कारखानों के लिए टीमें दिन में 12 घंटे काम के वादे के साथ विज्ञापित
Global Rights Compliance (GRC) की जांच के अनुसार, एक रूसी भर्ती वेबसाइट ने कारखानों और कृषि कार्य के लिए 50 से 100 उत्तर कोरियाई कामगारों की टीमों का विज्ञापन दिया। इसमें महीने में 28 दिन, रोज़ 12 घंटे की शिफ्ट का वादा किया गया था। हेग स्थित इस संगठन ने मॉस्को के पास सैन्य राशन बनाने वाली फैक्टरी और पालतू जानवरों का भोजन बनाने वाली कंपनी समेत कई उत्पादन स्थलों पर कामगारों के होने के सबूत जुटाए।
विषय-सूची
- कारखानों के लिए टीमें दिन में 12 घंटे काम के वादे के साथ विज्ञापित
- जांचकर्ताओं ने भर्ती नेटवर्क का पता कैसे लगाया
- कामगार दलों से छात्र नियुक्तियों तक
- दस्तावेज, अलगाव और धमकियां
- पैसा किसे मिलता है?
- नागरिक उत्पादन और सैन्य आपूर्ति का जुड़ाव
- विवाद के पीछे संयुक्त राष्ट्र की पाबंदियां
- साझेदारी कैसे आगे बढ़ी
- इनकार और अनुत्तरित सवाल
- मुख्य बातें
जांच में ऐसे कारोबारी नेटवर्क का ब्यौरा है जो विदेशों में उत्तर कोरियाई नागरिकों के रोजगार पर संयुक्त राष्ट्र की पाबंदियों के बावजूद रूसी नियोक्ताओं, श्रम दलालों और उत्तर कोरियाई अधिकारियों को जोड़ता था। विज्ञापनों में कामगारों पर कड़ा नियंत्रण एक खासियत के रूप में पेश किया गया: उनके दस्तावेज उत्तर कोरियाई दूतावास के पास रखे जाते, उन्हें अन्य राष्ट्रीयताओं के लोगों से अलग रहना होता और संभावित नियोक्ताओं को भरोसा दिलाया जाता कि वे कामगार काम छोड़कर नहीं जाएंगे।
इन वादों के पीछे GRC ने जबरदस्ती, कामगारों और उनके परिवारों को धमकाने तथा उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा उत्तर कोरियाई सरकार को दिए जाने के आरोप दर्ज किए। संगठन ने यह भी पता लगाया कि श्रम को पेश करने का तरीका बदला गया: पहले कामगार दलों के रूप में, फिर छात्रों की नियुक्तियों के रूप में। उसके मुताबिक इससे रोजगार को शिक्षा की आड़ में छिपाने में मदद मिली।
ये निष्कर्ष रूस में रोजमर्रा के उत्पादन को एक व्यापक साझेदारी से जोड़ते हैं, जिसमें उत्तर कोरियाई हथियार और सैनिक, रूस का भुगतान और ईंधन, तथा दोनों सरकारों के बीच सहयोग शामिल हैं। कामगारों के लिए बुनियादी सवाल स्पष्ट है: उनके दस्तावेजों, काम के घंटों, वेतन और नौकरी छोड़ने की क्षमता पर किसका नियंत्रण है।
जांचकर्ताओं ने भर्ती नेटवर्क का पता कैसे लगाया
GRC ने रूसी कंपनियों और खरीद के रिकॉर्ड के साथ ऑनलाइन विज्ञापनों, तस्वीरों और वीडियो की जांच की। जांचकर्ताओं ने संभावित नियोक्ता बनकर यह भी पूछा कि उत्तर कोरियाई कामगारों की भर्ती और तैनाती कैसे की जा सकती है। उत्तर कोरियाई अधिकारियों की पहचान में मदद के लिए जांच में चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक का इस्तेमाल किया गया।
GRC के अनुसार, इस नेटवर्क का केंद्र मॉस्को के कारोबारी व्लादिमीर सोकोलोव, ब्लैक हॉर्स समूह और भर्ती मंच KNDR.su थे। जांचकर्ताओं ने मॉस्को के पास रामेन्स्कोये में पालतू जानवरों का भोजन बनाने वाली KPP Ruscon और सैन्य राशन बनाने वाली एक फैक्टरी में उत्तर कोरियाई लोगों के काम करने के संकेत पाए।
GRC ने एक रूसी कृषि कंपनी में 50 उत्तर कोरियाई लोगों की नियुक्ति की व्यवस्था के लिए 133,800 डॉलर के अनुबंध का भी पता लगाया। अनुबंध की रकम को कामगारों की संख्या से भाग देने पर प्रति नियुक्ति 2,676 डॉलर बैठते हैं। यह भुगतान उनकी तैनाती की व्यवस्था के लिए था, न कि वह रकम जो हर कामगार को मिलनी थी।
ये रिकॉर्ड जांच को भर्ती विज्ञापनों से आगे ले जाते हैं। वे ऑनलाइन प्रचार को कामगार खोज रहे कारोबारों और उन खास उत्पादन स्थलों से जोड़ते हैं जहां GRC को उनके रोजगार के सबूत मिले।
कामगार दलों से छात्र नियुक्तियों तक
KNDR.su ने जुलाई से अगस्त के बीच अपनी ब्रांडिंग बदली। उत्तर कोरियाई श्रम दलों या श्रम कोर का जिक्र करने वाली भाषा की जगह छात्र प्रशिक्षण या इंटर्नशिप का उल्लेख किया जाने लगा। GRC का कहना है कि उत्तर कोरियाई लोग छात्र वीजा पर रूस आए, जबकि उन्हें कारखानों में काम के लिए नियोक्ताओं को मुहैया कराया गया।
ग्राहक बनकर पूछताछ कर रहे जांचकर्ताओं से मंच के एक प्रतिनिधि ने कहा कि उत्तर कोरियाई लोग कारखाने की शिफ्ट में काम करते हुए दूरस्थ पढ़ाई करते थे। एक अन्य प्रतिनिधि ने कहा कि छात्र कर्मचारी नहीं थे, इसलिए उन पर श्रम कानून लागू नहीं होते।
छात्र वीजा किसी देश में शिक्षा हासिल करने के लिए प्रवेश की अनुमति है। GRC का आरोप है कि इस नेटवर्क में रोजगार को संगठित करने के लिए शैक्षणिक दर्जे को आड़ बनाया गया। संभावित ग्राहकों के सामने यह व्यवस्था दूरस्थ पढ़ाई, लंबी कारखाना शिफ्ट और भर्ती शुल्क के मेल के रूप में रखी गई।
भर्ती से जुड़े कारोबारों ने रोजगार पाबंदियों से बचने के लिए छात्र दर्जे का इस्तेमाल करने से इनकार किया और कहा कि वे रूसी कानून का पालन करते हैं। उनकी प्रतिक्रिया से इन नियुक्तियों की कानूनी स्थिति विवाद के केंद्र में आ गई है: GRC इसे छिपाया गया श्रम बताता है, जबकि कारोबारी इस आरोप को खारिज करते हैं।
दस्तावेज, अलगाव और धमकियां
भर्ती विज्ञापनों में कहा गया था कि उत्तर कोरियाई दूतावास पासपोर्ट जैसे दस्तावेज अपने नियंत्रण में रखता है और कामगारों को अन्य राष्ट्रीयताओं के लोगों से अलग आवास में रहना होता है या ऐसा करने की सिफारिश की जाती है। GRC ने रूस में संभावित कार्यस्थलों का निरीक्षण करते दूतावास अधिकारियों की भी पहचान की।
पासपोर्ट पर नियंत्रण अहम है, क्योंकि पहचान और यात्रा दस्तावेजों तक पहुंच न होने पर कामगार के लिए नौकरी बदलना या घर लौटना व्यावहारिक रूप से मुश्किल हो जाता है। अलग आवास में रहने से कामगारों का कार्यदल से बाहर के लोगों से संपर्क भी सीमित हो सकता है। GRC ने इन नियंत्रणों के साथ कामगारों और उनके परिवारों को सजा देने की धमकियों का भी जिक्र किया।
विज्ञापित कार्यक्रम के तहत 28 दिन तक रोज़ 12 घंटे काम करने का मतलब महीने में 336 काम के घंटे है। कुछ अन्य विज्ञापनों में हर महीने सिर्फ दो छुट्टियों का जिक्र था। GRC ने सप्ताह में छह या सात दिन, रोज़ 18 घंटे तक काम कराने का भी विवरण दिया। यह भर्ती विज्ञापन में बताए गए कार्यक्रम से कहीं अधिक व्यापक स्थितियों का ब्यौरा है।
GRC की कानूनी सलाहकार एलिस लॉरियट प्रीवो ने कामगारों के कथित उत्पीड़न को दोनों सरकारों की प्राथमिकताओं से जोड़ा। जांच के निष्कर्ष को उन्होंने इन शब्दों में बताया:
यह जांच दो देशों की सैन्य महत्वाकांक्षाओं के बीच एक खतरनाक मेल को उजागर करती है।
GRC की चिंता है कि श्रम की आपूर्ति और सरकारी राजस्व बढ़ाने के दबाव में कामगारों का अपनी जिंदगी पर बहुत कम नियंत्रण रह जाता है। जबरन श्रम का मतलब ऐसा काम है जो धमकी या दबाव के जरिए कराया जाए, न कि ऐसा काम जिसे कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से मना कर सके या छोड़ सके।
पैसा किसे मिलता है?
GRC के अनुसार, भर्ती दलाल हर उत्तर कोरियाई कामगार के लिए 100,000 से 150,000 रूबल तक लेते थे। बताया गया कि ऊपरी रकम करीब 1,860 डॉलर थी। यानी उत्पादन से मिलने वाली मजदूरी पर विचार करने से पहले ही नियोक्ताओं को कामगारों तक पहुंच पाने के लिए बड़ी रकम चुकानी पड़ती थी।
GRC ने कहा कि कामगार अपनी कमाई का 90% तक उत्तर कोरियाई अधिकारियों को सौंप देते थे। कोरिया रिस्क ग्रुप के श्रीयास रेड्डी ने इससे व्यापक अनुमान देते हुए कहा कि कामगारों को सीधे तौर पर सिर्फ 10% से 25% मिलता था और बाकी रकम उत्तर कोरियाई सरकारी कंपनियों तथा अधिकारियों के पास जाती थी।
अगर किसी कामगार की कमाई 100 डॉलर के बराबर हो, तो इन अनुमानों के मुताबिक GRC के आंकड़े में उसके पास करीब 10 डॉलर बचेंगे, जबकि रेड्डी के दायरे के हिसाब से 10 से 25 डॉलर। दोनों ही विवरणों में आय का बड़ा हिस्सा कामगार के नियंत्रण से बाहर रहता है।
11 देशों का समूह मल्टीलैटरल सैंक्शंस मॉनिटरिंग टीम (MSMT) प्रतिबंधों के उल्लंघन पर नजर रखता है। सितंबर की एक रिपोर्ट में उसने अनुमान लगाया कि 12 देशों में 35,600 से 101,280 उत्तर कोरियाई काम कर रहे थे। विदेशों में श्रम से सालाना आय 450 मिलियन से 800 मिलियन डॉलर आंकी गई। ये आंकड़े अंतरराष्ट्रीय कामगारों से जुड़े हैं, जबकि केवल रूस में 2024 के अंत तक काम करने वालों की संख्या 15,000 से 30,000 बताई गई।
नागरिक उत्पादन और सैन्य आपूर्ति का जुड़ाव
ब्लैक हॉर्स ने बताया कि उसकी गतिविधियों में रूस के रक्षा मंत्रालय के आदेश पर मशीनरी की आपूर्ति और उत्तर कोरिया को कृषि उत्पादों का निर्यात शामिल था। उसके कारोबार चीन और यूरोप से विनिर्माण उपकरण भी आयात करते थे। GRC ने रूस के सैन्य उद्योग से जुड़े कम से कम दो स्थलों की पहचान की।
सैन्य राशन बनाने वाली फैक्टरी सशस्त्र बलों की मदद के लिए होने वाले काम का सीधा उदाहरण है। राशन सैनिकों के लिए पैक किया गया भोजन होता है। पालतू जानवरों के भोजन का निर्माण और कृषि दिखाते हैं कि कथित भर्ती व्यवस्था नागरिक उत्पादन तक भी फैली हुई थी।
उत्तर कोरिया के साथ वाणिज्यिक और औद्योगिक सहयोग में भूमिका को लेकर अक्टूबर में यूरोपीय संघ ने सोकोलोव पर प्रतिबंध लगाए। GRC की जांच उसकी मशीनरी, कृषि और श्रम संबंधी कंपनियों को एक ही व्यापक कारोबारी नेटवर्क के हिस्से के रूप में रखती है।
GRC की कारोबार और मानवाधिकार प्रमुख लारा स्ट्रेंजवेज़ ने बताया कि संगठन रूस में काम को प्योंगयांग के लिए आय से कैसे जोड़ता है:
उत्तर कोरियाई श्रम यूक्रेन के खिलाफ युद्ध से जुड़े रूसी उद्योगों को सहारा दे रहा है, और उत्तर कोरियाई कामगारों की कमाई का इस्तेमाल उत्तर कोरिया के सैन्य कार्यक्रमों के वित्तपोषण के लिए किया जाता है।
उनका आकलन इसमें शामिल सरकारों को मिलने वाले दो फायदों की ओर इशारा करता है: रूस को उत्पादन के लिए कामगार मिलते हैं, जबकि उत्तर कोरिया को विदेशों में कमाई गई रकम से आय होती है। अनुमानों के मुताबिक, कामगार इस लेन-देन के बीच में रहते हुए भी अपने वेतन का केवल छोटा हिस्सा अपने पास रख पाते हैं।
विवाद के पीछे संयुक्त राष्ट्र की पाबंदियां
प्योंगयांग के छठे परमाणु परीक्षण के बाद 2017 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने उत्तर कोरिया के विदेशों में श्रम पर पाबंदियां सख्त कीं। इन उपायों के तहत नए वर्क परमिट जारी करने पर रोक लगी और देशों को विदेशों में आय अर्जित कर रहे उत्तर कोरियाई नागरिकों को दिसंबर 2019 तक वापस भेजना था।
इन पाबंदियों का मकसद उत्तर कोरिया के परमाणु और हथियार कार्यक्रमों के लिए उपलब्ध आय घटाना था। सुरक्षा परिषद के दोनों स्थायी सदस्य रूस और चीन ने इन उपायों के पक्ष में मतदान किया। दक्षिण कोरिया और पश्चिमी सरकारों ने बाद में दोनों देशों पर पाबंदियों का पालन न करने का आरोप लगाया।
कथित रूप से पाबंदियों से बचने के तरीके में छात्र नियुक्तियां अहम हैं, क्योंकि इनसे कारखाना कामगारों को शैक्षणिक पहचान मिल जाती है। GRC का तर्क है कि संगठित शिफ्ट और कारोबारों को कामगारों की टीमें उपलब्ध कराने वाले अनुबंधों समेत वास्तविक गतिविधियां पाबंदियों के दायरे में आने वाला रोजगार हैं।
2024 में रूस ने संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों के पैनल के कार्यादेश को बढ़ाने के खिलाफ वीटो देकर अंतरराष्ट्रीय निगरानी के माहौल को भी बदल दिया। यह पैनल 2009 से प्रतिबंधों के कार्यान्वयन पर नजर रख रहा था। उसी साल दक्षिण कोरिया, जापान और अमेरिका समेत 11 देशों ने MSMT बनाया, ताकि संयुक्त राष्ट्र के उस पैनल के बाहर प्रतिबंधों के उल्लंघन पर नजर रखी जा सके।
साझेदारी कैसे आगे बढ़ी
2022 में यूक्रेन पर रूस के पूर्ण पैमाने के आक्रमण के बाद उत्तर कोरिया के साथ सैन्य और आर्थिक सहयोग गहरा हुआ। GRC के मुताबिक, इस लेन-देन में प्योंगयांग ने हथियार और कर्मी दिए, जबकि मॉस्को ने नकदी और ईंधन मुहैया कराया।
दक्षिण कोरिया की खुफिया एजेंसी ने कहा कि उत्तर कोरिया ने 2024 से रूसी बलों के साथ लड़ने के लिए 10,000 से अधिक सैनिक भेजे हैं। अन्य रिपोर्टों में तैनात सैनिकों की संख्या 11,000 से 25,000 तक बताई गई है। ये सैन्यकर्मी रूसी कारखानों और खेतों में काम कर रहे नागरिक कामगारों के अनुमान से अलग हैं।
मुख्य पड़ाव दिखाते हैं कि श्रम से जुड़े आरोप कई वर्षों में बढ़े इस रिश्ते से कैसे जुड़े हैं:
- 2017: उत्तर कोरिया के छठे परमाणु परीक्षण के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने विदेशों में रोजगार पर पाबंदियां सख्त कीं।
- दिसंबर 2019: संयुक्त राष्ट्र के उपायों के तहत विदेशों में आय अर्जित कर रहे उत्तर कोरियाई नागरिकों को वापस भेजने की समय-सीमा पूरी हुई।
- 2022: रूस ने यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने का आक्रमण शुरू किया, जिसके बाद प्योंगयांग के साथ सहयोग और गहरा हुआ।
- 2023: रूस और उत्तर कोरिया के नेताओं ने एक शिखर सम्मेलन में नए सिरे से सहयोग का संकल्प लिया।
- 2024: व्लादिमीर पुतिन और किम जोंग उन ने पारस्परिक रक्षा प्रतिबद्धता वाली साझेदारी संधि पर हस्ताक्षर किए। रूस ने संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध पैनल के कार्यादेश के नवीनीकरण को भी रोक दिया।
- 2024 के अंत तक: MSMT ने अनुमान लगाया कि रूस में 15,000 से 30,000 उत्तर कोरियाई कामगार मौजूद थे।
इस संधि के तहत सशस्त्र संघर्ष की स्थिति में दोनों देशों को एक-दूसरे की मदद करनी होगी। श्रमिकों की भर्ती उस साझेदारी में आर्थिक पहलू जोड़ती है, जिसमें पहले से सैन्य आपूर्ति, सैनिकों की तैनाती और औपचारिक सुरक्षा प्रतिबद्धताएं शामिल हैं।
इनकार और अनुत्तरित सवाल
GRC ने नेटवर्क की अहम हस्तियों के रूप में पहचाने गए दो रूसियों से संपर्क किया। उनमें से एक ने जवाब दिया और आरोप से इनकार किया। संबंधित कारोबारों ने भी कहा कि उन्होंने रूसी कानून का पालन किया और रोजगार पाबंदियों से बचने के लिए छात्र दर्जे का इस्तेमाल करने के आरोप खारिज किए।
रूस के विदेश मंत्रालय और मॉस्को स्थित उत्तर कोरियाई दूतावास ने टिप्पणी के अनुरोधों का जवाब नहीं दिया। जांच में दस्तावेजों पर नियंत्रण और कार्यस्थलों के निरीक्षण के जरिए दूतावास की भागीदारी के आरोप लगाए गए हैं, जिससे उसकी भूमिका इस पूरे विवरण का अहम हिस्सा बन जाती है।
इस नेटवर्क के जरिए काम कर रहे उत्तर कोरियाई नागरिकों की मौजूदा सटीक संख्या, नियोक्ताओं की पूरी सूची और प्योंगयांग को भेजी गई कुल आय अब भी अज्ञात है। रूस में 15,000 से 30,000 कामगारों का अनुमान 2024 के अंत का है, जबकि 450 मिलियन से 800 मिलियन डॉलर की सालाना आय का अनुमान 12 देशों में विदेशों में काम करने वाले लोगों से जुड़ा है।
रूसी नियोक्ताओं के लिए, जांच ऐसे भर्ती तंत्र में संभावित भागीदारी उजागर करती है जो संयुक्त राष्ट्र की पाबंदियों के खिलाफ काम कर रहा है। उत्तर कोरियाई कामगारों के लिए यह कहीं अधिक तात्कालिक स्थितियों का ब्यौरा है: असाधारण रूप से लंबी शिफ्ट, दस्तावेजों पर नियंत्रण, सीमित संपर्क और राज्य द्वारा कमाई का बड़ा हिस्सा ले लिया जाना।
मुख्य बातें
- GRC ने रूस के एक नेटवर्क का पता लगाया, जो कारखानों और कृषि के लिए 50 से 100 उत्तर कोरियाई कामगारों की टीमों का विज्ञापन करता था।
- विज्ञापित कार्यक्रम के तहत 28 दिन तक रोज़ 12 घंटे काम करने का मतलब महीने में 336 घंटे काम करना है।
- जांचकर्ताओं को मॉस्को के पास सैन्य राशन बनाने वाली फैक्टरी और पालतू जानवरों का भोजन बनाने वाली कंपनी समेत कई जगहों पर काम के सबूत मिले।
- GRC का आरोप है कि छात्र वीजा के जरिए रोजगार छिपाया गया और कामगारों को दस्तावेजों पर नियंत्रण तथा उनके परिवारों को धमकियों का सामना करना पड़ा।
- दलाल प्रति कामगार 150,000 रूबल तक लेते थे, जबकि अनुमानों के मुताबिक कामगार अपनी कमाई का केवल छोटा हिस्सा रख पाते थे।
- कारोबारों ने रोजगार पाबंदियों से बचने के आरोपों से इनकार किया और कहा कि वे रूसी कानून का पालन करते हैं।
- संयुक्त राष्ट्र के उपायों के तहत विदेशों में आय अर्जित कर रहे उत्तर कोरियाई नागरिकों को दिसंबर 2019 तक वापस भेजना था।






