दक्षिण कोरिया का प्रारंभिक शिक्षा संकट: प्रीस्कूल प्रवेश परीक्षाओं की आलोचना क्यों हो रही है
दक्षिण कोरिया में शैक्षणिक उपलब्धि की दौड़ दुनिया के लगभग हर दूसरे देश से पहले शुरू हो जाती है। हाल के वर्षों में निजी अकादमियों की बढ़ती संख्या—जिन्हें स्थानीय तौर पर हाग्वोन कहा जाता है—ने चार-पाँच साल के बच्चों के लिए कठिन प्रवेश परीक्षाएँ शुरू की हैं। ये तथाकथित “सात साल के बच्चों की परीक्षाएँ” शिक्षा के दबाव, बाल विकास और मानवाधिकारों पर देश में जारी बहस का केंद्र बन गई हैं।
विषय-सूची
- दक्षिण कोरिया का प्रारंभिक शिक्षा संकट: प्रीस्कूल प्रवेश परीक्षाओं की आलोचना क्यों हो रही है
- ‘सात साल के बच्चों की परीक्षाएँ’ क्या हैं और वे विवादास्पद क्यों हैं?
- इन परीक्षाओं का बच्चों पर क्या असर पड़ता है?
- दक्षिण कोरिया में शिक्षा के प्रति जुनून की जड़ें
- दुनिया के दूसरे देशों से इसकी तुलना कैसी है?
- मानवाधिकार आयोग ने हस्तक्षेप किया: आयोग ने क्या कहा?
- इसके व्यापक निहितार्थ क्या हैं?
- प्रीस्कूल रटंत स्कूलों की दुनिया के भीतर
- मानसिक स्वास्थ्य पर असर
- सुधार की मांग: आगे क्या होगा?
- संक्षेप में
25 अगस्त को दक्षिण कोरिया के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने एक दुर्लभ नीतिगत राय जारी कर शिक्षा मंत्रालय से उस चीज़ पर ध्यान देने का आग्रह किया जिसे उसने “अत्यधिक प्रारंभिक निजी शिक्षा” कहा। आयोग का यह बयान 800 से अधिक नागरिकों के हस्ताक्षर वाली उस याचिका के बाद आया, जिसमें प्रीस्कूल प्रवेश परीक्षाओं के बढ़ते चलन के खिलाफ सरकारी कार्रवाई की मांग की गई थी। आयोग ने प्रक्रियागत आधार पर याचिका खारिज कर दी, लेकिन व्यापक मानवाधिकार संबंधी चिंताओं को स्वीकार करते हुए व्यवस्थागत सुधारों की मांग की।
‘सात साल के बच्चों की परीक्षाएँ’ क्या हैं और वे विवादास्पद क्यों हैं?
“सात साल के बच्चों की परीक्षाएँ” उन प्रवेश परीक्षाओं को कहा जाता है जो विशिष्ट निजी अकादमियाँ प्रीस्कूल उम्र के बच्चों के लिए आयोजित करती हैं। इनमें अक्सर अंग्रेज़ी, गणित और यहाँ तक कि कोडिंग जैसे विषय शामिल होते हैं—ऐसे कौशल जो आम तौर पर काफी बड़े विद्यार्थियों के लिए होते हैं। सियोल के संपन्न गंगनम, सोचो और सोंगपा जिलों में प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी-भाषा इमर्शन किंडरगार्टन में दाखिले के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा है। माता-पिता तैयारी की कक्षाओं, निजी ट्यूटर्स और परीक्षा-मार्गदर्शिकाओं पर हजारों डॉलर खर्च करते हैं, इस उम्मीद में कि उनके बच्चों को शुरुआती बढ़त मिलेगी।
प्रतिनिधि कांग क्यंग-सुक और नागरिक समूह ‘निजी शिक्षा की चिंता से मुक्त दुनिया’ की 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार, इन जिलों के 74% से अधिक किंडरगार्टन अंग्रेज़ी-भाषा इमर्शन कार्यक्रम चलाते हैं। दस किंडरगार्टन में प्रीस्कूल बच्चों को पूरी प्राथमिक-स्तर की पाठ्यचर्या पढ़ाई जाती मिली, जबकि केवल एक संस्थान ने खेल-आधारित शिक्षा को प्राथमिकता देते हुए शुरुआती शैक्षणिक पढ़ाई को सक्रिय रूप से अस्वीकार किया।
शुरुआती शैक्षणिक दबाव की यह संस्कृति सियोल के सबसे अमीर इलाकों तक सीमित नहीं है। देशभर में निजी अंग्रेज़ी-भाषा प्रीस्कूलों की संख्या पाँच वर्षों में 37% बढ़ी है, जबकि सामान्य किंडरगार्टन में दाखिला घटा है। यह चलन दूसरे शहरों में भी फैल रहा है और कम उम्र से ही शैक्षणिक बढ़त हासिल करने की प्रतिस्पर्धा तेज कर रहा है।
इन परीक्षाओं का बच्चों पर क्या असर पड़ता है?
बाल विकास विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि शुरुआती उम्र में अत्यधिक शैक्षणिक दबाव के गंभीर नतीजे हो सकते हैं। पढ़ाई के सघन कार्यक्रमों और उच्च-दांव वाली परीक्षाओं से गुजरने वाले छोटे बच्चों को भावनात्मक तनाव, चिंता, चिड़चिड़ापन और यहाँ तक कि बाल झड़ने जैसे शारीरिक लक्षण हो सकते हैं। विकास के इस चरण में सहयोग, आत्म-नियंत्रण और सहानुभूति जैसे सामाजिक-भावनात्मक कौशल अहम होते हैं, लेकिन रटने और परीक्षा की तैयारी को तरजीह देने के कारण अक्सर उनकी उपेक्षा होती है।
इस साल की शुरुआत में मानवाधिकार शिकायत दर्ज कराने वाले गठबंधन ‘सात साल के बच्चों की रटंत परीक्षाओं के खिलाफ राष्ट्रीय शिकायतकर्ता’ के एक प्रवक्ता ने कहा, “अकादमी में दाखिले के लिए बच्चों को अंग्रेज़ी के वाक्य रटने और साक्षात्कार के अभ्यास से गुजरने के लिए मजबूर किया जाता है।” समूह ने इस चलन को बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन बताया और प्रीस्कूल तथा शुरुआती प्राथमिक स्तर पर निजी पूरक शिक्षा की राष्ट्रव्यापी जांच की मांग की।
सियोल के शिक्षा जिलों के आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले पाँच वर्षों में अवसाद या चिंता से पीड़ित पाए गए बच्चों की संख्या दोगुनी हो गई है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ छोटे बच्चों में टिक विकारों और तनाव से जुड़ी अन्य समस्याओं में बढ़ोतरी की खबर दे रहे हैं। उनका कहना है कि इसकी बड़ी वजह प्राथमिक स्कूल शुरू होने से पहले ही आरंभ हो जाने वाला लगातार शैक्षणिक दबाव है।
दक्षिण कोरिया में शिक्षा के प्रति जुनून की जड़ें
प्रीस्कूल प्रवेश परीक्षाएँ इतनी आम क्यों हो गई हैं, यह समझने के लिए दक्षिण कोरिया की शिक्षा व्यवस्था की व्यापक पृष्ठभूमि पर गौर करना जरूरी है। शिक्षा को सामाजिक उन्नति और आर्थिक सुरक्षा का प्रमुख रास्ता माना जाता है। देश के शीर्ष विश्वविद्यालयों में से किसी एक में दाखिले को—जिन्हें सामूहिक रूप से “स्काई” विश्वविद्यालय (सियोल नेशनल, कोरिया और योनसेई) कहा जाता है—सफलता का टिकट समझा जाता है। इस सोच ने तीव्र प्रतिस्पर्धा की संस्कृति को बढ़ावा दिया है, जिसमें परिवार कम उम्र से ही निजी शिक्षा पर भारी निवेश करते हैं।
इस दबाव की जड़ें जोसॉन राजवंश तक जाती हैं, जब कुलीन परिवारों के बच्चे शाही प्रशासनिक सेवा की परीक्षा की तैयारी के लिए कम उम्र से ही कठिन पढ़ाई शुरू कर देते थे। आज दांव शायद उससे भी ऊँचे हैं। निजी शिक्षा का “केंद्र” कहे जाने वाले डेची-दोंग जैसे इलाकों में माता-पिता तीन साल की उम्र से ही बच्चों को तैयारी कार्यक्रमों में दाखिला दिलाते हैं। सबसे प्रतिष्ठित किंडरगार्टन में प्रवेश के लिए प्रतिभा-परीक्षाएँ और अंग्रेज़ी साक्षात्कार पास करना जरूरी होता है। उनकी मासिक फीस 1,000 डॉलर से अधिक है और वर्दी तथा पाठ्यसामग्री का खर्च अलग है।
मुफ्त सरकारी किंडरगार्टन उपलब्ध होने के बावजूद कई माता-पिता को लगता है कि बच्चों को प्रतिस्पर्धा में बढ़त दिलाने के लिए निजी शिक्षा का रास्ता अपनाना जरूरी है। जल्दी आगे बढ़ने की यह होड़ अंग्रेज़ी तक सीमित नहीं है: तीसरी कक्षा के बच्चों का छठी कक्षा का गणित पढ़ना आम है और कुछ पाँचवीं कक्षा के बच्चे कलन पढ़ते हैं। “कई साल आगे की पढ़ाई” की यह सोच गहराई से जड़ जमा चुकी है। इसका मकसद प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में दाखिला और आगे चलकर सैमसंग जैसे बड़े कारोबारी समूहों में प्रतिष्ठित नौकरी पाना है।
दुनिया के दूसरे देशों से इसकी तुलना कैसी है?
दक्षिण कोरिया की शिक्षा व्यवस्था अपने ऊँचे शैक्षणिक प्रदर्शन के लिए जानी जाती है, लेकिन विद्यार्थियों पर डाले जाने वाले तीव्र दबाव के लिए इसकी आलोचना भी होती है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, छह साल से कम उम्र के लगभग आधे कोरियाई बच्चे निजी शिक्षा लेते हैं। प्रतिस्पर्धा इतनी कड़ी है कि प्रीस्कूल प्रवेश परीक्षाएँ भी विश्वविद्यालय स्तर की परीक्षाओं जितनी चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं।
अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने शिक्षा-केंद्रित इस संस्कृति के मनोवैज्ञानिक और आर्थिक बोझ को लेकर चिंता जताई है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की प्रोफेसर एमेरिटा जोआन विलियम्स ने दक्षिण कोरिया की रिकॉर्ड-निम्न प्रजनन दर पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “कोरिया पूरी तरह बर्बादी की ओर बढ़ रहा है।” उन्होंने शैक्षणिक दबाव और देश के जनसांख्यिकीय संकट के बीच संबंध को रेखांकित किया।
मानवाधिकार आयोग ने हस्तक्षेप किया: आयोग ने क्या कहा?
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का हस्तक्षेप दक्षिण कोरिया में शुरुआती शिक्षा पर चल रही बहस का एक अहम पड़ाव है। अपनी नीतिगत राय में आयोग ने कहा कि शुरुआती उम्र में शिक्षा की अत्यधिक प्रथाएँ “संविधान और संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय द्वारा सुनिश्चित स्वास्थ्य, विकास, आराम और खेल के बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन कर सकती हैं।”
आयोग ने जोर देकर कहा कि अत्यधिक प्रतिस्पर्धा से प्रेरित शुरुआती शिक्षा की ये प्रथाएँ छोटे बच्चों को खेल, आत्म-अभिव्यक्ति और आराम जैसे उनकी उम्र के अनुरूप अनुभवों के अधिकार से वंचित करती हैं।
हालाँकि आयोग ने प्रक्रियागत आधार पर याचिका खारिज कर दी—यह कहते हुए कि निजी अकादमियाँ उसके सीधे जांच-अधिकार के दायरे में नहीं आतीं—लेकिन उसने कई अहम उपाय सुझाए:
- प्रारंभिक बाल्यावस्था की निजी शिक्षा का राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण
- सर्वेक्षण के निष्कर्षों का अनिवार्य सार्वजनिक खुलासा
- छोटे बच्चों को लक्षित परीक्षा-आधारित कार्यक्रमों और विदेशी भाषाओं की सघन शिक्षा पर कड़ा नियमन
आयोग ने कहा, “ये प्रथाएँ स्पष्ट रूप से बच्चों के अधिकारों को कमजोर करती हैं।” उसने “यह सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्थागत सुरक्षा उपायों” की मांग की कि सभी बच्चे विकास के लिहाज से उपयुक्त वातावरण में बड़े हों और सीखें।
इसके व्यापक निहितार्थ क्या हैं?
आयोग की सिफारिशें बाल विकास विशेषज्ञों के बीच बढ़ती सहमति को दर्शाती हैं: प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा क्षेत्र के लक्षित नियमन और सटीक निगरानी के बिना, कोरिया के सबसे छोटे विद्यार्थियों को हर कीमत पर उपलब्धि हासिल करने की संस्कृति का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। परिवारों पर पड़ रहा मनोवैज्ञानिक और आर्थिक बोझ देश में जन्मदर में तेज गिरावट में योगदान दे रहा है—जो दुनिया में सबसे कम है—और मौजूदा व्यवस्था की टिकाऊ होने की क्षमता पर सवाल उठा रहा है।
इस बीच माता-पिता खुद को दुविधा में पाते हैं। इस दौड़ से बाहर रहने पर बच्चे पीछे रह सकते हैं, लेकिन इसमें शामिल होने का मतलब अक्सर उनकी भलाई से समझौता करना होता है। डेची-दोंग के एक अभिभावक ने बताया, “अगर आप इसमें शामिल नहीं होते, तो आपका बच्चा पीछे रह जाता है। लेकिन शामिल होते हैं, तो उसकी खुशी और सेहत की चिंता सताती है।”
प्रीस्कूल रटंत स्कूलों की दुनिया के भीतर
सियोल के डेची-दोंग में सफल होने का दबाव चार साल की उम्र से ही शुरू हो जाता है। बच्चे अंग्रेज़ी-भाषा किंडरगार्टन की प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी कराने वाली अकादमियों में जाते हैं, जहाँ वे अक्षरों की पहचान करना, अंग्रेज़ी में जवाब देना और कक्षा में व्यवहार करना सीखते हैं। शुरुआत में कक्षाएँ 30 मिनट की होती हैं और बच्चों के ढलने के साथ धीरे-धीरे एक घंटे तक बढ़ाई जाती हैं। माता-पिता ट्यूटर्स और परीक्षा-मार्गदर्शिकाओं पर सैकड़ों डॉलर खर्च करते हैं और कुछ तो किंडरगार्टन में दाखिले के लिए कतार में जगह बनाए रखने हेतु लोगों को भी काम पर रखते हैं।
इन कार्यक्रमों की फीस प्रति माह 20 लाख वॉन (लगभग 1,500 डॉलर) से अधिक हो सकती है। मांग वाली पाठ्यचर्या के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए निजी ट्यूशन और अतिरिक्त अकादमियों पर भी खर्च करना पड़ता है। भाषा में डूबकर सीखने को बढ़ावा देने के लिए कुछ माता-पिता घर पर भी अंग्रेज़ी नाम इस्तेमाल करते हैं, हालाँकि इससे बच्चों को कोरियाई के बुनियादी शब्दों में कठिनाई हो सकती है।
कई परिवारों के लिए शुरुआती अंग्रेज़ी शिक्षा का मकसद भविष्य की बाधाएँ दूर करना है, ताकि बच्चे प्राथमिक स्कूल में गणित जैसे उन्नत विषयों पर ध्यान दे सकें। जल्दी आगे बढ़ने की होड़ इतनी तेज है कि कुछ बच्चों को अमेरिकी प्राथमिक स्कूल की तीसरी या चौथी कक्षा की पाठ्यचर्या से पढ़ाया जाता है। इस शुरुआती दबाव का चरम है “सात साल के बच्चों की गोसी” परीक्षा—स्कूल के बाद चलने वाली विशिष्ट अंग्रेज़ी अकादमियों में दाखिले के लिए बेहद प्रतिस्पर्धी परीक्षा।
मानसिक स्वास्थ्य पर असर
दक्षिण कोरिया में शैक्षणिक दबाव किसी से छिपा नहीं है और बचपन का तनाव अब अच्छी तरह दर्ज किया गया संकट है। आंकड़ों के मुताबिक, सियोल के शिक्षा जिलों में अवसाद या चिंता से पीड़ित पाए गए बच्चों की संख्या पाँच वर्षों में दोगुनी हो गई है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि शैक्षणिक उपलब्धि की लगातार दौड़ बच्चों की खुशी और भलाई पर भारी पड़ रही है।
बाल विकास विशेषज्ञों के बीच बढ़ती सहमति स्पष्ट है: प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा क्षेत्र के लक्षित नियमन और सटीक निगरानी के बिना, कोरिया के सबसे छोटे विद्यार्थियों को हर कीमत पर उपलब्धि हासिल करने की संस्कृति का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
सुधार की मांग: आगे क्या होगा?
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सिफारिशों ने दक्षिण कोरिया में शुरुआती शिक्षा पर बहस को फिर तेज कर दिया है। अधिकारों के लिए काम करने वाले लोग निजी अकादमियों पर कड़े नियमन, प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा में अधिक पारदर्शिता और खेल-आधारित शिक्षा पर फिर से जोर देने की मांग कर रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों का सुझाव है कि निजी शिक्षण संस्थानों पर निर्भरता घटाने और सभी बच्चों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए सरकार मुफ्त सार्वजनिक प्री-प्राइमरी शिक्षा शुरू करे।
अंतरराष्ट्रीय तुलनाएँ संज्ञानात्मक और सामाजिक विकास, भविष्य की शैक्षणिक उपलब्धि और आर्थिक अवसरों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा के महत्व को रेखांकित करती हैं। लेकिन दक्षिण कोरिया का मॉडल—जिसकी पहचान निजी शिक्षा पर भारी खर्च, तीव्र प्रतिस्पर्धा और कम उम्र से शैक्षणिक दबाव है—उन व्यवस्थाओं से बिल्कुल अलग है जो खेल, रचनात्मकता और भावनात्मक कल्याण को प्राथमिकता देती हैं।
शिक्षा-केंद्रित संस्कृति के नतीजों से जूझ रहे देश के सामने सवाल अब भी कायम है: क्या दक्षिण कोरिया शैक्षणिक उत्कृष्टता और अपने सबसे छोटे नागरिकों के अधिकारों तथा भलाई के बीच संतुलन बना सकता है?
संक्षेप में
- दक्षिण कोरिया के मानवाधिकार आयोग ने प्रीस्कूल प्रवेश परीक्षाओं समेत शुरुआती उम्र में शिक्षा की अत्यधिक प्रथाओं के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
- “सात साल के बच्चों की परीक्षाएँ” विशिष्ट निजी अकादमियों में दाखिले के इच्छुक छोटे बच्चों के लिए उच्च-दांव वाली परीक्षाएँ हैं, खासकर सियोल के संपन्न इलाकों में।
- विशेषज्ञों की चेतावनी है कि अत्यधिक शैक्षणिक दबाव बच्चों के भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाता है और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में बढ़ोतरी की वजह बन रहा है।
- शुरुआती उम्र में शैक्षणिक प्रतिस्पर्धा की संस्कृति दक्षिण कोरिया की शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक मूल्यों में गहराई से जड़ें जमाए हुए है।
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण, अधिक पारदर्शिता और प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा के कड़े नियमन की सिफारिश की है।
- माता-पिता अपने बच्चों की शैक्षणिक सफलता की चाह और उनकी भलाई की चिंता के बीच कठिन चुनाव करने को मजबूर हैं।
- दक्षिण कोरिया की शुरुआती शिक्षा व्यवस्था में सुधार और बच्चों के अधिकारों तथा विकास की बेहतर सुरक्षा को लेकर बहस जारी है।






