जापानी किशोर और स्कूल लौटने की पीड़ा: गहराता संकट
जापान के लाखों विद्यार्थियों के लिए गर्मी की छुट्टियों का अंत सिर्फ बेफिक्र मौसम के खत्म होने का संकेत नहीं है—यह चिंता, तनाव और कुछ बच्चों के लिए गहरे भय की वापसी भी है। हालिया सर्वेक्षणों और बढ़ते साक्ष्यों से पता चलता है कि स्कूल लौटने का यह बदलाव जापान के कई किशोरों के लिए खास तौर पर पीड़ादायक है, जिसके असर कक्षा से कहीं आगे तक जाते हैं। यह स्थिति इतनी गंभीर है कि ज्यादातर स्कूलों के दोबारा खुलने का दिन, 1 सितंबर, राष्ट्रीय चिंता का विषय बन गया है। इसी दिन के आसपास किशोर आत्महत्याओं में उछाल आता है और मानसिक स्वास्थ्य सुधारों की तत्काल मांग फिर तेज हो जाती है।
विषय-सूची
- जापानी किशोर और स्कूल लौटने की पीड़ा: गहराता संकट
- सर्वेक्षण में जापानी किशोरों की गहरी बेचैनी उजागर
- 1 सितंबर: त्रासदी से जुड़ी तारीख
- जापानी किशोरों के लिए स्कूल इतना पीड़ादायक क्यों है?
- समूह संस्कृति और अनुरूपता की भूमिका
- सरकार और समुदाय की पहल: क्या ये पर्याप्त हैं?
- दर्द को जाहिर करना: 'यामी कवाई' संस्कृति का उभार
- कोविड-19 और अन्य संकटों का असर
- अंतरराष्ट्रीय तुलना में जापान: साफ अंतर
- क्या किया जा सकता है? उम्मीद और उबरने के रास्ते
- संक्षेप में
सर्वेक्षण में जापानी किशोरों की गहरी बेचैनी उजागर
योकोहामा स्थित गैर-लाभकारी संस्था दाइसान काज़ोकू के हालिया सर्वेक्षण से पता चलता है कि गर्मी की छुट्टियां खत्म होने का जापानी विद्यार्थियों पर कितना भावनात्मक असर पड़ता है। स्कूल जीवन में मुश्किलों का सामना कर रहे 10 से 18 वर्ष की उम्र के 216 प्रतिभागियों में से 73.1% ने नए सत्र की शुरुआत को "पीड़ादायक" बताया। अन्य 14.4% ने इसे "उबाऊ" कहा और सिर्फ 1.9% ने बताया कि वे इसके लिए उत्सुक हैं। इसकी प्रमुख वजहों में दूसरों के आकलन का डर (79.6%) और स्कूल का दमघोंटू माहौल (71.3%) शामिल थे। करीब आधे प्रतिभागियों ने बताया कि उनका कोई दोस्त नहीं है, जबकि 44% ने कहा कि वे पढ़ाई के साथ कदम नहीं मिला पा रहे हैं।
ये निष्कर्ष कोई अकेली घटना नहीं हैं। वे जापानी समाज की एक व्यापक और गहरी जड़ें जमाए समस्या को दर्शाते हैं, जहां पढ़ाई का दबाव, सामाजिक अनुरूपता और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा कलंक मिलकर युवाओं के लिए चुनौतीपूर्ण माहौल बनाते हैं।
1 सितंबर: त्रासदी से जुड़ी तारीख
कई देशों में नए स्कूल वर्ष की शुरुआत का स्वागत उत्साह से किया जाता है, लेकिन जापान में 1 सितंबर एक दुखद आंकड़े से जुड़ा है: इस दिन जापानी बच्चों के अपनी जान लेने की आशंका सबसे अधिक होती है। जापान के कैबिनेट कार्यालय के एक अध्ययन के अनुसार, 1972 से 2013 के बीच इस तारीख को बच्चों की आत्महत्या के 131 मामले दर्ज हुए—साल के किसी भी दूसरे दिन से अधिक। अप्रैल में भी ऐसे मामलों की संख्या बढ़ती है, जब वसंत की छुट्टियों के बाद स्कूल खुलते हैं।
2024 में जापान में विद्यार्थियों की आत्महत्या के अब तक के सबसे अधिक मामले दर्ज हुए: प्राथमिक, जूनियर हाई और सीनियर हाई स्कूल के विद्यार्थियों में कुल 529 मामले। यह 2022 में दर्ज 514 मामलों के पिछले रिकॉर्ड से अधिक था। इसकी प्रमुख वजहें स्कूल से जुड़े तनाव थे, जैसे पढ़ाई में प्रदर्शन, सहपाठियों के साथ टकराव और भविष्य को लेकर चिंता। करीब एक-तिहाई मामलों में अवसाद समेत स्वास्थ्य समस्याओं का जिक्र था और 20% मामलों में पारिवारिक समस्याएं कारण बनीं।
सितंबर अब भी सबसे खतरनाक महीना है। गर्मी की छुट्टियों के खत्म होने और स्कूल के दूसरे सत्र की शुरुआत के समय विद्यार्थियों की आत्महत्याओं की संख्या सबसे अधिक होती है। यह सिलसिला इतना जाना-पहचाना है कि तारीख नजदीक आने पर हर साल जन-जागरूकता अभियान और मशहूर हस्तियों की पहल तेज हो जाती है। वे जोखिम का सामना कर रहे बच्चों से मदद लेने की अपील करते हैं और उन्हें याद दिलाते हैं कि सहारा मांगना बिल्कुल ठीक है।
जापानी किशोरों के लिए स्कूल इतना पीड़ादायक क्यों है?
गर्मी की छुट्टियों के अंत में जापानी विद्यार्थियों की बेचैनी के पीछे कई आपस में जुड़ी वजहें हैं:
- पढ़ाई का दबाव: जापान की शिक्षा व्यवस्था अत्यधिक प्रतिस्पर्धी है और परीक्षाओं तथा प्रदर्शन पर जोर देती है। पढ़ाई में पीछे रह जाने से अपर्याप्तता और निराशा की भावना पैदा हो सकती है।
- बुलिंग और सामाजिक अलगाव: बुलिंग (इजिमे) लगातार बनी रहने वाली समस्या है। इसके शिकार बच्चों को अक्सर लगता है कि वे उन्हें सताने वालों से बच नहीं सकते, खासकर ऐसे समाज में जहां समूह में तालमेल और अनुरूपता को महत्व दिया जाता है। सर्वेक्षण में शामिल करीब आधे किशोरों ने बताया कि उनका कोई दोस्त नहीं है।
- मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा कलंक: जागरूकता बढ़ने के बावजूद जापान में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं पर बात करना अब भी वर्जित माना जाता है। कई विद्यार्थी अपनी मुश्किलें अपने भीतर दबा लेते हैं और मानते हैं कि उन्हें चुपचाप सब सहना चाहिए, मदद नहीं मांगनी चाहिए।
- आत्महत्या के प्रति सांस्कृतिक नजरिया: कई पश्चिमी समाजों में आत्महत्या को पाप माना जाता है, जबकि जापान में ऐतिहासिक रूप से इसे जिम्मेदारी लेने या क्षमा मांगने के तरीके के रूप में देखा गया है। यह धारणा समुराई की सेप्पुकु जैसी प्रथाओं और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कामिकाजे पायलटों से जुड़ी रही है।
- मानसिक स्वास्थ्य सहायता का अपर्याप्त ढांचा: जापान में प्रति व्यक्ति मनोचिकित्सकों की संख्या अन्य विकसित देशों से कम है और मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों के बीच समन्वय भी सीमित है। क्लिनिकल मनोवैज्ञानिकों के लिए सरकार द्वारा अनिवार्य प्रशिक्षण का अभाव है और स्कूलों में उपलब्ध सहायता अक्सर पर्याप्त नहीं होती।
समूह संस्कृति और अनुरूपता की भूमिका
जापानी समाज में समूह के तालमेल और अनुरूपता को बहुत महत्व दिया जाता है। यह प्रवृत्ति सहारा देने वाली भी हो सकती है और दमघोंटू भी। जो लोग व्यक्तित्व, रुचियों या पढ़ाई की क्षमता के कारण समूह में घुल-मिल नहीं पाते, उन पर अनुरूप होने का दबाव बहिष्कार, बुलिंग और अलगाव की भावना पैदा कर सकता है। कक्षा का तालमेल बनाए रखने के लिए शिक्षक भी बुलिंग के मामलों में दखल देने से बच सकते हैं और कभी-कभी अलग दिखने वाले विद्यार्थियों के बहिष्कार में खुद शामिल हो जाते हैं।
बाल मनोचिकित्सक डॉ. केन ताकाओका बताते हैं कि स्कूल सामूहिकता को प्राथमिकता देते हैं और समूह में मेलजोल रखने में कठिनाई महसूस करने वाले बच्चों को अधिक परेशानी झेलनी पड़ती है। हिकिकोमोरी यानी समाज से अत्यधिक दूरी बना लेने की प्रवृत्ति समस्या को और बढ़ाती है। कुछ विद्यार्थी सामाजिक जीवन से पूरी तरह पीछे हट जाते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि अपनी भावनाएं जाहिर करने का उनके पास कोई रास्ता नहीं है।
सरकार और समुदाय की पहल: क्या ये पर्याप्त हैं?
संकट को देखते हुए जापानी सरकार ने युवाओं की आत्महत्याएं कम करने के लिए कई पहल शुरू की हैं। इनमें शामिल हैं:
- मानसिक स्वास्थ्य पर जागरूकता अभियान और सार्वजनिक चर्चा
- बच्चों और अभिभावकों के लिए 24 घंटे फोन पर परामर्श सेवाएं
- बच्चों और परिवारों की एजेंसी की ओर से बाल आत्महत्या की हकीकत के बारे में जागरूकता फैलाने के प्रयास
- स्कूल असहनीय हो जाने पर विद्यार्थियों को घर पर रहने के लिए धर्मार्थ संस्थाओं और गैर-सरकारी संगठनों की ओर से प्रोत्साहन
इन प्रयासों के बावजूद आलोचकों का कहना है कि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। टोक्यो मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर आया आबे कहती हैं कि बच्चों को भी मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं, इस बारे में अब भी जागरूकता कम है और सरकारी उपाय काफी हद तक बेअसर रहे हैं। कई पहल वयस्कों को ध्यान में रखकर तैयार की गई हैं और बच्चों तथा किशोरों की खास जरूरतों को पूरा नहीं करतीं।
समुदाय की कुछ पहलों ने रचनात्मक तरीके अपनाए हैं। पुस्तकालयों और यहां तक कि टोक्यो के यूनो चिड़ियाघर ने भी स्कूल लौटने से डरे विद्यार्थियों को शरण देने की पेशकश की है। इससे यह संदेश मिलता है कि कक्षा के बाहर सुरक्षा और सहारा तलाशना ठीक है। मशहूर हस्तियां और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर मुश्किलों से जूझ रहे किशोरों तक पहुंचने के लिए उम्मीद और एकजुटता के संदेश साझा करते हैं।
दर्द को जाहिर करना: 'यामी कवाई' संस्कृति का उभार
हाल के वर्षों में जापानी युवाओं ने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी अपनी मुश्किलें जाहिर करने के नए तरीके खोजे हैं। "यामी कवाई" (बीमार-सा प्यारा) फैशन ट्रेंड में मुख्यधारा की कवाई संस्कृति के हल्के रंगों के साथ गहरे और बेचैन करने वाले चित्रों का मेल है—जैसे गुलाबी पोशाक के साथ सिरिंज के आकार का हार या "मैं मरना चाहता हूं" संदेश वाली टी-शर्ट। बाहर के लोगों को यह भले ही परेशान करने वाला लगे, लेकिन कई किशोरों के लिए यह अवसाद या आत्महत्या के विचारों का सामना कर रहे दूसरों के प्रति समझ और एकजुटता जताने का तरीका है।
फैशन समीक्षक मिशा जेनेट इसे कॉस्प्ले का एक रूप बताती हैं, जो लोगों को अपने अवसाद को हल्के अंदाज में देखने और ऐसी ही परिस्थितियों से गुजर रहे लोगों से जुड़ने का मौका देता है। टेल लाइफलाइन के क्लिनिकल निदेशक बिल क्लीरी का मानना है कि फैशन के जरिए भावनाएं जाहिर करने से शर्मिंदगी कम हो सकती है और अनुभव साझा करने के लिए सुरक्षित माहौल मिल सकता है।
कोविड-19 और अन्य संकटों का असर
कोविड-19 महामारी ने जापानी युवाओं की मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों को और बढ़ा दिया है। स्कूल बंद होने, सामाजिक अलगाव और पारिवारिक तनाव ने युवाओं में आत्महत्या की दर बढ़ाने में योगदान दिया, खासकर अगस्त से नवंबर 2020 के बीच। इसके बाद यह दर महामारी से पहले के स्तर के करीब लौट आई है, लेकिन अब भी ऊंची बनी हुई है और संकट का असर जारी है।
शोध से पता चलता है कि मानसिक सहारा देने और नियमित सामाजिक मेलजोल के अवसर उपलब्ध कराने वाली पहल इन प्रभावों को कम करने में मदद कर सकती हैं। ग्रेट ईस्ट जापान भूकंप जैसी पिछली आपदाओं से मिले सबक बताते हैं कि किशोरों में मुश्किलों का सामना करने की क्षमता बढ़ाने के लिए शारीरिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करना, मनोवैज्ञानिक सहारा देना और उदासी से निपटना अहम है।
अंतरराष्ट्रीय तुलना में जापान: साफ अंतर
जापान में युवाओं की आत्महत्या दर विकसित देशों में सबसे ऊंची दरों में से एक है। यूनिसेफ की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, युवाओं के मानसिक कल्याण के मामले में जापान 43 विकसित और उभरते देशों में 32वें स्थान पर रहा। सर्वेक्षण में शामिल समृद्ध देशों में आत्महत्या दर के मामले में वह चौथे स्थान पर था। इसके उलट, शारीरिक स्वास्थ्य के मामले में जापान शीर्ष पर रहा, जो शारीरिक और मानसिक कल्याण के बीच बड़े अंतर को उजागर करता है।
जापान में आत्महत्या की कुल दर 2003 के शिखर के बाद से काफी घटी है, लेकिन बच्चों और किशोरों में यह दर उस राह पर नहीं चली। इससे संकेत मिलता है कि वयस्कों पर केंद्रित पहल असरदार हो सकती हैं, लेकिन युवाओं पर पड़ने वाले विशिष्ट दबावों के लिए उनके अनुरूप समाधान जरूरी हैं।
क्या किया जा सकता है? उम्मीद और उबरने के रास्ते
विशेषज्ञों और इस दिशा में काम करने वालों की सहमति है कि जापान में युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए कई स्तरों पर प्रयास करने होंगे:
- मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कलंक को दूर करना: स्कूलों और घरों, दोनों जगह मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बातचीत आम होनी चाहिए। शिक्षकों, अभिभावकों और साथियों को चेतावनी के संकेत पहचानने और बिना किसी पूर्वाग्रह के सहारा देने का प्रशिक्षण मिलना चाहिए।
- सहायता तक पहुंच बढ़ाना: स्कूलों में अधिक परामर्शदाता और मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर होने चाहिए और सेवाएं बच्चों तथा किशोरों की जरूरतों के मुताबिक तैयार की जानी चाहिए।
- पढ़ाई का दबाव घटाना: शिक्षा व्यवस्था में सुधार से परीक्षाओं और रैंकिंग पर अत्यधिक जोर कम हो सकता है। इससे विद्यार्थी अपनी गति से सीख सकेंगे और अलग-अलग रुचियों को आगे बढ़ा सकेंगे।
- सामाजिक जुड़ाव को बढ़ावा देना: दोस्ती, समावेश और मुश्किलों से उबरने की क्षमता को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रम बुलिंग और समूह के अनुरूप होने के दबाव से पैदा हुए अलगाव को कम कर सकते हैं।
- युवा संस्कृति से सीखना: यामी कवाई जैसी रचनात्मक अभिव्यक्तियों को अपनाने से युवाओं को अपनी मुश्किलें साझा करने और समुदाय से जुड़ने के नए रास्ते मिल सकते हैं।
आखिरकार, लक्ष्य ऐसा समाज बनाना है जहां बच्चे सुरक्षित महसूस करें, उन्हें सहारा मिले और उन्हें महत्व दिया जाए—सिर्फ पढ़ाई में उनकी उपलब्धियों के लिए नहीं, बल्कि वे जिस रूप में हैं उसके लिए भी।
संक्षेप में
- गर्मी की छुट्टियों का अंत जापान के कई किशोरों के लिए खास तौर पर तनावपूर्ण और पीड़ादायक समय होता है। सर्वेक्षणों में स्कूल लौटने को लेकर चिंता और भय का स्तर ऊंचा पाया गया है।
- 1 सितंबर, जिस दिन ज्यादातर स्कूल खुलते हैं, युवाओं में आत्महत्याओं में उछाल से जुड़ा है और राष्ट्रीय चिंता का विषय बन गया है।
- प्रमुख वजहों में पढ़ाई का दबाव, बुलिंग, सामाजिक अलगाव, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा कलंक और अनुरूपता तथा आत्महत्या के प्रति सांस्कृतिक नजरिया शामिल हैं।
- सरकार और समुदाय की पहल बढ़ी हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि बच्चों और किशोरों के लिए अधिक लक्षित सहायता जरूरी है।
- यामी कवाई जैसे युवा संस्कृति के रुझान किशोरों को अपनी मुश्किलें जाहिर करने और उनसे निपटने के नए तरीके देते हैं।
- विशेषज्ञ संकट से निपटने के लिए मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा कलंक दूर करने, सहायता सेवाओं का विस्तार करने, पढ़ाई का दबाव घटाने और सामाजिक जुड़ाव बढ़ाने की मांग करते हैं।






