सुप्रीम कोर्ट द्वारा हर छात्र की सुरक्षा पर जोर दिए जाने के बीच भारत ने यूजीसी के समानता नियमों की समीक्षा के लिए समिति गठित करने पर विचार किया

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India Considers Committee to Review UGC Equity Rules as Supreme Court Seeks Protection for Every Student

समीक्षा के प्रस्ताव के बीच 2012 के कैंपस नियम लागू

भारत सरकार ने 5 नवंबर, 2026 को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह विश्वविद्यालयों के समानता संबंधी नियमों की समीक्षा के लिए एक समिति गठित करने पर विचार कर रही है। ये नियम 29 जनवरी से स्थगित हैं। इस बीच 2012 का ढांचा लागू है और न्यायाधीश इस बात की जांच कर रहे हैं कि नए नियम जातिगत भेदभाव को कैसे परिभाषित करते हैं और उससे कैसे निपटते हैं।

विषय-सूची
  1. समीक्षा के प्रस्ताव के बीच 2012 के कैंपस नियम लागू
  2. सरकार ने अदालत से क्या कहा
  3. न्यायाधीशों ने सभी की सुरक्षा के लिए व्यवस्था बनाने को कहा
  4. दो परिभाषाएं विवाद का केंद्र क्यों बनीं
  5. अदालत की चिंताएं पात्रता से आगे तक फैली हैं
  6. दो माताओं की मांग से शुरू हुआ मामला
  7. 2019 की याचिका से नवंबर की सुनवाई तक
  8. रोक का कैंपसों के लिए क्या अर्थ है
  9. समीक्षा में किन बातों पर ध्यान देना होगा
  10. मुख्य बातें

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अबेदा सलीम तड़वी बनाम भारत संघ और इससे जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान यह बात कही। हर छात्र के हितों की रक्षा करने का आग्रह करने के बाद अदालत ने सुनवाई चार सप्ताह के लिए स्थगित कर दी।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी) विनियम, 2026 को 13 जनवरी को अधिसूचित किया गया था। इन नियमों को लाने के पीछे जातिगत भेदभाव से मजबूत सुरक्षा की मांग वाली कानूनी कार्रवाई थी, लेकिन जल्द ही इन्हें चुनौती देते हुए इनकी भाषा, विशिष्ट परिभाषा में शामिल समूहों और दुरुपयोग के जोखिम पर सवाल उठाए गए।

विवाद के केंद्र में विनियम 3(1)(c) है, जो अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के संदर्भ में जातिगत भेदभाव को परिभाषित करता है। एक अन्य प्रावधान भेदभाव को व्यापक रूप से परिभाषित करता है और किसी भी हितधारक के खिलाफ जाति के आधार पर अनुचित व्यवहार को शामिल करता है। ये दोनों परिभाषाएं एक-दूसरे के साथ कैसे लागू होती हैं, यह एक प्रमुख कानूनी मुद्दा है।

सरकार ने अदालत से क्या कहा

केंद्र की ओर से पेश मेहता ने कहा कि सरकार छात्रों की चिंताओं का समाधान करना चाहती है और यह सुनिश्चित करना चाहती है कि किसी भी वर्ग को असंतोष या आशंका महसूस न हो। उन्होंने प्रस्तावित समिति को इस पुनर्विचार का हिस्सा बताया।

सॉलिसिटर जनरल ने अदालत में सरकार का पक्ष रखा:

सरकार ने फैसला किया है कि हर छात्र का ध्यान रखा जाना चाहिए। किसी को कोई आशंका नहीं होनी चाहिए। किसी को असंतुष्ट महसूस नहीं होना चाहिए। हम युवा पीढ़ी के हितों पर भी विचार कर रहे हैं। सरकार एक समिति नियुक्त करने पर विचार कर रही है।

समिति के सदस्यों, नियुक्ति की तारीख या समीक्षा पूरी करने की समयसीमा की घोषणा नहीं की गई। सरकार ने अगस्त 2026 में ही अदालत को बताया था कि नियमों पर पुनर्विचार किया जा रहा है; नवंबर में दिए गए बयान में मुद्दों की जांच के लिए समिति गठित करने की संभावना सामने रखी गई।

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न्यायाधीशों ने सभी की सुरक्षा के लिए व्यवस्था बनाने को कहा

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने केंद्र से छात्रों और अगली पीढ़ी के कल्याण को ध्यान में रखते हुए नियमों पर फिर से विचार करने का आग्रह किया। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची भी सुनवाई में शामिल हुए।

मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि वह पुनर्विचार से क्या हासिल करना चाहते हैं:

आप इन नियमों पर फिर से विचार क्यों नहीं करते, ताकि अगली पीढ़ी का ध्यान रखा जा सके? उन्हें हर छात्र के हितों की रक्षा करनी चाहिए।

अदालत ने कहा कि उसने सरकार को अपने सुझाव बता दिए हैं और अब वह देखेगी कि क्या कदम उठाए जाते हैं। उसकी चिंता नियमों की शब्दावली और ऐसी व्यवस्था को लेकर थी जो व्यवहार में छात्रों के हितों की रक्षा कर सके।

विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के लिए तत्काल स्थिति में कोई बदलाव नहीं है: 2026 के नियमों पर रोक है और अगले आदेश तक 2012 के नियम लागू रहेंगे। रोक का अर्थ है कि अदालत द्वारा कानूनी चुनौती पर विचार किए जाने के दौरान किसी उपाय का लागू होना अस्थायी रूप से स्थगित रहेगा।

दो परिभाषाएं विवाद का केंद्र क्यों बनीं

विनियम 3(1)(c) जातिगत भेदभाव को अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के खिलाफ जाति या जनजाति के आधार पर होने वाले भेदभाव के रूप में परिभाषित करता है। इन समुदायों को आम तौर पर एससी, एसटी और ओबीसी कहा जाता है।

नियमों को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस शब्दावली के कारण सामान्य वर्ग के छात्र और शिक्षक उस विशिष्ट सुरक्षा के दायरे से बाहर रह जाते हैं। विरोधियों ने झूठी शिकायतों से निपटने के लिए स्पष्ट प्रावधान न होने पर भी सवाल उठाए हैं।

हालांकि, नियमों के खंड 3(e) में भेदभाव की एक व्यापक परिभाषा भी है। इसमें किसी भी हितधारक के खिलाफ जाति के आधार पर अनुचित या अलग व्यवहार शामिल है। इसलिए कानूनी सवाल यह है कि समावेशी सामान्य परिभाषा और खास समुदायों का नाम लेने वाली अलग परिभाषा के बीच क्या संबंध है।

जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने पूछा था कि क्या संकीर्ण परिभाषा नियमों के उद्देश्य को पूरा करती है, खासकर तब जब जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों को अन्य भेदभाव से अलग ढंग से निपटाने के लिए कोई विशिष्ट प्रक्रिया तय नहीं की गई है।

सीधे शब्दों में कहें तो न्यायाधीशों ने पूछा कि जब शिकायतें एक ही प्रक्रिया से निपटाई जानी हैं, तो अलग-अलग दायरे वाली दो परिभाषाओं की जरूरत क्यों है। वहीं, नियमों के समर्थकों का तर्क है कि वंचित समुदायों के छात्रों को उच्च शिक्षा में उनके सामने आने वाले जातिगत भेदभाव से मजबूत सुरक्षा की जरूरत है।

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अदालत की चिंताएं पात्रता से आगे तक फैली हैं

सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में जांच के दौरान इस सवाल से आगे बढ़कर कई मुद्दों पर विचार किया कि क्या सामान्य वर्ग के छात्र किसी खास प्रावधान का लाभ ले सकते हैं। उसने आरक्षित समुदायों के भीतर सबसे वंचित समूहों की सुरक्षा, छात्रों को अलग रखने की व्यवस्थाओं और रैगिंग से निपटने के तरीकों की भी जांच की।

न्यायाधीशों ने पूछा कि क्या नियम एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों के भीतर अत्यंत पिछड़ी जातियों के लिए पर्याप्त सुरक्षा देते हैं। उनका सवाल था कि नई शब्दावली मौजूदा संवैधानिक और कानूनी वर्गीकरणों के साथ कैसे लागू होगी, जिनमें इन व्यापक श्रेणियों के भीतर समूहों के बीच अंतर भी शामिल हैं।

छात्रावास, कक्षाएं और मेंटरशिप समूह भी चिंता का विषय थे। अदालत ने पूछा कि क्या पृथक्करण से जुड़ी शब्दावली, भले ही उसे भेदभाव से मुक्त बताए गए पारदर्शी मानदंडों से जोड़ा गया हो, ऐसी व्यवस्था बना सकती है जिसमें छात्रों को अलग रखा जाए, लेकिन उन्हें समान बताया जाए।

यह मुद्दा समानता और बंधुत्व से जुड़ा है: क्या छात्रों के साथ समान व्यवहार होता है और क्या वे कैंपस जीवन में साथ भाग ले सकते हैं। अदालत ने अपने सवालों को संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 तथा प्रस्तावना से जोड़ा।

भेदभाव के एक विशिष्ट रूप के तौर पर रैगिंग को शामिल न किए जाने पर भी सवाल उठे। रैगिंग से आशय दुर्व्यवहारपूर्ण परिचय कराने या उत्पीड़न से है, जो अक्सर नए छात्रों को निशाना बनाता है। अदालत ने पूछा कि क्या इसे बाहर रखने से पीड़ितों को सुरक्षा पाने में असमानता का सामना करना पड़ सकता है। इससे अनुच्छेद 14 और 21 के तहत चिंताएं पैदा होती हैं, जो कानून के समक्ष समानता और जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं।

इन सवालों से संभावित समीक्षा का व्यापक दायरा सामने आता है। किसी परिभाषा में शामिल समुदायों को बदलने से विवाद का एक हिस्सा सुलझेगा; अदालत ने यह भी पूछा है कि कैंपस में दुर्व्यवहार के विभिन्न रूपों के मामलों में सुरक्षा कैसे काम करती है।

दो माताओं की मांग से शुरू हुआ मामला

कानूनी कार्रवाई की शुरुआत 2019 में रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं की याचिका से हुई थी। उन्होंने उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव के खिलाफ मजबूत कदम उठाने की मांग की थी।

हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र वेमुला की 2016 में आत्महत्या से मृत्यु हो गई थी। मुंबई की मेडिकल छात्रा तड़वी की 2019 में आत्महत्या से मृत्यु हुई। दोनों की मौत के मामलों में जातिगत भेदभाव के आरोप सामने आए थे।

माताओं ने संस्थागत सुरक्षा उपायों को मजबूत करने और शिकायतों से निपटने के प्रभावी तंत्र बनाने की मांग की। उनकी याचिका ने सुप्रीम कोर्ट के सामने यह मुद्दा रखा कि सुरक्षा उपायों को लागू कैसे किया जाए, न कि केवल नियम मौजूद हैं या नहीं।

परामर्श के बाद यूजीसी ने 2026 के नियम अधिसूचित किए और 2012 में अपनाए गए ढांचे की जगह उन्हें लागू किया। बाद में नियमों को चुनौती देने वालों ने सुनवाई में एक और मांग रखी: नया ढांचा सभी श्रेणियों के छात्रों की निष्पक्ष रूप से रक्षा करे और उसकी भाषा पर्याप्त रूप से स्पष्ट हो।

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2019 की याचिका से नवंबर की सुनवाई तक

मामला मजबूत सुरक्षा उपायों की मांग, नए नियमों की शुरुआत और उनकी संवैधानिकता को चुनौती दिए जाने के चरणों से गुजरा है। प्रमुख तारीखें ये हैं:

  • 2019: रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं ने उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव के खिलाफ मजबूत कदम उठाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।
  • 13 जनवरी, 2026: यूजीसी ने 2012 के ढांचे की जगह अपने नए समानता नियम अधिसूचित किए।
  • 29 जनवरी, 2026: सुप्रीम कोर्ट ने नए नियमों पर रोक लगाई और निर्देश दिया कि 2012 के नियम जारी रहें।
  • 19 मार्च, 2026: जनवरी की सुनवाई में नए ढांचे को चुनौती देने वाली तीन याचिकाओं पर केंद्र और यूजीसी से जवाब देने के लिए यह तारीख तय की गई।
  • अगस्त 2026: केंद्र ने अदालत को बताया कि नियमों पर पुनर्विचार किया जा रहा है।
  • 5 नवंबर, 2026: केंद्र ने कहा कि वह समीक्षा समिति गठित करने पर विचार कर रहा है और अदालत ने मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए स्थगित कर दी।

13 जनवरी की अधिसूचना और 29 जनवरी की रोक के बीच सिर्फ 16 दिन का अंतर था। नवंबर की सुनवाई तक नए नियम नौ महीने से अधिक समय से निलंबित थे और इस पूरी अवधि में पुराने नियम लागू रहे।

जवाब दाखिल करने की मार्च की समयसीमा पहले की सुनवाई से जुड़ी थी। नवंबर की सुनवाई में घोषित अगला प्रक्रियात्मक कदम चार सप्ताह का स्थगन था।

रोक का कैंपसों के लिए क्या अर्थ है

सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए अगले आदेश तक 2012 के नियमों को लागू रखा। यह प्रावधान अदालत को किसी मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए जरूरी निर्देश जारी करने की अनुमति देता है।

इसलिए कानूनी और नीतिगत समीक्षा जारी रहने के दौरान छात्र और संस्थान पुराने समानता ढांचे के अधीन रहेंगे। नवंबर की सुनवाई में संशोधित नियमों की दिशा में एक संभावित रास्ता सामने आया, जबकि मौजूदा अंतरिम व्यवस्था कैंपसों पर लागू है।

अदालत ने पहले कहा था कि 2026 के नियमों के कुछ प्रावधान पहली नजर में अस्पष्ट लगते हैं और दुरुपयोग तथा व्यापक नतीजों को लेकर चिंता जताई थी। वह उनकी संवैधानिकता को चुनौती देने वाली तीन रिट याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। रिट याचिका में अदालत से तब हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया जाता है, जब आरोप हो कि कोई कानून, सार्वजनिक निर्णय या कार्रवाई न करना कानूनी अथवा संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।

छात्र समूहों और अन्य संगठनों ने नए नियम वापस लेने की मांग की है। समर्थक वंचित समुदायों के लिए मजबूत सुरक्षा उपायों पर जोर देते रहे हैं। सरकार ने कहा है कि पुनर्विचार में छात्रों की चिंताओं का समाधान किया जाना चाहिए और किसी भी समूह को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि उसे बाहर रखा गया है या उसकी सुरक्षा नहीं है।

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समीक्षा में किन बातों पर ध्यान देना होगा

सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी की सुनवाई के दौरान प्रतिष्ठित विधिवेत्ताओं की समिति से जांच कराने का सुझाव पहले ही दिया था। केंद्र के नवंबर के प्रस्ताव में संभावित समिति को जारी न्यायिक समीक्षा के साथ रखा गया है।

समिति के सामने अलग जातिगत भेदभाव परिभाषा का उद्देश्य, व्यापक भेदभाव खंड के साथ उसका संबंध, आरक्षित श्रेणियों के भीतर वंचित समूहों की सुरक्षा और पृथक्करण तथा रैगिंग से निपटने जैसे मुद्दे होंगे।

दुर्व्यवहार का सामना कर रहे छात्र के लिए नियमों का मसौदा तैयार करने से जुड़े इन सवालों के व्यावहारिक परिणाम हैं: शिकायत नियमों के दायरे में आती है या नहीं, संस्थान उससे कैसे निपटता है और क्या सुरक्षा उपलब्ध है। किसी आरोप का सामना कर रहे व्यक्ति के लिए भी शिकायत का आकलन कैसे होगा, यह स्पष्ट परिभाषाओं और प्रक्रियाओं पर निर्भर करता है।

सरकार अदालत के अगले समक्षीकरण में यह बता सकेगी कि उसके सुझावों के बाद उसने क्या कदम उठाए हैं। मुख्य काम यही है कि जातिगत भेदभाव के खिलाफ प्रभावी सुरक्षा को स्पष्ट दायरे और प्रभावित सभी लोगों के लिए निष्पक्ष प्रक्रियाओं के साथ जोड़ा जाए।

मुख्य बातें

  • केंद्र ने 5 नवंबर, 2026 को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह यूजीसी के समानता नियमों की समीक्षा के लिए समिति गठित करने पर विचार कर रहा है।
  • अदालत ने सुनवाई चार सप्ताह के लिए स्थगित की और हर छात्र के हितों की रक्षा करने का आग्रह किया।
  • 2026 के नियम 13 जनवरी को अधिसूचित किए गए और 29 जनवरी को उन पर रोक लगा दी गई।
  • अगले आदेश तक 2012 के नियम लागू रहेंगे।
  • विवाद का केंद्र विनियम 3(1)(c) का दायरा और भेदभाव की व्यापक परिभाषा के साथ उसका संबंध है।
  • अदालत ने अत्यंत पिछड़ी जातियों की सुरक्षा, पृथक्करण और रैगिंग को शामिल न किए जाने को लेकर भी चिंता जताई।
  • यह कानूनी कार्रवाई 2019 में रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं की याचिका से शुरू हुई थी, जिसमें कैंपस में मजबूत सुरक्षा उपायों की मांग की गई थी।
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