भारत ने ‘GAY’ हवाई अड्डा कोड बदलने से किया इनकार: विवाद, संदर्भ और असामान्य IATA कोड पर वैश्विक बहस

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भारत ने ‘GAY’ हवाई अड्डा कोड बदलने से किया इनकार: विवाद, संदर्भ और असामान्य IATA कोड पर वैश्विक बहस

भारत का ‘GAY’ हवाई अड्डा कोड: विवाद क्यों उठा और यह क्यों नहीं बदलेगा

बिहार के प्राचीन शहर गया में स्थित गया अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा एक असामान्य विवाद के केंद्र में आ गया है। अंतरराष्ट्रीय हवाई परिवहन संघ (IATA) द्वारा तय किए गए हवाई अड्डे के तीन-अक्षरीय कोड ‘GAY’ को एक सांसद ने सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से आपत्तिजनक बताया है। यह आपत्ति खास तौर पर उस शहर को लेकर उठाई गई, जिसे हिंदुओं और बौद्धों के प्रमुख तीर्थस्थल के रूप में सम्मान प्राप्त है। इन आपत्तियों के बावजूद, भारत के नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि कोड नहीं बदलेगा।

विषय-सूची
  1. भारत का ‘GAY’ हवाई अड्डा कोड: विवाद क्यों उठा और यह क्यों नहीं बदलेगा
  2. विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
  3. IATA के हवाई अड्डा कोड क्या हैं और इन्हें कैसे तय किया जाता है?
  4. क्या सामाजिक या सांस्कृतिक कारणों से हवाई अड्डे के कोड बदले जा सकते हैं?
  5. कोड बदलने की मांग पर तीखी प्रतिक्रिया क्यों हुई?
  6. स्थानीय लोगों और यात्रियों की कोड पर क्या राय है?
  7. गया अकेला नहीं: असामान्य हवाई अड्डा कोड की दुनिया
  8. यह विवाद भारतीय समाज के बारे में क्या बताता है?
  9. आगे क्या होगा?
  10. संक्षेप में

यह मामला सिर्फ तीन अक्षरों तक सीमित नहीं है। इसमें वैश्विक विमानन नियमों, भाषा की राजनीति, भारत में LGBTQ+ लोगों के अधिकारों और हवाई अड्डों के कोड की कभी-कभी विचित्र दुनिया से जुड़े सवाल शामिल हैं। आइए, विवाद, हवाई अड्डा कोड तय करने के नियमों और भारत तथा दुनिया पर इसके व्यापक असर को विस्तार से समझें।

विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

बहस तब शुरू हुई जब सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद भीम सिंह ने भारत की संसद के उच्च सदन राज्यसभा में यह मुद्दा उठाया। सिंह ने तर्क दिया कि ‘GAY’ कोड “सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से आपत्तिजनक और असहज” है, खासकर गया जैसे आध्यात्मिक महत्व वाले शहर के लिए। उन्होंने सरकार से पूछा कि क्या उसे इस कोड को लेकर शिकायतें मिली हैं और क्या वह इसे कुछ अधिक “सम्मानजनक और सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त” कोड से बदलने पर विचार करेगी।

गया भारत के सबसे पुराने और पवित्र शहरों में से एक है। यह हिंदुओं का प्रमुख तीर्थस्थल है, जहां वे पितरों के लिए अनुष्ठान करने आते हैं। बौद्धों के लिए भी यह अहम है, क्योंकि पास ही बोध गया वह स्थान है जहां माना जाता है कि गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। बोध गया का महाबोधि मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है और दुनिया भर से यहां पर्यटक आते हैं।

सिंह की चिंताएं नई नहीं थीं। कोड बदलने की मांग पहले भी उठी है, जिनमें एयर इंडिया और 2022 में एक संसदीय समिति की मांग भी शामिल है। लेकिन इस बार इस मुद्दे पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान गया। इससे न सिर्फ कोड, बल्कि भारतीय समाज के बारे में उसके मायने पर भी बहस छिड़ गई।

IATA के हवाई अड्डा कोड क्या हैं और इन्हें कैसे तय किया जाता है?

यह समझने के लिए कि कोड बदलने की संभावना क्यों कम है, यह जानना जरूरी है कि हवाई अड्डा कोड कैसे काम करते हैं। कनाडा के मॉन्ट्रियल में स्थित वैश्विक व्यापार संगठन अंतरराष्ट्रीय हवाई परिवहन संघ (IATA) दुनिया भर के हवाई अड्डों को तीन-अक्षरीय कोड देता है। इनका इस्तेमाल विमानन कंपनियों के संचालन, टिकट जारी करने, सामान संभालने और लॉजिस्टिक्स में होता है। उदाहरण के लिए, DEL दिल्ली, BOM मुंबई और BLR बेंगलुरु के लिए इस्तेमाल होता है।

आमतौर पर ये कोड शहर या क्षेत्र के नाम के पहले तीन अक्षरों से बनाए जाते हैं। गया के मामले में ‘GAY’ एक स्वाभाविक विकल्प था। 30 सितंबर, 2011 से यह कोड आधिकारिक तौर पर इस्तेमाल हो रहा है। इसी दिन एयर इंडिया की पहली नियमित उड़ान गया-वाराणसी-दिल्ली मार्ग पर शुरू हुई थी। तब से यह घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के टिकटों, सामान के टैग और उड़ान समय-सारिणी में दिखाई देता रहा है। इनमें बैंकॉक, यांगून और थिम्पू से आने वाली उड़ानें, साथ ही जापान और दक्षिण कोरिया से चार्टर उड़ानें भी शामिल हैं।

एक बार तय होने के बाद IATA कोड स्थायी माने जाते हैं और इन्हें केवल असाधारण परिस्थितियों में बदला जाता है—आमतौर पर हवाई सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं के कारण। यह नीति IATA के प्रस्ताव 763 में दी गई है, जो स्थान कोड तय करने और बदलने की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है। इसका तर्क यह है कि ये कोड विमानन कंपनियों की आरक्षण प्रणालियों, माल की ट्रैकिंग करने वाले डेटाबेस और सामान संभालने की प्रक्रियाओं में गहराई से शामिल होते हैं। इसलिए इन्हें बदलना महंगा और लॉजिस्टिक्स के लिहाज से जटिल होता है।

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क्या सामाजिक या सांस्कृतिक कारणों से हवाई अड्डे के कोड बदले जा सकते हैं?

तकनीकी तौर पर हवाई अड्डे के कोड बदले जा सकते हैं, लेकिन ऐसा बहुत कम होता है। IATA के दिशा-निर्देशों के अनुसार, बदलाव केवल परिचालन या सुरक्षा कारणों से किए जाते हैं। इनमें ऐसे मिलते-जुलते कोडों के बीच भ्रम शामिल है, जिससे हवाई यातायात नियंत्रण या सामान के मार्ग निर्धारण में गलतियां हो सकती हैं। सांस्कृतिक या सामाजिक संवेदनशीलताओं को आमतौर पर बदलाव का पर्याप्त कारण नहीं माना जाता।

कुछ अपवाद जरूर रहे हैं, लेकिन वे गिने-चुने हैं। उदाहरण के लिए, बाल्टीमोर के हवाई अड्डे का कोड नाम बदले जाने के बाद BAL से BWI हुआ। राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी की हत्या के बाद न्यूयॉर्क के आइडलवाइल्ड हवाई अड्डे का नाम JFK कर दिया गया। हाल के वर्षों में कजाकिस्तान की राजधानी का नाम बदलने के बाद उसके हवाई अड्डे का कोड TSE से NQZ हुआ, लेकिन इस प्रक्रिया में भी कई साल लगे और इसके लिए ठोस औचित्य देना पड़ा।

गया के मामले में भारत सरकार को कोड बदलने के अनुरोध मिले हैं, जिनमें एयर इंडिया और भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के अनुरोध भी शामिल हैं। हालांकि, IATA ने लगातार यही जवाब दिया है कि कोड में बदलाव के मानदंड पूरे नहीं होते। नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल ने संसद में इस बात को दोहराते हुए कहा:

IATA के स्थान कोड स्थायी माने जाते हैं और इनमें बदलाव केवल असाधारण परिस्थितियों में किया जाता है, आमतौर पर जब हवाई सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं हों।

उन्होंने यह भी कहा कि ये कोड मुख्य रूप से वाणिज्यिक विमान सेवाओं के संचालन के लिए होते हैं और सरकारों के नहीं, बल्कि विमानन कंपनियों के अनुरोध पर जारी किए जाते हैं।

कोड बदलने की मांग पर तीखी प्रतिक्रिया क्यों हुई?

कुछ स्थानीय लोगों और यात्रियों ने इस कोड से असहजता जताई है, लेकिन इसे बदलने की मांग पर LGBTQ+ कार्यकर्ताओं और उनके समर्थकों ने कड़ी आलोचना की है। कई लोगों का मानना है कि यह आपत्ति वास्तविक सांस्कृतिक चिंता के बजाय समलैंगिकता के प्रति पूर्वाग्रह से उपजी है।

LGBTQ अधिकारों के प्रमुख पैरोकार अरविंद नरैन ने तर्क दिया कि ‘gay’ शब्द तभी आपत्तिजनक लगता है, जब कोई LGBTQ लोगों को आपत्तिजनक मानता हो। उन्होंने 2018 के उस सुप्रीम कोर्ट फैसले का हवाला दिया, जिसने भारत में समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर किया और क्वीर नागरिकों की गरिमा तथा संवैधानिक अधिकारों की पुष्टि की। नरैन ने कहा:

हमें अनैतिक बताकर सांसद समुदाय की गरिमा छीनते हैं। उन्हें समझना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार निजी नैतिकता नहीं, बल्कि संवैधानिक नैतिकता सर्वोपरि है। उन्हें समुदाय से माफी मांगनी चाहिए।

अन्य कार्यकर्ताओं ने भी इसी विचार का समर्थन करते हुए कहा कि ‘gay’ शब्द को लेकर असहजता किसी वास्तविक सांस्कृतिक अनुपयुक्तता के बजाय गहरे पूर्वाग्रह को दिखाती है। एक अन्य LGBTQ कार्यकर्ता राजेश श्रीनिवास ने कहा कि कोड में कुछ भी गलत नहीं है और ध्यान इससे बचने के बजाय समावेशन पर होना चाहिए।

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मानसिक स्वास्थ्य और विविधता के विशेषज्ञों ने भी इस बहस में अपनी बात रखी। परामर्श मनोवैज्ञानिक शनमथी सेंथिल कुमार ने कहा कि कोड को “असुरक्षित” या “अनुचित” बताना हानिकारक रूढ़ियों को मजबूत करता है और यह संदेश देता है कि क्वीर पहचान को मिटा देना चाहिए। मनोचिकित्सक विद्या दिनाकरन ने कहा कि ऐसे मौकों पर बात से बचने के बजाय सार्थक चर्चा होनी चाहिए। असली प्रगति कलंक का सामना करने से आती है, उसे दबा देने से नहीं।

स्थानीय लोगों और यात्रियों की कोड पर क्या राय है?

स्थानीय लोगों और यात्रियों की प्रतिक्रियाएं मिली-जुली हैं। गया के उपन्यासकार संजय सहाय जैसे कुछ लोगों ने माना है कि अपने गृहनगर के लिए हवाई टिकट बुक करते समय उन्हें शर्मिंदगी महसूस होती है। वहीं, कुछ लोगों का मानना है कि यह विवाद बेवजह बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है और कोड महज पहचान के लिए इस्तेमाल होने वाला एक व्यावहारिक संकेत है, जिसका कोई गहरा अर्थ नहीं है।

ज्यादातर यात्रियों के लिए इस कोड का परिचालन पर कोई असर नहीं पड़ता। गया अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का एक सक्रिय केंद्र बना हुआ है। यह खास तौर पर भारत को श्रीलंका, थाईलैंड, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों से जोड़ने वाले बौद्ध तीर्थयात्रा मार्गों के लिए अहम है। धार्मिक पर्यटन और अंतरराष्ट्रीय संपर्क को बढ़ावा देने में हवाई अड्डे की भूमिका को उसके कोड के शब्दार्थ से कहीं अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

कुछ टिप्पणीकारों ने सुझाव दिया है कि कोड में प्रतीकात्मक बदलाव के बजाय हवाई अड्डे के बुनियादी ढांचे और संपर्क सुविधाओं को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए। एक यात्रा स्तंभकार के शब्दों में, “बेहतर है इसे अपना ही लें: SUX के लिए उड़ान भरें।”

गया अकेला नहीं: असामान्य हवाई अड्डा कोड की दुनिया

गया का विवाद अनोखा नहीं है। दुनिया भर के कई हवाई अड्डों के कोड अंग्रेजी या दूसरी भाषाओं में अजीब, हास्यास्पद या आपत्तिजनक लग सकते हैं। ये कोड अक्सर पुराने नामकरण नियमों का नतीजा होते हैं या पंजीकरण के समय उपलब्ध पहले तीन-अक्षरीय संयोजन से बनते हैं।

कुछ चर्चित उदाहरण:

  • SUX – सिओक्स गेटवे हवाई अड्डा, सिओक्स सिटी, आयोवा, अमेरिका
  • FUK – फुकुओका हवाई अड्डा, जापान
  • PEE – पर्म अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, रूस
  • POO – पोकोस डी काल्डास हवाई अड्डा, ब्राजील
  • LOL – डर्बी फील्ड, नेवादा, अमेरिका
  • OMG – ओमेगा हवाई अड्डा, नामीबिया
  • DIE – अर्राचार्ट हवाई अड्डा, मेडागास्कर
  • BUM – बटलर मेमोरियल हवाई अड्डा, मिसौरी, अमेरिका
  • EEK – ईक हवाई अड्डा, अलास्का, अमेरिका
  • YUM – युमा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, एरिजोना, अमेरिका

कुछ शहरों ने अपने कोड बदलने की कोशिश की है, अक्सर उन्हें सफलता नहीं मिली। उदाहरण के लिए, सिओक्स सिटी ने 1990 के दशक के आखिर और 2000 के दशक की शुरुआत में SUX को बदलने की कोशिश की, लेकिन उसका अनुरोध ठुकरा दिया गया। आखिरकार, शहर ने इस कोड को अपनाते हुए व्यंग्यपूर्ण विज्ञापन अभियान चलाए, जिनमें यात्रियों से “SUX के लिए उड़ान भरने” की अपील की गई।

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IATA कुछ ऐसे कोडों पर रोक लगाता है जिन्हें स्पष्ट रूप से आपत्तिजनक माना जाता है, जैसे SEX या GUN, लेकिन कई अन्य कोड अब भी इस्तेमाल में हैं। किसी कोड को बदलने की प्रक्रिया लंबी होती है, इसके लिए ठोस औचित्य देना पड़ता है और मंजूरी मिलना दुर्लभ है।

यह विवाद भारतीय समाज के बारे में क्या बताता है?

गया के हवाई अड्डे के कोड पर बहस भारत में भाषा, पहचान और समावेशन से जुड़ी व्यापक चर्चाओं का केंद्र बन गई है। सरकार का कोड बदलने से इनकार अंतरराष्ट्रीय विमानन मानकों पर आधारित है, लेकिन इस विवाद ने भारतीय समाज के कुछ हिस्सों में LGBTQ+ पहचानों को लेकर बनी असहजता उजागर की है।

हाल के वर्षों में भारत में LGBTQ+ अधिकारों के क्षेत्र में कुछ प्रगति हुई है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट का समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाला फैसला एक ऐतिहासिक पड़ाव था। बेघर ट्रांसजेंडर लोगों के लिए आश्रय कार्यक्रमों का विस्तार जैसे समावेशन के प्रतीकात्मक कदम भी उठाए गए हैं। हालांकि, कार्यकर्ताओं का कहना है कि समान-लिंग विवाह को कानूनी मान्यता देने जैसे सार्थक सुधार अब भी दूर हैं। गया के कोड को लेकर हुआ विवाद दिखाता है कि सामाजिक स्वीकार्यता के मामले में देश को अभी लंबा रास्ता तय करना है।

कई लोगों के लिए असली मुद्दा हवाई अड्डे का कोड नहीं, बल्कि उससे उजागर हुआ नजरिया है। LGBTQ+ अधिकारों के एक पैरोकार के शब्दों में, “यह विवाद एक बड़ी चर्चा को सामने लाता है, जो भारत को अब भी करनी है—हवाई अड्डे के कोड पर नहीं, बल्कि स्वीकार्यता पर।”

आगे क्या होगा?

फिलहाल, गया अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का कोड ‘GAY’ ही रहेगा। सरकार ने साफ किया है कि उसके पास कोड बदलने का अधिकार नहीं है और IATA के नियम सामाजिक या सांस्कृतिक संवेदनशीलताओं के आधार पर बदलाव की अनुमति नहीं देते। जब तक हवाई सुरक्षा से जुड़ा कोई ठोस मुद्दा सामने नहीं आता, यह कोड बना रहेगा।

हालांकि, बहस के थमने की संभावना कम है। भारत जब पहचान, समावेशन और आधुनिकता से जुड़े सवालों से जूझ रहा है, तब हवाई अड्डे के कोड जैसी मामूली दिखने वाली चीज भी समाज में हो रहे बड़े बदलावों का प्रतीक बन सकती है।

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संक्षेप में

  • भारत के गया अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का IATA कोड ‘GAY’ है। एक सांसद ने इसे सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से आपत्तिजनक बताया, जिसके बाद विवाद उठा।
  • भारत सरकार ने कोड बदलने का अनुरोध करने से इनकार किया है। उसका कहना है कि IATA की नीति के तहत कोड स्थायी होते हैं और इनमें बदलाव केवल हवाई सुरक्षा के कारण किया जाता है।
  • LGBTQ+ कार्यकर्ताओं और उनके समर्थकों ने इस आपत्ति को पूर्वाग्रह से प्रेरित बताते हुए आलोचना की है। उनका कहना है कि ‘gay’ शब्द आपत्तिजनक नहीं है और ध्यान समावेशन पर होना चाहिए।
  • ‘GAY’ जैसे हवाई अड्डा कोड कोई अनोखी बात नहीं हैं। दुनिया भर के कई हवाई अड्डों के कोड असामान्य या हास्यास्पद हैं, और इन्हें बदलना दुर्लभ तथा कठिन है।
  • इस विवाद ने भारतीय समाज में भाषा, पहचान और स्वीकार्यता से जुड़े व्यापक मुद्दों को उजागर किया है, खासकर LGBTQ+ अधिकारों के संदर्भ में।
  • फिलहाल कोड नहीं बदलेगा। यह बहस भारत और दुनिया में समाज से जुड़ी गहरी चर्चाओं को सामने लाती रहेगी।
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