2027 में पाठ्यक्रम में बड़ा बदलाव, मलेशिया सह-शिक्षण की ओर क्यों बढ़ रहा है
मलेशिया 2027 में कक्षा में पढ़ाने के तरीके में व्यापक बदलाव की योजना बना रहा है। शिक्षा मंत्रालय एक ही कक्षा में दो योग्य शिक्षकों को तैनात करेगा। इसकी शुरुआत प्राथमिक स्कूलों में कक्षा 1 से 3 तक होगी और फिर इसका विस्तार किया जाएगा। इसका उद्देश्य पाठों को अधिक रुचिकर बनाना, हर विद्यार्थी पर व्यक्तिगत ध्यान देना और हाल के वर्षों में बढ़ी सीखने की खाई को कम करना है। अनुशासन और विद्यार्थियों के कल्याण को लेकर चिंताओं का भी यह नीति जवाब देती है। इसके तहत चरित्र और मूल्यों को स्कूल जीवन के केंद्र में रखा जाएगा।
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योजना के तहत शिक्षक समान भागीदारों के रूप में मिलकर काम करेंगे। वे पाठों की संयुक्त योजना बनाएंगे, विद्यार्थियों के एक ही समूह को साथ पढ़ाएंगे और सीखने का संयुक्त आकलन करेंगे। इस तरीके से समूहों को लचीले ढंग से बनाया जा सकेगा, पीछे रह रहे विद्यार्थियों को जल्द मदद दी जा सकेगी और पढ़ाई को अधिक गतिशील बनाया जा सकेगा। उदाहरण के लिए, किसी विषय के लिए उपयुक्त होने पर अंग्रेज़ी, विज्ञान और संगीत को एक ही सत्र में जोड़ा जा सकेगा। मंत्रालय ने शिक्षक कौशल-विकास कार्यक्रम शुरू किए हैं, ताकि 2027 में इसे लागू करने से पहले शिक्षक कक्षा की जिम्मेदारियां प्रभावी ढंग से साझा करना सीख सकें।
यह सुधार कक्षा 1 के विद्यार्थियों के लिए आलम दान मनुसिया (प्रकृति और मानवता) विषय को फिर से शुरू करने के साथ हो रहा है। इस विषय में विज्ञान, स्वास्थ्य शिक्षा, दृश्य कला, संगीत, तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण (TVET) के तत्व तथा डिजिटल साक्षरता शामिल होंगे। नीति-निर्माताओं का कहना है कि इसका उद्देश्य शुरुआती वर्षों में जिज्ञासा, रचनात्मकता और सामाजिक जागरूकता विकसित करते हुए बच्चों का सर्वांगीण विकास करना है। प्राथमिक और माध्यमिक विद्यार्थियों के लिए हर सप्ताह 60 मिनट का चरित्र विकास कार्यक्रम भी रोज़मर्रा की स्कूल दिनचर्या में नैतिकता और सकारात्मक व्यवहार को मजबूत करेगा।
सह-शिक्षण क्या है और यह कैसे काम करेगा
सह-शिक्षण ऐसा मॉडल है जिसमें दो प्रशिक्षित शिक्षक एक ही कक्षा की जिम्मेदारी साझा करते हैं। दोनों मिलकर योजना बनाते हैं, पढ़ाते हैं और विद्यार्थियों की प्रगति पर नज़र रखते हैं। यह मुख्य शिक्षक के साथ सहायक शिक्षक वाली व्यवस्था से अलग है। सह-शिक्षण में शिक्षक समान स्तर के सहयोगी होते हैं और उनकी खूबियां एक-दूसरे की पूरक होती हैं। एक शिक्षक विज्ञान की गतिविधि का नेतृत्व कर सकता है, जबकि दूसरा छोटे समूहों में अभ्यास करवाए या समझ की जांच करे। भीड़भाड़ वाली कक्षाओं में यह तरीका कक्षाओं को स्थायी रूप से बांटे बिना विद्यार्थियों और वयस्कों के बीच सार्थक संवाद के अवसर बढ़ाता है।
स्कूलों में अपनाए जा सकने वाले आम मॉडल
- स्टेशन शिक्षण: शिक्षक पाठ्य सामग्री को अलग-अलग स्टेशनों में बांटते हैं। विद्यार्थी समूहों में हर स्टेशन पर जाकर लक्षित निर्देश प्राप्त करते हैं।
- समानांतर शिक्षण: कक्षा को दो समूहों में बांटा जाता है। दोनों शिक्षक एक ही सामग्री पढ़ाते हैं, फिर समूह साझा गतिविधि के लिए दोबारा एक साथ आते हैं।
- टीम शिक्षण: दोनों शिक्षक एक ही पाठ को साथ पढ़ाते हैं। वे बारी-बारी से भूमिकाएं निभाते हुए संवाद, समस्या समाधान और प्रतिक्रिया देने का तरीका दिखाते हैं।
- एक पढ़ाए, दूसरा सहायता करे: एक शिक्षक पढ़ाई का नेतृत्व करता है, जबकि दूसरा उन विद्यार्थियों को तुरंत मदद देता है जिन्हें इसकी जरूरत होती है।
- वैकल्पिक शिक्षण: एक शिक्षक केंद्रित सहायता या अतिरिक्त अभ्यास के लिए छोटे समूह के साथ काम करता है, जबकि दूसरा मुख्य समूह को पढ़ाना जारी रखता है।
स्कूल पूरे सप्ताह इन मॉडलों को मिलाकर अपना सकते हैं। सफलता के लिए साथ योजना बनाने का तय समय, भूमिकाओं की स्पष्ट परिभाषा और कक्षा प्रबंधन साझा करने का प्रशिक्षण जरूरी है। समय-सारणी में योजना बनाने के लिए सुरक्षित समय न हो, तो अतिरिक्त तालमेल का काम स्कूल के समय के बाद तक जा सकता है और शिक्षकों पर दबाव बढ़ा सकता है।
अभी क्यों, सहभागिता और चरित्र पर जोर
नए पाठ्यक्रम में शैक्षणिक लक्ष्यों के साथ चरित्र, अनुशासन और ईमानदारी को भी जगह दी गई है। विज्ञान, अंग्रेज़ी और गणित समेत सभी शिक्षकों से अपने पाठों में मूल्यों को शामिल करने की अपेक्षा होगी। साप्ताहिक चरित्र विकास कार्यक्रम स्कूलों को ऐसी गतिविधियों के लिए एक तय मंच देगा, जिनसे सम्मान, आत्म-नियंत्रण, टीमवर्क और नागरिक जागरूकता विकसित हो। पाठों को अधिक संवादपरक और व्यक्तिगत बनाकर नीति-निर्माता उम्मीद करते हैं कि उपस्थिति, एकाग्रता और विद्यार्थियों की सुरक्षा में सुधार होगा तथा पढ़ाई छोड़ने का जोखिम घटेगा।
अधिकारियों का तर्क है कि जिन विद्यार्थियों को अधिक ध्यान और सार्थक अभ्यास मिलता है, वे पढ़ने, लिखने और गणितीय कौशल को अधिक प्रभावी ढंग से मजबूत कर पाते हैं। इसका मकसद ऐसा कक्षा अनुभव देना है जो निष्क्रिय रूप से नोट्स लिखने के बजाय उद्देश्यपूर्ण काम जैसा लगे। स्कूलों के बुनियादी ढांचे में सुधार में समय लगने के दौरान, भीड़भाड़ वाली कक्षाओं से निपटने के व्यावहारिक तरीके के रूप में भी सह-शिक्षण को देखा जा रहा है।
शिक्षकों की उपलब्धता और काम का बोझ, बड़ी चुनौती
समर्थक और आलोचक एक बात पर सहमत हैं: योजना को जमीनी स्तर पर उपलब्ध शिक्षक संख्या के अनुरूप होना चाहिए। एक शिक्षक समूह ने मंत्रालय से शिक्षकों की संख्या, भर्ती और नौकरी छोड़ने की स्थिति का व्यापक ऑडिट कराने और रणनीतिक रूप से तैनाती की योजना बनाने की अपील की है। हाल के वर्षों में समय से पहले सेवानिवृत्ति की घटनाएं इस चुनौती को रेखांकित करती हैं। संसद में साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, हर साल बड़ी संख्या में शिक्षक समय से पहले नौकरी छोड़ते हैं। इनमें अधिकांश ने पेशे में रुचि खत्म होने को वजह बताया, जबकि अन्य ने पारिवारिक और स्वास्थ्य संबंधी कारण बताए। यदि शिक्षक कम हों, तो ग्रामीण और घनी आबादी वाले शहरी स्कूलों पर सबसे अधिक असर पड़ सकता है।
समर्थकों का कहना है कि सह-शिक्षण से कक्षा प्रबंधन बेहतर हो सकता है और कम उपलब्धि हासिल करने वाले विद्यार्थियों को मदद मिल सकती है। हालांकि, वे काम के बोझ को लेकर आगाह भी करते हैं। एक कक्षा में दो शिक्षकों के होने का मतलब तैयारी का काम आधा हो जाना नहीं है। अक्सर योजना बनाने का काम बढ़ जाता है, क्योंकि पढ़ाई, आकलन और दिनचर्या में तालमेल जरूरी होता है। पेरेंट एक्शन ग्रुप फॉर एजुकेशन की अध्यक्ष दातिन नूर अज़ीमा अब्दुल रहीम ने सहयोगात्मक तरीके की ओर इस कदम का स्वागत किया, लेकिन स्पष्टता और प्रशिक्षण की जरूरत पर जोर दिया।
अपने विचार रखते हुए PAGE ने कहा कि यह नीति तभी काम करेगी जब दोनों शिक्षक समान भागीदार हों और उनकी भूमिकाएं लिखित तथा स्पष्ट हों। दातिन नूर अज़ीमा ने बताया कि मकसद सहयोग है, न कि मुख्य शिक्षक के साथ किसी सहायक को तैनात करना।






