चीन द्वारा उत्तर कोरियाई श्रमिकों को स्वीकार करना: क्या यह संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंधों का उल्लंघन है?
उत्तर कोरिया के हजारों श्रमिकों को अपने यहां काम देने के कारण चीन हाल ही में अंतरराष्ट्रीय जांच-पड़ताल के दायरे में आया है। यह कदम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के प्रतिबंधों का उल्लंघन करता दिखाई देता है। 2017 में लागू किए गए इन प्रतिबंधों का मकसद उत्तर कोरिया के विदेशी मुद्रा के एक अहम स्रोत को बंद करना था। अंतरराष्ट्रीय समुदाय का मानना है कि इस धन का इस्तेमाल प्योंगयांग के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों को वित्तपोषित करने के लिए किया जाता है। इन पाबंदियों के बावजूद, कई रिपोर्टों और जांचों से संकेत मिलता है कि चीन विभिन्न उद्योगों में उत्तर कोरियाई श्रमिकों को काम पर रखना जारी रखे हुए है। इससे जबरन श्रम, मानवाधिकारों के हनन और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की प्रभावशीलता को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं।
विषय-सूची
- चीन द्वारा उत्तर कोरियाई श्रमिकों को स्वीकार करना: क्या यह संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंधों का उल्लंघन है?
- पृष्ठभूमि: संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध और उनका उद्देश्य
- चीन उत्तर कोरियाई श्रमिकों को काम क्यों दे रहा है?
- केंद्र सरकार की भूमिका
- जबरन श्रम और मानवाधिकारों को लेकर चिंताएं
- मामले का अध्ययन: चीनी मछली पकड़ने वाले जहाजों पर उत्तर कोरियाई श्रमिक
- उत्तर कोरियाई श्रमिकों को विदेश कैसे भेजा जाता है?
- श्रमिकों के अनुभव और गवाहियां
- चीन की प्रतिक्रिया और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं
- वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर असर
- व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ
- अधिक पारदर्शिता और कड़ाई से नियम लागू करने की मांग
- संक्षेप में
चीन-उत्तर कोरिया संबंधों से परिचित सूत्रों के अनुसार, मार्च 2024 तक करीब 3,000 उत्तर कोरियाई श्रमिक जिलिन प्रांत के हुंचुन पहुंचे थे, जबकि मई में 500 और श्रमिक लियाओनिंग प्रांत के डांडोंग आए। इनमें से ज्यादातर युवा महिलाएं हैं, जिन्हें उत्तर कोरिया की सीमा से लगे चीन के पूर्वोत्तर प्रांतों में कपड़ा कारखानों और समुद्री खाद्य प्रसंस्करण संयंत्रों में काम सौंपा गया है। बताया जाता है कि अन्य क्षेत्रों में भी उत्तर कोरियाई श्रमिकों को काम देने के लिए बातचीत जारी है, जो श्रमिकों को आयात करने के एक व्यापक चलन की ओर इशारा करता है।
पृष्ठभूमि: संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध और उनका उद्देश्य
2017 में यूएनएससी ने प्रस्ताव 2397 पारित किया था। इसके तहत सदस्य देशों को उत्तर कोरियाई नागरिकों को काम के लिए अनुमति देने से रोका गया और दिसंबर 2019 तक सभी उत्तर कोरियाई श्रमिकों को वापस भेजना अनिवार्य किया गया। इन कदमों का उद्देश्य स्पष्ट है: विदेशों में उत्तर कोरियाई श्रमिकों की कमाई का बड़ा हिस्सा प्योंगयांग का शासन जब्त कर लेता है और इसका इस्तेमाल प्रतिबंधित हथियार कार्यक्रमों के वित्तपोषण में करता है। ये प्रतिबंध उत्तर कोरिया के लगातार जारी परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल परीक्षणों के सीधे जवाब में लगाए गए थे, जो पहले हुए अंतरराष्ट्रीय समझौतों और प्रस्तावों की अवहेलना थे।
इन स्पष्ट पाबंदियों के बावजूद, संयुक्त राष्ट्र और गैर-सरकारी संगठनों के अनुमानों के अनुसार चीन में एक लाख तक उत्तर कोरियाई श्रमिक रह रहे हैं। ये श्रमिक विनिर्माण, समुद्री खाद्य प्रसंस्करण और हालिया जांचों के मुताबिक, दूर-समुद्री मत्स्य उद्योग समेत कई क्षेत्रों में काम करते हैं।
चीन उत्तर कोरियाई श्रमिकों को काम क्यों दे रहा है?
उत्तर कोरियाई श्रमिकों को काम देने का चीन का फैसला आर्थिक और राजनीतिक कारणों के मेल से प्रेरित दिखाई देता है। चीनी अर्थव्यवस्था, खास तौर पर पूर्वोत्तर के “रस्ट बेल्ट” प्रांतों को हाल के वर्षों में आबादी में गिरावट, श्रमिकों की कमी और धीमी वृद्धि जैसी बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। कई युवा चीनी कारखानों या ग्रामीण इलाकों में काम करने के इच्छुक नहीं हैं। इससे सस्ते और भरोसेमंद श्रम की मांग पैदा हुई है, जिसे उत्तर कोरियाई श्रमिक पूरा कर सकते हैं।
विश्लेषकों का यह भी मानना है कि उत्तर कोरियाई श्रमिकों को काम देना प्योंगयांग के साथ द्विपक्षीय संबंध बेहतर बनाने की चीन की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। चीन और उत्तर कोरिया के संबंधों में तनाव और ठंडेपन के दौर आते रहे हैं। खास तौर पर कोविड-19 महामारी के दौरान सीमा बंद होने से श्रमिकों का आना-जाना रुक गया था। श्रमिकों को फिर से भेजने की शुरुआत यह संकेत दे सकती है कि बीजिंग अपने पड़ोसी के साथ रिश्ते दोबारा मजबूत करना चाहता है, विशेषकर ऐसे समय में जब उत्तर कोरिया रूस के साथ संबंध मजबूत कर रहा है और उत्तर कोरिया को लेकर अमेरिका का रुख बदल रहा है।
केंद्र सरकार की भूमिका
रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि उत्तर कोरियाई श्रमिकों को स्वीकार करने का फैसला केवल स्थानीय सरकारों ने नहीं लिया होगा। इसके बजाय, इसमें बीजिंग की केंद्र सरकार की भागीदारी और मंजूरी होने की संभावना है। फैसले का यह केंद्रीकरण चीन की विदेश नीति और घरेलू आर्थिक प्रबंधन के लिए इस मुद्दे की राजनीतिक संवेदनशीलता और रणनीतिक अहमियत को रेखांकित करता है।
जबरन श्रम और मानवाधिकारों को लेकर चिंताएं
प्रतिबंधों के उल्लंघन के सवाल से परे, चीन में उत्तर कोरियाई श्रमिकों से काम कराने पर मानवाधिकारों को लेकर गंभीर चिंताएं हैं। पर्यावरण न्याय फाउंडेशन (ईजेएफ), अंतरराष्ट्रीय मीडिया और मानवाधिकार संगठनों की जांचों में उत्तर कोरियाई श्रमिकों के साथ बड़े पैमाने पर होने वाले दुर्व्यवहार दर्ज किए गए हैं, खास तौर पर मछली पकड़ने और समुद्री खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों में।
विदेशों में काम करने वाले उत्तर कोरियाई श्रमिक आमतौर पर अपने देश की सुरक्षा एजेंसियों के लगातार निगरानी में रहते हैं। उनसे लंबे समय तक काम कराया जाता है—अक्सर दिन में 12 घंटे से भी ज्यादा—और उनकी कमाई का ज्यादातर हिस्सा उत्तर कोरियाई शासन जब्त कर लेता है। श्रमिकों को आने-जाने की बहुत कम या बिल्कुल भी आजादी नहीं होती, उन्हें खराब रहने की परिस्थितियों में रखा जाता है और अक्सर वे अपने परिवारों से संपर्क नहीं कर पाते। ये स्थितियां अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के जबरन श्रम संबंधी संकेतकों पर खरी उतरती हैं।
मामले का अध्ययन: चीनी मछली पकड़ने वाले जहाजों पर उत्तर कोरियाई श्रमिक
जबरन श्रम के सबसे चौंकाने वाले उदाहरणों में चीनी ध्वज वाले दूर-समुद्री मछली पकड़ने के जहाजों पर काम करने वाले उत्तर कोरियाई श्रमिक शामिल हैं। ईजेएफ की 2024 की जांच के अनुसार, हिंद महासागर में काम करने वाले कम से कम 12 चीनी टूना लॉन्गलाइनर जहाजों पर 2019 से 2024 के बीच उत्तर कोरियाई चालक दल के सदस्य काम कर रहे थे। इंडोनेशियाई और फिलिपीनो चालक दल के सदस्यों की गवाही से पता चला कि उत्तर कोरियाई श्रमिकों को एक दशक तक समुद्र में रखा गया, पकड़े जाने से बचाने के लिए उन्हें एक जहाज से दूसरे जहाज पर भेजा गया और जहाज छोड़ने या मोबाइल फोन इस्तेमाल करने जैसी बुनियादी आजादियों से वंचित रखा गया।
पर्यावरण न्याय फाउंडेशन के सीईओ और संस्थापक स्टीव ट्रेंट इन दुर्व्यवहारों की गंभीरता पर कहते हैं:
चीनी मछली पकड़ने वाले जहाजों पर उत्तर कोरियाई श्रमिकों का इस्तेमाल हमारे महासागरों के नियमन में विफलता का गंभीर प्रमाण है। चीन के दूर-समुद्री जहाजों पर लगभग हर मामले में अवैध मछली पकड़ने और मानवाधिकारों के हनन के उदाहरण मिल सकते हैं। हालांकि, इतने लंबे समय तक उत्तर कोरियाई श्रमिकों से जबरन काम कराना ईजेएफ की जांच में सामने आए गंभीर कदाचार का विशेष रूप से भयावह उदाहरण है।
ये तौर-तरीके न केवल अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों का उल्लंघन करते हैं, बल्कि वैश्विक समुद्री खाद्य आपूर्ति शृंखलाओं की विश्वसनीयता को भी कमजोर करते हैं। जबरन श्रम से जुड़े उत्पाद एशिया, यूरोप और अमेरिका के बाजारों तक पहुंच सकते हैं।
उत्तर कोरियाई श्रमिकों को विदेश कैसे भेजा जाता है?
विदेशी मुद्रा कमाने के लिए अपने नागरिकों को विदेशों में काम करने भेजने का उत्तर कोरियाई सरकार का लंबा इतिहास रहा है। आमतौर पर शासन श्रमिकों का चयन करता है और कड़ी निगरानी में उन्हें चीन और रूस जैसे देशों में भेजता है। उनकी आवाजाही पर सख्त नियंत्रण रहता है और उन्हें अपनी कमाई का अधिकांश हिस्सा सरकार को भेजना पड़ता है। निजी इस्तेमाल के लिए उनके पास केवल एक छोटा हिस्सा बचता है।
कोविड-19 महामारी के दौरान सीमाएं बंद होने के कारण उत्तर कोरियाई श्रमिकों को विदेश भेजना कुछ समय के लिए रोक दिया गया था। जो श्रमिक पहले से विदेश में थे, उनमें से कई वहीं फंस गए और घर नहीं लौट पाए। 2023 में यात्रा प्रतिबंधों में ढील के बाद चीन ने कुछ उत्तर कोरियाई श्रमिकों को वापस भेजना शुरू किया, लेकिन हालिया रिपोर्टें बताती हैं कि अब फिर से बड़ी संख्या में श्रमिक आ रहे हैं। यह महामारी के बाद पहली बार इतने बड़े पैमाने पर श्रमिकों को भेजे जाने का संकेत है।
श्रमिकों के अनुभव और गवाहियां
चालक दल के सदस्यों और श्रमिकों की गवाहियां उत्तर कोरियाई श्रमिकों की कठोर परिस्थितियों को सामने लाती हैं। इंडोनेशिया के चालक दल के एक सदस्य ने बताया:
चार साल का अनुबंध पूरा करने के बाद भी छह कोरियाई लोगों को घर जाने की अनुमति नहीं दी गई। उन्हें बस एक जहाज से दूसरे जहाज पर भेज दिया गया।
एक अन्य व्यक्ति ने लंबे समय तक समुद्र में अलग-थलग रहने के मानसिक असर का वर्णन किया:
जब भी हम उन्हें देखते, वे बहुत तनाव में दिखते थे। छह महीने भी समुद्र में बिताना मेरे लिए बहुत लंबा है। मैं सोच भी नहीं सकता कि कोई वहां सालों तक कैसे रह सकता है।
ये बयान इस व्यवस्था के शोषणकारी स्वरूप और विदेशों में काम करने वाले उत्तर कोरियाई श्रमिकों को फैसले लेने की आजादी न दिए जाने को उजागर करते हैं।
चीन की प्रतिक्रिया और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं
प्रतिबंधों के उल्लंघन और जबरन श्रम के आरोपों पर चीनी अधिकारियों ने आम तौर पर किसी भी गलत काम से इनकार किया है। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा:
चीन हमेशा से कानूनों और नियमों के अनुसार अपतटीय मछली पकड़ता आया है। उत्तर कोरिया के साथ चीन का संबंधित सहयोग अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में किया जाता है।
हालांकि, गैर-सरकारी संगठनों, पत्रकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सामने रखे गए सबूत इसके उलट संकेत देते हैं। उत्तर कोरियाई श्रमिकों की मौजूदगी छिपाने के लिए किए गए सुनियोजित प्रयास—जैसे बंदरगाहों पर पकड़े जाने से बचाने के लिए उन्हें एक जहाज से दूसरे जहाज पर भेजना—दिखाते हैं कि इन तौर-तरीकों की गैरकानूनी प्रकृति से परिचित होने के बावजूद उन्हें जारी रखा जा रहा है।
वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर असर
चीनी उद्योगों में उत्तर कोरियाई श्रमिकों से जबरन काम कराने का वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं पर दूरगामी असर पड़ता है। उत्तर कोरियाई श्रमिकों से बने समुद्री खाद्य, कपड़े और अन्य उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच सकते हैं। इससे अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान जैसे देशों के आयात प्रतिबंधों और नैतिक खरीद मानकों का उल्लंघन हो सकता है। इससे मौजूदा निगरानी और प्रवर्तन व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता पर सवाल उठते हैं। साथ ही, यह भी सवाल है कि कंपनियों और उपभोक्ताओं की यह सुनिश्चित करने की क्या जिम्मेदारी है कि उनकी खरीदी हुई चीजें जबरन श्रम से जुड़ी न हों।
व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ
उत्तर कोरियाई श्रमिकों को स्वीकार करने के चीन के फैसले को क्षेत्रीय भू-राजनीति के व्यापक संदर्भ में भी समझना होगा। चीन और उत्तर कोरिया के संबंध जटिल हैं और ऐतिहासिक रिश्तों, सुरक्षा चिंताओं तथा बदलते गठबंधनों से प्रभावित होते हैं। उत्तर कोरिया के रूस के करीब आने और प्योंगयांग को लेकर अमेरिका की नीति में बदलाव के बीच चीन उत्तर कोरियाई श्रमिकों को काम देना अपनी पूर्वोत्तर सीमा पर प्रभाव और स्थिरता बनाए रखने का एक तरीका मान सकता है।
इसके अलावा, 2023 में चीन और उत्तर कोरिया के राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ पर बड़े समारोह न होना कुछ विश्लेषकों ने ठंडे पड़ते रिश्तों के संकेत के रूप में देखा। श्रमिकों को भेजने की हालिया शुरुआत बदलते क्षेत्रीय हालात के बीच बीजिंग का रिश्ते सुधारने और मजबूत करने का प्रयास हो सकती है।
अधिक पारदर्शिता और कड़ाई से नियम लागू करने की मांग
मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय निगरानी संस्थाओं ने प्रतिबंधों को अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में ज्यादा पारदर्शिता लाने की मांग की है। ईजेएफ और अन्य समूह जहाजों की स्थिति की जानकारी अनिवार्य रूप से भेजने, एक जहाज से दूसरे जहाज पर माल स्थानांतरित करने की प्रथा को खत्म करने या उस पर कड़ी निगरानी रखने, और जबरन श्रम का पता लगाने तथा उसे रोकने के लिए बंदरगाहों पर नियंत्रण बेहतर करने जैसे उपायों की पैरवी करते हैं।
ईजेएफ के स्टीव ट्रेंट सामूहिक जिम्मेदारी की जरूरत पर जोर देते हैं:
इसके दूरगामी असर दुनिया भर में महसूस किए जा सकते हैं, क्योंकि इस अवैध श्रम से पकड़ी गई मछली दुनियाभर के समुद्री खाद्य बाजारों तक पहुंचती है। इसकी ज्यादातर जिम्मेदारी चीन की है, लेकिन जब आधुनिक गुलामी से दूषित उत्पाद हमारी अपनी थाली तक पहुंच सकते हैं, तो यह स्पष्ट है कि ध्वज देशों और नियामक संस्थाओं को भी सामूहिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
समन्वित अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई के बिना उत्तर कोरियाई श्रमिकों का शोषण जारी रहने की आशंका है, जिससे मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध व्यवस्थाओं की विश्वसनीयता, दोनों को नुकसान पहुंचेगा।
संक्षेप में
- चीन ने 2024 में हजारों उत्तर कोरियाई श्रमिकों को काम दिया है। इनमें से ज्यादातर कपड़ा कारखानों और समुद्री खाद्य प्रसंस्करण संयंत्रों में काम करते हैं। यह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रतिबंधों का स्पष्ट उल्लंघन दिखाई देता है।
- संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध विदेशों में उत्तर कोरियाई नागरिकों को काम पर रखने से रोकते हैं, ताकि शासन अपने हथियार कार्यक्रमों के लिए विदेशी मुद्रा न कमा सके।
- जांचों में चीन में उत्तर कोरियाई श्रमिकों के बड़े पैमाने पर जबरन श्रम और मानवाधिकारों के हनन का खुलासा हुआ है, खास तौर पर मछली पकड़ने के उद्योग में।
- उत्तर कोरियाई श्रमिकों को काम देने के पीछे चीन की आर्थिक जरूरतें और राजनीतिक विचार हैं, जिनमें प्योंगयांग के साथ संबंध मजबूत करने के प्रयास भी शामिल हैं।
- चीनी अधिकारी गलत काम से इनकार करते हैं, लेकिन सबूत बताते हैं कि उत्तर कोरियाई श्रमिकों के इस्तेमाल को छिपाने के सुनियोजित प्रयास किए जा रहे हैं।
- चीनी उद्योगों में उत्तर कोरियाई श्रमिकों से जबरन काम कराने का वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं और नैतिक खरीद पर बड़ा असर पड़ता है।
- मानवाधिकार संगठन जबरन श्रम से निपटने और कमजोर श्रमिकों की रक्षा के लिए प्रतिबंधों को सख्ती से लागू करने तथा अधिक पारदर्शिता की मांग करते हैं।






