इंडोनेशिया पर उठे सवाल: ईसाई प्रार्थना स्थलों पर भीड़ के हमलों से बढ़ती धार्मिक असहिष्णुता उजागर

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इंडोनेशिया पर उठे सवाल: ईसाई प्रार्थना स्थलों पर भीड़ के हमलों से बढ़ती धार्मिक असहिष्णुता उजागर

पडांग में हिंसक भीड़ का हमला: धार्मिक असहिष्णुता की गंभीर चेतावनी

27 जुलाई, 2025 को इंडोनेशिया के पश्चिमी सुमात्रा प्रांत के पडांग में एक हिंसक भीड़ ने ईसाई प्रार्थना स्थल पर धावा बोल दिया। इस हमले में बच्चे घायल हुए और दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम-बहुल देश में धार्मिक असहिष्णुता को लेकर गंभीर चिंताएं फिर बढ़ गईं। करीब 30 ईसाई विद्यार्थियों द्वारा साप्ताहिक धार्मिक अध्ययन के लिए इस्तेमाल किए जा रहे एक निजी घर को निशाना बनाकर किए गए इस हमले की मानवाधिकार संगठनों, धार्मिक नेताओं और नागरिक समाज ने निंदा की है। उन्होंने चेतावनी दी कि व्यवस्थागत भेदभाव इंडोनेशिया के संविधान में उपासना की स्वतंत्रता के वादे को लगातार कमजोर कर रहा है।

विषय-सूची
  1. पडांग में हिंसक भीड़ का हमला: धार्मिक असहिष्णुता की गंभीर चेतावनी
  2. पडांग में क्या हुआ?
  3. हिंसा का सिलसिला: कोई अकेली घटना नहीं
  4. व्यापक संदर्भ: इंडोनेशिया में धार्मिक स्वतंत्रता और भेदभाव
  5. धार्मिक और नागरिक समाज के नेताओं ने कार्रवाई की मांग की
  6. सरकार की प्रतिक्रिया: वादे और आलोचना
  7. संरचनात्मक बाधाएं: भेदभावपूर्ण कानूनों की भूमिका
  8. पीड़ितों पर असर: सदमा और भय
  9. धार्मिक असहिष्णुता क्यों बढ़ रही है?
  10. अंतरधार्मिक एकजुटता: उम्मीद की किरण?
  11. संक्षेप में

ऑनलाइन प्रसारित वीडियो में कुछ पुरुष बाड़ पर लात मारते, खिड़कियां तोड़ते और बच्चों को वहां से चले जाने की मांग करते दिख रहे हैं। उनमें से कुछ के हाथों में लकड़ी के तख्ते थे। विधिक सहायता संस्थान (एलबीएच) पडांग के अनुसार, दो बच्चे घायल हुए। एक 13 वर्षीय बच्चे की पीठ पर लात मारी गई, जबकि 11 वर्षीय एक अन्य बच्चे को लकड़ी के गुटके से गंभीर चोट लगी, जिसके कारण वह चलने में असमर्थ हो गया। वहां मौजूद अन्य बच्चे भी गहरे सदमे में थे। खबरों के मुताबिक, वे रो रहे थे, छिप रहे थे और लगातार भय महसूस कर रहे थे।

यह कोई अकेली घटना नहीं है। इंडोनेशिया में ईसाई समुदायों पर हमलों और उन्हें डराने-धमकाने की घटनाओं का सिलसिला पहले से जारी है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि बढ़ते धार्मिक रूढ़िवाद के माहौल में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने की राज्य की क्षमता और इच्छाशक्ति कितनी है।

पडांग में क्या हुआ?

यह हमला कोटो तंगाह जिले के पडांग सराय गांव में उस घर पर हुआ, जिसका इस्तेमाल इंडोनेशियन फेथफुल क्रिश्चियन चर्च (जीकेएसआई) अनुग्रह पडांग धार्मिक शिक्षा के लिए करता था। स्थानीय सरकारी स्कूलों में ईसाई धर्म की शिक्षा उपलब्ध नहीं होने के कारण मंडली ने यह अस्थायी व्यवस्था अपनाई थी। भीड़ के वहां पहुंचने पर पुलिस अधिकारी कथित तौर पर देखते रहे। हिंसा तेजी से बढ़ी, संपत्ति को नुकसान पहुंचा और बच्चे तथा उनके माता-पिता घबराहट में रह गए।

पडांग के मेयर ने इस घटना को “गलतफहमी” बताया, लेकिन ईसाई नेताओं और अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस वर्णन को खारिज करते हुए इसे धार्मिक असहिष्णुता का स्पष्ट कृत्य और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन कहा। राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो को लिखे खुले पत्र में पादरी फू क्वेट खियोंग ने लिखा:

जब उपासना के दौरान बच्चे घायल होते हैं, तो हमला सिर्फ प्रार्थना-घर पर नहीं होता, बल्कि यह राष्ट्र की अंतरात्मा पर भी चोट है।

इंडोनेशियन कैथोलिक स्कॉलर्स एसोसिएशन की अध्यक्ष रेस्टु हापसारी ने भी इन चिंताओं को दोहराया। उन्होंने कहा कि नुकसान का पैमाना और बच्चों को पहुंचे सदमे के कारण सरकार के लिए समन्वित कदम उठाना जरूरी है। इनमें केंद्र की मरम्मत और प्रभावित लोगों को मनोवैज्ञानिक सहायता देना शामिल है।

हिंसा का सिलसिला: कोई अकेली घटना नहीं

पडांग का हमला एक चिंताजनक प्रवृत्ति का हिस्सा है। इससे कुछ ही सप्ताह पहले पश्चिमी जावा के सुकाबुमी में ईसाई युवाओं का एक शिविर करीब 200 लोगों की भीड़ ने बाधित किया था। भीड़ ने संपत्ति को नुकसान पहुंचाया और प्रतिभागियों को वहां से खदेड़ दिया। उस घटना में भी पुलिस और सैनिक देखते रहे। दोनों मामलों में हमलावरों ने उपासना गतिविधियों के लिए आधिकारिक अनुमति न होने का हवाला देकर अपने कृत्यों को सही ठहराया। इंडोनेशिया में अल्पसंख्यक धार्मिक समूहों को निशाना बनाने के लिए यह बहाना आम तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।

सेटारा इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड पीस के अनुसार, इंडोनेशिया में 2014 से 2024 के बीच धर्म और आस्था की स्वतंत्रता के उल्लंघन की 3,217 घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें चर्च निर्माण का विरोध, ईसाई उपासना पर रोक और धार्मिक स्थलों को नष्ट करना शामिल है। 2006 का संयुक्त मंत्रिस्तरीय आदेश अल्पसंख्यक धार्मिक समूहों के लिए उपासना-स्थल बनाने से पहले अन्य धर्मों के लोगों के हस्ताक्षर और कई आधिकारिक अनुमतियां लेना अनिवार्य करता है। इसकी व्यापक आलोचना इस आधार पर हुई है कि यह भेदभावपूर्ण है और बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर वीटो का अधिकार देता है।

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मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि ऐसे नियम और कानून का असंगत प्रवर्तन ऐसा माहौल बनाते हैं, जहां भीड़ की हिंसा और कानून अपने हाथ में लेने की कार्रवाई सहन की जाती है या परोक्ष रूप से बढ़ावा मिलता है। सेटारा इंस्टीट्यूट ने कहा:

इस कृत्य का कोई औचित्य नहीं है। यह एक आपराधिक अपराध है, जो राष्ट्रीय कानून और संविधान दोनों का उल्लंघन करता है।

व्यापक संदर्भ: इंडोनेशिया में धार्मिक स्वतंत्रता और भेदभाव

इंडोनेशिया का 1945 का संविधान अनुच्छेद 28 और 29 के तहत धर्म और उपासना की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। हालांकि, व्यवहार में धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासकर ईसाइयों, को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है:

  • सार्वजनिक जीवन, शिक्षा और रोजगार में भेदभाव
  • चर्च भवनों के लिए अनुमति हासिल करने में कठिनाई
  • कट्टरपंथी समूहों की हिंसा और धमकी
  • सामाजिक दबाव, खासकर इस्लाम से ईसाई धर्म अपनाने वालों पर
  • धार्मिक असहिष्णुता पर सरकार की असंगत प्रतिक्रिया

ओपन डोर्स की 2025 वर्ल्ड वॉच लिस्ट के अनुसार, इंडोनेशिया के ईसाई समुदाय अब भी आधिकारिक और अनौपचारिक, दोनों तरह के भेदभाव और उत्पीड़न के जोखिम में हैं। सरकार की प्रतिक्रिया क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग होती है। कुछ स्थानीय प्रशासन प्रतिबंधात्मक नियम लागू करते हैं, जबकि अन्य सहिष्णुता को बढ़ावा देने की कोशिश करते हैं। संवैधानिक गारंटी के बावजूद, कई ईसाइयों के लिए हकीकत अनिश्चितता और जोखिम से भरी है।

धार्मिक और नागरिक समाज के नेताओं ने कार्रवाई की मांग की

पडांग के हमले के बाद अलग-अलग धर्मों के नेताओं ने एकजुट होकर सरकार से दुर्लभ संयुक्त अपील की। 5 अगस्त को जकार्ता में हुई बैठक में कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट, मुस्लिम, हिंदू, बौद्ध और कन्फ्यूशियस समुदायों के प्रतिनिधियों ने बढ़ती असहिष्णुता की घटनाओं की निंदा की और राज्य से उपासना की स्वतंत्रता के संवैधानिक संरक्षण को लागू करने का आग्रह किया।

बिशप्स कमीशन फॉर इंटररिलिजियस रिलेशंस के कार्यकारी सचिव फादर एलोयसियस बुडी पुरनोमो ने जोर देकर कहा कि ऐसी घटनाएं “इंडोनेशिया में सहिष्णुता, सद्भाव, भाईचारे और साथ रहने की नींव के साथ-साथ धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को कलंकित और नुकसान पहुंचाती हैं।”

संयुक्त बयान में पांच बिंदुओं वाली नैतिक अपील की गई:

  • धर्म और उपासना की स्वतंत्रता संवैधानिक अधिकार है
  • भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए राज्य को निर्णायक कदम उठाने चाहिए
  • हिंसा करने वालों और उपासना-स्थलों को नष्ट करने वालों के खिलाफ कानून तथा सुरक्षा बलों को कार्रवाई करनी चाहिए
  • सहिष्णुता बनाए रखने के लिए सरकारों को अंतरधार्मिक मंचों और समुदायों के साथ सहयोग करना चाहिए
  • धार्मिक नेताओं को अपनी मंडलियों में सद्भाव बनाए रखने और विभाजनकारी उकसावे में न आने की अपील करनी चाहिए
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कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस और अन्य धर्मों के नेताओं ने जोर देकर कहा कि उपासना-स्थल हमेशा शांति, सुरक्षा और गरिमा के स्थल बने रहने चाहिए। उन्होंने कानून प्रवर्तन और न्यायिक अधिकारियों से प्रार्थना के लिए इस्तेमाल होने वाले स्थलों पर हिंसा, रोक, बाधा या तोड़फोड़ की हर घटना को रोकने और उसकी पूरी जांच करने का आह्वान किया।

सरकार की प्रतिक्रिया: वादे और आलोचना

धार्मिक मामलों के मंत्री नसरुद्दीन उमर ने पडांग हमले पर खेद जताते हुए इसे “सहिष्णु राष्ट्र के रूप में इंडोनेशिया की छवि पर दाग” बताया और जांच का वादा किया। हालांकि, अधिकार कार्यकर्ताओं और जनमत को प्रभावित करने वाले लोगों का कहना है कि सिर्फ खेद जताना काफी नहीं है। जकार्ता पोस्ट ने अपने संपादकीय में लिखा:

उम्मीद और खेद अब काफी नहीं हैं। सरकार को खेद जताने से आगे बढ़ना होगा, भेदभावपूर्ण नियमों को खत्म करना होगा, दोषियों पर मुकदमा चलाना होगा और सभी के लिए सुरक्षित उपासना सुनिश्चित करनी होगी।

2024 में पदभार संभालने वाले राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो पर संवैधानिक धार्मिक स्वतंत्रता की स्पष्ट रूप से रक्षा करने का दबाव बढ़ रहा है। आलोचकों का कहना है कि नेतृत्व की चुप्पी या निष्क्रियता से राज्य की उदासीनता या मिलीभगत की धारणा मजबूत होती है और असहिष्णु समूहों का हौसला बढ़ता है।

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संरचनात्मक बाधाएं: भेदभावपूर्ण कानूनों की भूमिका

इंडोनेशिया में धार्मिक असहिष्णुता की समस्या की जड़ में ऐसी संरचनात्मक बाधाएं हैं, जो अल्पसंख्यकों के लिए स्वतंत्र रूप से अपने धर्म का पालन करना कठिन बनाती हैं। उपासना-स्थलों के निर्माण से जुड़ा 2006 का संयुक्त मंत्रिस्तरीय आदेश इसका प्रमुख उदाहरण है। इसके तहत अल्पसंख्यक समूहों को चर्च या प्रार्थना-घर बनाने से पहले अन्य धर्मों के स्थानीय निवासियों और कई सरकारी एजेंसियों से मंजूरी लेनी होती है। स्थानीय बहुसंख्यक अक्सर इस प्रक्रिया का इस्तेमाल निर्माण को रोकने या अनिश्चितकाल के लिए टालने में करते हैं।

प्रमुख अधिकार कार्यकर्ता परमादी आर्या बताते हैं कि घरों में उपासना के लिए आधिकारिक अनुमति की जरूरत नहीं होती और ईसाइयों के साथ भी मुसलमानों जैसा समान व्यवहार होना चाहिए, जो बिना अनुमति प्रार्थना-कक्षों का इस्तेमाल करते हैं। इसके बावजूद, हमलों को सही ठहराने के लिए अक्सर अनुमति न होने का हवाला दिया जाता है, जबकि निजी उपासना के लिए कानूनन अनुमति जरूरी नहीं है।

कानूनी और नौकरशाही बाधाएं, सामाजिक दबाव और हिंसा का खतरा मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं जिसमें धार्मिक अल्पसंख्यकों को गुप्त रूप से उपासना करने या हमले का जोखिम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इससे धार्मिक स्वतंत्रता पर रोक लगती है और अल्पसंख्यक समुदायों में असुरक्षा की भावना बढ़ती है।

पीड़ितों पर असर: सदमा और भय

धार्मिक असहिष्णुता की मानवीय कीमत बहुत गहरी है। पडांग में संडे स्कूल जाते समय हमले का शिकार हुए बच्चे अब गंभीर सदमे से जूझ रहे हैं। इंडोनेशिया के चर्चों की संगति के न्याय और शांति आयोग की रेवरेंड एटिका सारागिह ने चेताया कि बच्चों पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक असर को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए, क्योंकि इससे उनका भविष्य का कल्याण और समाज में अपनेपन की भावना प्रभावित हो सकती है।

इसी तरह का सदमा अन्य घटनाओं में भी सामने आया है, जैसे सुकाबुमी में युवाओं के शिविर पर हुआ हमला, जहां उपासना-स्थल में तोड़फोड़ के बाद प्रतिभागियों को भागना पड़ा। इन हमलों से पैदा भय और चिंता का असर तत्काल पीड़ितों से आगे पूरे समुदाय पर पड़ता है और नागरिकों की रक्षा करने की राज्य की क्षमता पर भरोसा कमजोर होता है।

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धार्मिक असहिष्णुता क्यों बढ़ रही है?

इंडोनेशिया में धार्मिक असहिष्णुता बढ़ने के पीछे कई कारण हैं:

  • धार्मिक रूढ़िवाद में वृद्धि: हाल के वर्षों में इंडोनेशियाई समाज अधिक रूढ़िवादी हुआ है। कट्टरपंथी समूहों का प्रभाव बढ़ा है और असहिष्णु बयानबाजी आम होती जा रही है।
  • कमजोर कानून प्रवर्तन: पुलिस और स्थानीय अधिकारी अक्सर हस्तक्षेप करने या दोषियों को जवाबदेह ठहराने में नाकाम रहते हैं। कभी-कभी वे सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने या बहुसंख्यकों को नाराज करने से बचने की जरूरत का हवाला देते हैं।
  • भेदभावपूर्ण नियम: 2006 के आदेश जैसे कानून स्थानीय बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों की धार्मिक गतिविधियों पर प्रभावी वीटो का अधिकार देते हैं और भेदभाव को संस्थागत रूप देते हैं।
  • राजनीतिक गणनाएं: राजनेता कभी-कभी समर्थन खोने के डर से असहिष्णु समूहों का सामना करने से बचते हैं, खासकर उन क्षेत्रों में जहां धार्मिक रूढ़िवाद मजबूत है।

ह्यूमन राइट्स वॉच की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों ने धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले रोकने के लिए बहुत कम किया है और कई कानून इन समूहों को जोखिम में डालते हैं। इनमें ईशनिंदा कानून और धार्मिक सद्भाव से जुड़े नियम शामिल हैं। रिपोर्ट में पिछले दशक के दौरान इंडोनेशिया में नागरिक और राजनीतिक अधिकारों में व्यापक गिरावट का भी उल्लेख है। इस दौरान नागरिक मामलों में सशस्त्र बलों का हस्तक्षेप बढ़ा है और विधायी निगरानी कमजोर हुई है।

अंतरधार्मिक एकजुटता: उम्मीद की किरण?

चुनौतियों के बावजूद, अंतरधार्मिक एकजुटता उम्मीद की कुछ किरणें दिखाती है। इंडोनेशिया के विविध धर्मों के नेताओं की संयुक्त अपील से सहिष्णुता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व बनाए रखने की साझा प्रतिबद्धता जाहिर होती है। अंतरधार्मिक समूह फोरम फॉर रिलिजियस हार्मनी (एफकेयूबी) ने स्थानीय स्तर पर विवाद सुलझाने और संवाद को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई है।

कुछ मामलों में स्थानीय अधिकारियों ने चर्च निर्माण या उपासना गतिविधियों को लेकर विवाद सुलझाने के लिए सफलतापूर्वक समझौते करवाए हैं। इससे पता चलता है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति होने पर संवाद और सहयोग संभव हैं। हालांकि, ऐसी सफलताएं नियम के बजाय अपवाद हैं। असहिष्णुता के मूल कारणों से निपटने के लिए देश के नेतृत्व की निरंतर प्रतिबद्धता जरूरी है।

संक्षेप में

  • पश्चिमी सुमात्रा के पडांग में ईसाई प्रार्थना-घर पर हिंसक भीड़ के हमले में बच्चे घायल हुए और इंडोनेशिया में धार्मिक असहिष्णुता को लेकर चिंताएं फिर बढ़ गईं।
  • यह घटना ईसाई समुदायों पर हमलों और उन्हें डराने-धमकाने की व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है। ऐसे हमलों को अक्सर उपासना की अनुमति से जुड़े भेदभावपूर्ण नियमों के आधार पर सही ठहराया जाता है।
  • अलग-अलग धर्मों के धार्मिक और नागरिक समाज के नेता धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा और हिंसा के दोषियों पर मुकदमा चलाने के लिए निर्णायक सरकारी कार्रवाई की मांग को लेकर एकजुट हुए हैं।
  • 2006 के संयुक्त मंत्रिस्तरीय आदेश सहित संरचनात्मक बाधाएं अल्पसंख्यकों के लिए उपासना-स्थल बनाना और स्वतंत्र रूप से अपने धर्म का पालन करना कठिन बनाती हैं।
  • धार्मिक हिंसा के पीड़ितों, खासकर बच्चों, को लंबे समय तक सदमे और भय का सामना करना पड़ता है। इससे सहिष्णु और बहुलतावादी राष्ट्र के रूप में इंडोनेशिया की प्रतिष्ठा कमजोर होती है।
  • मानवाधिकार संगठनों और जनमत को प्रभावित करने वाले लोगों का कहना है कि सिर्फ खेद जताना काफी नहीं है। सभी इंडोनेशियाई नागरिकों के लिए सुरक्षित उपासना सुनिश्चित करने हेतु व्यवस्थागत सुधार और कानून का लगातार प्रवर्तन जरूरी है।
  • अंतरधार्मिक एकजुटता उम्मीद जगाती है, लेकिन स्थायी बदलाव के लिए राष्ट्रीय नेतृत्व और भेदभावपूर्ण कानूनों तथा तौर-तरीकों को खत्म करना जरूरी होगा।
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