एशिया के नए तनाव-बिंदु के केंद्र में फिलीपींस
अगस्त 2025 में, फिलीपींस के राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस जूनियर ने सार्वजनिक रूप से कहा कि ताइवान को लेकर चीन और अमेरिका के बीच किसी भी संघर्ष में उनका देश अनिवार्य रूप से शामिल हो जाएगा। भारत की हाई-प्रोफाइल राजकीय यात्रा के दौरान की गई और फर्स्टपोस्ट के साथ एक विशेष साक्षात्कार में प्रसारित मार्कोस की इस टिप्पणी से बीजिंग ने कड़ी आपत्ति जताई, ताइपे ने आभार व्यक्त किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिक्रियाओं की लहर उठी। इस घटनाक्रम ने फिलीपींस को हिंद-प्रशांत की सबसे अस्थिर सुरक्षा-दुविधा के केंद्र में ला खड़ा किया है। इससे दो महाशक्तियों के बीच देश की नाजुक स्थिति और क्षेत्रीय तनाव बढ़ने के जोखिम को उजागर किया है।
विषय-सूची
- एशिया के नए तनाव-बिंदु के केंद्र में फिलीपींस
- कूटनीतिक विवाद क्यों भड़का?
- फिलीपींस ने एक-चीन नीति दोहराई
- फिलीपींस इतना असुरक्षित क्यों है?
- दक्षिण चीन सागर में बढ़ता तनाव
- रणनीतिक साझेदारियां: भारत, जापान और अमेरिका
- चीन की व्यापक रणनीति: ताइवान और दक्षिण चीन सागर को जोड़ना
- फिलीपीनी सेना की तैयारियां और मानवीय पहलू
- क्षेत्रीय और वैश्विक दांव
- फिलीपींस कूटनीतिक संतुलन कैसे साध रहा है?
- संक्षेप में
राष्ट्रपति मार्कोस की टिप्पणी स्पष्ट थी: “अगर पूरी तरह युद्ध छिड़ता है, तो हम इसमें खिंचे चले आएंगे। ताइवान में बहुत, बहुत से फिलीपीनी नागरिक हैं और यह तुरंत एक मानवीय समस्या बन जाएगी।” ताइवान में 150,000 से अधिक फिलीपीनी रह रहे और काम कर रहे हैं, इसलिए मानवीय दांव बहुत ऊंचे हैं। लेकिन इसके रणनीतिक निहितार्थ और भी बड़े हैं। फिलीपींस के सबसे उत्तरी द्वीप ताइवान से 100 मील से भी कम दूरी पर हैं, जिससे ताइवान जलडमरूमध्य के किसी भी संघर्ष में मनीला का तटस्थ दर्शक बने रहना असंभव हो जाता है।
कूटनीतिक विवाद क्यों भड़का?
फर्स्टपोस्ट की प्रबंध संपादक पाल्की शर्मा के साथ मार्कोस का साक्षात्कार इस विवाद की वजह बना। उन्होंने बताया कि ताइवान से फिलीपींस की निकटता और अमेरिका के साथ उसका गठबंधन युद्ध की स्थिति में तटस्थ रहना असंभव बना देंगे। उन्होंने फिलीपीनी नागरिकों की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ समन्वय के लिए आकस्मिक योजनाएं बनाने की जरूरत पर जोर दिया। मार्कोस ने यह भी कहा कि मनीला संघर्ष नहीं चाहता, बल्कि “जिन चुनौतियों का वह सामना कर रहा है” उन पर प्रतिक्रिया दे रहा है।
चीन की प्रतिक्रिया तत्काल और तीखी थी। बीजिंग के विदेश मंत्रालय ने कड़े शब्दों में बयान जारी कर मनीला को “आग से न खेलने” की चेतावनी दी और उससे एक-चीन सिद्धांत का पालन करने का आग्रह किया। बयान में कहा गया, “भौगोलिक निकटता और विदेशों में बड़ी आबादी दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का बहाना नहीं हैं।” चीन ने फिलीपींस पर “उकसाने वाली टिप्पणियां” करने, अंतरराष्ट्रीय कानून और दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ (आसियान) के चार्टर को कमजोर करने तथा क्षेत्रीय शांति को जोखिम में डालने का आरोप लगाया।
मनीला स्थित बीजिंग के दूतावास ने औपचारिक कूटनीतिक विरोध दर्ज कराया और चीनी अधिकारियों ने ताइवान तथा समुद्री सुरक्षा को लेकर मनीला के हालिया कदमों पर “गहरी नाराजगी” जताने के लिए फिलीपीनी राजदूत को तलब किया। चीन के विदेश मंत्रालय ने अपना पुराना रुख दोहराया: ताइवान चीनी क्षेत्र का अभिन्न हिस्सा है और किसी भी विदेशी दखल को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इस बीच, ताइवान ने मार्कोस की टिप्पणियों का स्वागत किया। उसने इन्हें द्वीप की असुरक्षा और हिंद-प्रशांत के परस्पर जुड़े सुरक्षा माहौल की मान्यता के रूप में देखा। ताइवानी अधिकारियों ने क्षेत्रीय स्थिरता के समर्थन और ताइवान में रह रहे फिलीपीनी प्रवासी कामगारों के सामने मौजूद मानवीय जोखिमों को स्वीकार करने के लिए फिलीपींस की सराहना की।
फिलीपींस ने एक-चीन नीति दोहराई
कूटनीतिक हंगामे के बीच फिलीपीनी सरकार ने तेजी से अपना रुख स्पष्ट किया। विदेश मामलों के विभाग (डीएफए) ने 1975 की फिलीपींस-चीन संयुक्त विज्ञप्ति में स्थापित एक-चीन नीति के प्रति मनीला की प्रतिबद्धता दोहराई। डीएफए ने जोर दिया कि चीन के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की नीति का पालन करते हुए भी फिलीपींस लगातार संवाद, क्षेत्रीय स्थिरता और मतभेदों के शांतिपूर्ण समाधान की पैरवी करता है।
डीएफए ने एक बयान में कहा:
फिलीपींस अपनी एक-चीन नीति और दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने के सिद्धांत का पालन करता है। साथ ही, हम विदेशों में अपने नागरिकों की सुरक्षा और कल्याण तथा अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए प्रतिबद्ध हैं।
राष्ट्रपति मार्कोस ने खुद दोहराया कि फिलीपींस युद्ध की तैयारी नहीं कर रहा, लेकिन अपनी विशिष्ट भौगोलिक और जनसांख्यिकीय परिस्थितियों के कारण उसे हर संभावित स्थिति की योजना बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा है। उन्होंने अमेरिका के साथ देश के “अटूट” गठबंधन और भारत तथा जापान समेत अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के साथ बढ़ती रक्षा साझेदारियों का भी उल्लेख किया।
फिलीपींस इतना असुरक्षित क्यों है?
ताइवान संघर्ष में फिलीपींस की असुरक्षा की जड़ उसकी भौगोलिक स्थिति और जनसांख्यिकी में है। देश का सबसे उत्तरी क्षेत्र, बतानेस द्वीपसमूह, ताइवान से 100 मील से भी कम दूरी पर है। दोनों को अलग करने वाला लूज़ोन जलडमरूमध्य वाणिज्यिक जहाजरानी और सैन्य अभियानों, दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण समुद्री संकरा मार्ग है। ताइवान जलडमरूमध्य के किसी भी संघर्ष का फिलीपीनी क्षेत्र, हवाई क्षेत्र और जलक्षेत्र तक फैलना लगभग तय है।
इसके अलावा, दुनिया की सबसे बड़ी विदेशी कामगार आबादियों में से एक फिलीपींस से है। ताइवान में 150,000 से अधिक फिलीपीनी रहते हैं। युद्ध की स्थिति में मनीला के सामने अपने नागरिकों को विवादित जलडमरूमध्य के पार निकालने की कठिन चुनौती होगी, जिसमें संभवतः चीनी सैन्य और समुद्री सीमाएं पार करनी पड़ सकती हैं। फिलीपीनी सैन्य योजनाकारों ने पहले ही ऐसी निकासी के लिए आकस्मिक योजनाएं तैयार की हैं और अब इन परिदृश्यों को अमेरिका-फिलीपींस के संयुक्त सैन्य अभ्यासों में शामिल किया जा रहा है।
फिलीपींस के सशस्त्र बलों के चीफ ऑफ स्टाफ जनरल रोमियो ब्राउनर ने हाल में उत्तरी लूज़ोन में सैनिकों से ताइवान पर संभावित हमले की स्थिति के लिए तैयार रहने को कहा। उन्होंने मनीला की भागीदारी को अपरिहार्य बताया और फिलीपीनी नागरिकों को बचाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने ऐसे किसी भी अभियान, खासकर ताइवान से विदेशों में रह रहे फिलीपीनी कामगारों को बचाने के अभियान का नेतृत्व उत्तरी लूज़ोन कमान को सौंपा।
दक्षिण चीन सागर में बढ़ता तनाव
ताइवान को लेकर कूटनीतिक तकरार ऐसे समय हो रही है जब दक्षिण चीन सागर में चीन और फिलीपींस के बीच तनाव बढ़ रहा है। दोनों देशों ने एक-दूसरे पर आक्रामक चालें चलने, संप्रभुता का उल्लंघन करने और समुद्र में खतरनाक मुठभेड़ों के आरोप लगाए हैं। जहाजों की टक्कर, पानी की तोपों से हमले और यहां तक कि भालों तथा चाकुओं से झड़प की घटनाएं चिंताजनक रूप से आम हो गई हैं।
दक्षिण चीन सागर पर चीन के व्यापक दावे फिलीपींस के विशेष आर्थिक क्षेत्र से टकराते हैं, खासकर सेकंड थॉमस शोल और स्कारबोरो शोल जैसे विवादित क्षेत्रों के आसपास। मनीला के साथ पारस्परिक रक्षा संधि से बंधे अमेरिका ने बार-बार अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है कि सशस्त्र हमले की स्थिति में वह फिलीपींस की रक्षा करेगा। इसमें तटरक्षक बल के कर्मियों और सरकारी जहाजों पर हमले भी शामिल हैं।
हाल के महीनों में फिलीपींस ने क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है और अमेरिका तथा अन्य सहयोगियों के साथ अधिक बार गश्त और संयुक्त अभ्यास किए हैं। फिलीपीनी तटरक्षक बल ने बाशी जलडमरूमध्य में ताइवान के समकक्ष बल के साथ सहयोग भी शुरू किया है, जिससे बीजिंग की नाराजगी और बढ़ गई है।
रणनीतिक साझेदारियां: भारत, जापान और अमेरिका
राष्ट्रपति मार्कोस की भारत यात्रा सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसका उद्देश्य नई सुरक्षा साझेदारियां बनाना भी था। यात्रा के दौरान मनीला और नई दिल्ली ने रक्षा संबंध मजबूत करने के समझौतों पर हस्ताक्षर किए, जिनमें उनकी थल सेनाओं, वायु सेनाओं और नौसेनाओं के बीच सहयोग शामिल है। भारतीय युद्धपोतों ने विवादित दक्षिण चीन सागर में फिलीपीनी नौसेना के साथ संयुक्त गश्त शुरू की है। इस कदम से चीन और नाराज हो सकता है।
भारत और फिलीपींस ने अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया है। इसमें समुद्री सहयोग, रक्षा उपकरणों में साझेदारी और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन पर ध्यान दिया गया है। दोनों देशों ने चीन-फिलीपींस समुद्री विवाद के एक प्रमुख तनाव-बिंदु स्कारबोरो शोल के पास पहली बार संयुक्त नौसैनिक अभ्यास किया। भारत की दक्षिण चीन सागर में खास दिलचस्पी है, क्योंकि उसका काफी व्यापार इस क्षेत्र से होकर गुजरता है।
जापान क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था के बदलते ढांचे का एक और अहम पक्ष है। ताइवान, फिलीपींस और जापान के बीच रणनीतिक त्रिकोण का महत्व बढ़ रहा है, क्योंकि तीनों देशों को ताइवान जलडमरूमध्य पर चीन के नियंत्रण से अलग-थलग पड़ने का खतरा है। ताइवान और लूज़ोन जलडमरूमध्य से गुजरने वाले समुद्री मार्गों पर जापान की निर्भरता उसे क्षेत्र के किसी भी संघर्ष के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है। टोक्यो ने अपने रक्षा खर्च को दोगुना करने का संकल्प लिया है और मनीला तथा वाशिंगटन, दोनों के साथ सुरक्षा संबंध गहरे कर रहा है।
अमेरिका फिलीपींस का प्रमुख सुरक्षा सहयोगी बना हुआ है। उन्नत रक्षा सहयोग समझौते (ईडीसीए) के तहत अमेरिकी बलों को फिलीपींस के नौ सैन्य ठिकानों तक पहुंच है, जिनमें ताइवान के पास लूज़ोन में स्थित कई ठिकाने शामिल हैं। अमेरिका ने उन्नत मिसाइल प्रणालियां तैनात की हैं और बतानेस द्वीपों में फिलीपीनी बलों के साथ संयुक्त युद्धाभ्यास किए हैं। इससे ताइवान से जुड़े खतरों पर गठबंधन का ध्यान रेखांकित होता है।
चीन की व्यापक रणनीति: ताइवान और दक्षिण चीन सागर को जोड़ना
दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस के साथ चीन के टकराव अब ताइवान के खिलाफ उसके व्यापक अभियान से तेजी से जुड़ रहे हैं। बीजिंग इस क्षेत्र को एक रणनीतिक सुरक्षा-घेरा मानता है और जिसे वह अपने “मुख्य हित” कहता है, उसमें किसी भी विदेशी दखल को रोकने के लिए दृढ़ है। चीनी अधिकारियों ने दक्षिण चीन सागर में अपनी कार्रवाइयों को अमेरिका के साथ फिलीपींस के सुरक्षा सहयोग को रोकने और रणनीतिक जलमार्गों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए जरूरी बताया है।
विमानवाहक पोतों और उन्नत मिसाइल प्रणालियों की तैनाती समेत चीन का सैन्य आधुनिकीकरण समुद्र पर नियंत्रण हासिल करने और अमेरिकी दखल को रोकने के उद्देश्य से है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (प्लान) ने लूज़ोन जलडमरूमध्य के पास विमानवाहक पोतों से अभियान चलाए हैं। वहीं, चीनी तटरक्षक जहाजों ने शोध और गश्त कर रहे फिलीपीनी जहाजों को परेशान किया है।
इसी दौरान चीन फिलीपींस और क्षेत्र के अन्य देशों पर दबाव बनाने के लिए कूटनीतिक, आर्थिक और सूचना संबंधी साधनों का इस्तेमाल कर रहा है। मनीला और ताइपे के बीच बढ़ती नजदीकी के हर संकेत पर बीजिंग ने विरोध जताया है। इनमें संयुक्त गश्त, सैन्य अभ्यास और यहां तक कि ताइवान के नेताओं को बधाई संदेश देना भी शामिल है। चीनी अधिकारियों ने फिलीपींस पर “एक-चीन सिद्धांत को तोड़-मरोड़कर पेश करने और खोखला करने” का आरोप लगाया है तथा किसी भी कथित हस्तक्षेप के गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी है।
फिलीपीनी सेना की तैयारियां और मानवीय पहलू
फिलीपीनी सेना इस खतरे को हल्के में नहीं ले रही। राष्ट्रपति मार्कोस के नेतृत्व में मनीला ने अपनी रक्षा नीति का रुख आंतरिक सुरक्षा से हटाकर बाहरी खतरों की ओर किया है, खासकर ताइवान जलडमरूमध्य और दक्षिण चीन सागर से पैदा होने वाले खतरों की ओर। अब व्यापक द्वीपसमूह रक्षा अवधारणा सैन्य योजना का मार्गदर्शन करती है। इसका ध्यान देश की समुद्री सीमाओं की रक्षा और ताइवान से जुड़ी संभावित परिस्थितियों के लिए तैयारी पर है।
बालिकातान 2025 जैसे हालिया सैन्य अभ्यासों में उत्तरी लूज़ोन और बतानेस द्वीपों में तटीय रक्षा, हवाई पट्टी संचालन और समुद्री क्षेत्र की निगरानी से जुड़े अभ्यास शामिल रहे हैं। ताइवान और लूज़ोन को अलग करने वाले द्वीपसमूह में सेंसर, मिसाइल प्रणालियों और विमानन संसाधनों की तैनाती को चीनी आक्रामकता रोकने वाला कदम और किसी भी संकट का जवाब देने की मनीला की तैयारी का संकेत माना जा रहा है।
लेकिन मानवीय पहलू भी बड़ा है। संघर्ष के बीच ताइवान से हजारों फिलीपीनी कामगारों को निकालने की संभावना एक बड़ी व्यवस्थागत चुनौती है। फिलीपीनी अधिकारियों ने बड़े पैमाने पर नागरिकों को स्वदेश लाने की आकस्मिक योजनाएं बनाई हैं और अब इन परिदृश्यों को अमेरिका-फिलीपींस की संयुक्त सैन्य योजना में शामिल किया गया है। विशेषज्ञों ने चेताया है कि नागरिकों को निकालने की कोई भी कोशिश अनजाने में चीनी सैन्य सीमाओं को पार कर सकती है और तनाव बढ़ने का खतरा पैदा कर सकती है।
क्षेत्रीय और वैश्विक दांव
ताइवान का भविष्य सिर्फ अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता का मामला नहीं है। फिलीपींस और जापान के लिए चीन द्वारा ताइवान पर कब्जा किए जाने के परिणाम बेहद गंभीर होंगे। इस द्वीप पर चीन का नियंत्रण क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को बुनियादी तौर पर बदल देगा। इससे दोनों देश अलग-थलग पड़ सकते हैं और अमेरिकी रुख चाहे जो भी हो, उन्हें चीनी प्रभुत्व स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
ताइवान और फिलीपींस को अलग करने वाला लूज़ोन जलडमरूमध्य वैश्विक जहाजरानी और सैन्य अभियानों के लिए एक महत्वपूर्ण संकरा मार्ग है। इस जलडमरूमध्य पर नियंत्रण से चीन प्रशांत क्षेत्र में अपनी शक्ति का विस्तार कर सकेगा और जापान, दक्षिण कोरिया तथा फिलीपींस के लिए जरूरी समुद्री मार्गों को खतरा पैदा होगा। मनीला के लिए इस जलडमरूमध्य तक पहुंच खोने से उसके व्यापारिक मार्ग और रणनीतिक स्वायत्तता प्रभावित होगी।
रणनीतिक गणनाओं से परे, यह मुद्दा मूल्यों से भी जुड़ा है। ताइवान का लोकतंत्र चीन के सत्तावादी मॉडल को चुनौती देता है। ताइवान का भविष्य तय करेगा कि फिलीपींस और जापान जैसे देश खुले क्षेत्रीय व्यवस्था में संप्रभु भूमिका निभाते रहेंगे या चीनी आधिपत्य के अधीन हो जाएंगे।
फिलीपींस कूटनीतिक संतुलन कैसे साध रहा है?
राष्ट्रपति मार्कोस की टिप्पणियों और उसके बाद पैदा हुए कूटनीतिक विवाद ने वैश्विक मंच पर मनीला की मौजूदगी को और बढ़ाया है। फिलीपींस अब गठबंधनों, प्रतिद्वंद्विताओं और सुरक्षा-दुविधाओं के जटिल जाल के केंद्र में है। एक-चीन नीति दोहराते हुए भी मनीला चुपचाप, लेकिन महत्वपूर्ण रूप से, अपनी रक्षा क्षमताएं बढ़ा रहा है और अमेरिका, भारत तथा जापान के साथ सुरक्षा साझेदारियां मजबूत कर रहा है।
फिलीपींस के रक्षा सचिव गिल्बर्टो टेओडोरो ने इस दुविधा को संक्षेप में बताया: “यह कहना कि ताइवान की सुरक्षा का हम पर असर नहीं पड़ेगा, स्पष्ट वास्तविकता से मुंह मोड़ना होगा।” फिलीपींस अपनी संप्रभुता की रक्षा करने, अपने नागरिकों की सुरक्षा करने और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है, भले ही उसे बीजिंग और वाशिंगटन की परस्पर विरोधी मांगों के बीच संतुलन साधना पड़े।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का तनाव-बिंदु बना हुआ है और फिलीपींस की बदलती रणनीतिक नीति एशियाई सुरक्षा की नई हकीकत दर्शाती है। देश के नेता जानते हैं कि अब तटस्थता कोई विकल्प नहीं है और उनके आज के फैसले आने वाले दशकों तक क्षेत्र का भविष्य तय करेंगे।
संक्षेप में
- राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस जूनियर की ताइवान संघर्ष में फिलीपींस की अपरिहार्य भागीदारी संबंधी टिप्पणी के बाद चीन ने कड़ी चेतावनी दी और अंतरराष्ट्रीय बहस छिड़ गई।
- चीन ने फिलीपींस पर “आग से खेलने” और अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया, जबकि ताइवान ने क्षेत्रीय सुरक्षा जोखिमों को मनीला द्वारा स्वीकार किए जाने का स्वागत किया।
- फिलीपींस ने अपनी एक-चीन नीति दोहराई, लेकिन अपने नागरिकों की सुरक्षा और हर संभावित स्थिति के लिए तैयारी की जरूरत पर जोर दिया।
- दक्षिण चीन सागर और लूज़ोन जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव ने फिलीपींस को हिंद-प्रशांत की सुरक्षा-दुविधा में अग्रिम मोर्चे का देश बना दिया है।
- मनीला अमेरिका, भारत और जापान के साथ सुरक्षा साझेदारियां मजबूत कर रहा है, संयुक्त अभ्यास कर रहा है और सैन्य क्षमताएं बढ़ा रहा है।
- फिलीपींस के साथ चीन के टकराव ताइवान में विदेशी दखल रोकने और रणनीतिक जलमार्गों पर नियंत्रण जताने की व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं।
- संकट के दौरान ताइवान से फिलीपीनी कामगारों को निकालने की मानवीय चुनौती मनीला के लिए बड़ी चिंता है।
- ताइवान का भविष्य फिलीपींस, जापान और पूरे क्षेत्र के लिए गंभीर रणनीतिक परिणाम लेकर आएगा और शक्ति संतुलन तथा एशिया में लोकतंत्र का भविष्य तय करेगा।






