विषय-सूची
- मानसून की बाढ़: बार-बार आने वाला शहरी दुःस्वप्न
- भारत में शहरी बाढ़ की वजहें क्या हैं?
- बिना योजना के शहरीकरण और लुप्त होते जलमार्ग
- पुरानी और क्षमता से अधिक दबाव झेलती बुनियादी संरचना
- पर्यावरण की अनदेखी और नीतिगत विफलताएं
- जलवायु परिवर्तन: बाढ़ का प्रकोप बढ़ता हुआ
- अध्ययन के मामले: मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु और अन्य शहर
- मुंबई: तटीय चुनौतियां और मानवीय प्रभाव
- दिल्ली: बाढ़ के मैदान और शहरी अव्यवस्था
- बेंगलुरु: झीलों से कंक्रीट तक
- छोटे शहर और पूर्वोत्तर: संकट के नए मोर्चे
- तात्कालिक उपाय काफी क्यों नहीं हैं
- सारांश
मानसून की बाढ़: बार-बार आने वाला शहरी दुःस्वप्न
हर साल, जब मानसूनी बादल भारत के ऊपर छाने लगते हैं, शहर अव्यवस्था के लिए तैयार होने लगते हैं। 2024 में मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु और कई अन्य शहरी केंद्र मूसलाधार बारिश के कारण एक बार फिर ठप हो गए हैं। सड़कें नदियों में बदल जाती हैं, आवागमन के दौरान वाहन बीच रास्ते में बंद पड़ जाते हैं और कुछ ही घंटों में पूरे मोहल्ले जलमग्न हो जाते हैं। मुंबई के भूमिगत मेट्रो स्टेशन जैसी नई बनी बुनियादी संरचनाएं भी मूसलाधार बारिश का सामना नहीं कर पाई हैं। उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद प्लेटफॉर्मों पर गंदा पानी भरने की वायरल तस्वीरें इसकी गवाह हैं। कई लोगों के मन में सवाल है: भारत के शहरों में हर मानसून में इतनी नियमितता से बाढ़ क्यों आती है?भारत में शहरी बाढ़ की वजहें क्या हैं?
बिना योजना के शहरीकरण और लुप्त होते जलमार्ग
विशेषज्ञ तेजी से हो रहे, अक्सर बिना योजना वाले शहरी विस्तार को इसकी प्रमुख वजह बताते हैं। शहरों के फैलने के साथ प्राकृतिक जलनिकासी मार्गों, आर्द्रभूमियों और झीलों को पाटकर या उन पर अतिक्रमण करके, बारिश के अतिरिक्त पानी को सोखने वाले इन क्षेत्रों को खत्म किया जा रहा है। उदाहरण के लिए, बेंगलुरु कभी आपस में जुड़ी झीलों के लिए मशहूर था, लेकिन अब वहां कई जलाशयों की जगह अपार्टमेंट परिसर और कारोबारी केंद्र बन गए हैं। झील संरक्षण कार्यकर्ता राम प्रसाद बताते हैं, "जब आप झीलों को—जो परंपरागत रूप से बाढ़ से बचाव का काम करती हैं—निर्मित क्षेत्रों में बदल देते हैं, तो पानी के पास जाने की कोई जगह नहीं रहती।" भारत भर में यही स्थिति दिखती है: चेन्नई के लुप्त होते तालाबों से लेकर हैदराबाद की सिकुड़ती झीलों तक।पुरानी और क्षमता से अधिक दबाव झेलती बुनियादी संरचना
भारत के कई शहर दशकों पहले तैयार की गई जलनिकासी प्रणालियों पर निर्भर हैं। इन्हें आज की आबादी के घनत्व या अब होने वाली बारिश की मात्रा को संभालने के लिए कभी बनाया ही नहीं गया था। वास्तुकार और शहरी योजनाकार दीक्षु कुकरेजा कहते हैं, "शहरी विस्तार की रफ्तार सहायक बुनियादी संरचना के विकास से कहीं आगे निकल गई है, खासकर जल और जलनिकासी प्रणालियों के मामले में।" नतीजा यह होता है कि नालियां उफनने लगती हैं, सड़कें धंस जाती हैं और भारी बारिश के पहले संकेत पर ही यातायात ठप हो जाता है।विज्ञापन
पर्यावरण की अनदेखी और नीतिगत विफलताएं
पर्यावरण के कुप्रबंधन से संकट और गहरा जाता है। मुंबई में मैंग्रोव, जो प्राकृतिक बाढ़ अवरोधक का काम करते हैं, विकास परियोजनाओं के लिए काटे गए हैं। दिल्ली में बाढ़ के मैदानों पर निर्माण—ये वे क्षेत्र हैं जिन्हें नदी का अतिरिक्त पानी सोखने के लिए सुरक्षित रखा जाना चाहिए—शहरी बाढ़ का जोखिम बढ़ा रहा है। नीतिगत कदम अक्सर संकट के बाद उठाए जाते हैं और दीर्घकालिक तैयारी तथा योजना के बजाय पानी निकालने वाले पंप जैसे तात्कालिक उपायों पर ध्यान देते हैं।जलवायु परिवर्तन: बाढ़ का प्रकोप बढ़ता हुआ
भारत में सालाना बारिश का करीब 80% मानसून के दौरान, आम तौर पर जून से सितंबर के बीच होता है। मानसून कृषि और लाखों लोगों की आजीविका के लिए जरूरी है, लेकिन जलवायु परिवर्तन बारिश के तौर-तरीकों को अधिक अनियमित बना रहा है। बेमौसम मूसलाधार बारिश, अचानक आने वाली बाढ़ और भीषण गर्मी से जुड़ा सूखा अब अधिक आम हो रहे हैं। इस साल दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में मानसून एक सप्ताह पहले पहुंच गया, जिससे अधिकारी तैयारी नहीं कर पाए। स्काईमेट में मौसम विज्ञान के उपाध्यक्ष महेश पलावत के अनुसार, अरब सागर के ऊपर बने असामान्य अवदाब इसकी वजह थे, जिन्होंने तय समय से पहले मानसूनी हवाओं को उत्तर की ओर खींच लिया। पूर्वोत्तर में रिकॉर्ड बारिश से विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन हुए हैं। गुवाहाटी और सिलचर जैसे शहरों में एक सदी से भी अधिक समय की सबसे ज्यादा बारिश दर्ज की गई। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि समुद्र की सतह का बढ़ता तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों में बदलाव ऐसी चरम घटनाओं को और आम बना सकते हैं।विज्ञापन
अध्ययन के मामले: मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु और अन्य शहर
मुंबई: तटीय चुनौतियां और मानवीय प्रभाव
मुंबई की भौगोलिक स्थिति—समुद्र से घिरा निचला इलाका—उसे स्वाभाविक रूप से बाढ़ के प्रति संवेदनशील बनाती है। लेकिन मानवीय गतिविधियों ने स्थिति और बिगाड़ दी है। मीठी जैसी नदियों का सिकुड़ना, बिना रोक-टोक जमीन का भराव और मैंग्रोव का विनाश, इन सभी ने शहर की पानी निकालने की क्षमता घटाई है। जब भारी बारिश के साथ ऊंचा ज्वार आता है, तो शहर की जलनिकासी व्यवस्था पर तुरंत दबाव बढ़ जाता है।दिल्ली: बाढ़ के मैदान और शहरी अव्यवस्था
दिल्ली का मिंटो ब्रिज शहर की सालाना मानसूनी मुश्किलों का प्रतीक बन गया है, जहां पानी में वाहन अक्सर फंस जाते हैं। यमुना के बाढ़ के मैदानों पर निर्माण, जिसमें बुनियादी संरचना की बड़ी परियोजनाएं भी शामिल हैं, अतिरिक्त बारिश को सोखने की जमीन की क्षमता घटा चुका है। इस साल दिल्ली में 1901 के बाद सबसे अधिक बारिश वाला मई दर्ज किया गया। इससे बड़े पैमाने पर संपत्ति को नुकसान पहुंचा और कई लोगों की जान गई।बेंगलुरु: झीलों से कंक्रीट तक
बेंगलुरु कभी तीन प्रमुख घाटियों और झीलों के जाल के आधार पर बसाया गया था। अब अतिक्रमण और अवैध निर्माण के कारण शहर को बाढ़ का सामना करना पड़ रहा है। पहाड़ी पर बसा यह शहर बाढ़ग्रस्त होने के लिए बना ही नहीं था, फिर भी खराब शहरी योजना और भवन नियमों के उल्लंघन से यहां जलभराव होता है।विज्ञापन
छोटे शहर और पूर्वोत्तर: संकट के नए मोर्चे
बाढ़ केवल भारत के बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। असम और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में भारी बारिश और बांधों से अचानक छोड़े गए पानी के कारण लाखों लोग विस्थापित हुए हैं, फसलें नष्ट हुई हैं और दर्जनों लोगों की जान गई है। अपर्याप्त जलनिकासी, बांध संचालकों और स्थानीय अधिकारियों के बीच तालमेल की कमी तथा बाढ़ के मैदानों पर अतिक्रमण ने इस संकट को बढ़ाया है।तात्कालिक उपाय काफी क्यों नहीं हैं
अधिकारी अक्सर बाढ़ के जवाब में अल्पकालिक कदम उठाते हैं: पंप लगाना, नालियों की सफाई करना या बुनियादी संरचना की विफलता के बाद अधिकारियों को निलंबित करना। इन कदमों से कुछ समय के लिए राहत मिल सकती है, लेकिन वे समस्या की जड़ तक नहीं पहुंचते। शहरी योजनाकार एलन अब्राहम चेताते हैं, "अगर जलनिकासी की समस्याएं अनसुलझी रहती हैं, तो बाढ़ आना स्वाभाविक है।" विशेषज्ञों का कहना है कि रियल-टाइम सेंसर, पूर्वानुमान मॉडल और अधिक जोखिम वाले क्षेत्रों के नक्शे जैसी तकनीक मददगार हो सकती है, लेकिन इसके साथ जवाबदेह शासन और समुदाय की भागीदारी भी जरूरी है। दीर्घकालिक समाधानों के लिए दूरदर्शी शहरी योजना, भवन नियमों का सख्त पालन और प्राकृतिक जलाशयों तथा जलनिकासी मार्गों को बहाल करना आवश्यक है।विज्ञापन
सारांश
- भारतीय शहरों में मानसूनी बाढ़ के पीछे तेजी से हो रहा बिना योजना का शहरीकरण, पुरानी बुनियादी संरचना और पर्यावरण की अनदेखी प्रमुख वजहें हैं।
- जलवायु परिवर्तन बारिश के तौर-तरीकों को अधिक अनियमित बना रहा है, जिससे शहरी बाढ़ की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है।
- मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु और पूर्वोत्तर के उदाहरण बाढ़ के अलग-अलग, लेकिन आपस में जुड़े कारणों को उजागर करते हैं।
- पंप लगाना और नालियों की सफाई जैसे तात्कालिक उपाय केवल अस्थायी राहत देते हैं; दीर्घकालिक तैयारी के लिए बेहतर योजना, नियमों का पालन और प्राकृतिक जलनिकासी प्रणालियों की बहाली जरूरी है।
- विशेषज्ञ शहरों को मानसून के लिए सचमुच तैयार करने के वास्ते तकनीक, शासन और सामुदायिक कार्रवाई को जोड़ने वाली एकीकृत रणनीतियों की मांग करते हैं।






