दक्षिण कोरिया में युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य मामलों में अभूतपूर्व उछाल, इलाज की दर तेजी से बढ़ी

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Korea faces mental health crisis as children’s psychiatric care visits ...

मानसिक स्वास्थ्य संकट के बीच इलाज में उछाल

दक्षिण कोरिया में युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति दृष्टिकोण में नाटकीय बदलाव देखा जा रहा है। इसकी एक वजह मनोचिकित्सकीय देखभाल लेने वाले बच्चों और किशोरों की संख्या में तेज बढ़ोतरी है। स्वास्थ्य बीमा समीक्षा एवं मूल्यांकन सेवा के हालिया आंकड़ों के अनुसार, पिछले चार वर्षों में 18 वर्ष से कम उम्र के लोगों में मानसिक स्वास्थ्य उपचार लेने वालों की संख्या 76.6 प्रतिशत बढ़ी है। केवल 2024 में, मनोचिकित्सा क्लीनिकों में आने वाले युवा मरीजों की संख्या 3,50,000 से अधिक हो गई, जबकि 2020 में यह 1,98,384 थी। यह बढ़ोतरी लगातार जारी रही है। 2023 में पहली बार यह आंकड़ा 3,00,000 के पार पहुंचा, जो देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य परिदृश्य में बड़े बदलाव का संकेत है।

विषय-सूची
  1. मानसिक स्वास्थ्य संकट के बीच इलाज में उछाल
  2. एडीएचडी से अवसाद तक: बदलता परिदृश्य
  3. शैक्षणिक अपेक्षाओं का दबाव
  4. डिजिटल दुविधा: सोशल मीडिया और स्क्रीन
  5. मानवीय कीमत: केस अध्ययन और आत्महत्या
  6. इलाज के ढांचे की गंभीर चुनौतियां
  7. चिकित्सकीय अधिकार पर बहस
  8. नीतिगत कदम और भविष्य के समाधान
  9. निष्कर्ष

इलाज के मामलों में यह उछाल कई कारकों के जटिल मेल को दर्शाता है। यह युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में वास्तविक वृद्धि का संकेत तो है ही, विशेषज्ञों के अनुसार यह सामाजिक सोच में सकारात्मक बदलाव भी दिखाता है। दक्षिण कोरियाई समाज में दशकों तक मनोचिकित्सकीय मदद लेने से जुड़ा गहरा कलंक रहा है; इसे अक्सर सामाजिक प्रतिष्ठा या परिवार की इज्जत खोने से जोड़कर देखा जाता था। हालांकि, मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि अब ये बाधाएं कम हो रही हैं और अधिक परिवार जरूरी देखभाल हासिल कर पा रहे हैं। यह रुझान दुनिया भर में दिख रहे व्यापक बदलाव से मेल खाता है, जहां युवाओं में चिंता और अवसाद के मामले बढ़ रहे हैं। कोविड-19 महामारी के लंबे समय तक रहे प्रभावों और डिजिटल तकनीक के व्यापक असर ने इसे और बढ़ाया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया है कि महामारी के बाद चिंता और अवसाद संबंधी विकारों के मामलों में दुनिया भर में कम से कम 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। दक्षिण कोरिया में इसका असर युवाओं पर विशेष रूप से तीव्र रहा है, जिसके लिए स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और नीति-निर्माताओं, दोनों की ठोस प्रतिक्रिया जरूरी है। ये आंकड़े देश के लिए एक स्पष्ट चेतावनी हैं कि वह इस परेशानी के मूल कारणों से निपटे और साथ ही सेवाओं की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए मानसिक स्वास्थ्य ढांचे की क्षमता का विस्तार करे।

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एडीएचडी से अवसाद तक: बदलता परिदृश्य

मरीजों के आंकड़ों के विश्लेषण से अलग-अलग आयु वर्गों में मानसिक स्वास्थ्य निदान के स्पष्ट रुझान सामने आते हैं। 12 वर्ष और उससे कम उम्र के बच्चों में अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) सबसे आम समस्या बनी हुई है। 2024 में इसके 98,318 मामले दर्ज किए गए। इस आयु वर्ग में विकास संबंधी देरी दूसरा सबसे आम निदान है। इसके उलट, 13 से 18 वर्ष के किशोरों की तस्वीर काफी अलग है। इस बड़े आयु वर्ग में अवसाद सबसे प्रमुख मानसिक बीमारी है, जिसके 60,895 मामले सामने आए। इसके बाद एडीएचडी के 54,311 मामले दर्ज किए गए। निदान में यह बदलाव दिखाता है कि बचपन से किशोरावस्था में प्रवेश करते समय दबाव और विकास संबंधी चुनौतियां किस तरह बदलती हैं।

लिंग के आधार पर आंकड़े भी संकट की तस्वीर को और स्पष्ट करते हैं। लड़कों में मनोचिकित्सकीय मरीजों की सबसे बड़ी संख्या सात से 12 वर्ष के आयु वर्ग में है, जिसमें 1,05,000 से अधिक बच्चे शामिल हैं। इसके विपरीत, लड़कियों में मानसिक स्वास्थ्य उपचार की दर 13 से 18 वर्ष की उम्र के बीच सबसे अधिक है। इस वर्ग में मरीजों की संख्या लगभग 95,000 है। विशेषज्ञ इन अंतरों की वजह विकास की अलग-अलग समय-सीमाओं और शुरुआती वर्षों में लड़कों तथा लड़कियों पर पड़ने वाले अलग सामाजिक दबावों को बताते हैं। खासतौर पर किशोरियों में अवसाद की व्यापकता ने शोधकर्ताओं और चिकित्सकों का ध्यान खींचा है।

शैक्षणिक अपेक्षाओं का दबाव

मानसिक स्वास्थ्य संकट की एक बड़ी वजह दक्षिण कोरियाई युवाओं पर बहुत कम उम्र से डाला जाने वाला तीव्र शैक्षणिक दबाव है। वहां की शिक्षा व्यवस्था बेहद प्रतिस्पर्धी मानी जाती है। नियमित स्कूल के बाद विद्यार्थी अक्सर देर शाम तक निजी कोचिंग स्कूलों में पढ़ते हैं, जिन्हें हाग्वोन कहा जाता है। विश्वविद्यालयों की बेहद प्रतिस्पर्धी प्रवेश परीक्षाओं पर जोर से ऐसा माहौल बनता है जिसमें शैक्षणिक सफलता सर्वोपरि होती है, अक्सर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की कीमत पर। सैमसंग मेडिकल सेंटर में मनोचिकित्सा की प्रोफेसर जोंग यू-सुक का कहना है कि अब बच्चे पहले की तुलना में बहुत कम उम्र में ही शैक्षणिक और सामाजिक तनाव का सामना कर रहे हैं। पहले ऐसी समस्याएं आमतौर पर मिडिल स्कूल में सामने आती थीं।

लगातार बेहतर प्रदर्शन करने की होड़ में आराम और फुर्सत के लिए बहुत कम जगह बचती है, जिससे थकावट और चिंता बढ़ती है। यह दबाव केवल विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे परिवार को प्रभावित करता है, क्योंकि माता-पिता बच्चों की शिक्षा में काफी आर्थिक और भावनात्मक संसाधन लगाते हैं। अत्यधिक प्रतिस्पर्धी समाज में पीछे छूट जाने का डर युवाओं के लिए भारी पड़ सकता है और निराशा तथा गहरी मानसिक परेशानी का कारण बन सकता है। जैसे-जैसे दबाव बढ़ता है और कम उम्र में शुरू होता है, मानसिक स्वास्थ्य पर इसका असर निदान की बढ़ती संख्या और मनोचिकित्सकीय मदद लेने वाले बच्चों की घटती उम्र में दिखाई देता है।

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डिजिटल दुविधा: सोशल मीडिया और स्क्रीन

शैक्षणिक दबाव के साथ-साथ डिजिटल माहौल भी दक्षिण कोरियाई युवाओं के बिगड़ते मानसिक स्वास्थ्य में बड़ी भूमिका निभाता है। विशेषज्ञों ने सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल को इसका एक प्रमुख कारण बताया है। किशोरों के सामने लगातार जानकारी की बाढ़ रहती है; उन्हें ऑनलाइन साइबर बुलिंग और साथियों से अवास्तविक तुलना का भी सामना करना पड़ता है। मोबाइल एनालिटिक्स फर्म आईजीएवर्क्स के आंकड़ों के मुताबिक, कोरियाई किशोर हर दिन औसतन 98 मिनट यूट्यूब वीडियो देखने और 49 मिनट इंस्टाग्राम सामग्री देखने में बिताते हैं। स्क्रीन पर बिताए जा रहे इस लंबे समय के असर को लेकर माता-पिता और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चिंता जताई है।

साइंसडायरेक्ट में प्रकाशित सहकर्मी-समीक्षित शोध में स्मार्टफोन के इस्तेमाल और लिंग से जुड़ी एक खास चिंता सामने आई है। अध्ययन में पाया गया कि स्मार्टफोन का लंबे समय तक इस्तेमाल लड़कियों में अवसाद के लक्षण और आत्महत्या के विचार बढ़ाता है, हालांकि लड़कों में यह पैटर्न उसी स्तर पर नहीं देखा गया। शोध के अनुसार, दोस्तों और परिवार से बातचीत जैसे सामाजिक और सक्रिय स्मार्टफोन इस्तेमाल से अवसाद के लक्षण कम होने का अनुमान लगाया जा सकता है, लेकिन इस्तेमाल की कुल अवधि अब भी जोखिम का एक अहम कारक है। इन निष्कर्षों में दिखा लैंगिक अंतर बताता है कि डिजिटल मीडिया अलग-अलग समूहों को जिस तरह प्रभावित करता है, उससे निपटने के लिए लक्षित उपाय जरूरी हैं।

"दक्षिण कोरियाई समाज में पहले की तुलना में मनोचिकित्सक के पास जाने को लेकर पूर्वाग्रह और डर कम हुआ है, जिससे इलाज लेने की बाधा घटी है," सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिसिन में बाल एवं किशोर मनोचिकित्सा के प्रोफेसर होंग सुन-बम ने कहा।

प्रोफेसर ने आगे कहा कि मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी यह भी दर्शाती है कि टेलीविजन और यूट्यूब पर बाल मनोचिकित्सा से जुड़ी सामग्री देखने के बाद अधिक माता-पिता पेशेवर मदद ले रहे हैं। इससे पता चलता है कि मीडिया दोहरी भूमिका निभा रहा है: सामाजिक तुलना के जरिए चिंता बढ़ाने के साथ-साथ, यह शिक्षा और जागरूकता का माध्यम भी बन रहा है। इससे माता-पिता उन लक्षणों को पहचान पा रहे हैं जिन पर शायद पहले उनका ध्यान न जाता।

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मानवीय कीमत: केस अध्ययन और आत्महत्या

इन आंकड़ों के पीछे ऐसे युवाओं की असली कहानियां हैं जो हालात से जूझ रहे हैं। कोरिया जूंगआंग डेली में प्रकाशित एक मामले से इन चुनौतियों की जटिलता का पता चलता है। सियोल में नौ साल के एक लड़के ने अपने माता-पिता के तलाक के बाद अवसाद का इलाज लेना शुरू किया। उसकी मां ने बताया कि अस्थिर घरेलू माहौल ने उसके भावनात्मक विकास को प्रभावित किया, जिससे वह चिड़चिड़ा हो गया और स्मार्टफोन का इस्तेमाल बढ़ गया। यह मामला दिखाता है कि पारिवारिक परिस्थितियां और डिजिटल सामग्री का इस्तेमाल मिलकर बहुत छोटे बच्चों में भी मानसिक स्वास्थ्य संकट पैदा कर सकते हैं। बच्चों में अवसाद के लक्षण अक्सर वयस्कों से अलग होते हैं। चिड़चिड़ापन या अत्यधिक संवेदनशीलता जैसे लक्षणों को सामान्य व्यवहारगत अवज्ञा समझने की भूल हो सकती है।

अनुपचारित या अपर्याप्त रूप से संभाली गई मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सबसे गंभीर परिणाम आत्महत्या है। 2011 से दक्षिण कोरिया में 9 से 24 वर्ष के लोगों की मौत का प्रमुख कारण आत्महत्या रही है। "साइलेंट टाइप" आत्महत्याओं के कारण स्थिति और गंभीर हो जाती है। ऐसे मामलों में पीड़ितों में कोई स्पष्ट समस्या या माहौल से जुड़ा जोखिम कारक नजर नहीं आता। अध्ययनों के मुताबिक, दक्षिण कोरिया में किशोरों की आत्महत्याओं में से लगभग आधी इसी श्रेणी में आती हैं, जो अन्य देशों की तुलना में काफी अधिक है। इससे पता चलता है कि कई युवा शायद चुपचाप तकलीफ झेल रहे हैं और अपनी स्थिति से अनजान हैं, या लंबे समय से चले आ रहे कलंक के कारण मदद मांगने से डरते हैं।

आत्महत्या का असर व्यक्ति से कहीं आगे तक जाता है। एक आत्महत्या पीड़ित के सामाजिक दायरे में लगभग 60 लोगों को प्रभावित करती है और दुख तथा सदमे की लहर पैदा करती है। शोध से पता चलता है कि आत्महत्या से जान गंवाने वाले लोगों के परिवार के सदस्यों में मानसिक बीमारी और खुद आत्महत्या करने का जोखिम काफी अधिक होता है। 2021 में किशोरों में आत्महत्या की दर 10.1 प्रतिशत बढ़ी, जो सभी आयु वर्गों में सबसे अधिक थी। ये दुखद नतीजे दिखाते हैं कि सक्रिय हस्तक्षेप और ऐसी सहायता प्रणालियों की तत्काल जरूरत है जो युवाओं तक संकट की स्थिति में पहुंचने से पहले पहुंच सकें।

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इलाज के ढांचे की गंभीर चुनौतियां

इलाज की दर में बढ़ोतरी से सेवाओं तक बेहतर पहुंच का संकेत मिलता है, लेकिन दक्षिण कोरिया की मानसिक स्वास्थ्य प्रणाली के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। एक प्रमुख चिंता गंभीर जोखिम वाले मरीजों के लिए ढांचे की कमी है। हालीम यूनिवर्सिटी सैक्रेड हार्ट हॉस्पिटल में मनोचिकित्सा की प्रोफेसर होंग ह्योन-जू ने बताया कि आत्महत्या का प्रयास कर चुके बच्चों के लिए अस्पताल में पर्याप्त बिस्तर नहीं हैं। उन्होंने कहा कि गंभीर लक्षणों के मामले बढ़ रहे हैं, जैसे अवसाद के कारण 10 साल के बच्चों को अस्पताल में भर्ती करना। पहले ऐसे मामले बहुत कम देखने को मिलते थे। भर्ती सुविधाओं और कर्मचारियों की कमी से संकट की गंभीर स्थिति से निपटने की प्रणाली की क्षमता सीमित हो जाती है।

एक और बढ़ती चिंता दवाओं पर संभावित अत्यधिक निर्भरता है। एडीएचडी की दवाओं का इस्तेमाल बढ़ा है। एकाग्रता पर कथित असर के कारण इन्हें अक्सर "स्टडी ड्रग्स" कहा जाता है। 2022 से 2024 के बीच 19 वर्ष और उससे कम उम्र के मरीजों के लिए एडीएचडी की दवाओं के 33.5 लाख नुस्खे जारी किए गए। केवल 2024 में नाबालिगों के लिए 13.7 लाख नुस्खे जारी हुए, जो पिछले वर्ष की तुलना में 21.9 प्रतिशत अधिक थे। इस बढ़ोतरी ने बहस छेड़ दी है कि क्या इन दवाओं का इस्तेमाल वास्तविक विकारों के इलाज के लिए हो रहा है या शैक्षणिक लाभ के लिए इन्हें मांगा जा रहा है। कोरिया इंस्टीट्यूट ऑफ ड्रग सेफ्टी एंड रिस्क मैनेजमेंट ने एडीएचडी की दवाओं के इस्तेमाल पर नजर रखने के लिए दवा इतिहास जांच प्रणाली लागू की है, लेकिन नुस्खों की बड़ी संख्या अब भी विवाद का विषय है।

चिकित्सकीय अधिकार पर बहस

कुछ चिकित्सा पेशेवरों समेत आलोचकों का कहना है कि यह प्रणाली इलाज के जैव-चिकित्सकीय मॉडल पर जरूरत से ज्यादा निर्भर है। कोरियाई संस्कृति में डॉक्टरों को अक्सर ऐसी प्राधिकारी हस्तियों के रूप में देखा जाता है जिनकी बात पर सवाल नहीं उठाया जाता। मनोचिकित्सक जब दवा लिखते हैं, तो मरीज और परिवार शायद ही कभी उसकी जरूरत पर सवाल करते हैं या दूसरे विकल्प तलाशते हैं। यह सांस्कृतिक अधीनता और अक्सर 10 मिनट से भी कम समय तक चलने वाली परामर्श बैठकों का मेल, परेशानी के मूल मनोवैज्ञानिक या सामाजिक कारणों को संबोधित किए बिना लंबे समय तक दवाओं पर निर्भरता का कारण बन सकता है। कुछ विशेषज्ञ केवल दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय मनोचिकित्सा, सामुदायिक सहायता और जीवनशैली में बदलाव शामिल करने वाले अधिक समग्र दृष्टिकोण की वकालत करते हैं।

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नीतिगत कदम और भविष्य के समाधान

बढ़ते संकट के जवाब में दक्षिण कोरियाई सरकार कई नीतिगत उपायों पर विचार कर रही है। कोरिया मीडिया कम्युनिकेशंस कमीशन के अध्यक्ष किम जोंग-चोल ने कहा है कि बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पाबंदियां बढ़ाना प्राथमिकता होगी। यह ऑस्ट्रेलिया जैसे अन्य देशों के कदमों के अनुरूप है, जहां हाल ही में 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाया गया है। हालांकि, नियमन इस समस्या का केवल एक हिस्सा है। विशेषज्ञ शिक्षा, शुरुआती हस्तक्षेप और सामुदायिक सहायता समेत व्यापक उपायों की जरूरत पर जोर देते हैं।

स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य साक्षरता (एमएचएल) को बढ़ावा देना एक अहम निवारक उपाय माना जाता है। शिक्षा मंत्रालय के "स्कूल मानसिक स्वास्थ्य संसाधन एवं अनुसंधान केंद्र" ने मिडिल और हाई स्कूल के पाठ्यक्रमों में शिक्षकों के इस्तेमाल के लिए कार्यक्रम तैयार किए हैं। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य विद्यार्थियों को सकारात्मक मानसिक स्वास्थ्य बनाए रखने, लक्षण पहचानने और बिना शर्म महसूस किए मदद मांगने के तरीके सिखाना है। शोध से पता चलता है कि किशोरावस्था में सकारात्मक मानसिक स्वास्थ्य का स्तर मानसिक स्वास्थ्य साक्षरता के स्तर के अनुपात में होता है। इन पाठों को नियमित पाठ्यक्रम में शामिल करके स्कूल विद्यार्थियों को आधुनिक जीवन के दबावों से निपटने के जरूरी कौशल दे सकते हैं।

इसके अलावा, "गेटकीपर" की भूमिका बढ़ाने की मांग भी की जा रही है। इसके तहत शिक्षकों और परामर्शदाताओं को जोखिम में पड़े विद्यार्थियों की पहचान करने और उन्हें विशेषज्ञ सेवाओं तक पहुंचाने का प्रशिक्षण दिया जाएगा। स्कूलों के मौजूदा मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों से आत्महत्या का जोखिम कम करने में सकारात्मक नतीजे मिले हैं, लेकिन पर्याप्त धन न मिलने से उनका दायरा अक्सर सीमित रहता है। फिलहाल, देश के स्वास्थ्य खर्च में मानसिक स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च 3 प्रतिशत से भी कम है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन की 15 से 50 प्रतिशत की सिफारिश से काफी नीचे है। देश के युवाओं के लिए टिकाऊ सहायता प्रणाली बनाने को यह निवेश बढ़ाना जरूरी है।

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निष्कर्ष

दक्षिण कोरिया में युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य मामलों में बढ़ोतरी एक बहुआयामी समस्या है, जिससे निपटने के लिए परिवारों, स्कूलों, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और सरकार की साझा कार्रवाई जरूरी है। इलाज के मामलों में वृद्धि चिंता का विषय तो है, लेकिन यह लंबे समय से मानसिक बीमारी के साथ जुड़े कलंक को तोड़ने की दिशा में एक कदम भी है। शैक्षणिक दबाव और सोशल मीडिया के प्रभाव जैसे परेशानी के मूल कारणों से निपटकर और अधिक मजबूत तथा संवेदनशील देखभाल ढांचा तैयार करके दक्षिण कोरिया अपनी आने वाली पीढ़ियों के कल्याण की रक्षा कर सकता है।

  • दक्षिण कोरिया में मानसिक स्वास्थ्य उपचार लेने वाले 18 वर्ष से कम उम्र के युवाओं की संख्या 2020 से 2024 के बीच 76.6 प्रतिशत बढ़कर 3,50,000 से अधिक हो गई।
  • 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में एडीएचडी सबसे आम निदान है, जबकि 13 से 18 वर्ष के किशोरों में अवसाद सबसे प्रमुख समस्या है।
  • शैक्षणिक दबाव और प्रवेश परीक्षाओं में कड़ी प्रतिस्पर्धा को विद्यार्थियों के तनाव और चिंता के प्रमुख कारणों में गिना जाता है।
  • सोशल मीडिया और स्मार्टफोन का अत्यधिक इस्तेमाल अवसाद के बढ़ते लक्षणों से जुड़ा है, खासकर किशोरियों में।

  • 9 से 24 वर्ष के युवाओं की मौत का प्रमुख कारण आत्महत्या बनी हुई है। "साइलेंट टाइप" आत्महत्याओं की दर अधिक है, जिनमें पहले से चेतावनी के संकेत नहीं दिखते।
  • एडीएचडी की दवाओं के नुस्खों में तेज बढ़ोतरी हुई है, जिससे शैक्षणिक प्रदर्शन के लिए "स्टडी ड्रग्स" के दुरुपयोग की चिंता बढ़ी है।

  • विशेषज्ञ स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य साक्षरता बढ़ाने और मानसिक स्वास्थ्य ढांचे पर सरकारी खर्च बढ़ाने की वकालत करते हैं।
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