ओकिनावा में सैन्य उपस्थिति के प्रति बदलते विचार: पीढ़ियों के बीच बदलाव

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परिचय: सैन्य उपस्थिति के साथ ओकिनावा का जटिल रिश्ता

जापान का सबसे दक्षिणी प्रांत ओकिनावा लंबे समय से सैन्य उपस्थिति, राष्ट्रीय सुरक्षा और युद्ध की विरासत पर बहसों के केंद्र में रहा है। दशकों से इस द्वीप पर अमेरिका के सैन्य अड्डों का असंगत रूप से बड़ा हिस्सा रहा है। इसकी जड़ें द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के घटनाक्रम और उसके बाद के अमेरिकी कब्जे में हैं। ऐतिहासिक रूप से, कई ओकिनावावासी, खासकर वे जिन्होंने ओकिनावा की लड़ाई की तबाही झेली, सैन्य उपस्थिति के प्रबल विरोधी रहे हैं। हालांकि, हाल के सर्वेक्षणों और सामाजिक रुझानों से पता चलता है कि युवा पीढ़ियों के विचारों में उल्लेखनीय बदलाव आया है। वे सैन्य उपस्थिति को तेजी से स्वीकार कर रहे हैं और यहां तक कि जापान के आत्मरक्षा बलों (एसडीएफ) को मजबूत करने का समर्थन भी कर रहे हैं। यह लेख इस बदलाव की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, पीढ़ियों के बीच मतभेदों और इसके पीछे काम कर रहे कारकों की पड़ताल करता है।

विषय-सूची
  1. परिचय: सैन्य उपस्थिति के साथ ओकिनावा का जटिल रिश्ता
  2. ओकिनावा की लड़ाई की विरासत
  3. युद्धोत्तर कब्जा और अमेरिकी सैन्य उपस्थिति
  4. पीढ़ियों के बीच मतभेद: विचारों में बदलाव
  5. सर्वेक्षण के आंकड़े: युवाओं में स्वीकार्यता
  6. विरोध से स्वीकार्यता तक
  7. बदलाव के पीछे के कारक
  8. आर्थिक वास्तविकताएं
  9. सुरक्षा चिंताएं और भू-राजनीति
  10. बदलता सामाजिकरण और शिक्षा
  11. जारी तनाव और अनसुलझे मुद्दे
  12. ओकिनावा की आवाजें: पीढ़ियों के पार नजरिए
  13. ऐतिहासिक स्मृति और निरंतरता की चुनौती
  14. सारांश

ओकिनावा की लड़ाई की विरासत

1945 में ओकिनावा की लड़ाई द्वितीय विश्व युद्ध के सबसे खूनी सैन्य अभियानों में से एक थी, जिसमें 200,000 से अधिक लोग मारे गए, जिनमें बड़ी संख्या में आम नागरिक शामिल थे। इस लड़ाई के सदमे ने स्थानीय आबादी पर गहरे घाव छोड़े। बचे लोगों और उनके वंशजों ने नुकसान, कठिनाइयों और युद्ध की भयावहता की कहानियां आगे पहुंचाई हैं। कई वर्षों तक, इन यादों ने द्वीप पर किसी भी तरह के सैन्यीकरण, चाहे वह विदेशी सेनाओं द्वारा हो या जापानी बलों द्वारा, का कड़ा विरोध बनाए रखा।

बचे लोगों के निजी अनुभव, जैसे कि स्थानीय स्कूलों में शांति सभाओं के दौरान साझा किए गए संस्मरण, ओकिनावावासियों की पीड़ा को लगातार उजागर करते हैं। उदाहरण के लिए, 91 वर्षीय तमाकी रिएको, जिन्होंने लड़ाई में अपना परिवार खो दिया था, याद करती हैं कि वह युद्धक्षेत्र में अकेली भटकती रहीं और उन अनुभवों का उनके मन पर स्थायी असर पड़ा। इस तरह की गवाहियां ओकिनावा में शांति शिक्षा का अहम हिस्सा रही हैं, जिसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि युद्ध के सबक भुलाए न जाएं।

युद्धोत्तर कब्जा और अमेरिकी सैन्य उपस्थिति

जापान की हार के बाद ओकिनावा 1972 तक अमेरिकी प्रशासन के अधीन रहा, जबकि जापान के बाकी हिस्सों ने 1952 में संप्रभुता फिर हासिल कर ली थी। इस अवधि में अमेरिका ने पूरे द्वीप पर अनेक सैन्य अड्डे बनाए, अक्सर जमीन जबरन अधिग्रहित करके। जापानी नियंत्रण में लौटने के बाद भी, जापान में मौजूद सभी अमेरिकी सैन्य सुविधाओं में से करीब 70% ओकिनावा में ही केंद्रित रहीं, जबकि देश के कुल भूभाग और आबादी में प्रांत की हिस्सेदारी केवल लगभग 1% है।

सैन्य उपस्थिति का यह भारी बोझ लगातार तनाव का कारण रहा है। अमेरिकी सैन्यकर्मियों से जुड़ी घटनाओं, जिनमें अपराध और दुर्घटनाएं शामिल हैं, ने समय-समय पर विरोध प्रदर्शनों और अड्डों को कम करने या हटाने की मांगों को जन्म दिया है। पुरानी पीढ़ियों ने, जिन्होंने युद्ध और उसके बाद के दौर को सीधे अनुभव किया, खास तौर पर खुलकर विरोध किया है।

पीढ़ियों के बीच मतभेद: विचारों में बदलाव

हाल के सर्वेक्षणों और अकादमिक शोध से ओकिनावा में सेना के प्रति विचारों को लेकर पीढ़ियों के बीच स्पष्ट अंतर सामने आया है। जहां उम्रदराज निवासी अमेरिकी उपस्थिति जारी रहने की आलोचना करते हैं और फिर से सैन्यीकरण को लेकर आशंकित हैं, वहीं युवा ओकिनावावासी यथास्थिति को तेजी से व्यावहारिक नजरिए से देख रहे हैं या उसका समर्थन कर रहे हैं।

सर्वेक्षण के आंकड़े: युवाओं में स्वीकार्यता

मीसेई विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हिरोयुकी कुमामोतो और उनके सहकर्मियों द्वारा किए गए 2022 के जनमत सर्वेक्षण में पाया गया कि 18 से 34 वर्ष के ओकिनावावासियों में करीब आधे एसडीएफ और अमेरिका-जापान सुरक्षा गठबंधन को मजबूत करने के पक्ष में थे। इस आयु वर्ग के 47% उत्तरदाताओं ने मजबूत एसडीएफ का समर्थन किया, जबकि केवल 21% ने इसका विरोध किया। इसके उलट, 65 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों में केवल 24% एसडीएफ को मजबूत करने के पक्ष में थे, जबकि 64% इसके विरोध में थे।

इसी तरह, जब ओकिनावा में अमेरिकी अड्डों के संकेंद्रण के बारे में पूछा गया, तो केवल 28% युवा उत्तरदाताओं ने इसे “अनुचित” माना, जबकि उम्रदराज उत्तरदाताओं में यह आंकड़ा 64% था। इसके अलावा, 34 वर्ष से कम आयु के 55% लोगों ने कहा कि अड्डों के विरोध में चलने वाले आंदोलन “बेमतलब” हैं। यह मौजूदा स्थिति के प्रति बेबसी या स्वीकार्यता का भाव दर्शाता है।

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इन निष्कर्षों की पुष्टि अन्य सर्वेक्षणों से भी होती है, जैसे 2021 का रयूक्यू शिम्पो सर्वेक्षण। उसमें दिखा कि जहां उम्रदराज ओकिनावावासियों में बहुमत अब भी अड्डों के मुद्दे को प्राथमिकता देता है, वहीं युवा पीढ़ियां आर्थिक चिंताओं को अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकता बताने की अधिक संभावना रखती हैं।

विरोध से स्वीकार्यता तक

विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव जरूरी नहीं कि सेना के प्रति उत्साह का संकेत हो, बल्कि वास्तविकता के साथ व्यावहारिक तालमेल बैठाने का नतीजा हो सकता है। कई युवा ओकिनावावासियों के लिए अड्डों की मौजूदगी बस जीवन का हिस्सा है। एक स्थानीय अधिकारी ने कहा, “युवा पीढ़ी के लिए अड्डे बस आसपास के नजारे का हिस्सा हैं। उन्हें लेकर कोई असहजता महसूस नहीं होती।”

प्रोफेसर कुमामोतो बताते हैं कि पीढ़ियों के बीच यह अंतर आंशिक रूप से युद्ध की प्रत्यक्ष यादों के धुंधला पड़ने की वजह से है। आबादी की उम्र बढ़ने के साथ, ऐसे लोगों की संख्या कम हो रही है जिनका ओकिनावा की लड़ाई के सदमे से निजी या पारिवारिक रिश्ता है। इसके बजाय, युवा अड्डों के मुद्दे को रोजगार के अवसरों, आर्थिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताओं के नजरिए से देखने की अधिक संभावना रखते हैं, खासकर पूर्वी एशिया में बढ़ते तनाव के बीच।

बदलाव के पीछे के कारक

आर्थिक वास्तविकताएं

ओकिनावा अब भी जापान के सबसे गरीब प्रांतों में से एक है। यहां औसत आय कम और बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है। कुछ लोगों के लिए अड्डे स्थिर रोजगार और आर्थिक लाभ देते हैं, सीधे नौकरियों के जरिए या उनसे जुड़े उद्योगों के माध्यम से। इस क्षेत्र में एसडीएफ की सुविधाओं के विस्तार से रोजगार के नए अवसर भी बने हैं, जिससे सैन्य सेवा युवाओं के लिए अधिक आकर्षक विकल्प बन गई है।

रक्षा मंत्रालय के अनुसार, ओकिनावा से एसडीएफ में भर्ती होने वालों का अनुपात बढ़ रहा है और 2023 में देशभर के सभी नए रंगरूटों में यह 2% से अधिक हो गया, जबकि ओकिनावा की आबादी में हिस्सेदारी कम है। यह रुझान सैन्य रोजगार के आर्थिक आकर्षण और स्थानीय समाज में एसडीएफ की मौजूदगी के सामान्य होते जाने, दोनों को दर्शाता है।

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सुरक्षा चिंताएं और भू-राजनीति

विचारों को प्रभावित करने वाला एक अन्य कारक पूर्वी एशिया का बदलता सुरक्षा माहौल है। चीन की सैन्य शक्ति में बढ़ोतरी और ताइवान तथा दक्षिण चीन सागर को लेकर बढ़ते तनाव ने जापान की राष्ट्रीय रक्षा के बारे में चिंताएं बढ़ाई हैं। जापानी सरकार ने ओकिनावा समेत दक्षिण-पश्चिमी द्वीपों में एसडीएफ की मौजूदगी मजबूत करके और अमेरिका के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाकर इसका जवाब दिया है।

युवा ओकिनावावासी ऐसे माहौल में बड़े हुए हैं जहां क्षेत्रीय सुरक्षा के खतरों पर मीडिया में अक्सर चर्चा होती है। उनके लिए मजबूत एसडीएफ और अमेरिकी उपस्थिति जारी रहना अक्सर शांति और स्थिरता के लिए जरूरी माना जाता है। ओकिनावा के एक युवा एसडीएफ अधिकारी ने कहा, “मैं लोगों की जान और संपत्ति की रक्षा करने का अपना कर्तव्य निभाना चाहता हूं।”

बदलता सामाजिकरण और शिक्षा

ओकिनावावासी युद्ध और अड्डों के मुद्दे के बारे में जिस तरह सीखते हैं, वह भी बदल गया है। स्कूल के पाठ्यक्रम में शांति शिक्षा अब भी शामिल है, लेकिन गहन चर्चा और पीढ़ियों के बीच संवाद के अवसर कम हुए हैं। कुछ शिक्षकों का कहना है कि शांति अध्ययन कोई औपचारिक विषय नहीं है, जिससे व्यापक कार्यक्रमों के लिए समय और संसाधन जुटाना मुश्किल होता है। नतीजतन, कई युवा युद्ध से बचे लोगों की कहानियों और नजरियों से सीधे तौर पर कम परिचित हो पाते हैं।

वहीं, स्कूल यात्राओं पर ओकिनावा के बाहर से आने वाले विद्यार्थी अक्सर द्वीप के इतिहास की बेहतर जानकारी लेकर पहुंचते हैं, क्योंकि वे पहले से इसका अध्ययन कर चुके होते हैं। यह फर्क स्थानीय ऐतिहासिक चेतना में संभावित कमी को उजागर करता है, क्योंकि युद्ध का प्रत्यक्ष अनुभव समय के साथ और दूर होता जा रहा है।

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जारी तनाव और अनसुलझे मुद्दे

पीढ़ियों के बीच बदलाव के बावजूद, अड्डों का मुद्दा विवादास्पद बना हुआ है। कई उम्रदराज ओकिनावावासी अड्डों को कम करने या हटाने के लिए अभियान चलाते रहते हैं। उनका कहना है कि प्रांत पर असंगत रूप से भारी बोझ डाला गया है और सैन्य उपस्थिति से जुड़ी सामाजिक समस्याएं हैं, जैसे अमेरिकी सैन्यकर्मियों से जुड़े अपराध और दुर्घटनाएं। अमेरिकी सैनिकों द्वारा यौन हिंसा और अन्य अपराधों की घटनाओं ने गुस्से और नाराजगी को बढ़ाया है, खासकर तब जब लोगों को लगता है कि अधिकारियों ने उन्हें दबाने की कोशिश की या उन पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं की।

ऐतिहासिक स्मृति के लुप्त होने और उदासीनता की जड़ें जमने की आशंका भी है। शांति शिक्षा से जुड़े एक व्यक्ति ने चेताया, “अगर लोग मुद्दों की स्पष्ट समझ के बिना बड़े होते हैं, तो वे ऐसे वयस्क बन सकते हैं जो बिना सवाल उठाए या बदलाव की कोशिश किए, चीजों को जैसा है वैसा ही स्वीकार कर लेते हैं।”

ओकिनावा की आवाजें: पीढ़ियों के पार नजरिए

ओकिनावा के निवासियों के विचारों की विविधता उनकी आवाजों में दिखती है। युद्ध में जीवित बचे बुजुर्गों में से कुछ अपने अनुभव आगे पहुंचाने और शांति की वकालत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। वहीं अन्य लोग, खासकर युवा, बेबसी का भाव जताते हैं या व्यावहारिक चिंताओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

2022 के सर्वेक्षण का नेतृत्व करने वाले मीसेई विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हिरोयुकी कुमामोतो कहते हैं: "चीन की सैन्य शक्ति के विस्तार को खतरे के रूप में देखने की धारणा व्यापक हो गई है, खासकर युवा पीढ़ी में, जो ओकिनावा में अड्डों के मौजूदा संकेंद्रण को स्वीकार करती है। पीढ़ीगत बदलाव आगे बढ़ने के साथ इस प्रवृत्ति के और मजबूत होने की संभावना है।"

इस बीच, ओकिनावा के कुछ युवा एसडीएफ सदस्य अपनी सेवा को समाज में योगदान देने और सेना तथा स्थानीय निवासियों के बीच दूरी कम करने का एक तरीका मानते हैं। एक अधिकारी ने बताया कि युद्ध में बचे उनके दादा-दादी ने शुरुआत में विरोध किया था, लेकिन अपने अनुभव और सेवा के पीछे की प्रेरणा साझा करने के बाद वह अंततः उनका समर्थन हासिल कर पाए।

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ऐतिहासिक स्मृति और निरंतरता की चुनौती

युद्ध में बचे लोगों की संख्या घटने के साथ, ओकिनावा के अतीत के सबक को संजोकर आगे पहुंचाने की चुनौती और गंभीर होती जा रही है। शांति कार्यकर्ता और शिक्षक पीढ़ियों के बीच संवाद और इतिहास के साथ आलोचनात्मक जुड़ाव के महत्व पर जोर देते हैं। वे चेताते हैं कि अज्ञानता उदासीनता को जन्म दे सकती है और उदासीनता अन्याय को जारी रख सकती है।

वहीं, समकालीन ओकिनावा की वास्तविकताएं—आर्थिक कठिनाइयां, सुरक्षा चिंताएं और सैन्य उपस्थिति का सामान्य हो जाना—युवा पीढ़ियों के नजरिए को आकार देती हैं। नतीजा यह है कि विचारों का एक जटिल और बदलता परिदृश्य उभरता है, जहां अतीत की विरासत वर्तमान की जरूरतों के साथ मौजूद है।

सारांश

  • द्वितीय विश्व युद्ध की विनाशकारी लड़ाई और उसके बाद अमेरिकी कब्जे के स्थल के रूप में ओकिनावा के इतिहास ने सैन्य उपस्थिति के प्रति कड़े विरोध को आकार दिया है, खासकर पुरानी पीढ़ियों में।
  • हाल के सर्वेक्षणों से पीढ़ियों के बीच उल्लेखनीय बदलाव का पता चलता है: युवा ओकिनावावासी अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को अधिक स्वीकार करते हैं और जापान के आत्मरक्षा बलों को मजबूत करने का समर्थन करते हैं।
  • आर्थिक कारक, सुरक्षा चिंताएं और शिक्षा में बदलाव इस प्रवृत्ति में योगदान देते हैं, क्योंकि युवा अड्डों के मुद्दे को अधिक व्यावहारिक नजरिए से देखते हैं।
  • इस रुझान के बावजूद, अड्डों का मुद्दा विवादास्पद बना हुआ है। सैन्य उपस्थिति से जुड़ी समस्याओं को लेकर विरोध प्रदर्शन जारी हैं और सामाजिक मुद्दे अनसुलझे हैं।
  • युद्ध में बचे लोगों की संख्या घटने के साथ ऐतिहासिक स्मृति को संजोने और अतीत के साथ आलोचनात्मक जुड़ाव को बढ़ावा देने की चुनौती और भी तात्कालिक हो गई है।
  • ओकिनावा का अनुभव दिखाता है कि सेना के प्रति जनमत को आकार देने में इतिहास, सुरक्षा और पीढ़ीगत बदलाव किस तरह एक-दूसरे से जटिल रूप से जुड़े हैं।
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