इंडोनेशिया का मुफ्त भोजन कार्यक्रम: महत्वाकांक्षा, मितव्ययिता और विवाद
राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो की प्रमुख नीतियों में शामिल इंडोनेशिया का महत्वाकांक्षी मुफ्त भोजन कार्यक्रम दुनिया की सबसे महंगी सामाजिक पहलों में से एक बन गया है। इसका लक्ष्य स्कूली बच्चों, छोटे बच्चों और गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं समेत 8.3 करोड़ लोगों तक पौष्टिक भोजन पहुंचाना है। कुपोषण और बच्चों के अवरुद्ध विकास से निपटने के लिए बनाई गई इस योजना के विशाल पैमाने, वित्तपोषण की रणनीति और क्रियान्वयन की चुनौतियों ने तीखी बहस, सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों और इंडोनेशिया की अर्थव्यवस्था व समाज पर इसके दीर्घकालिक प्रभाव को लेकर चिंताएं पैदा की हैं।
विषय-सूची
- इंडोनेशिया का मुफ्त भोजन कार्यक्रम: महत्वाकांक्षा, मितव्ययिता और विवाद
- इंडोनेशिया का मुफ्त भोजन कार्यक्रम क्या है?
- बजट में कटौती और राजकोषीय समझौते: कार्यक्रम का खर्च कैसे उठाया जा रहा है?
- आर्थिक और सामाजिक प्रभाव: विकास, घाटा और जनता की प्रतिक्रिया
- क्रियान्वयन की चुनौतियां: लॉजिस्टिक्स, खाद्य सुरक्षा और निजी निवेश
- खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता को लेकर चिंताएं
- भ्रष्टाचार के जोखिम और शासन संबंधी चुनौतियां
- क्या मुफ्त भोजन कार्यक्रम सही समाधान है?
- व्यापक निहितार्थ: राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक जोखिम
- संक्षेप में
इंडोनेशिया का मुफ्त भोजन कार्यक्रम क्या है?
2025 की शुरुआत में शुरू किए गए मुफ्त पौष्टिक भोजन (मकान बर्गिजी ग्रातिस, या MBG) कार्यक्रम के तहत लाखों इंडोनेशियाई लोगों को सप्ताह में पांच बार भोजन देने की योजना है। इसका मुख्य लक्ष्य विद्यार्थी, पांच साल से कम उम्र के बच्चे और गर्भवती या स्तनपान कराने वाली माताएं हैं। यह पहल राष्ट्रपति प्रबोवो की उस परिकल्पना का हिस्सा है, जिसके तहत देश की मानव पूंजी को बेहतर बनाना, बच्चों में अवरुद्ध विकास की दर घटाना और 2045 तक विकसित देश बनने के इंडोनेशिया के लक्ष्य को समर्थन देना शामिल है।
अवरुद्ध विकास—दीर्घकालिक कुपोषण के कारण होने वाली ऐसी स्थिति, जो शारीरिक और संज्ञानात्मक विकास को प्रभावित करती है—इंडोनेशिया में पांच साल से कम उम्र के लगभग हर पांचवें बच्चे को प्रभावित करता है। सरकार को उम्मीद है कि मुफ्त पौष्टिक भोजन देकर बच्चों की लंबाई बढ़ाने, उनकी सीखने की क्षमता सुधारने और अंततः देश की आर्थिक प्रगति में योगदान देने में मदद मिलेगी।
बजट में कटौती और राजकोषीय समझौते: कार्यक्रम का खर्च कैसे उठाया जा रहा है?
शुरुआत में अनुमान था कि इस कार्यक्रम पर सालाना 450 ट्रिलियन रुपिया (करीब 28 अरब अमेरिकी डॉलर) तक खर्च होगा, जिससे यह अमेरिका के बाद दुनिया की दूसरी सबसे महंगी मुफ्त भोजन योजना बन जाती। हालांकि, 2025 के मध्य में सरकार ने 2026 के नियोजित खर्च में 22% कटौती की घोषणा की। सामग्री की लागत के अनुमानों में संशोधन और योजना के विस्तार की गति फिर से तय करने के बाद बजट घटाकर 350 ट्रिलियन रुपिया (21.4 अरब अमेरिकी डॉलर) कर दिया गया। इस साल का खर्च करीब 7.5 अरब अमेरिकी डॉलर रहने की उम्मीद है, जो पहले की योजनाओं से 29% कम है।
कार्यक्रम के लिए धन जुटाने के वास्ते राष्ट्रपति प्रबोवो ने सरकारी मंत्रालयों और क्षेत्रीय आवंटनों में व्यापक बजट कटौती का आदेश दिया, जिसकी कुल राशि 306.7 ट्रिलियन रुपिया (करीब 19.5 अरब अमेरिकी डॉलर) है। मितव्ययिता के इन उपायों का असर लोक निर्माण, स्वास्थ्य, शिक्षा और अनुसंधान समेत कई क्षेत्रों पर पड़ा है। उदाहरण के लिए, लोक निर्माण मंत्रालय के बजट में 80% कटौती हुई, जबकि स्वास्थ्य मंत्रालय की निधि 18.56% घट गई। उच्च शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने भोजन कार्यक्रम को समर्थन देने के लिए अनुसंधान निधि का रुख बदल दिया, वहीं राष्ट्रीय पुस्तकालय ने अपने संचालन के घंटे कम कर दिए।
वित्त मंत्री श्री मुल्यानी इंद्रावती ने कहा कि इन कटौतियों का उद्देश्य मुफ्त भोजन पहल जैसे सीधे तौर पर जनता को लाभ पहुंचाने वाले कार्यक्रमों को प्राथमिकता देना था। हालांकि, धन के पुनर्विनियोजन से आवश्यक सेवाओं, सरकारी कामकाज और इंडोनेशिया की राजकोषीय स्थिति पर पड़ने वाले असर को लेकर व्यापक चिंताएं पैदा हुई हैं।
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव: विकास, घाटा और जनता की प्रतिक्रिया
कार्यक्रम के समर्थकों का कहना है कि स्थानीय खाद्य उत्पादों की मांग बढ़ाकर, रोजगार पैदा करके और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य व उत्पादकता में सुधार करके यह आर्थिक वृद्धि को गति देगा। राष्ट्रपति के एक सलाहकार के मुताबिक, मुफ्त भोजन के लिए अतिरिक्त बजट इस साल इंडोनेशिया की GDP वृद्धि में लगभग दो प्रतिशत अंक जोड़ सकता है और देश को 5.2% वृद्धि के लक्ष्य तक पहुंचने में मदद कर सकता है।
हालांकि, वित्तीय बाजारों और विश्लेषकों ने कार्यक्रम की लागत और राजकोषीय अनुशासन के लिए इंडोनेशिया की प्रतिष्ठा पर इसके असर को लेकर चिंता जताई है। नोमुरा होल्डिंग्स ने इस साल राजकोषीय घाटा GDP का 2.9% रहने का अनुमान लगाया है, जो 3% की कानूनी सीमा के करीब है। इसके लिए कमजोर आर्थिक वृद्धि, कम जिंस कीमतों और मुफ्त भोजन कार्यक्रम पर तेज खर्च को वजह बताया गया है। उम्मीद है कि सरकार साल के मध्य में बजट की समीक्षा के दौरान घाटे का संशोधित और अधिक विस्तृत अनुमान घोषित करेगी।
मितव्ययिता के इन उपायों के खिलाफ सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं, खासकर विद्यार्थियों और नागरिक समाज समूहों की ओर से। विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के नेतृत्व वाले “डार्क इंडोनेशिया” (इंडोनेशिया गेलाप) आंदोलन ने शिक्षा, छात्रवृत्तियों और सार्वजनिक सेवाओं में कटौती के विरोध में बड़े शहरों में प्रदर्शन किए हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि बच्चों को मुफ्त भोजन भले मिले, लेकिन व्यापक आबादी को नौकरियों के नुकसान, सामाजिक सहायता में कमी और धुंधले भविष्य का सामना करना पड़ रहा है। ये प्रदर्शन राष्ट्रपति प्रबोवो के प्रशासन के लिए पहली बड़ी राजनीतिक चुनौती बन गए हैं। कुछ प्रदर्शन हिंसक भी हुए और सरकार की प्राथमिकताओं पर देशव्यापी बहस छिड़ गई।
क्रियान्वयन की चुनौतियां: लॉजिस्टिक्स, खाद्य सुरक्षा और निजी निवेश
इंडोनेशिया जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में इस पैमाने का कार्यक्रम लागू करना बेहद कठिन साबित हुआ है। सरकार का लक्ष्य 2025 के अंत तक सभी 8.3 करोड़ लक्षित लाभार्थियों तक पहुंचना है, जो मौजूदा 50 लाख की संख्या से 16 गुना अधिक है। इसके लिए 17,000 से अधिक द्वीपों में रसोई सुविधाओं, खाद्य आपूर्ति शृंखलाओं और वितरण नेटवर्क का बड़े पैमाने पर विस्तार करना होगा।
सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है, स्थानीय स्तर पर पर्याप्त भोजन जुटाना। यह कार्यक्रम घरेलू उत्पादकों से मिलने वाले अंडों, चिकन, मछली, सब्जियों और फलों पर निर्भर है। हालांकि, दूध की मांग आपूर्ति से अधिक होने की आशंका है। इसलिए ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, ब्राजील, अमेरिका और यूरोप जैसे देशों से 15 लाख तक डेयरी गायों का आयात करने की योजना है, जिससे इंडोनेशिया का मौजूदा पशुधन लगभग तीन गुना हो सकता है। अधिकारियों ने माना है कि अभी तत्काल कोई कमी नहीं है, लेकिन स्थानीय उत्पादन बढ़ाने में समय लगेगा।
भोजन तैयार करने और बांटने के लिए जरूरी अनुमानित 32,000 रसोई बनाने और चलाने में निजी निवेश अहम है। लेकिन अभी 1,900 से भी कम रसोई काम कर रही हैं और निवेशक अब भी हिचकिचा रहे हैं। हर रसोई की लागत 183,000 अमेरिकी डॉलर तक हो सकती है और लागत वसूलने में दो साल लग सकते हैं। इंडोनेशिया विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के व्याख्याता आदित्य परदाना बताते हैं:
लोग निवेश के इस मॉडल को लेकर आश्वस्त नहीं हैं और फिलहाल इंतजार करके प्रगति देखना पसंद कर रहे हैं।
योजना को तेजी से लागू करने के लिए सरकार 30,000 विश्वविद्यालय स्नातकों को रसोई प्रबंधक के तौर पर तैनात करने की योजना बना रही है। फिर भी दूरदराज के इलाकों में भोजन पहुंचाने, उसे ताजा बनाए रखने और समय पर वितरण सुनिश्चित करने जैसी लॉजिस्टिक्स संबंधी चुनौतियां बनी हुई हैं।
खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता को लेकर चिंताएं
खाद्य सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरी है। कार्यक्रम से जुड़े भोजन के कारण विषाक्तता के कई चर्चित मामले सामने आए हैं। जकार्ता के दक्षिण में स्थित सियानजुर में भोजन से अप्रिय गंध आने के बाद करीब 80 विद्यार्थियों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। जांच में भोजन तैयार करने में लापरवाही की बात सामने आई और अधिकारियों ने सुरक्षा प्रोटोकॉल बेहतर करने का वादा किया है। कार्यक्रम शुरू होने के बाद से भोजन से विषाक्तता की कम से कम आठ घटनाएं सामने आई हैं, जिनसे विद्यार्थी और कर्मचारी दोनों प्रभावित हुए हैं।
कुछ विद्यार्थियों ने भोजन की गुणवत्ता को लेकर शिकायत की है और उसे बेस्वाद, बासी या खाने के लायक नहीं बताया है। खबरें आई हैं कि भोजन की तस्वीरें ऑनलाइन साझा करने से रोकने के लिए शिक्षकों ने विद्यार्थियों के फोन जब्त किए। भुगतान में देरी और नकदी प्रवाह की समस्याओं के कारण कुछ खानपान सेवा प्रदाताओं ने कार्यक्रम से हाथ खींच लिया है।
विशेषज्ञों और विश्लेषकों ने जल्दबाजी में किए गए क्रियान्वयन तथा स्वच्छता, पोषण और खाद्य सुरक्षा के विस्तृत मानकों की कमी की आलोचना की है। सेंटर फॉर इंडोनेशिया’स स्ट्रैटेजिक डेवलपमेंट इनिशिएटिव्स (CISDI) ने कहा कि राष्ट्रीय पोषण एजेंसी के पास स्थानीय सरकारों के साथ समन्वय करने के सीमित अधिकार हैं, जिससे प्रभावी निगरानी बाधित होती है। पोषण विशेषज्ञ तान शोट येन ने चेतावनी दी कि जमीनी स्तर पर पर्याप्त भागीदारी के बिना कार्यक्रम को बहुत तेजी से लागू करने से भोजन की बर्बादी और खराब नतीजों का जोखिम है।
भ्रष्टाचार के जोखिम और शासन संबंधी चुनौतियां
इंडोनेशिया में बड़े पैमाने की सामाजिक सहायता योजनाएं ऐतिहासिक रूप से भ्रष्टाचार की चपेट में आती रही हैं और मुफ्त भोजन पहल भी इसका अपवाद नहीं है। धन के गबन, विक्रेताओं को भुगतान में चूक और पारदर्शिता की कमी के आरोप पहले ही सामने आ चुके हैं। एक मामले में, दक्षिण जकार्ता के भोजन आपूर्तिकर्ता ने अधिकारियों पर स्कूल के दोपहर के भोजन पर खर्च किए गए करीब एक अरब रुपिया की भरपाई न करने का आरोप लगाया, जिसके बाद पुलिस जांच शुरू हुई। राष्ट्रीय भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने कार्यक्रम के विशाल बजट को देखते हुए धोखाधड़ी की “वास्तविक आशंका” जताई है।
राष्ट्रपति प्रबोवो ने इन समस्याओं से निपटने और सार्वजनिक धन की रक्षा करने का संकल्प लिया है, लेकिन संदेह बना हुआ है। इंडोनेशिया के लेखा परीक्षा बोर्ड के शोध विश्लेषक मुहम्मद रफी बाकरी कहते हैं:
बजट का आकार इतना बड़ा है कि यह कार्यक्रम भ्रष्ट अधिकारियों के लिए कमाई का खजाना है।
क्या मुफ्त भोजन कार्यक्रम सही समाधान है?
कार्यक्रम के लक्ष्यों—पोषण में सुधार, बच्चों में अवरुद्ध विकास घटाना और मानव पूंजी को समर्थन देना—को व्यापक समर्थन हासिल है। फिर भी आलोचकों का सवाल है कि क्या MBG सबसे प्रभावी या किफायती तरीका है। पोस्यांडू सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, परिवार कल्याण कार्ड (KKS) नकद हस्तांतरण योजना और पूरक आहार कार्यक्रम (PMT) जैसी पिछली सरकारी पहलों ने अलग-अलग स्तर पर सफलता के साथ कुपोषण को लक्षित किया है। कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि महंगी नई योजना शुरू करने के बजाय इन मौजूदा कार्यक्रमों का विस्तार करना अधिक विवेकपूर्ण होगा।
इसके अलावा, राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के मुताबिक, पिछले एक साल में इंडोनेशिया के केवल लगभग 1% परिवारों के पास एक दिन भोजन नहीं था और 8% से कम परिवारों ने आर्थिक तंगी के कारण पौष्टिक भोजन तक पहुंच न होने की बात कही। इससे संकेत मिलता है कि कुपोषण अब भी चिंता का विषय है, लेकिन व्यापक भुखमरी मुख्य समस्या नहीं है। केवल अधिक भोजन मुहैया कराने के बजाय आहार की गुणवत्ता सुधारना अधिक लक्षित समाधान हो सकता है।
कार्यक्रम के “सार्वभौमिक” दृष्टिकोण को लेकर भी चिंताएं हैं। हो सकता है कि यह स्थानीय पोषण जरूरतों को पूरा न करे या खाद्य उपलब्धता और खानपान की आदतों में क्षेत्रीय अंतर का ध्यान न रखे। उदाहरण के लिए, दूध देने की योजना लैक्टोज असहिष्णुता की ऊंची दर और घरेलू उत्पादन सीमित होने के कारण जटिल हो गई है। स्थानीय छोटे कारोबारों को सशक्त बनाने के बजाय केंद्रीकृत रसोई पर निर्भरता कार्यक्रम के अपेक्षित आर्थिक लाभ और स्थानीय जरूरतों के अनुसार ढलने की क्षमता को भी कमजोर कर सकती है।
व्यापक निहितार्थ: राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक जोखिम
मुफ्त भोजन कार्यक्रम इंडोनेशिया की विकास प्राथमिकताओं, राजकोषीय प्रबंधन और सामाजिक अनुबंध पर व्यापक बहस का केंद्र बन गया है। राष्ट्रपति प्रबोवो की लोकप्रियता अब भी करीब 80% अनुमोदन के साथ बनी हुई है, लेकिन विरोध प्रदर्शनों और जनता की नाराजगी से ऐसे विशाल कार्यक्रम के वित्तपोषण में शामिल समझौतों को लेकर बढ़ती बेचैनी जाहिर होती है।
विद्यार्थियों और नागरिक समाज समूहों को चिंता है कि शिक्षा, अनुसंधान और सार्वजनिक सेवाओं में कटौती से इंडोनेशिया की दीर्घकालिक संभावनाएं कमजोर होंगी, जबकि सरकार मुफ्त भोजन कार्यक्रम और जावा के तट से दूर 80 अरब डॉलर की समुद्री दीवार जैसी बड़ी परियोजनाएं आगे बढ़ा रही है। मितव्ययिता के उपायों से सरकारी सेवाएं घटी हैं, छात्रवृत्तियां रद्द हुई हैं और सरकारी कार्यालयों में एयर कंडीशनिंग व रोशनी के इस्तेमाल पर भी पाबंदियां लगी हैं।
विश्लेषकों ने चेताया है कि आर्थिक हालात बिगड़ने या जीवनयापन की लागत बढ़ने पर जनता का असंतोष बढ़ सकता है, जिससे सरकार की स्थिरता और सुधार एजेंडे के सामने चुनौती खड़ी होगी। इंडोनेशिया के पिछले छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलनों का अनुभव बताता है कि अगर विरोध प्रदर्शनों को समाज के व्यापक वर्गों का समर्थन मिले, तो उनका बड़ा राजनीतिक प्रभाव हो सकता है।
संक्षेप में
- इंडोनेशिया का मुफ्त भोजन कार्यक्रम दुनिया की सबसे बड़ी और महंगी सामाजिक पहलों में से एक है। इसका लक्ष्य 8.3 करोड़ लोगों तक भोजन पहुंचाना है।
- 2026 के लिए कार्यक्रम के बजट में 22% कटौती की गई है, लेकिन यह अब भी एक बड़ी राजकोषीय प्रतिबद्धता है, जिसके लिए सरकारी क्षेत्रों में व्यापक मितव्ययिता उपाय किए गए हैं।
- लॉजिस्टिक्स की चुनौतियों, खाद्य सुरक्षा की घटनाओं, भुगतान में देरी और निजी निवेश आकर्षित करने में मुश्किलों ने क्रियान्वयन को बाधित किया है।
- शिक्षा और अन्य सेवाओं पर असर डालने वाली बजट कटौतियों के विरोध में, खासकर विद्यार्थियों ने, प्रदर्शन किए हैं।
- विशेषज्ञों को संदेह है कि कुपोषण और बच्चों में अवरुद्ध विकास से निपटने का यह सबसे प्रभावी तरीका है। उनका सुझाव है कि मौजूदा पहलों का विस्तार अधिक विवेकपूर्ण हो सकता है।
- भ्रष्टाचार के जोखिम और शासन संबंधी चुनौतियां कार्यक्रम की प्रभावशीलता और जनता के भरोसे को कमजोर कर सकती हैं।
- कार्यक्रम की सफलता या विफलता का इंडोनेशिया की आर्थिक वृद्धि, सामाजिक स्थिरता और विकास की दिशा पर बड़ा असर पड़ेगा।






