ट्रंप ने ब्रांडेड दवाओं के आयात पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाया, अमेरिका में संयंत्र बना रही कंपनियों को छूट

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Trump orders drug price cuts as Americans debate government market ...

दवाओं के प्रवाह को नया रूप दे सकने वाला बड़ा शुल्क

अमेरिका 1 अक्टूबर, 2025 से आयातित ब्रांडेड और पेटेंट वाली दवाओं पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाएगा। यह महत्वपूर्ण विनिर्माण को घरेलू स्तर पर लाने और विदेशी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता घटाने की व्यापक कोशिश का हिस्सा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इस घोषणा से देश के बाहर बनने वाली ब्रांडेड और पेटेंट वाली दवाओं के लिए सख्त रुख तय हो गया है। कंपनियां इस शुल्क से बच सकती हैं, यदि वे अमेरिका में विनिर्माण क्षमता बना रही हों। यहां निर्माण शुरू होने का अर्थ है कि परियोजना की आधारशिला रखी जा चुकी हो या निर्माण कार्य जारी हो। प्रशासन ने कहा है कि इस चरण में जेनेरिक दवाएं शामिल नहीं हैं। इससे तत्काल असर उन कम कीमत वाली दवाओं तक सीमित रहेगा, जो अमेरिका में वितरित अधिकांश नुस्खों का हिस्सा हैं।

विषय-सूची
  1. दवाओं के प्रवाह को नया रूप दे सकने वाला बड़ा शुल्क
  2. पहले दिन सीधे किस पर पड़ेगा असर
  3. छूट कैसे मिलेगी और निर्माण की परिभाषा क्या है
  4. यह शुल्क अभी क्यों
  5. भारत के लिए इसका क्या अर्थ है
  6. यूरोप, जापान और समझौतों की सीमाएं
  7. उद्योग की प्रतिक्रिया और बाजार की चाल
  8. मरीजों और दवा खर्च उठाने वालों पर संभावित असर
  9. कंपनियों की रणनीति और निर्माण की होड़
  10. भारत के साथ व्यापार तनाव और नए जोखिम
  11. प्रमुख अनिश्चितताएं और आगे क्या
  12. मुख्य बातें

यह कदम अन्य श्रेणियों पर नए आयात शुल्कों के साथ आया है। इनमें रसोई की अलमारियों और बाथरूम वैनिटी पर 50 प्रतिशत, गद्देदार फर्नीचर पर 30 प्रतिशत और भारी ट्रकों पर 25 प्रतिशत शुल्क शामिल हैं। व्हाइट हाउस ने इस पैकेज को राष्ट्रीय सुरक्षा और घरेलू उद्योग की रक्षा के लिए जरूरी बताया। अमेरिकी व्यापार में दवा आयात की उल्लेखनीय हिस्सेदारी है। 2023 में कुल आयात में इसका हिस्सा करीब 5.6 प्रतिशत था। आयात के प्रमुख स्रोतों में आयरलैंड, स्विट्जरलैंड, जर्मनी और भारत शामिल हैं। इन देशों से ऊंचे मूल्य वाली पेटेंट दवाओं के साथ बड़ी मात्रा में तैयार जेनेरिक दवाएं भी आती हैं।

उपभोक्ताओं और दवाओं का खर्च उठाने वालों के लिए 100 प्रतिशत शुल्क का अर्थ है कि इसके दायरे में आने वाली किसी भी आयातित दवा की अमेरिका पहुंचने तक की लागत लगभग दोगुनी हो जाएगी। ये लागतें फार्मेसी काउंटर तक पहुंचेंगी या नहीं, यह बीमा कंपनियों और फार्मेसी बेनिफिट मैनेजरों के साथ हुए अनुबंधों तथा निर्माताओं की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा। कुछ कंपनियां छूट पाने के लिए अमेरिका में निवेश और उत्पादन तेज कर सकती हैं। अन्य कंपनियां छूट मांग सकती हैं, कीमतों में बदलाव कर सकती हैं या मुनाफा खत्म होने पर कुछ मामलों में अमेरिका में बिक्री रोक सकती हैं। इस नीति से उन दवा कंपनियों पर तत्काल दबाव पड़ेगा, जो अमेरिकी बाजार में बिकने वाली विशेष और पेटेंट दवाओं के लिए विदेशी संयंत्रों पर निर्भर हैं।

पहले दिन सीधे किस पर पड़ेगा असर

यह शुल्क किसी भी आयातित ब्रांडेड या पेटेंट वाली दवा पर लागू होगा। इसमें वे नई दवाएं शामिल हैं जिन पर पेटेंट अब भी लागू है, साथ ही ब्रांड नाम से बिकने वाली वे दवाएं भी, जिनका पेटेंट खत्म हो चुका है। प्रशासन ने जेनेरिक दवाओं को छूट दी है। यह अहम है, क्योंकि अमेरिका में ज्यादातर नुस्खे जेनेरिक दवाओं के होते हैं और इनमें से कई भारत से आती हैं, जो बड़े पैमाने पर कम लागत वाला उत्पादन करने के लिए जाना जाता है। अस्पष्टता ब्रांडेड जेनेरिक दवाओं को लेकर है। इनका पेटेंट खत्म हो चुका होता है, लेकिन ये ब्रांड नाम से बिकती हैं। अगर अमेरिकी एजेंसियां शुल्क के लिहाज से इन्हें ब्रांडेड दवाएं मानती हैं, तो भारत का कुछ निर्यात पेटेंट खत्म होने के बावजूद 100 प्रतिशत शुल्क के दायरे में आ सकता है।

छूट कैसे मिलेगी और निर्माण की परिभाषा क्या है

शुल्क से बचने के लिए कंपनी को यह दिखाना होगा कि वह संबंधित दवा के लिए अमेरिका में विनिर्माण क्षमता बना रही है। सार्वजनिक बयान में राष्ट्रपति ने इसकी सीधी कसौटी बताई और कहा कि पहले से चल रही परियोजनाएं भी पात्र होंगी। इस छूट का उद्देश्य उन कंपनियों को प्रोत्साहित करना है जो उत्पादन देश के भीतर ला रही हैं। इसके लिए अक्टूबर से पहले संयंत्र का पूरा होना जरूरी नहीं है।

नीति का ब्यौरा देते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने मुख्य शब्द को सरल भाषा में परिभाषित किया।

एक पोस्ट में उन्होंने लिखा कि निर्माणाधीन होने का अर्थ है परियोजना का शुरू हो जाना, और जिन आयातित दवाओं के लिए निर्माण शुरू हो चुका है, उन पर उस अवधि में शुल्क नहीं लगेगा।

निर्माणाधीन होने का अर्थ होगा 'आधारशिला रखी जा चुकी हो' और/या 'निर्माण जारी हो'। इसलिए, यदि निर्माण शुरू हो चुका है तो इन दवा उत्पादों पर कोई शुल्क नहीं लगेगा।

अधिकारियों ने संकेत दिया है कि यह छूट खास उत्पाद के लिए होगी। अगर कोई कंपनी किसी विशेष दवा का विनिर्माण अमेरिका में शुरू कर रही है, तो संयंत्र बनने और मान्यता मिलने के दौरान उस दवा के आयात को राहत मिल सकती है, भले ही उसी कंपनी की दूसरी दवाओं को छूट न मिले। मौजूदा प्रशासन से पहले शुरू हुई परियोजनाएं भी पात्र हैं। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि कंपनियां पात्रता के दस्तावेज कैसे देंगी, व्यावसायिक उत्पादन शुरू करने से पहले छूट कितने समय तक रहेगी और क्या अमेरिका में दवा भरने, अंतिम रूप देने या दोबारा पैक करने जैसे आंशिक चरण भी गिने जाएंगे। दवा कंपनियां अनुपालन, समयसीमा और पात्र गतिविधियों के दायरे पर विस्तृत दिशा-निर्देश मांग रही हैं।

यह शुल्क अभी क्यों

महामारी में सक्रिय दवा घटकों से लेकर तैयार खुराक वाली दवाओं तक आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियां उजागर होने के बाद वॉशिंगटन कई वर्षों से दवा आपूर्ति श्रृंखलाओं की समीक्षा कर रहा है। अमेरिकी व्यापार कानून की धारा 232 के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा जांच पहले से चल रही है। इसमें तैयार दवाएं, सक्रिय दवा घटक (APIs), प्रमुख शुरुआती सामग्री और चिकित्सा प्रतिकार शामिल हैं। रिपोर्ट 27 दिसंबर, 2025 तक आने की उम्मीद है और राष्ट्रपति का फैसला मार्च 2026 तक अपेक्षित है। इन सिफारिशों से पहले 100 प्रतिशत शुल्क लगाना संकेत देता है कि व्हाइट हाउस सामग्री और जेनेरिक दवाओं के लिए व्यापक ढांचा तय होने से पहले ही ब्रांडेड दवाओं के आयात पर कार्रवाई को तैयार है।

प्रशासन का तर्क है कि शुल्क से देश में निवेश बढ़ेगा और विदेशों में व्यवधानों के प्रति अमेरिका की संवेदनशीलता घटेगी। व्यापार में सख्त रुख के समर्थक इस कदम को मित्र देशों और प्रतिद्वंद्वियों, दोनों के साथ बातचीत में दबाव बनाने का जरिया भी मानते हैं। अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि शुल्क आयात पर कर की तरह काम करते हैं। वे कंपनियों के संयंत्र बनाने के फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन घरेलू उत्पादन तेजी से न बढ़े तो लागत भी बढ़ाते हैं। शुरुआती झटके को कम करने के लिए कुछ आयातकों ने अक्टूबर की शुरुआत से पहले ही भंडार जमा किया होगा, हालांकि समय के साथ ये भंडार घटेंगे।

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भारत के लिए इसका क्या अर्थ है

अमेरिकी दवा बाजार को आपूर्ति करने वाले देशों में भारत की अहम भूमिका है, खासकर जेनेरिक दवाओं में। मात्रा के लिहाज से भारत तैयार जेनेरिक दवाओं का वैश्विक अग्रणी है और प्रमुख दवा घटकों का भी बड़ा हिस्सा बनाता है। अमेरिका भारत के दवा निर्यात का सबसे बड़ा बाजार है। अवधि के हिसाब से, अमेरिका को भारत का दवा निर्यात हाल में 2024 कैलेंडर वर्ष में करीब 8.7 अरब डॉलर से लेकर वित्त वर्ष 2025 में लगभग 10.5 अरब डॉलर तक रहा है। हाल के कई वर्षों में भारत के कुल दवा निर्यात का एक-तिहाई से लेकर दो-पांचवां हिस्सा अमेरिका गया है।

नया शुल्क ब्रांडेड और पेटेंट वाली दवाओं पर केंद्रित है, इसलिए भारतीय खेपों पर शुरुआती असर सीमित हो सकता है। अमेरिका को भारत का अधिकांश निर्यात पेटेंट-मुक्त जेनेरिक दवाओं का है। भारत की कई बड़ी कंपनियां अमेरिका में विनिर्माण या दोबारा पैक करने की इकाइयां भी चलाती हैं और स्थानीय क्षमता बढ़ाने वाले अधिग्रहणों पर विचार कर रही हैं। परिभाषाएं तय होने और धारा 232 की प्रक्रिया पूरी होने तक ये बातें कुछ राहत दे सकती हैं।

फार्मास्यूटिकल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष नमित जोशी ने कहा कि निकट अवधि में असर सीमित रहने की संभावना है, क्योंकि भारत का निर्यात मुख्य रूप से साधारण जेनेरिक दवाओं का है और कई कंपनियों की अमेरिका में पहले से मौजूदगी है।

प्रस्तावित शुल्क का भारतीय निर्यात पर तत्काल असर पड़ने की संभावना कम है, क्योंकि हमारे योगदान का बड़ा हिस्सा साधारण जेनेरिक दवाओं का है। अधिकांश बड़ी भारतीय कंपनियां पहले से अमेरिका में विनिर्माण या दोबारा पैक करने की इकाइयां चलाती हैं और आगे अधिग्रहण की संभावनाएं तलाश रही हैं।

भारतीय दवा कंपनियों के लिए सबसे बड़ी अनिश्चितता यह है कि अमेरिकी अधिकारी ब्रांडेड जेनेरिक दवाओं के साथ कैसा व्यवहार करेंगे। तकनीकी रूप से इनका पेटेंट खत्म हो चुका होता है, लेकिन ये ब्रांड नाम से बिकती हैं और अक्सर बिना ब्रांड वाले विकल्पों से अधिक कीमत पर उपलब्ध होती हैं। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव की स्थापना करने वाले भारत के पूर्व व्यापार अधिकारी अजय श्रीवास्तव ने आगाह किया है कि नीति का नतीजा औपचारिक परिभाषाओं पर निर्भर करेगा।

स्पष्टता तभी आएगी जब अमेरिकी कानूनी दस्तावेज जारी होंगे।

घोषणा के बाद कई भारतीय दवा कंपनियों के शेयरों में गिरावट आई। निफ्टी फार्मा सूचकांक दिन में 2 प्रतिशत से अधिक गिरा। अमेरिका में विशेष ब्रांडेड दवाओं से अच्छी-खासी आय अर्जित करने वाली सन फार्मा का शेयर भी नीचे आया, क्योंकि निवेशकों ने इन दवाओं पर जोखिम का आकलन किया। साथ ही, अमेरिका में संयंत्र बना रही कंपनियों को मिलने वाली छूट उन भारतीय कंपनियों के लिए फायदेमंद हो सकती है जो पहले से वहां कुछ उत्पाद बनाती या पैक करती हैं, अथवा नई परियोजनाओं या अधिग्रहणों के जरिये विस्तार की योजना बना रही हैं।

व्यापार संबंध इस मामले को और जटिल बनाते हैं। भारत के निर्यातकों को अमेरिका में प्रवेश करने वाले कई तरह के सामान पर पहले से 50 प्रतिशत शुल्क का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा 25 प्रतिशत का दंडात्मक शुल्क भी है, जिसे वॉशिंगटन ने भारत की रूसी तेल खरीद से जोड़ा है। नया दवा शुल्क नई दिल्ली और उद्योग जगत के नेताओं के लिए दांव बढ़ाता है, जिन्हें यह तय करना है कि अमेरिका में बिकने वाली बड़ी मात्रा की जेनेरिक और विशेष दवाओं के लिए बाजार तक पहुंच कैसे सुरक्षित रखी जाए।

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यूरोप, जापान और समझौतों की सीमाएं

अमेरिका के यूरोपीय और जापानी सहयोगियों ने इस साल की शुरुआत में वस्तुओं की एक व्यापक श्रेणी पर शुल्क की अधिकतम सीमा तय करने के लिए बातचीत की थी। अमेरिका को यूरोपीय संघ के दवा निर्यात पर 15 प्रतिशत की सीमा लागू है और जापान के समझौते में भी इसी तरह की शर्तें हैं। व्हाइट हाउस ने संकेत दिया है कि वह इन सीमाओं का सम्मान करेगा, जिससे पात्र यूरोपीय संघ और जापानी निर्यात पर 100 प्रतिशत शुल्क नहीं लगेगा। यह छूट अहम है, क्योंकि अमेरिका को भेजी जाने वाली ऊंचे मूल्य वाली ब्रांडेड दवाओं के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ताओं में आयरलैंड, स्विट्जरलैंड और जर्मनी शामिल हैं।

यूरोपीय आयोग के एक प्रवक्ता ने यूरोपीय संघ के निर्यातकों के लिए शुल्क की अधिकतम सीमा को ज्यादा शुल्कों से बचाव का जरिया बताया।

यूरोपीय संघ के निर्यात पर यह स्पष्ट, सर्वसमावेशी 15% शुल्क सीमा इस बात की गारंटी है कि यूरोपीय आर्थिक इकाइयों पर इससे ऊंचा कोई शुल्क नहीं लगाया जाएगा।

समझौतों के तहत सीमा तय होने के बावजूद, यूरोपीय दवा कंपनियां व्यापारिक तनाव का जोखिम घटाने और संघीय प्रोत्साहनों के लिए पात्र होने के मकसद से अमेरिका में विनिर्माण निवेश बढ़ा रही हैं। कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां जैविक दवाओं, रोगाणुमुक्त इंजेक्शन और उन्नत उपचारों के लिए अमेरिकी क्षमता बढ़ा रही हैं या नई इकाइयां जोड़ रही हैं। दवा संयंत्रों के निर्माण और मान्यता की जटिलता के कारण इस प्रक्रिया को पूरा होने में कई साल लग सकते हैं।

उद्योग की प्रतिक्रिया और बाजार की चाल

घोषणा के बाद यूरोप और एशिया में दवा कंपनियों के शेयर गिरे, हालांकि प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं रही। विश्लेषकों ने कहा कि कई बड़ी वैश्विक कंपनियों के अमेरिका में संयंत्र निर्माणाधीन हैं या उनकी योजना है, जिससे नए शुल्क का सीधा असर कम हो सकता है। छोटी कंपनियों या उन उत्पादों पर इसका ज्यादा असर पड़ सकता है जिनका विनिर्माण निकट भविष्य में अमेरिका में शुरू करने का कोई रास्ता नहीं है।

मिज़ुहो के विश्लेषक जारेड होल्ज ने ग्राहकों से कहा कि राष्ट्रपति के शब्द सीधे थे, लेकिन बड़ी दवा कंपनियों पर व्यावहारिक असर सीमित हो सकता है, क्योंकि अधिकांश की घरेलू स्तर पर पहले से मौजूदगी है और उन्होंने विस्तार की योजनाएं घोषित की हैं। लीरिंक पार्टनर्स के डेविड राइजिंगर ने भी जारी निर्माण परियोजनाओं को इस बात की वजह बताया कि कई बड़ी कंपनियां तत्काल शुल्क से कम प्रभावित होंगी।

उद्योग के प्रमुख व्यापार संघ ने चेताया कि भारी आयात कर उन कामों के लिए उपलब्ध धन घटा देंगे जिन्हें नीति निर्माता प्रोत्साहित करना चाहते हैं। फार्मास्यूटिकल रिसर्च एंड मैन्युफैक्चरर्स ऑफ अमेरिका के वरिष्ठ उपाध्यक्ष एलेक्स श्राइवर ने कहा कि शुल्क से वह पूंजी कम हो सकती है जो नए संयंत्रों और अनुसंधान में लगाई जाती।

शुल्क इन योजनाओं के लिए जोखिम हैं, क्योंकि शुल्क पर खर्च किया गया हर डॉलर वह डॉलर है जिसे अमेरिकी विनिर्माण या भविष्य के उपचारों और इलाजों के विकास में निवेश नहीं किया जा सकता।

ऑस्ट्रेलिया और जापान की दवा कंपनियों के शेयर भी गिरे। इससे यह अनिश्चितता झलकी कि परियोजनाएं छूट के लिए कैसे पात्र होंगी और संक्रमणकालीन राहत कितने समय तक रहेगी। भारत में बीएसई हेल्थकेयर सूचकांक और कई बड़ी कंपनियों के शेयर नीचे आए। निवेशक यह परख रहे थे कि कौन-सी कंपनियां अमेरिका में विशेष ब्रांड बेचती हैं और कौन मुख्य रूप से उन सामान्य जेनेरिक दवाओं पर निर्भर हैं, जो फिलहाल शुल्क के दायरे से बाहर दिखती हैं।

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मरीजों और दवा खर्च उठाने वालों पर संभावित असर

जिन आयातित ब्रांडेड दवाओं को अमेरिका में संयंत्र संबंधी छूट नहीं मिलेगी, उन पर सीमा पर चुकाई जाने वाली कीमत दोगुनी हो सकती है। इसका असर मरीजों तक किस तरह पहुंचेगा, यह निर्माताओं, थोक विक्रेताओं, बीमा कंपनियों और फार्मेसी बेनिफिट मैनेजरों की पूरी श्रृंखला पर निर्भर करेगा। बाजार में अपनी हिस्सेदारी बनाए रखने के लिए कुछ कंपनियां लागत का एक हिस्सा खुद उठा सकती हैं, जबकि अन्य कीमतें बढ़ाने की कोशिश कर सकती हैं या उत्पाद घाटे में जाने पर आपूर्ति घटा सकती हैं। दवा खर्च उठाने वाले पक्ष अमेरिका में उत्पादन की योजना वाले चिकित्सकीय रूप से समान विकल्पों को तरजीह दे सकते हैं, जिससे दवाओं की सूची में बदलाव हो सकता है।

जेनेरिक दवाएं फिलहाल 100 प्रतिशत शुल्क के दायरे से बाहर हैं। इससे सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली दवाओं की निकट भविष्य में कमी का जोखिम घटता है। विश्लेषकों का कहना है कि शुल्क लगाए जाने की आशंका में कई आयातकों ने इस साल भंडार बनाया होगा, जिससे शुरुआती असर कम होगा। हालांकि, ये भंडार हमेशा नहीं चलेंगे। अगर राष्ट्रीय सुरक्षा जांच के तहत बाद में जेनेरिक दवाओं या सक्रिय दवा घटकों को निशाना बनाया गया, तो आपूर्ति और कीमतों पर दबाव तेजी से बढ़ेगा, क्योंकि जेनेरिक दवाओं का मुनाफा कम होता है और उत्पादन को दूसरी जगह ले जाने की गुंजाइश सीमित है।

जेनेरिक दवाओं से अमेरिकी स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था को बड़ी बचत होती है। उद्योग के अनुमानों के मुताबिक, 2022 में जेनेरिक दवाओं से सालाना बचत 200 अरब डॉलर से अधिक थी। यही एक वजह है कि नीति निर्माताओं ने अब तक जेनेरिक दवाओं के आयात पर नए कर लगाने से परहेज किया है। मरीजों के हितों की वकालत करने वाले संगठन और अस्पताल समूह इस नीति के लागू होने पर बारीकी से नजर रखेंगे, ताकि महत्वपूर्ण उपचारों, खासकर इंजेक्शन वाली दवाओं और कम विकल्प वाले विशेष उत्पादों की आपूर्ति में किसी व्यवधान के संकेत मिलें तो उनका पता चल सके।

कंपनियों की रणनीति और निर्माण की होड़

दवा कंपनियां पहले से ही अमेरिका में विनिर्माण बढ़ा रही थीं और नए शुल्क से इन फैसलों में तेजी आएगी। एली लिली ने हाल ही में ह्यूस्टन में 6.5 अरब डॉलर के विनिर्माण परिसर की घोषणा की। इससे पहले उसने वर्जीनिया के रिचमंड के पास 5 अरब डॉलर की इकाई का ऐलान किया था। कई यूरोपीय कंपनियों ने अमेरिका में नए संयंत्र लगाने या मौजूदा इकाइयों का विस्तार करने की योजनाएं सार्वजनिक की हैं। अमेरिका में मजबूत बिक्री वाली भारतीय कंपनियां उत्पादन के और चरण देश के भीतर लाने तथा छूट पाने के लिए अधिग्रहण और साझेदारियों का आकलन कर रही हैं।

दवा उत्पादन को दूसरी जगह ले जाना आसान नहीं है। संयंत्र बनाने और उनकी मान्यता लेने, आपूर्तिकर्ताओं को योग्य ठहराने तथा जटिल विनिर्माण प्रक्रियाएं स्थानांतरित करने में तीन से पांच साल या उससे अधिक लग सकते हैं। जैविक दवाओं और रोगाणुमुक्त इंजेक्शन के लिए विशेष उपकरण और गहरी विशेषज्ञता जरूरी है। अनुबंध पर विकास और विनिर्माण करने वाले संगठन, जिन्हें उद्योग में CDMOs कहा जाता है, इस बदलाव में अहम होंगे। उनके जरिये कंपनियां हर नई इकाई की मालिक बने बिना अमेरिका में क्षमता बढ़ा सकती हैं। कम जोखिम वाली कुछ उत्पाद श्रेणियों के लिए कंपनियां पूर्ण पैमाने पर विनिर्माण विकसित करने के दौरान अमेरिका में पैकिंग, लेबल लगाने या दवा भरने और अंतिम रूप देने का काम बढ़ा सकती हैं।

कंपनी अधिकारियों ने चेताया है कि 10 प्रतिशत से अधिक शुल्क के कारण बड़ी मात्रा में बिकने वाले कम मुनाफे के उत्पाद अव्यावहारिक हो सकते हैं। सहयोगी देशों के बाजारों में शुल्क संरचना भी मायने रखती है। यूरोपीय संघ और जापान के निर्यातकों के लिए शुल्क सीमित करने वाले व्यापार समझौते निवेश के फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं, जबकि ऐसी सीमा से बाहर के देशों पर अमेरिका के भीतर उत्पादन शुरू करने का दबाव ज्यादा होगा। समय के साथ, ये ताकतें छोटी अणु वाली गोलियों से लेकर जटिल जैविक दवाओं तक की आपूर्ति के नक्शे को बदल सकती हैं।

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भारत के साथ व्यापार तनाव और नए जोखिम

नए शुल्क वॉशिंगटन और नई दिल्ली के बीच संवेदनशील व्यापार वार्ताओं के बीच लगे हैं। भारत का दवा क्षेत्र निर्यात पर काफी निर्भर है और अमेरिका इसका सबसे बड़ा बाजार है। ब्रांडेड और पेटेंट वाली दवाओं पर 100 प्रतिशत शुल्क से विशेष उत्पाद बेचने वाली भारतीय कंपनियों के फैसले जटिल होंगे। साथ ही, व्यापारिक नाम से बिकने वाली पेटेंट-मुक्त ब्रांडेड दवाओं पर भी सवाल उठेंगे। रूसी तेल की खरीद से जुड़ा एक अलग व्यापारिक दंड पहले ही संबंधों में तनाव पैदा कर चुका है। हालिया निर्यात आंकड़ों में भारतीय दवा निर्यात का प्रदर्शन असमान दिखा है। कई जेनेरिक दवाओं पर शून्य शुल्क होने के बावजूद कुछ महीनों में गिरावट आई है, जो संकेत देता है कि अनिश्चितता ही खेपों को घटा सकती है।

नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय और अन्य विभाग इस नीति का आकलन कर रहे हैं। उद्योग संगठन स्पष्ट परिभाषाओं की मांग कर रहे हैं, ताकि पेटेंट-मुक्त ब्रांडेड जेनेरिक दवाओं की रक्षा हो और अमेरिका में पहले से किए गए उन निवेशों को मान्यता मिले जिनसे वहां रोजगार पैदा हो रहे हैं। भारतीय कंपनियां रणनीतिक बदलावों पर भी विचार कर रही हैं, जैसे अपने उत्पाद पोर्टफोलियो को छूट वाली जेनेरिक दवाओं की ओर संतुलित करना या अमेरिकी सीमाओं के भीतर विनिर्माण लाने वाले अधिग्रहण तेज करना।

प्रमुख अनिश्चितताएं और आगे क्या

कई व्यावहारिक सवाल तय करेंगे कि यह नीति असल दुनिया में कैसे काम करेगी। सबसे तात्कालिक सवाल परिभाषा का है। नियामकों को बताना होगा कि ब्रांडेड जेनेरिक दवाओं के साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा। कंपनियों को यह भी स्पष्टता चाहिए कि कौन-से दस्तावेज साबित करेंगे कि परियोजना की आधारशिला रखी जा चुकी है या निर्माण जारी है, छूट कितने समय तक चलेगी और क्या दवा भरने, अंतिम रूप देने या दोबारा पैक करने जैसे आंशिक चरण किसी खास उत्पाद के लिए निर्माण की शर्त पूरी करते हैं।

धारा 232 के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा समीक्षा दिसंबर के अंत तक पूरी होनी है और फैसला 2026 की शुरुआत में आ सकता है। इससे सक्रिय दवा घटकों, प्रमुख शुरुआती सामग्री और तैयार दवाओं की अन्य श्रेणियों पर चर्चा का दायरा बढ़ सकता है। यह प्रक्रिया तय करेगी कि 100 प्रतिशत शुल्क पेटेंट वाली और ब्रांड नाम की दवाओं तक सीमित रहता है या सामग्री और जेनेरिक दवाओं को शामिल करने वाले व्यापक ढांचे का हिस्सा बनता है। यूरोपीय संघ और जापान के निर्यातकों के लिए समझौतों में तय शुल्क सीमाएं बाजार की स्थितियों को प्रभावित करती रहेंगी। मरीजों की दवाओं तक पहुंच जोखिम में होने पर कुछ कंपनियां चरणबद्ध अमल या विशेष लाइसेंस मांग सकती हैं।

फिलहाल दवा कंपनियां यह सूची बना रही हैं कि कौन-से उत्पाद शुल्क के दायरे में आएंगे, किन्हें निर्माण संबंधी छूट मिल सकती है और अमेरिका में निवेश कहां तेज किया जा सकता है। आयातक बदलाव के दौर से निपटने के लिए भंडार संभाल रहे हैं। स्वास्थ्य योजनाएं मरीजों की अतिरिक्त लागत कम रखने वाले विकल्पों का आकलन कर रही हैं। अक्टूबर की शुरुआत की तारीख नजदीक आने के साथ नीति की बारीकियां तय करेंगी कि दवा आपूर्ति श्रृंखला की हर कड़ी पर कितना दबाव पड़ेगा।

मुख्य बातें

  • अमेरिका 1 अक्टूबर, 2025 से आयातित ब्रांडेड और पेटेंट वाली दवाओं पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाएगा।
  • कंपनियां किसी खास उत्पाद का विनिर्माण अमेरिका में बना रही हों तो शुल्क से बच सकती हैं। निर्माण का अर्थ है आधारशिला रखी जा चुकी हो या निर्माण जारी हो।
  • प्रशासन का कहना है कि फिलहाल जेनेरिक दवाओं को छूट है, लेकिन धारा 232 की समीक्षा के तहत भविष्य में जेनेरिक दवाओं, सक्रिय दवा घटकों और प्रमुख शुरुआती सामग्री के आयात पर फिर विचार हो सकता है।
  • यूरोपीय संघ और जापान के व्यापार समझौतों में दवाओं पर शुल्क करीब 15 प्रतिशत तक सीमित है। व्हाइट हाउस ने इन सीमाओं का सम्मान करने का संकेत दिया है।
  • अमेरिका को भारत का निर्यात ज्यादातर जेनेरिक दवाओं का है, जिससे तत्काल जोखिम घटता है, लेकिन ब्रांडेड जेनेरिक दवाओं के वर्गीकरण को लेकर अनिश्चितता है।
  • घोषणा के बाद यूरोप और एशिया में दवा कंपनियों के शेयर गिरे। विश्लेषकों ने कहा कि कई बड़ी कंपनियों के अमेरिका में संयंत्र निर्माणाधीन हैं।
  • PhRMA ने चेताया कि शुल्क से अमेरिका में विनिर्माण और अनुसंधान निवेश के लिए उपलब्ध धन घटेगा।
  • एली लिली और अन्य कंपनियों ने अमेरिका में अरबों डॉलर के संयंत्रों की घोषणा की है। और कंपनियां भी अमेरिकी परियोजनाओं में तेजी ला सकती हैं।
  • धारा 232 की रिपोर्ट 27 दिसंबर, 2025 तक आनी है और राष्ट्रपति का फैसला मार्च 2026 तक अपेक्षित है। इससे व्यापक नीतिगत विकल्पों का रास्ता तय होगा।
  • नियामक ब्रांडेड जेनेरिक दवाओं को कैसे परिभाषित करते हैं और निर्माण संबंधी छूट कैसे लागू करते हैं, इसी से शुल्क का व्यावहारिक दायरा तय होगा।
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