चीन और भारत के उच्च-ग्रेड कोयले की ओर रुख करने से इंडोनेशिया का कोयला उद्योग संकट का सामना कर रहा है

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India, China shift to high-grade coal, decrease imports from world's ...

उच्च-ग्रेड कोयले की ओर वैश्विक रुझान के बीच इंडोनेशिया का कोयला निर्यात उछाल कमजोर पड़ा

लंबे समय से दुनिया का सबसे बड़ा तापीय कोयला निर्यातक रहा इंडोनेशिया अपनी किस्मत में बड़ा बदलाव देख रहा है। देश का कोयला उद्योग, जो उसकी अर्थव्यवस्था का एक स्तंभ है, बढ़ते दबाव में है, क्योंकि उसके दो सबसे बड़े ग्राहक—चीन और भारत—अन्य आपूर्तिकर्ताओं से अधिक ऊष्मीय मान (CV) वाले विकल्पों को तरजीह देते हुए इंडोनेशियाई कोयले का आयात घटा रहे हैं। यह रणनीतिक बदलाव वैश्विक कोयला व्यापार के प्रवाह को नया रूप दे रहा है और इंडोनेशियाई खनन कंपनियों को अपने कारोबारी मॉडल पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर कर रहा है। इसके देश की अर्थव्यवस्था और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दूरगामी असर हो सकते हैं।

विषय-सूची
  1. उच्च-ग्रेड कोयले की ओर वैश्विक रुझान के बीच इंडोनेशिया का कोयला निर्यात उछाल कमजोर पड़ा
  2. चीन और भारत इंडोनेशियाई कोयले से दूरी क्यों बना रहे हैं?
  3. वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं से प्रतिस्पर्धा
  4. चीन और भारत में घरेलू उत्पादन में उछाल
  5. इंडोनेशियाई कोयला निर्यात और अर्थव्यवस्था पर असर
  6. परिचालन और नियामकीय चुनौतियां
  7. वैश्विक कोयला बाजार में फायदे और नुकसान
  8. कीमतों के रुझान और बाजार की गतिशीलता
  9. इंडोनेशिया की रणनीतिक प्रतिक्रिया: घरेलू बाजार और प्रगलन उद्योग
  10. नियामकीय और नीतिगत बाधाएं
  11. दीर्घकालिक जोखिम और आगे की राह
  12. वैश्विक ऊर्जा बदलाव के व्यापक मायने
  13. संक्षेप में

चीन और भारत इंडोनेशियाई कोयले से दूरी क्यों बना रहे हैं?

इस समस्या की जड़ कोयले की गुणवत्ता में है। इंडोनेशियाई कोयला मुख्य रूप से मध्यम और कम ऊष्मीय मान वाला होता है, यानी ऑस्ट्रेलिया, मंगोलिया, दक्षिण अफ्रीका और रूस जैसे देशों के उच्च-ग्रेड कोयले की तुलना में प्रति टन इससे कम ऊर्जा पैदा होती है। वैश्विक कोयला कीमतें गिरने के साथ कम-ग्रेड और उच्च-ग्रेड कोयले के बीच कीमत का अंतर घट गया है। इससे अधिक ऊर्जा दक्षता और कम उत्सर्जन चाहने वाले खरीदारों के लिए उच्च-ग्रेड कोयला ज्यादा आकर्षक हो गया है।

भारतीय कोयला कारोबारी आई-एनर्जी नैचुरल रिसोर्सेज के निदेशक वासुदेव पमनानी इस आर्थिक तर्क को समझाते हैं:

उच्च CV वाला कोयला महंगा है, लेकिन मौजूदा कीमतों पर खर्च किए गए हर डॉलर के बदले ज्यादा ऊर्जा देता है। उच्च CV वाले 10 लाख टन कोयले से इंडोनेशिया के 12 से 13 लाख टन या यहां तक कि 15 लाख टन कोयले की जगह ली जा सकती है।

इसका मतलब है कि चीन और भारत के बिजली संयंत्र और औद्योगिक उपयोगकर्ता उच्च-ग्रेड किस्में चुनकर कम कोयले से अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी कर सकते हैं, जिससे लागत और उत्सर्जन दोनों घटते हैं।

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वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं से प्रतिस्पर्धा

चीन और भारत सिर्फ इंडोनेशियाई कोयला कम नहीं खरीद रहे हैं, वे सक्रिय रूप से नए आपूर्तिकर्ताओं से भी खरीद कर रहे हैं। 2025 के पहले पांच महीनों में चीन को मंगोलिया का कोयला निर्यात 44.8% बढ़ा, जबकि भारत को दक्षिण अफ्रीका की आपूर्ति 26.1% बढ़ी। दोनों देशों ने कजाखस्तान, कोलंबिया, मोजाम्बिक और तंजानिया से भी आयात बढ़ाया है। रूस-यूक्रेन संघर्ष से पारंपरिक व्यापार मार्ग बाधित होने के बाद तंजानिया वैश्विक कोयला बाजार में एक नए खिलाड़ी के रूप में उभरा है।

चीन में समान ग्रेड के रियायती रूसी कोयले ने इंडोनेशियाई निर्यात पर दबाव और बढ़ा दिया है। केप्लर के विश्लेषक झियुआन ली का कहना है कि इंडोनेशिया का मध्यम और कम ऊष्मीय मान वाला कोयला इन सस्ते विकल्पों से मुकाबला करने में मुश्किल महसूस कर रहा है। इस बीच, चीन में ऑस्ट्रेलिया के उच्च-ग्रेड कोयले की बाजार हिस्सेदारी बढ़ी है और भारतीय कारोबारी ऊर्जा-सघन विकल्पों को शामिल कर अपने स्रोतों में विविधता ला रहे हैं।

चीन और भारत में घरेलू उत्पादन में उछाल

एक अन्य प्रमुख कारक चीन और भारत, दोनों में घरेलू कोयला उत्पादन में तेज वृद्धि है। चीन का उत्पादन रिकॉर्ड 4.9 अरब टन तक पहुंच गया, जबकि भारत ने 1 अरब टन का आंकड़ा पार कर लिया। स्थानीय आपूर्ति में यह उछाल ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने और आयात पर निर्भरता घटाने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। दोनों देश लागत प्रबंधन और उत्सर्जन नियंत्रण की कोशिश भी कर रहे हैं।

चाइना कोल ट्रांसपोर्टेशन एंड डिस्ट्रीब्यूशन एसोसिएशन के विश्लेषक ली शुएगांग नीतिगत बदलाव पर प्रकाश डालते हैं:

सरकार द्वारा उत्सर्जन पर सख्त नियंत्रण से कम ऊष्मा और खराब गुणवत्ता वाले कोयले की मांग में भारी कमी आएगी।

चीन में तापीय कोयले का बेंचमार्क मूल्य चार साल के निचले स्तर पर आ गया है। देश की बिजली कंपनियां अब घरेलू स्तर पर या नजदीकी आपूर्तिकर्ताओं से बेहतर गुणवत्ता वाला कोयला हासिल करने में तेजी से सक्षम हो रही हैं, जिससे इंडोनेशिया की बाजार हिस्सेदारी और घट रही है।

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इंडोनेशियाई कोयला निर्यात और अर्थव्यवस्था पर असर

आंकड़े गंभीर तस्वीर पेश करते हैं। 2025 के पहले पांच महीनों में चीन और भारत को इंडोनेशिया का तापीय कोयला निर्यात क्रमशः 12.3% और 14.3% गिरा—इन देशों के कोयला आयात में कुल गिरावट से भी ज्यादा। विश्लेषण फर्म केप्लर के आंकड़ों के अनुसार, इसी अवधि में इंडोनेशिया का कुल कोयला निर्यात 12% घटकर 187 मिलियन टन रह गया। यह तीन वर्षों का सबसे निचला स्तर है और संभावित दीर्घकालिक गिरावट का संकेत देता है।

चीन और भारत मिलकर इंडोनेशिया के कोयला निर्यात का करीब दो-तिहाई हिस्सा लेते हैं, इसलिए इसका असर गहरा है। कोयला क्षेत्र इंडोनेशिया की आर्थिक गतिविधियों में लगभग 3.6% का योगदान देता है और इसमें हजारों लोग काम करते हैं। लंबे समय तक जारी मंदी से न केवल कंपनियों के मुनाफे, बल्कि सरकारी राजस्व और क्षेत्रीय रोजगार को भी खतरा है।

परिचालन और नियामकीय चुनौतियां

निर्यात के अवसर घटने के बीच इंडोनेशियाई कोयला खनन कंपनियां अपनी रणनीति फिर से तय करने में जुटी हैं। कई कंपनियां बिक्री घरेलू बाजार की ओर मोड़ रही हैं, खासकर तेजी से बढ़ते खनिज प्रगलन उद्योग को, जहां भारी नियमन वाले बिजली उपयोगिता क्षेत्र की तुलना में बेहतर मुनाफा मिलता है। अब घरेलू कोयला आपूर्ति राष्ट्रीय कुल आपूर्ति का 48.6% है—एक दशक से भी अधिक समय में सबसे बड़ा हिस्सा।

हालांकि, घरेलू मांग सीमित बनी हुई है। राष्ट्रीय कोयला उत्पादन 2024 के 836 मिलियन टन से घटकर इस साल 800 मिलियन टन से नीचे आने का अनुमान है, जबकि घरेलू खपत पिछले साल के 233 मिलियन टन से बढ़कर सिर्फ 250 से 260 मिलियन टन तक पहुंचने की उम्मीद है। इससे बड़ा अधिशेष बचता है, जिसके चलते खनन उपकरणों का पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा और परिचालन दक्षता घट रही है।

इंडोनेशियन माइनिंग प्रोफेशनल्स एसोसिएशन (परहापी) में औद्योगिक संबंधों के प्रमुख अर्धी इशाक कोसेन ने चिंता जताई:

खनन उपकरणों का पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा; कुछ मशीनें खड़ी हैं, जबकि कुछ कम घंटों तक या बिल्कुल नहीं चल रही हैं।

खनन कंपनियां सरकार से उन नियमों को वापस लेने की मांग भी कर रही हैं जो वित्तीय दबाव बढ़ाते हैं, जैसे अनिवार्य बायोडीजल मिश्रण और निर्यात से होने वाली विदेशी मुद्रा आय का एक हिस्सा देश में रखने की शर्त। कुछ खरीदारों ने कहा है कि इंडोनेशिया का कोयला संदर्भ मूल्य (HBA) मौजूदा वैश्विक बाजार दरों से ऊंचा बना हुआ है, जो निर्यात में गिरावट का एक कारण है।

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वैश्विक कोयला बाजार में फायदे और नुकसान

चीन और भारत के रुख में बदलाव से वैश्विक कोयला बाजार में नए विजेता उभरे हैं। चीन और भारत में क्रमशः मंगोलिया और दक्षिण अफ्रीका की बाजार हिस्सेदारी रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई है। बेहतर बुनियादी ढांचे और लॉजिस्टिक्स से चीन के लिए मंगोलिया और रूस से रेलमार्ग के जरिए कोयला आयात अधिक किफायती हो गया है, जबकि भारतीय खरीदार दक्षिण अफ्रीकी कोयले को तेजी से तरजीह दे रहे हैं।

ऑस्ट्रेलिया, कजाखस्तान, कोलंबिया, मोजाम्बिक और तंजानिया ने भी वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं के रूप में अपनी स्थिति मजबूत की है। आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाना आंशिक रूप से भू-राजनीतिक तनावों की प्रतिक्रिया है। रूस-यूक्रेन संघर्ष ने पारंपरिक व्यापार प्रवाह बाधित किया है और खरीदारों को नए साझेदार तलाशने के लिए प्रेरित किया है।

कीमतों के रुझान और बाजार की गतिशीलता

वैश्विक कोयला कीमतें 2023 के अंत से गिरावट की ओर हैं। ऑस्ट्रेलिया के न्यूकैसल बंदरगाह पर 6,300 kcal/kg FOB कोयले की औसत कीमत मई 2025 में 104.41 डॉलर प्रति टन रही, जो एक साल पहले की तुलना में 26.5% कम है। इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया के कोयला सूचकांक, जो चीनी खरीदारों की पसंद वाले ग्रेड दर्शाते हैं, दोनों में गिरावट आई है। ऑस्ट्रेलियाई बेंचमार्क तेजी से नीचे आया है। इससे एशियाई खरीदारों के लिए उच्च-ग्रेड कोयला अधिक सुलभ हुआ है और इंडोनेशिया से आपूर्ति हटने की रफ्तार तेज हुई है।

जहाजरानी और लॉजिस्टिक्स की भी भूमिका रही है। मंगोलिया और रूस से चीन तक बेहतर रेल संपर्क ने परिवहन लागत घटाई है, जबकि ड्राई बल्क जहाजरानी बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति से मालभाड़ा दरें कम बनी हुई हैं। इससे खरीदारों के लिए आपूर्तिकर्ताओं की व्यापक श्रेणी से कोयला मंगाना आसान हुआ है।

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इंडोनेशिया की रणनीतिक प्रतिक्रिया: घरेलू बाजार और प्रगलन उद्योग

निर्यात घटने के जवाब में इंडोनेशियाई खनन कंपनियां घरेलू बाजार, खासकर खनिज प्रगलन उद्योग, पर तेजी से ध्यान दे रही हैं। निकेल प्रगलन संयंत्र खास तौर पर उम्मीद की किरण बने हैं, क्योंकि वे बिजली क्षेत्र या अंतरराष्ट्रीय खरीदारों से बेहतर कीमत देते हैं। सरकार की घरेलू बाजार बाध्यता (DMO) नीति के तहत कोयला उत्पादन का एक हिस्सा स्थानीय स्तर पर बेचना जरूरी है। इस साल DMO के 31.2% को प्रगलन संयंत्रों द्वारा खपाए जाने की उम्मीद है, जबकि बिजली उत्पादन 58% के साथ सबसे बड़ा उपभोक्ता बना हुआ है।

इंडोनेशियन कोल माइनिंग एसोसिएशन (APBI) की कार्यकारी निदेशक गीता मह्यारानी इस बदलाव को समझाती हैं:

उत्पादक मौजूदा अनुबंधों को पूरा करने को प्राथमिकता दे रहे हैं। वे खास तौर पर दक्षिण-पूर्व एशिया के उन देशों पर ध्यान दे रहे हैं जो अब भी मध्यम ऊष्मीय मान वाले कोयले पर निर्भर हैं। वहां कोयला आधारित बिजली संयंत्रों का इस्तेमाल अब भी अधिक है और [MCV] कोयले की मांग मजबूत बनी हुई है। इन देशों की निकटता से लॉजिस्टिक्स का फायदा भी मिलता है।

कठिन बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए खनन कंपनियों की प्राथमिकता अब लागत दक्षता हो गई है। हालांकि, स्थानीय मांग में वृद्धि सीमित है और जरूरत से ज्यादा उत्पादन का जोखिम बना हुआ है।

नियामकीय और नीतिगत बाधाएं

उद्योग जगत के नेता मंदी से निपटने में मदद के लिए नियामकीय राहत की मांग कर रहे हैं। परहापी के अर्धी का सुझाव है कि कोयला उत्पादकों को परिचालन दक्षता बेहतर करनी चाहिए और पूंजीगत खर्च घटाना चाहिए। वह सरकार से वित्तीय बोझ बढ़ाने वाली नीतियां वापस लेने का आग्रह भी करते हैं, जैसे B40 मिश्रित बायोडीजल का अनिवार्य इस्तेमाल और निर्यात से होने वाली विदेशी मुद्रा आय का एक हिस्सा देश में रखने की शर्त।

कुछ खरीदारों का कहना है कि निर्यात खेपों का आधार बनने वाला इंडोनेशिया का कोयला संदर्भ मूल्य (HBA) वैश्विक बाजार दरों के मुकाबले बहुत ऊंचा है और इससे निर्यात में गिरावट आई है। जून 2025 के दूसरे पखवाड़े के लिए HBA 98.61 डॉलर प्रति टन तय किया गया, जो महीने की शुरुआत से 2.33% कम था, लेकिन मार्च से अब तक 23% की गिरावट दर्शाता है।

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दीर्घकालिक जोखिम और आगे की राह

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि मौजूदा मंदी इंडोनेशिया के कोयला उद्योग में लंबी अवधि की गिरावट का संकेत हो सकती है। यह क्षेत्र कुछ ही खरीदारों पर बहुत अधिक निर्भर है। चीन और भारत के घरेलू उत्पादन बढ़ाने और उच्च-ग्रेड कोयले की ओर रुख करने के साथ इंडोनेशिया की निर्यात संभावनाएं सीमित रहने की आशंका है।

एनर्जी शिफ्ट इंस्टीट्यूट की हेजल इलांगो ने चेताया:

ये ऐसे संकेत हैं जिन्हें इंडोनेशियाई कोयला खनन कंपनियों को भी गंभीरता से लेना शुरू करना होगा।

इसके अलावा भी जोखिम हैं। इंडोनेशिया की ज्यादातर कोयला कंपनियों का नियंत्रण कुछ अंदरूनी लोगों के हाथ में केंद्रित है, जिससे लचीलापन और नवाचार सीमित होता है। घरेलू आपूर्ति के नियमों और ऊंची रॉयल्टी जैसे नियमन भी मुनाफे पर दबाव डालते हैं, जबकि वैश्विक वित्तपोषण तक पहुंच सीमित है। निजी क्षेत्र और निवेशक आम तौर पर दीर्घकालिक बदलाव की योजनाओं के बजाय अल्पकालिक लाभ पर ध्यान देते हैं और सरकारी नीतियां अक्सर असंगत रहती हैं।

इंडोनेशिया नीतिगत दुविधा का सामना कर रहा है: उसने उत्सर्जन घटाने और स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ने का वादा किया है, लेकिन साथ ही कोयला उत्पादन बढ़ाना और नए संयंत्रों को मंजूरी देना जारी रखा है। घरेलू सब्सिडी से कोयला सस्ता बना हुआ है, लेकिन अचानक लगाए गए निर्यात प्रतिबंधों ने वैश्विक बाजारों को बाधित किया है। इस बीच, राज्य की बिजली कंपनी 20 अरब डॉलर के बदलाव समझौते के तहत कोयला संयंत्रों को समय से पहले बंद करने की योजना बना रही है, जबकि प्रगलन उद्योग को सहारा देने के लिए नए संयंत्र बनाए जा रहे हैं।

वैश्विक ऊर्जा बदलाव के व्यापक मायने

चीन और भारत का इंडोनेशियाई कोयले से दूर होना स्वच्छ ऊर्जा और अधिक दक्षता की ओर बढ़ते व्यापक वैश्विक रुझान का हिस्सा है। पिछले साल चीन में ऊर्जा मांग में हुई वृद्धि के 75% से अधिक हिस्से की पूर्ति स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों से हुई। भारत भी नवीकरणीय ऊर्जा में भारी निवेश कर रहा है और आयातित कोयले पर निर्भरता घटाने की कोशिश में है।

इंडोनेशिया के सामने चुनौती अपनी अर्थव्यवस्था और ऊर्जा क्षेत्र में विविधता लाने की है, ताकि कम कार्बन वाले भविष्य की ओर बढ़ती दुनिया में वह पीछे न छूट जाए। मौजूदा संकट नीति निर्माताओं और उद्योग जगत के नेताओं के लिए स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव और टिकाऊ आर्थिक विकास की रफ्तार तेज करने की चेतावनी बन सकता है।

संक्षेप में

  • चीन और भारत के वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं से उच्च-ग्रेड और अधिक ऊर्जा-सघन कोयले की ओर रुख करने के साथ इंडोनेशिया का निर्यात तेजी से घटा है।
  • वैश्विक कोयला कीमतों में गिरावट से कम-ग्रेड और उच्च-ग्रेड कोयले के बीच लागत का अंतर घटा है, जिससे उच्च-ग्रेड कोयला खरीदारों के लिए अधिक आकर्षक हुआ है।
  • चीन और भारत घरेलू कोयला उत्पादन बढ़ा रहे हैं और आयात में विविधता ला रहे हैं, जिससे इंडोनेशियाई आपूर्ति पर निर्भरता और घट रही है।
  • इंडोनेशियाई खनन कंपनियां घरेलू बाजार, खासकर खनिज प्रगलन उद्योग, की ओर रुख कर रही हैं, लेकिन स्थानीय मांग सीमित है।
  • परिचालन अक्षमताएं, नियामकीय बोझ और परस्पर विरोधी नीतियां उद्योग की चुनौतियों को और बढ़ा रही हैं।
  • विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि मंदी लंबी अवधि की गिरावट का संकेत हो सकती है और इंडोनेशिया से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव तथा आर्थिक विविधीकरण तेज करने का आग्रह किया है।
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