अब भी नमक से प्रभावित जमीन पर खेती की वापसी
बांग्लादेश के सुंदरबन के पास स्थित श्यामनगर में सरकारी कृषि कार्यालय के रिकॉर्ड में 71,000 किसान और 17,539 हेक्टेयर खेती योग्य भूमि दर्ज है। इसके आकलन में उत्पादन की पांच बाधाएं बताई गई हैं: लवणता, शुष्क मौसम में सिंचाई की कमी, मानसून में जलभराव, कर्मचारियों की अपर्याप्त संख्या और शीत भंडारण का अभाव। दशकों तक झींगा पालन के बाद फसल उत्पादन फिर शुरू करने की कोशिश कर रहे किसानों पर एक और दबाव है: बेचने लायक फसल आने से पहले बीज, उर्वरक और कीटनाशकों का खर्च उठाना।
विषय-सूची
- अब भी नमक से प्रभावित जमीन पर खेती की वापसी
- झींगा किसान क्यों बदल रहे हैं राह
- उत्पादन बढ़ना एकसमान बहाली का संकेत नहीं
- खेतों को उत्पादक बनाए रखने के लिए उधार
- रसायनों का इस्तेमाल और मिट्टी की घटती गुणवत्ता
- स्वास्थ्य जोखिमों के लिए बेहतर साक्ष्य और सुरक्षित इस्तेमाल जरूरी
- स्थानीय बीज संग्रह एक और रास्ता
- मीठे पानी की कमी अब भी सबसे बड़ी बाधा
- प्रशिक्षण खेती को घरेलू खाद्य सुरक्षा से जोड़ता है
- सरकारी उपाय और अब भी बाकी कमियां
- मुख्य बिंदु
श्यामनगर कृषि कार्यालय की प्रोफाइल में रोपाई वाले अमन धान, यानी मुख्य मानसूनी फसल, के तहत 16,850 हेक्टेयर भूमि और 125% फसल सघनता दर्ज है। यह माप अलग-अलग मौसमों में बोए गए कुल क्षेत्र की तुलना शुद्ध खेती क्षेत्र से करता है। इससे कुछ जमीन पर बार-बार खेती होने का संकेत मिलता है, न कि हर खेत में कई फसलें ली जाने का।
पिछले दशक से मीठे पानी की फसलें फिर उगाने की कोशिश कर रहे किसानों के लिए यह बदलाव आसान नहीं है। झींगा पालन के बाड़ों में लाया गया खारा नदी का पानी जमीन को खेती के लिए कठिन बना चुका है। किसानों का कहना है कि पैदावार बनाए रखने के लिए वे रासायनिक इनपुट की अधिक मात्रा इस्तेमाल करते हैं, फिर खर्च पूरा करने के लिए विक्रेताओं, बीज कंपनियों, साहूकारों और माइक्रोफाइनेंस संस्थानों से उधार लेते हैं।
देश के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में कृषि की बहाली के संकेत दिख रहे हैं। कुछ किसानों के घाटे वाले झींगा कारोबार छोड़ने के साथ धान, सब्जियों और फलों का उत्पादन बढ़ा है। लेकिन जिलों में उत्पादन बढ़ने का अर्थ यह नहीं कि हर गांव की मिट्टी, पेड़ या मीठे पानी तक पहुंच बहाल हो गई है। श्यामनगर में मुख्य सवाल यह है कि क्या फसलों की ओर यह वापसी कर्ज और पर्यावरणीय नुकसान बढ़ाए बिना आजीविका का सहारा बन सकती है।
झींगा किसान क्यों बदल रहे हैं राह
करीब चार दशक पहले दक्षिण-पश्चिमी तट पर व्यावसायिक झींगा पालन फैलने लगा था, क्योंकि बढ़ती लवणता से धान की खेती कठिन हो गई थी। खेतों में खारा पानी लाकर बंद बाड़ों में जमा करना शुरू में आय का एक विकल्प था। हाल के वर्षों में अत्यधिक लवणता, विषाणुजनित रोग और नुकसान ने कुछ किसानों को फिर खेती की ओर लौटने के लिए प्रेरित किया है।
श्यामनगर के किसान शेख सिराजुल इस्लाम ने दो दशक तक झींगा पालने के बाद फिर धान की खेती शुरू की। उन्होंने विषाणुजनित रोग फैलने के दौरान झींगा उत्पादन घटने और बाड़े के आसपास की जमीन में इतनी लवणता होने की बात बताई कि दूसरी फसलें नहीं उग सकती थीं। उनकी नई पद्धति में मानसून के दौरान धान और शुष्क मौसम में सब्जियां या फल उगाना शामिल है।
खुलना के डाकोप के किसान निर्मल गायेन ने भी नुकसान उठाने के बाद झींगा पालन छोड़कर धान और तरबूज की खेती शुरू की। अपने आखिरी झींगा निवेश को याद करते हुए उन्होंने कहा:
आखिरी बार जब मैंने झींगा पाला, तो लगाए गए 705 डॉलर (60,000 टका) में से केवल आधी रकम ही वापस मिल पाई। मुझे नुकसान हुआ क्योंकि विषाणुजनित रोग बार-बार मेरे झींगा फार्म पर हमला करते थे।
डाकोप में हुए एक अध्ययन में झींगा पालन की तुलना में धान और तरबूज की खेती से अधिक सकल लाभ और शुद्ध आय पाई गई। 2023 में Land Use Policy में प्रकाशित शोध में भी तटीय झींगा पालन क्षेत्रों में फसलों के विविधीकरण के बढ़ने की बात सामने आई। ये निष्कर्ष इस बदलाव का समर्थन करते हैं, हालांकि मीठे पानी की कमी अब भी किसानों के लिए खेती का क्षेत्र बढ़ाना सीमित करती है।
उत्पादन बढ़ना एकसमान बहाली का संकेत नहीं
कृषि विस्तार विभाग के जिन आंकड़ों का हवाला दिया गया है, उनके अनुसार 2018 से 2023 तक के पांच वित्तीय वर्षों में खुलना, बागेरहाट और सातखीरा में अमन धान का उत्पादन 11% से 14% तक बढ़ा। सब्जियों का उत्पादन करीब 50% बढ़ा, जबकि इन जिलों में तरबूज का उत्पादन छह से दस गुना तक बढ़ गया।
खुलना में फल उत्पादन 197% और सातखीरा में 114% बढ़ा। इसका अर्थ है कि उत्पादन क्रमशः पहले के स्तर से करीब 2.97 गुना और 2.14 गुना हो गया। किसान आम, नारियल, अमरूद और केले समेत व्यावसायिक फसलों की व्यापक किस्में उगा रहे थे।
झींगा उत्पादन के आंकड़े अलग जिलों के समूह के हैं, इसलिए उनकी तुलना फसलों के कुल उत्पादन से सीधे नहीं की जानी चाहिए। खुलना, पटुआखाली, भोला, बरगुना और नोआखाली में 2018 के वित्तीय वर्ष के करीब 30,000 टन उत्पादन से 2023 में समाप्त हुए 2022 के वित्तीय वर्ष तक झींगा उत्पादन 7% से अधिक घटा। झींगा पालन का क्षेत्र लगभग 5% सिकुड़ा। अकेले खुलना में उत्पादन 8% गिरा।
इसके बावजूद श्यामनगर के स्थानीय किसानों का कहना है कि उनके आसपास आम, जामुन, नींबू, नारियल, चीकू और जामरूल के पेड़ कम हो गए हैं। इसमें जरूरी नहीं कि विरोधाभास हो: किसी जिले में व्यावसायिक फल उत्पादन बढ़ सकता है, जबकि कुछ खास खारे गांवों में पुराने पेड़ नष्ट हो सकते हैं। आंकड़े उत्पादन मापते हैं, हर स्थानीय बाग या प्रजाति का जीवित रहना नहीं।
खेतों को उत्पादक बनाए रखने के लिए उधार
किसान बताते हैं कि कठिन मिट्टी की स्थिति में उर्वरक और कीटनाशकों पर अधिक खर्च करना पड़ता है, जबकि खेती के मौसम में नकदी की कमी उन्हें उधार लेने पर मजबूर करती है। उन्हें कई जगहों से कर्ज मिलता है, जिनमें कृषि इनपुट बेचने वाले कारोबार भी शामिल हैं। कुछ कर्ज पर ब्याज अधिक होता है और उसकी किस्तें पूरे साल चुकानी पड़ सकती हैं।
इस व्यवस्था में किसान के अगले मौसम की बुआई का फैसला पिछले मौसम की देनदारियों से जुड़ जाता है। खराब फसल से खेती की लागत और कर्ज, दोनों चुकाना मुश्किल हो सकता है। कृषि इनपुट विक्रेता से उधार लेने पर वही विक्रेता यह सलाह देने का सबसे सुलभ स्रोत भी बन सकता है कि क्या और कितनी मात्रा में खरीदना है।
कृषि कार्यालय की किसान श्रेणियों से पता चलता है कि कई परिवारों के पास नुकसान सहने की बहुत कम गुंजाइश है। कार्यालय के अनुसार 15,820 भूमिहीन, 20,925 सीमांत और 22,400 छोटे किसान हैं। इन समूहों में कुल 59,145 किसान हैं, यानी 71,000 किसानों का करीब 83.3%।
कार्यालय फसल कटने के बाद की एक समस्या भी बताता है: शीत भंडारण नहीं होने से किसान खराब होने के जोखिम के बजाय जल्दी खराब होने वाली उपज सस्ते में बेच सकते हैं। इसलिए उत्पादन बढ़ने से आय उसी अनुपात में अपने आप नहीं बढ़ती। फसल उगाने के लिए किसानों को पानी और उपयुक्त बीज चाहिए, लेकिन किफायती कर्ज और अपनी बिक्री की कीमत का बड़ा हिस्सा बचाए रखने का तरीका भी जरूरी है।
रसायनों का इस्तेमाल और मिट्टी की घटती गुणवत्ता
श्यामनगर की चिंताएं कृषि रसायनों के व्यापक बढ़ते इस्तेमाल का हिस्सा हैं। पर्यावरण विभाग के नाम से दिए गए आंकड़ों के अनुसार कीटनाशकों का आयात 1990 में 3,000 मीट्रिक टन था, जो 2021 में बढ़कर 45,000 टन से अधिक हो गया। यह पंद्रह गुने से भी ज्यादा वृद्धि है। हालांकि, आयात की मात्रा से यह पता नहीं चलता कि श्यामनगर में कितने रसायनों का इस्तेमाल हुआ या अलग-अलग उत्पाद कितने विषैले हैं।
2022 में मृदा संसाधन विकास संस्थान के नाम से दिए गए शोध में पाया गया कि बांग्लादेश की करीब 80% कृषि भूमि में जैविक पदार्थ घट रहे थे। जैविक पदार्थों में अपघटित पौधों और जानवरों की सामग्री शामिल है, जो मिट्टी में पानी और पोषक तत्व बनाए रखने में मदद करती है। इनका कम होना उत्पादक मिट्टी को फिर से बनाने को कठिन करता है, खासकर उन इलाकों में जहां लवणता और पानी की कमी पहले से ही फसल की वृद्धि रोकती है।
झेनाइदह और कुश्तिया के धान के खेतों में हुए अध्ययनों में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के लंबे समय तक संयुक्त इस्तेमाल के बाद मिट्टी में नाइट्रोजन और कार्बन घटने की बात सामने आई। ये निष्कर्ष उन्हीं अध्ययन स्थलों से जुड़े हैं, श्यामनगर के खेतों के प्रत्यक्ष माप नहीं हैं। फिर भी वे बताते हैं कि बार-बार रसायन खरीदकर पैदावार बनाए रखना मिट्टी की सेहत बहाल करने जैसा नहीं है।
किसानों का यह भी कहना है कि पक्षी, घोंघे, मेंढक, सांप और जुगनू कम हो गए हैं। खारा पानी, आवास में बदलाव और रसायनों का संपर्क, सभी चिंता के विषय हैं, लेकिन किसानों के अनुभवों से यह साबित नहीं होता कि इनमें से हर कारक का कितना योगदान रहा। व्यावहारिक फर्क अहम है: उर्वरक पोषक तत्व दे सकता है, लेकिन वह मीठे पानी के प्रबंधन की जगह नहीं ले सकता या जमा नमक हटा नहीं सकता।
स्वास्थ्य जोखिमों के लिए बेहतर साक्ष्य और सुरक्षित इस्तेमाल जरूरी
तटीय इलाके के किसानों का कहना है कि उन्हें बार-बार बीमारियां होती हैं और प्रजनन स्वास्थ्य, दृष्टि तथा हृदय संबंधी समस्याओं की चिंता है। महिलाओं और बच्चों को खास तौर पर कमजोर बताया जाता है। रिपोर्टों में रसायनों के संपर्क को कैंसर और अन्य बीमारियों से जोड़ने वाले अध्ययनों का भी उल्लेख है, लेकिन पेश किए गए साक्ष्य यह साबित नहीं करते कि श्यामनगर में किसी खास बीमारी का कारण क्या है।
दो अलग-अलग तरह के संपर्कों में फर्क करना जरूरी है: कृषि रसायनों के संपर्क और खारे पानी के लंबे समय तक संपर्क में रहना। Action Against Hunger के अनुसार खारे पानी में काम करने वाली महिलाओं को स्वास्थ्य समस्याएं हो रही हैं। यह कीटनाशक छिड़कने से होने वाले संपर्क जैसा नहीं है, और इनमें से कोई भी विवरण यह साबित नहीं करता कि खारी मिट्टी में उगी फसल खाने से बताई गई बीमारियां होती हैं।
कृषि विस्तार विभाग के नाम से दिए गए राष्ट्रीय आंकड़ों से कीटनाशकों के असुरक्षित इस्तेमाल का व्यापक संकेत मिलता है। बताया गया है कि करीब 77% किसान हर फसल मौसम में दो से अधिक बार कीटनाशक छिड़कते हैं और लगभग 95% छिड़काव तथा कटाई के बीच सुझाई गई अवधि का पालन नहीं करते। यह अवधि उपज इकट्ठा करने से पहले उसमें मौजूद रसायन अवशेष कम होने का समय देती है; इसकी अवधि उत्पाद और फसल पर निर्भर करती है।
राष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एवं अस्पताल के एक सर्वेक्षण के हवाले से बताया गया है कि सर्वे में शामिल कैंसर मरीजों में 64% किसान थे। यह अनुपात अकेले यह साबित नहीं कर सकता कि उनके कैंसर की वजह कीटनाशक थे, या दूसरे पेशों की तुलना में किसानों में कैंसर का जोखिम कितना है। सर्वे का दायरा और तुलना समूह स्पष्ट नहीं हैं। सबसे ठोस व्यावहारिक निष्कर्ष है सुरक्षित इस्तेमाल, उत्पादों के बारे में सटीक मार्गदर्शन और चिकित्सकीय जांच की जरूरत, न कि बीमारी के कारण को लेकर कोई व्यापक दावा।
स्थानीय बीज संग्रह एक और रास्ता
लवणता के कारण पारंपरिक फसलों की कुछ किस्में उगाना कठिन हो गया है, जबकि किसान तेजी से व्यावसायिक कंपनियों से बीज खरीद रहे हैं। किसान, जो पहले बीज बचाकर रखते और एक-दूसरे से साझा करते थे, अब हर साल बीज खरीदने की बात कहते हैं। इसके साथ उर्वरक और कीटनाशकों का खर्च भी जुड़ता है।
संकर बीज चुनिंदा मूल पौधों का संकरण कर बनाए जाते हैं। उनसे मिले बीज को बचाकर रखने पर अगली फसल में वही गुण भरोसेमंद ढंग से नहीं मिलते, जिससे बार-बार खरीदने की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि, सिर्फ संकर होने का मतलब यह नहीं कि किसी फसल को स्वाभाविक रूप से कीटनाशकों की जरूरत होगी। रसायनों की जरूरत किस्म, खेत की स्थिति, कीटों और खेती के तरीकों पर निर्भर करती है।
गैर-सरकारी शोध संगठन BARCIK के सहयोग से श्यामनगर के किसान स्थानीय किस्मों का संरक्षण कर रहे हैं और प्राकृतिक उर्वरकों, जैविक कीट उपचारों तथा कीट-जालों के साथ प्रयोग कर रहे हैं। जोगेश चंद्र मंडल का कहना है कि इसमें शामिल किसानों ने इन तरीकों से छोटे पैमाने पर स्थानीय किस्में उगाना शुरू कर दिया है।
कल्पना रानी मिस्त्री ने बीज बचाने और साझा करने वाली महिलाओं को संगठित करने में मदद की है। उनके संग्रह में 400 से अधिक स्थानीय किस्में हैं। कुलतली गांव में टुम्पा रानी मंडल अपनी और पट्टे पर ली हुई जमीन पर प्राकृतिक इनपुट के साथ धान और सब्जियां उगाती हैं। उनका कहना है कि उपज खरीदने के लिए नियमित ग्राहक उनसे संपर्क करते हैं। ये उदाहरण बताते हैं कि स्थानीय विकल्प काम कर रहे हैं, हालांकि इनके औसत उत्पादन, लागत या सभी 71,000 किसानों तक पहुंचने की क्षमता के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
मीठे पानी की कमी अब भी सबसे बड़ी बाधा
दक्षिण-पश्चिम में सतही पानी की लवणता फरवरी से अप्रैल के बीच सबसे ज्यादा होती है, जब शुष्क मौसम में उगाई जाने वाली फसलों को सिंचाई की जरूरत पड़ती है। किसान मानसून की बारिश पर काफी निर्भर हैं, जिसका पानी तालाबों और नहरों में जमा किया जाता है। कुछ किसान मानसून के बाद अस्थायी तटबंध बनाते हैं, ताकि नहरों को ज्वारीय नदियों से अलग किया जा सके और सिंचाई के पानी में खारा पानी आने से रोका जा सके।
श्यामनगर के किसान सिराजुल इस्लाम, जिन्होंने धान की खेती फिर शुरू की, ने इस तरीके की सीमाएं बताईं:
यहां गर्मियों में पानी की भारी कमी बनी रहती है। बारिश से भरे तालाबों और नहरों में जो थोड़ा-बहुत पानी बचता है, उससे हम बढ़ती फसलों की सिंचाई करते हैं। लेकिन कभी-कभी यह भी संभालना मुश्किल हो जाता है।
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के प्रोफेसर मोहम्मद शम्सुद्दुहा मानसून का पानी जमा करने के लिए नदियों और नहरों को बहाल करने या उनकी खुदाई करने की सिफारिश करते हैं। श्यामनगर कृषि कार्यालय भी नमक और सूखे को सहन करने वाली फसलों के साथ तालाब और छोटे तालाब खोदने को प्रोत्साहित करता है।
दूसरे तरीके जमा पानी को अधिक समय तक चलाने या पौधों का खारी जमीन से संपर्क कम करने के लिए अपनाए जाते हैं। मल्च मिट्टी को ढककर पानी के वाष्पीकरण को धीमा करता है। ड्रिप सिंचाई जड़ों के पास थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पानी पहुंचाती है। ऊंची क्यारियां, बोरियां और ऊंचाई पर रखे पात्र खेती के लिए अधिक सुविधाजनक जगह बना सकते हैं। ये तरीके कुछ खास बाधाओं से निपटते हैं, लेकिन इनकी सफलता पानी की उपलब्धता, उपयुक्त उगाने की सामग्री और रखरखाव पर निर्भर करती है।
प्रशिक्षण खेती को घरेलू खाद्य सुरक्षा से जोड़ता है
Action Against Hunger ने 2021 में सातखीरा में अपना कृषि कार्यक्रम शुरू किया। इसके सातखीरा कार्यक्रम के विवरण में खेती की कठिनाइयों को भूख से जोड़ा गया है और कंपोस्ट, फसल विविधीकरण, वर्षा जल भंडारण, मल्चिंग तथा ऊंची संरचनाओं पर खेती के प्रशिक्षण का उल्लेख है।
तटीय सातखीरा में तैनात Action Against Hunger की विशेषज्ञ खालिदा हुसैन मून ने मिट्टी की स्थिति, आय और पोषण के संबंध को समझाया:
मिट्टी में बहुत अधिक लवणता के कारण फसल उत्पादन बेहद कम है और कम आय वाले लोग खाना खरीदने में सक्षम नहीं हैं। इसलिए कई लोग कुपोषण से पीड़ित हैं, खासकर छोटे बच्चे।
जहां परिस्थितियां अनुकूल हों, वहां कार्यक्रम केवल धान पर निर्भर रहने के बजाय सूरजमुखी, भिंडी, पालक और मिर्च उगाने को बढ़ावा देता है। कार्यक्रम का कहना है कि फसल चक्र से एक ही फसल लगातार उगाने की तुलना में 10% अधिक पैदावार मिल सकती है, हालांकि इसे सातखीरा के हर भाग लेने वाले खेत का मापा हुआ नतीजा नहीं बताया गया है। फसल चक्र का मतलब अलग-अलग मौसमों में फसल बदलना है; विविधीकरण में कई फसलों का उत्पादन शामिल होता है।
कार्यक्रम में भाग लेने वाली रेखा घर के आसपास जमा बारिश के पानी, रसोई के कचरे से बने कंपोस्ट और पशुओं के गोबर से सब्जियां उगाती हैं। अब वह दूसरी महिलाओं को प्रशिक्षण देती हैं। संगठन का यह भी कहना है कि सिमुल बारिया के सभी परिवार सिलाई, पशुपालन, जलीय कृषि और छोटे कारोबार समेत आजीविका के कई काम करते हैं। विवरण में परिवारों की संख्या या आय में बदलाव के माप नहीं दिए गए हैं, लेकिन यह एक ही फसल पर निर्भरता घटाने की रणनीति बताता है।
सरकारी उपाय और अब भी बाकी कमियां
किसानों ने आपदाओं के जोखिम वाले तटीय इलाकों की कृषि के लिए अलग मंत्रालय या निदेशालय बनाने की मांग करते हुए अभियान चलाया है। उनका कहना है कि राज्य का ध्यान उनकी जरूरतों पर कम है। कृषि विस्तार विभाग का कहना है कि वह पहले से उपयुक्त फसल किस्मों, जैविक उर्वरकों, प्लास्टिक मल्चिंग, ड्रिप सिंचाई, हरी खाद और बोरियों व टावरों में खेती को समर्थन देता है। इसके स्थानीय कार्यालय की सूची में बागवानी प्रशिक्षण और सरकारी सब्सिडी के तहत मशीनों की खरीद भी शामिल है।
कीटनाशकों का नियमन भी प्रतिक्रिया का एक हिस्सा है। कीटनाशक अधिनियम, 2018 में पंजीकरण, जांच, निरीक्षण और जब्ती के प्रावधान हैं, और मोबाइल अदालतें कुछ अपराधों पर कार्रवाई कर सकती हैं। रिपोर्टों में कमजोर प्रवर्तन और बिक्री के समय अपर्याप्त मार्गदर्शन का उल्लेख है। कार्यक्रमों के विवरण से यह पता नहीं चलता कि श्यामनगर के कितने किसानों को सहायता मिलती है, कितना धन उपलब्ध है या प्रशिक्षण और निरीक्षण समस्या की सूचना देने वाले गांवों तक पहुंचते हैं या नहीं।
तिथियों से जुड़ी घटनाएं बताती हैं कि कृषि में बदलाव और बढ़ता पर्यावरणीय दबाव साथ-साथ हुए हैं:
- 1990 से 2021: देश में कीटनाशकों का आयात 3,000 से बढ़कर 45,000 मीट्रिक टन से अधिक होने की सूचना है।
- 2018: कीटनाशक अधिनियम ने रिपोर्टों में बताए मौजूदा नियामक ढांचे की स्थापना की।
- 2018 से 2023: कृषि आंकड़ों में तटीय जिलों के अलग-अलग समूहों में फसल उत्पादन बढ़ने और झींगा उत्पादन घटने का रिकॉर्ड है।
- 2021: Action Against Hunger ने सातखीरा में अपना कृषि कार्यक्रम शुरू किया।
- 2023: Land Use Policy के एक अध्ययन में तटीय इलाकों में फसल विविधीकरण और पर्यावरणीय दबाव का अध्ययन किया गया।
- मई 2024 से: Action Against Hunger ने बताया कि बांग्लादेश में चार बड़ी आपदाओं से 18.4 मिलियन लोग प्रभावित हुए हैं।
प्रस्तावित तटीय कृषि निकाय के लिए किसी फैसले या तय समयसीमा का उल्लेख नहीं है। अनसुलझा सवाल यह है कि मौजूदा उपाय किसानों तक कितने व्यापक रूप से पहुंचेंगे और क्या बेहतर जल भंडारण, मिट्टी प्रबंधन, बीजों तक पहुंच और रसायनों का सुरक्षित इस्तेमाल फसलों की ओर वापसी को आर्थिक रूप से टिकाऊ बना पाएंगे।
मुख्य बिंदु
- श्यामनगर कृषि कार्यालय के अनुसार यहां 71,000 किसान हैं; लवणता, सिंचाई की कमी और जलभराव बड़ी बाधाएं हैं।
- कुछ तटीय किसान रोग फैलने और वित्तीय नुकसान के बाद झींगा पालन छोड़ रहे हैं।
- कई जिलों में फसल उत्पादन बढ़ा है, लेकिन गांवों के बीच बहाली एकसमान नहीं है।
- कृषि इनपुट की खरीद और उधार, कम नकदी तथा सीमित जमीन वाले किसानों पर दबाव डालते हैं।
- BARCIK स्थानीय बीज संरक्षण और प्राकृतिक इनपुट से खेती को सहयोग देता है।
- वर्षा जल भंडारण, फसल विविधीकरण और मिट्टी प्रबंधन मौजूदा सहायता कार्यक्रमों के केंद्र में हैं।
- स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं की जांच जरूरी है, लेकिन मरीजों के बताए गए आंकड़े यह साबित नहीं करते कि खास कैंसर की वजह कीटनाशक थे।






