आखिरी पड़ाव के लिए बचाकर रखी यात्रा
तान ने 10 अक्टूबर को जियांग्सू प्रांत के वूशी से यात्रा शुरू की और 12 अक्टूबर को ल्हासा पहुंचे। इस तरह उन्होंने ट्रेन से वह सफर पूरा किया, जो उनके मुताबिक 43 घंटे चला। 94 वर्षीय सेवानिवृत्त रेलवे कर्मचारी ने स्मार्टफोन की मदद से खुद टिकट, होटल और घूमने-फिरने की व्यवस्था की थी। एक ट्रैवल एजेंसी ने उम्र के कारण उन्हें यात्रा पर ले जाने से मना कर दिया था।
विषय-सूची
- आखिरी पड़ाव के लिए बचाकर रखी यात्रा
- शिनजियांग के बाद तिब्बत क्यों
- व्यवस्था के लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल
- अकेले सफर में भी मिली मदद
- ल्हासा में मशहूर स्थलों से बढ़कर भी बहुत कुछ
- 16 अक्टूबर को पर्यटन कर्मचारी मदद के लिए पहुंचे
- पत्नी और बेटी घर पर क्यों रहीं
- यात्रा के जीवन से पहले रेलवे में करियर
- सेहत, रोजमर्रा की आदतें और अगली मंजिल
- मुख्य बातें
तिब्बत पहुंचने के साथ ही उनकी देशभर की यात्रा पूरी हुई, जो बीजिंग से शुरू हुई थी और उनके सफर के ब्योरों के मुताबिक चीन के सभी 34 प्रांतीय प्रशासनिक क्षेत्रों तक पहुंची। उन्होंने तिब्बत को आखिरी पड़ाव के लिए इसलिए बचाकर रखा था, क्योंकि उनके हिसाब से वहां जाना सबसे चुनौतीपूर्ण था।
ऑनलाइन उन्हें अक्सर 96 वर्षीय दादाजी तान के नाम से पेश किया जाता है, जबकि पूरे किए गए वर्षों के हिसाब से उनकी उम्र 94 साल है। अधिक उम्र का यह आंकड़ा वूशी में प्रचलित पारंपरिक आयु-गणना के मुताबिक है। तान ने ट्रेन यात्रा 43 घंटे की बताई, हालांकि इंटरनेट पर प्रसारित एक वीडियो के कैप्शन में इसे 48 घंटे का सफर कहा गया।
तान ने कहा कि ल्हासा पहुंचने के बाद उनकी तबीयत ठीक थी और उन्हें ऊंचाई की वजह से कोई परेशानी नहीं हुई। उन्होंने पोताला पैलेस और जोखांग मंदिर के आसपास के दर्शनीय स्थलों को देखा, शहर की बसों में सफर किया और बाद में ल्हासा के पर्यटन कर्मचारियों की मदद ली। कर्मचारी उन्हें तिब्बत संग्रहालय और नोरबुलिंगका भी ले गए।
उनकी यात्रा ने आत्मनिर्भरता के लिए लोगों की प्रशंसा बटोरी, लेकिन परिवार को इस बात पर तीखी टिप्पणियां भी झेलनी पड़ीं कि वे उनके साथ क्यों नहीं गए। तान ने बताया कि उनकी पत्नी 80 वर्ष से अधिक उम्र की हैं और बेटी 60 पार कर चुकी है। उन्होंने उनकी सेहत पर सफर के दबाव की चिंता के चलते भी अकेले जाने का फैसला किया।
इस व्यापक रूप से साझा की गई यात्रा के पीछे कई तरह की मदद दिखती है: तकनीक, जिसने उन्हें खुद व्यवस्था करने में सक्षम बनाया; वे अजनबी, जिन्होंने शारीरिक मुश्किलों में हाथ बंटाया; और स्थानीय कर्मचारी, जिन्होंने उनकी योजनाओं का सम्मान करते हुए सहायता दी।
शिनजियांग के बाद तिब्बत क्यों
तान की ल्हासा यात्रा से पहले एक और चुनौतीपूर्ण सफर था। सितंबर में वह शिनजियांग गए थे, फिर घर लौटकर करीब 20 दिन आराम किया और दोबारा रवाना हुए। लंबी ट्रेन यात्राएं उनके लिए नई नहीं थीं: युन्नान की एक पिछली यात्रा में उन्होंने ट्रेन पर करीब 40 घंटे बिताए थे।
उनके राष्ट्रीय यात्रा कार्यक्रम के शुरुआती 33 पड़ावों में रिश्तेदारों ने उनका साथ दिया था। तिब्बत जाने पर प्रतिक्रिया अलग थी। परिवार और दोस्तों ने लंबी यात्रा और ऊंचाई से होने वाली बीमारी के मेल की चिंता में उन्हें जाने से रोका। सफर के दौरान मिले एक ट्रेन कंडक्टर ने भी उनसे फिर विचार करने को कहा।
तान पहले किसी संगठित टूर में शामिल होना चाहते थे, लेकिन उम्र के कारण एक एजेंसी ने उन्हें मना कर दिया। इसके बाद उन्होंने सारी व्यवस्था खुद करने का फैसला किया। पिछली यात्राओं का अनुभव उनके आत्मविश्वास की वजह समझाता है, भले ही आसपास के लोग चिंतित थे।
उनकी हालिया यात्राओं के मुख्य पड़ाव इस तरह रहे:
- सितंबर: तान ने शिनजियांग की यात्रा पूरी की और फिर घर पर करीब 20 दिन आराम किया।
- 10 अक्टूबर: वह ल्हासा के लिए वूशी से रवाना हुए।
- 12 अक्टूबर: 43 घंटे की बताई गई यात्रा के बाद वह ल्हासा पहुंचे।
- 16 अक्टूबर: ल्हासा के पर्यटन कर्मचारी उनसे मिलने आए और उन्हें तिब्बत संग्रहालय तथा नोरबुलिंगका ले गए। उनके विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र संघ के एक प्रतिनिधि ने भी उनसे संपर्क किया।
व्यवस्था के लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल
तान ने चीन की रेलवे टिकट बुकिंग सेवा 12306 के जरिए ट्रेन का टिकट खरीदा और मोबाइल ऐप से होटल बुक किया। उन्होंने कार बुलाने के लिए भी ऐप का इस्तेमाल किया। ये काम उन्होंने खुद किए, परिवार ने पहले से उनकी ओर से व्यवस्था नहीं की थी।
उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल पिछले साल शुरू किया, जब उन्होंने अपनी बेटी को फोन पर सवाल पूछते देखा। जिज्ञासावश उन्होंने एक एआई असिस्टेंट डाउनलोड किया और यात्रा से जुड़ी जानकारी जुटाने के लिए उसका इस्तेमाल करना सीखा।
ल्हासा रवाना होने से पहले उन्होंने एआई असिस्टेंट से ऊंचाई, दर्शनीय स्थलों और मार्गों की जानकारी ली। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या उनकी उम्र का व्यक्ति यह यात्रा कर सकता है। टूल ने कोई पक्का जवाब नहीं दिया। एआई असिस्टेंट जानकारी व्यवस्थित कर सकता है और यात्रा कार्यक्रम सुझा सकता है; लेकिन किसी व्यक्ति का यात्रा के लिए स्वस्थ होना उसकी सेहत के आकलन पर निर्भर करता है।
तान की योजना बनाने की आदतें यात्रा के तौर-तरीकों में आए व्यावहारिक बदलाव को दिखाती हैं। उन्होंने याद किया कि पहले रेलवे टिकट खरीदने के लिए खिड़की पर कतार लगानी पड़ती थी, रहने की जगह अक्सर पहुंचने के बाद ढूंढी जाती थी और स्थानीय जानकारी के लिए होटल कर्मचारी मुख्य सहारा होते थे। अब उनका फोन घर से निकलने से पहले ही इनमें से कई काम करने देता है।
उनके लिए डिजिटल हुनर ने स्वतंत्र यात्रा को ठोस रूप से आसान बनाया है: वह कमरा बुक कर सकते हैं, रास्ता चुन सकते हैं और परिवहन की व्यवस्था कर सकते हैं, बिना हर कदम के लिए किसी और पर निर्भर हुए।
अकेले सफर में भी मिली मदद
तान ने ट्रेन में ऊपर की बर्थ बुक की थी। उसी डिब्बे में सफर कर रही एक युवती ने अपनी नीचे की बर्थ उनसे बदलने की पेशकश की और अंतर की रकम लेने से मना कर दिया। इससे उनके लिए सोने की जगह तक पहुंचना आसान हो गया।
ल्हासा रेलवे स्टेशन पर कर्मचारियों ने उन्हें व्हीलचेयर दी और ऐप से बुक की गई कारों के पिकअप क्षेत्र तक पहुंचने में मदद की। होटल के कर्मचारियों ने भी उनके यात्रा कार्यक्रम के बारे में पूछा और जानना चाहा कि क्या उन्हें किसी सहायता की जरूरत है।
तान की चलने-फिरने की क्षमता की एक खास सीमा है। उन्होंने बताया कि युवावस्था में उनके बाएं पैर की मांसपेशियां कमजोर होकर सिकुड़ गई थीं और पैर की कसरत के लिए उन्होंने कई साल साइकिल चलाई। उनकी स्थिति में सुधार हुआ, लेकिन सीढ़ियों वाली जगहों पर बिना सहारे या किसी दूसरे की मदद के उन्हें अब भी कठिनाई हो सकती है। वह छड़ी का इस्तेमाल भी करते हैं।
इन बातों से समझ आता है कि पूरी यात्रा के दौरान मदद क्यों जरूरी थी। वह योजना बना सकते थे, बुकिंग कर सकते थे और अपनी मंजिल चुन सकते थे, जबकि बर्थ, स्टेशन पर आने-जाने या सीढ़ियां चढ़ने में सहायता स्वीकार करते थे। कहीं-कहीं पहुंचने में मुश्किल होने के कारण वह कोई दर्शनीय स्थल नहीं देख पाए।
उनकी यात्रा में निजी आत्मनिर्भरता और व्यावहारिक मदद, दोनों शामिल थीं। बुकिंग का काम फोन ने किया; जहां भौतिक माहौल के कारण जरूरत पड़ी, वहां लोगों ने मदद की।
ल्हासा में मशहूर स्थलों से बढ़कर भी बहुत कुछ
तान ने पोताला पैलेस स्क्वायर, ज़ोंगजियाओ लुकांग पार्क, जोखांग मंदिर, तिब्बत संग्रहालय और नोरबुलिंगका देखा। उन्होंने ल्हासा नदी पर रात की सैर भी की और तस्वीरों के लिए तिब्बती पोशाक पहनी।
शहर की सड़कें भी उन्हें मशहूर पर्यटन स्थलों जितनी ही दिलचस्प लगीं। रोजमर्रा की जिंदगी देखने के लिए वह अलग-अलग मोहल्लों में बस और टैक्सी से घूमे; उनकी कोशिश सिर्फ एक पर्यटन स्थल से दूसरे तक जाने की नहीं थी।
तान ने अपनी यात्राओं में एक परिचित दिनचर्या बना ली है: शहर का इतिहास जानने के लिए संग्रहालय जाना, रात के बाजार घूमना, सार्वजनिक परिवहन से सफर करना और स्थानीय लोगों से बातचीत करना। इन चुनावों से उनके देशव्यापी यात्रा कार्यक्रम को सिर्फ जगहों की सूची पूरी करने से आगे का मकसद मिलता है।
सेवानिवृत्त रेलवे कर्मचारी तान ने बताया कि युवा यात्रियों से मिलने का उन पर क्या असर हुआ:
यह यात्रा बहुत आनंददायक रही। पोताला पैलेस में कई युवाओं से मुलाकात हुई और उनसे बातचीत करके मुझे बहुत खुशी हुई। मुझे खुद भी कम उम्र का महसूस हुआ।
ल्हासा के बारे में उनके ब्योरे में इन मुलाकातों के साथ-साथ दर्शनीय स्थलों के कर्मचारियों और स्थानीय निवासियों से मिली मदद का भी जिक्र था। स्मारकों के अलावा बातचीत और शहर में रोजमर्रा के सफर भी उनकी यात्रा का हिस्सा बने।
16 अक्टूबर को पर्यटन कर्मचारी मदद के लिए पहुंचे
ऑनलाइन उनकी कहानी पर ध्यान दिए जाने के बाद ल्हासा के संस्कृति और पर्यटन ब्यूरो ने तान से संपर्क किया। उनकी सहमति से कर्मचारी 16 अक्टूबर को दोपहर के समय उनके होटल पहुंचे, उनकी योजनाओं के बारे में पूछा और मदद की पेशकश की।
उन्होंने तिब्बत संग्रहालय और नोरबुलिंगका के लिए बुकिंग की व्यवस्था की और दोनों जगहों पर उनके साथ गए। इस दौरान तान ने प्रदर्शनियां देखीं और तस्वीरें खिंचवाईं। नोरबुलिंगका में तिब्बती पोशाक में ली गई तस्वीरें भी इनमें शामिल थीं।
कर्मचारियों ने उन्हें सजग और आसानी से बातचीत करने में सक्षम बताया। उन्होंने यह भी कहा कि तान बार-बार पूछते थे कि कहीं वे थक तो नहीं गए। आगे की योजना में उन्हें तिब्बती ओपेरा का कार्यक्रम दिखाने ले जाना भी शामिल था।
कर्मचारियों की यह मुलाकात तान के लिए मुश्किल समय पर हुई। परिवार से उन्हें पता चला था कि ऑनलाइन उनके परिजनों को अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ रहा है। वह इतने परेशान थे कि उस सुबह होटल से बाहर नहीं निकले। पर्यटन कर्मचारियों ने उन्हें भरोसा दिलाया और घूमना जारी रखने में मदद की, जिसके बाद उनका मन बेहतर हुआ।
पत्नी और बेटी घर पर क्यों रहीं
तान ने कहा कि परिवार के सदस्य अपनी उम्र और शारीरिक सीमाओं के कारण साथ नहीं गए। उनकी पत्नी 80 वर्ष से अधिक उम्र की हैं और बेटी 60 पार कर चुकी है। हाल ही में साथ में चोंगछिंग की यात्रा के दौरान उनकी बेटी की तबीयत सफर में खराब हो गई थी।
उस अनुभव का तिब्बत अकेले जाने के उनके फैसले पर असर पड़ा। उन्होंने कहा कि वह नहीं चाहते थे कि पत्नी और बेटी को उनके लिए फिर एक थकाऊ यात्रा करनी पड़े। उनकी यात्रा को लेकर परिवार की चिंता के साथ यह चिंता भी जुड़ी थी कि उनके साथ जाने के लिए उन्हें कितनी मशक्कत करनी पड़ेगी।
इसलिए परिवार पर ऑनलाइन की गई आलोचना से उन्हें दुख हुआ। कई लोगों ने उनके दृढ़ संकल्प की सराहना की, लेकिन कुछ ने सवाल उठाया कि रिश्तेदारों ने उन्हें अकेले यात्रा करने क्यों दिया और उन पर निजी हमले किए।
तान की सफाई में परिवार के तीनों सदस्यों की उम्र पर रोशनी पड़ती है। 60 से अधिक उम्र की बेटी की अपनी सेहत और शारीरिक क्षमता की सीमाएं हो सकती हैं, जबकि 80 से अधिक उम्र की पत्नी के लिए भी लंबा सफर चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इस परिवार के लिए साथ यात्रा करना पहले ही मुश्किल साबित हो चुका था।
यात्रा के जीवन से पहले रेलवे में करियर
तान के परिवार की जड़ें गुआंगदोंग के ताइशान में हैं और उनका जन्म तथा पालन-पोषण मलेशिया में हुआ। वह 19 साल की उम्र में चीन लौटे और 1954 में शंघाई जियाओतोंग विश्वविद्यालय में पांच वर्षीय कार्यक्रम के तहत वाहन निर्माण की पढ़ाई के लिए दाखिल हुए।
1959 में स्नातक होने के बाद उन्होंने नानजिंग पुजेन रेल वाहन कारखाने में काम किया, जो अब सीआरआरसी नानजिंग पुजेन है। वह 1988 में सेवानिवृत्त हुए और बाद में अपनी पत्नी के गृहनगर वूशी में बस गए। नौकरी के दौरान वह नियमित रूप से नानजिंग और वूशी के बीच यात्रा करते थे।
सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें उस रुचि की ओर लौटने का समय मिला, जो युवावस्था में उन्हें पसंद थी। नौकरी और परिवार की जिम्मेदारियों के चलते पहले यात्रा के लिए बहुत कम अवसर मिलते थे।
16 अक्टूबर को शंघाई जियाओतोंग विश्वविद्यालय के वूशी पूर्व छात्र संघ के सचिव यू ने तिब्बत में उनका हाल जानने और शुभकामनाएं देने के लिए उनसे संपर्क किया। तान ने कहा कि लोग उनका ध्यान रख रहे हैं और वूशी लौटने के बाद पूर्व छात्र संघ के प्रतिनिधियों को मिलने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने विश्वविद्यालय फिर से जाने की इच्छा भी जताई।
सेहत, रोजमर्रा की आदतें और अगली मंजिल
तान अपनी सेहत का कुछ श्रेय नियमित रूप से सक्रिय रहने और यात्रा करने को देते हैं। उन्होंने बताया कि वह आमतौर पर रात के खाने के बाद तीन से पांच किलोमीटर चलते हैं और पढ़ते या टीवी देखते समय कम से कम हर घंटे में एक बार उठते हैं। वह रोज अखबार पढ़ते हैं, नियमित दिनचर्या रखते हैं और संतुलित भोजन करने की कोशिश करते हैं।
ल्हासा में ठीक महसूस करने की उनकी बात यात्रा से पहले जताई गई चिंताओं के साथ देखी जानी चाहिए। ऊंचाई पर हवा का दबाव कम होने से हर सांस के साथ शरीर को कम ऑक्सीजन मिलती है और शरीर को वहां के अनुकूल होने में समय लगता है। अधिक उम्र के यात्रियों, खासकर हृदय रोग, उच्च रक्तचाप या अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों को रवाना होने से पहले अपनी योजना पर डॉक्टर से चर्चा करनी चाहिए।
तिब्बती पठार की यात्रा के लिए आराम, ऐसा यात्रा कार्यक्रम जिसे आसानी से पूरा किया जा सके और परिवार से संपर्क बनाए रखने की भरोसेमंद व्यवस्था व्यावहारिक तैयारी हैं। यात्रियों को मौसम की जानकारी लेनी चाहिए, उपयुक्त कपड़े साथ रखने चाहिए और तबीयत बिगड़ने पर चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए। तान की चलने-फिरने की कठिनाई के कारण सुलभ परिवहन और सीढ़ियों पर मदद विशेष रूप से उपयोगी रही।
ल्हासा के साथ देशभर में उनकी यात्रा का यह दौर पूरा हुआ, लेकिन तान पहले ही अन्य जगहों पर जाने के बारे में सोच रहे थे। वह पिंगलू नहर देखने के लिए गुआंग्शी जाना और शहर में आए बदलाव देखने के लिए हेफेई लौटना चाहते थे। दोनों यात्राओं की कोई तारीख नहीं बताई गई।
उनकी अगली योजनाएं उसी दिलचस्पी को आगे बढ़ाती हैं, जिसने ल्हासा में उनका समय तय किया: जगहों को खुद देखना, उनमें आए बदलावों को जानना और वहां रहने वाले लोगों से मिलना।
मुख्य बातें
- पूरे किए गए वर्षों के हिसाब से तान 94 साल के हैं, जबकि स्थानीय पारंपरिक आयु-गणना के मुताबिक उन्हें व्यापक रूप से 96 वर्ष का बताया जाता है।
- वह 10 अक्टूबर को वूशी से अकेले रवाना हुए और 12 अक्टूबर को ल्हासा पहुंचे। उन्होंने ट्रेन का सफर 43 घंटे का बताया।
- उन्होंने स्मार्टफोन से खुद परिवहन और रहने की व्यवस्था की तथा यात्रा कार्यक्रम की जानकारी जुटाने के लिए एआई असिस्टेंट का इस्तेमाल किया।
- एक सहयात्री, रेलवे कर्मचारियों, होटल स्टाफ और ल्हासा के पर्यटन कर्मचारियों ने सफर के दौरान उनकी मदद की।
- उन्होंने कहा कि उन्हें ऊंचाई से होने वाली बीमारी नहीं हुई, हालांकि पैर की समस्या के कारण कुछ सीढ़ियां चढ़ना मुश्किल था।
- तान ने कहा कि उनकी पत्नी और बेटी अपनी उम्र और लंबी यात्रा की थकान के कारण भी घर पर रहीं।
- तिब्बत में देशभर की यात्रा पूरी करने के बाद वह गुआंग्शी और हेफेई जाने की उम्मीद कर रहे थे।






