 1998 का बोरेमे अस्पताल मामला और 2009 का सेवेरेंस अस्पताल मामला।
1998 के बोरेमे अस्पताल मामले में, पत्नी के अनुरोध पर आर्थिक तंगी के कारण मरीज को अस्पताल से छुट्टी देने के बाद सर्जनों को दोषी पाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि डॉक्टरों ने हत्या में सहयोगी की भूमिका निभाई थी और पत्नी के अनुरोध को बिना अधिकार के किसी दूसरे की ओर से लिया गया फैसला माना। इस फैसले से चिकित्सा जगत में हलचल मच गई। ऐसा भय का माहौल बना, जिसमें डॉक्टरों को लगा कि आपराधिक जिम्मेदारी से बचने के लिए उन्हें हर कीमत पर मरीज की जिंदगी बढ़ानी होगी।
एक दशक बाद सेवेरेंस अस्पताल मामले ने कानूनी परिदृश्य बदल दिया। स्थायी वनस्पतिक अवस्था में रह रही एक महिला के परिवार ने उपचार बंद करने की मांग को लेकर मुकदमा दायर किया। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि यदि मरीज मृत्यु की अपरिवर्तनीय अवस्था में पहुंच चुका है, तो उसे आत्मनिर्णय का संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने माना कि यदि जीवनरक्षक उपचार वापस लेना मरीज की संभावित इच्छा के अनुरूप हो, तो इसकी अनुमति दी जा सकती है। यह मानवीय गरिमा और खुशी की तलाश के संवैधानिक अधिकारों पर आधारित था।
इन मामलों ने 2016 में पारित और 2018 में लागू हुए कानून के लिए न्यायिक आधार तैयार किया। अधिनियम ने बीमारी की "अंतिम अवस्था" और "मृत्यु प्रक्रिया" के बीच स्पष्ट अंतर तय किया। अंतिम अवस्था ऐसी स्थिति है जिसमें उपचार के बावजूद कुछ महीनों में मृत्यु होने की आशंका हो, जबकि मृत्यु प्रक्रिया में मरीज की मृत्यु निकट होती है और उसके ठीक होने की कोई संभावना नहीं रहती। अहम बात यह है कि कानून केवल "मृत्यु प्रक्रिया" के दौरान ही उपचार रोकने या वापस लेने की अनुमति देता है। यह सीमित अवधि मरीज की स्वायत्तता और जीवन की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने के लिए तय की गई है।
कानून ने निर्णय लेने के लिए विशिष्ट व्यवस्थाएं बनाईं, जिनमें जीवनरक्षक उपचार के लिए अग्रिम निर्देश (ASLST) और जीवनरक्षक उपचार के लिए चिकित्सक के आदेश (POLST) शामिल हैं। इस प्रक्रिया की निगरानी के लिए जीवनरक्षक उपचार प्रबंधन राष्ट्रीय एजेंसी और संस्थागत नैतिकता समितियों जैसे निकाय भी स्थापित किए गए।
कन्फ्यूशियसवादी मूल्य बनाम आधुनिक स्वायत्तता
परंपरागत कन्फ्यूशियसवादी समाज में पश्चिमी शैली का कानूनी ढांचा लागू करना कुछ खास चुनौतियां पेश करता है। दक्षिण कोरिया में कन्फ्यूशियसवादी मूल्य पितृभक्ति पर जोर देते हैं, जिसके तहत बच्चों का कर्तव्य है कि वे अपने माता-पिता की देखभाल करें और उनका जीवन बढ़ाएं। ऐतिहासिक रूप से चिकित्सा संबंधी फैसले व्यक्तिगत विकल्पों के बजाय पूरे परिवार के सामूहिक निर्णय होते थे। मृत्यु पर चर्चा को अक्सर वर्जित माना जाता था और मरीजों को निराशा से बचाने के लिए उनकी बीमारी के पूर्वानुमान की सच्चाई से अनजान रखा जाता था।
इन सांस्कृतिक प्रभावों के बावजूद, आंकड़े व्यक्तिगत स्वायत्तता की ओर स्पष्ट बदलाव दिखाते हैं। पुरुषों की तुलना में दोगुनी दर से महिलाओं का पंजीकरण कराना स्वास्थ्य प्रबंधन में बदलती लैंगिक भूमिकाओं या मृत्यु का सामना करने की महिलाओं की अधिक तत्परता का संकेत हो सकता है। इसके अलावा, 65 वर्ष या उससे अधिक उम्र की बुजुर्ग महिलाओं में लगभग हर चार में से एक ने अग्रिम निर्देश दाखिल किया है।
इस बदलाव का मतलब यह नहीं कि परिवार की भूमिका खत्म हो गई है। यदि मरीज निर्णय लेने में असमर्थ हो और उसकी पहले की इच्छा की पुष्टि न हो सके, तो कानून परिवार के सदस्यों को उसकी ओर से फैसला लेने की अनुमति देता है। हालांकि, इससे मतभेद की आशंका पैदा होती है। यदि परिवार मरीज की पहले से बताई इच्छा से असहमत हो या मरीज से उसके रिश्ते अच्छे न हों, तो उसकी स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।
कोरिया जूंगआंग डेली ने इस बढ़ते आंदोलन पर खबर दी और बताया कि गरिमापूर्ण मृत्यु के समर्थन का दायरा केवल कानूनी रूप से उपचार से इनकार करने तक सीमित नहीं है। सर्वेक्षणों से पता चलता है कि 91.9 प्रतिशत दक्षिण कोरियाई लोग लाइलाज बीमारी होने पर जीवन बढ़ाने वाला उपचार बंद कर देंगे। जनता के बीच यह व्यापक समर्थन बताता है कि सांस्कृतिक परंपराएं बरकरार रहने के बावजूद, लोग पुरानी बीमारियों और उच्च तकनीक वाले चिकित्सा हस्तक्षेप की आधुनिक वास्तविकताओं के अनुरूप ढल रहे हैं।
कानून और चिकित्सकीय वास्तविकता के बीच अंतर
कानूनी ढांचा मौजूद है, लेकिन शोध से कानून के उद्देश्य और चिकित्सकीय व्यवहार के बीच बड़ी खाई का पता चलता है। BMC मेडिकल एथिक्स में प्रकाशित एक अध्ययन में इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड का विश्लेषण किया गया और स्वास्थ्यकर्मियों से सर्वेक्षण किया गया। इसमें सामने आया कि उपचार न लेने के फैसले अक्सर बीमारी के बहुत आगे बढ़ जाने के बाद लिए जाते हैं।
अध्ययन में पाया गया कि जीवनरक्षक उपचार रोकने के फैसले अक्सर मृत्यु से महज एक-दो दिन पहले लिए जाते हैं। इतनी देर से फैसला होने पर पहले से योजना बनाने की अवधारणा कमजोर पड़ जाती है, क्योंकि कानूनी प्रक्रिया शुरू होने तक मरीज अक्सर सार्थक रूप से उसमें हिस्सा लेने की हालत में नहीं रहते। अध्ययन ने यह भी बताया कि फैसला कौन लेता है, इस पर भी अंतर है। मरीज और उनके परिवार मानते हैं कि फैसला मरीज को लेना चाहिए, लेकिन चिकित्सकीय आंकड़ों के अनुसार 81.5 प्रतिशत मामलों में फैसला परिवार के सदस्य लेते हैं।
डॉक्टरों को भी कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। बीमारी के परिणाम का अनुमान लगाने में अनिश्चितता के कारण चिकित्सा पेशेवरों के लिए जीवनरक्षक उपचार पर चर्चा का "सही समय" तय करना अक्सर कठिन होता है। कानून के अनुसार उपचार तभी वापस लिया जा सकता है जब मरीज "मृत्यु प्रक्रिया" में हो, लेकिन चिकित्सकीय रूप से इस अवस्था का सही समय तय करना मुश्किल है।
अध्ययन के लेखकों ने कहा, "अधिकांश डॉक्टरों और नर्सों का सुझाव था कि जीवनरक्षक उपचार बंद करने पर चर्चा का उचित समय तब होना चाहिए, जब मरीज की हालत गंभीर हो, लेकिन वह होश में हो।"
हालांकि, व्यवहार में कानूनी जवाबदेही का डर और अस्पष्ट चिकित्सकीय मानदंड अक्सर बातचीत को तब तक टाल देते हैं, जब तक मरीज बेहोश न हो जाए। नतीजतन, आम तौर पर मृत्यु निकट होने तक आक्रामक उपचार जारी रहता है, जबकि कई मरीज शायद इससे पहले आराम-केंद्रित देखभाल पसंद करते।
दर्द-निवारक देखभाल तक असमान पहुंच
एक अन्य अहम मुद्दा हॉस्पिस और उपशामक देखभाल तक पहुंच में असमानता है। 2018 का अधिनियम जीवनरक्षक उपचार न लेने के फैसलों के साथ हॉस्पिस देखभाल को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था। हालांकि, मौजूदा नियमों के तहत सरकार द्वारा निर्धारित हॉस्पिस सेवाएं केवल पांच खास बीमारियों वाले मरीजों तक सीमित हैं: कैंसर, एचआईवी, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज, दीर्घकालिक यकृत विफलता और दीर्घकालिक श्वसन विफलता।
इस वजह से हृदय-वाहिका रोग या डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे बड़ी संख्या में मरीजों को विशेषज्ञ उपशामक देखभाल कानूनी रूप से उपलब्ध नहीं है। 2024 में एक मेडिकल जर्नल में प्रकाशित विश्लेषण के अनुसार, 2022 में लाइलाज बीमारियों से ग्रस्त केवल लगभग 10 प्रतिशत मरीजों को उपशामक देखभाल मिली। यह सुविधा मुख्य रूप से कैंसर मरीजों तक सीमित है, जबकि दक्षिण कोरिया में मृत्यु के प्रमुख कारणों में हृदय रोग और डिमेंशिया भी शामिल हैं।
उपशामक देखभाल उपलब्ध न होने पर मरीजों को लग सकता है कि किसी तरह की चिकित्सा सहायता पाने के लिए उन्हें आक्रामक जीवनरक्षक उपचार जारी रखना ही होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन गंभीर स्वास्थ्य-संबंधी पीड़ा झेल रहे सभी मरीजों के लिए उपशामक देखभाल की सिफारिश करता है, लेकिन दक्षिण कोरिया का कानून अब तक इस वैश्विक मानक के अनुरूप पूरी तरह नहीं ढला है। इसके दायरे में शामिल बीमारियों की सूची बढ़ाने के प्रयास धीमे रहे हैं, जिससे कई परिवारों को जरूरी सहायता प्रणालियों के बिना ही जीवन के अंतिम चरण का सामना करना पड़ता है।
व्यवस्थागत जोखिम और तकनीक पर निर्भरता
अग्रिम निर्देशों के प्रबंधन के लिए केंद्रीकृत डिजिटल प्रणाली पर निर्भरता काम को कुशल बनाती है, लेकिन इससे व्यवस्थागत जोखिम भी पैदा होते हैं। सितंबर 2025 में एक घटना ने इन कमजोरियों को उजागर किया, जब डेटा सेंटर में आग लगने से नेशनल इन्फॉर्मेशन रिसोर्स सर्विस का काम बाधित हो गया। सरकार का जीवनरक्षक उपचार सूचना प्रसंस्करण तंत्र ठप पड़ गया, जिससे अस्पताल यह पुष्टि नहीं कर पाए कि मरीजों ने अग्रिम निर्देशों पर हस्ताक्षर किए थे या नहीं।
इस रुकावट से देशभर के चिकित्सा केंद्रों में तत्काल अफरा-तफरी मच गई। डॉक्टर यह पुष्टि नहीं कर सके कि बेहोश मरीजों ने जीवन बढ़ाने वाली देखभाल से इनकार किया था या नहीं। दस्तावेजों की पुष्टि न होने पर फैसला लेने का अधिकार परिवार के सदस्यों के पास चला गया। जिन मरीजों ने अपने रिश्तेदारों से संबंध तोड़ लिए थे या जो अकेले रहते थे, उनके लिए यह गंभीर जोखिम था कि उनकी इच्छा अनदेखी कर दी जाएगी।
एक मामले में 60 वर्ष से अधिक उम्र के एक व्यक्ति को पेट का लाइलाज कैंसर था। उसने कई महीने पहले जीवनरक्षक उपचार से इनकार करने संबंधी दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन आपात सर्जरी के लिए दूसरे अस्पताल ले जाए जाने पर प्रणाली ठप होने के कारण अस्पताल उसके दस्तावेज की पुष्टि नहीं कर सका। संकट की उस घड़ी में चिकित्सा कर्मचारियों को मरीज और उसके परिवार को नया दस्तावेज तैयार करने के लिए मनाना पड़ा। इस घटना ने प्रणाली की नाजुकता और तकनीकी विफलता से मरीजों की सुनियोजित योजनाएं बिगड़ने पर उन्हें होने वाली परेशानी को उजागर किया।
इसके बाद राष्ट्रीय एजेंसी ने होश में रहने वाले मरीजों को सलाह दी कि वे पंजीकरण कार्ड अपने पास रखें और वैकल्पिक उपाय के तौर पर अस्पतालों में सीधे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करें। हालांकि, इस घटना ने उन लोगों की स्वायत्तता की रक्षा के लिए बैकअप प्रणालियों की जरूरत को रेखांकित किया, जो अपनी बात कहने में असमर्थ हैं।
कानून के विस्तार के प्रस्ताव
इन सीमाओं को देखते हुए सांसद और स्वास्थ्य अधिकारी कानून का दायरा बढ़ाने के लिए सुधारों पर जोर दे रहे हैं। सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ कोरिया की सांसद नाम इन-सून ने 2025 में संशोधन का प्रस्ताव रखा। इसका उद्देश्य पात्रता का दायरा बढ़ाकर उन मरीजों को भी शामिल करना है जिनकी "मृत्यु की आशंका है", न कि केवल वे जो तत्काल "मृत्यु प्रक्रिया" में हैं।
मौजूदा कानून के तहत उपचार बंद करने से पहले मरीज का मृत्यु के निकट होना जरूरी है। यह संकीर्ण परिभाषा फैसले के लिए उपलब्ध समय को सीमित करती है और मरीजों को ऐसे उपचार झेलने के लिए मजबूर कर सकती है जिनसे खास लाभ नहीं होता। प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य मरीजों को किसी अपरिवर्तनीय बीमारी के दौरान ही पहले से जीवनरक्षक उपचार न लेने की अनुमति देना है। इससे कानूनी ढांचा "अंतिम अवस्था" की अवधारणा के अधिक अनुरूप होगा, जिसमें कुछ महीनों के भीतर मृत्यु की आशंका तो होती है, लेकिन वह तत्काल निकट नहीं होती।
कल्याण मंत्री जियोंग यून-क्योंग ने भी दायरा बढ़ाने के समर्थन में बात कही है। उन्होंने माना कि फैसलों को केवल अंतिम अवस्था तक सीमित रखने से मरीजों का आत्मनिर्णय का अधिकार सीमित होता है। सरकार की हॉस्पिस और जीवनरक्षक उपचार पर दूसरी व्यापक योजना (2024-2028) में उपचार वापस लेने के समय को आगे लाने के प्रस्ताव शामिल हैं। इससे यह बढ़ती सहमति झलकती है कि जिन लोगों की रक्षा के लिए कानून बनाया गया था, उनकी बेहतर सेवा के लिए इसे विकसित होना होगा।
इन प्रस्तावित बदलावों के सामने चुनौतियां हैं, खासकर नैतिक सीमाओं और उपचार की निरर्थकता की परिभाषा को लेकर। हालांकि, उपचार से इनकार करने वाले दक्षिण कोरियाई लोगों की बड़ी संख्या बताती है कि जनता जीवन के अंतिम चरण की देखभाल के लिए अधिक लचीले और मानवीय दृष्टिकोण को अपनाने के लिए तैयार है।
मुख्य बातें
- दक्षिण कोरिया के 32 लाख से अधिक लोगों ने औपचारिक रूप से जीवनरक्षक उपचार से इनकार किया है। पंजीकरण कराने वालों में लगभग दो-तिहाई महिलाएं हैं।
- जीवनरक्षक उपचार संबंधी निर्णय अधिनियम 2018 में लागू हुआ। इससे पहले ऐतिहासिक अदालती मामलों ने निरर्थक उपचार से इनकार करने के अधिकार की स्थापना की थी।
- शोध से पता चलता है कि दर्द और आर्थिक बोझ कम करने की इच्छा के कारण पारंपरिक परिवार-केंद्रित निर्णयों से व्यक्तिगत स्वायत्तता की ओर बदलाव आ रहा है।
- 2025 में डेटा सेंटर में लगी आग ने व्यवस्थागत जोखिम उजागर किए। अस्पताल बेहोश मरीजों के अग्रिम निर्देशों की पुष्टि नहीं कर पाए और अफरा-तफरी मच गई।
उपशामक देखभाल तक पहुंच अब भी सीमित है। कानून के तहत यह केवल पांच खास बीमारियों के लिए उपलब्ध है, जिससे हृदय-वाहिका रोग या डिमेंशिया से जूझ रहे कई मरीज इसके दायरे से बाहर हैं।
सांसदों ने बीमारी की "अंतिम अवस्था" में उपचार बंद करने की पात्रता बढ़ाने के लिए संशोधन प्रस्तावित किए हैं, ताकि बीमारी के दौरान पहले ही फैसले लिए जा सकें।






