अंतिम विदाई और उनका काम जारी रखने का संकल्प
bdnews24.com के प्रधान संपादक और प्रबंध निदेशक तौफीक इमरोज़ खालिदी को शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को शाम करीब 5:00 बजे मीरपुर स्थित शहीद बुद्धिजीवी कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया। वह 59 वर्ष के थे। उनकी विदाई में परिवार के सदस्यों, पत्रकारों, राजनेताओं, शिक्षाविदों और सांस्कृतिक जगत की हस्तियों ने हिस्सा लिया। श्रद्धांजलियों में उनके बनाए स्वतंत्र न्यूज़रूम और उन मानकों पर जोर दिया गया, जिन्हें सहकर्मियों के मुताबिक अब उन्हें बनाए रखना होगा।
विषय-सूची
- अंतिम विदाई और उनका काम जारी रखने का संकल्प
- लंदन से न्यूज़रूम और घर तक
- सार्वजनिक जीवन की हस्तियों और परिवार की श्रद्धांजलि
- एक संस्था बनाने वाले संपादक को याद करते हुए
- प्रिंट से डिजिटल खबरों तक का सफर
- तेज़ी से पहले पुष्टि, पड़ताल के साथ निष्पक्षता
- रिपोर्ट हटाने का दबाव और स्वतंत्रता की सीमाएं
- सहकर्मियों और युवा पत्रकारों में निवेश
- दफ़न के बाद सांस्कृतिक योजनाएं और श्रद्धांजलियां
- मुख्य बातें
दफ़न से पहले दोपहर 3:30 बजे बनानी के ओल्ड डीओएचएस मैदान में जनाज़े की नमाज़ अदा की गई। खालिदी का 2 अक्टूबर को लंदन के सेंट बार्थोलोम्यू अस्पताल में निधन हो गया था। उन्हें मस्तिष्क में रक्तस्राव हुआ था, यानी मस्तिष्क के भीतर या उसके आसपास खून बहने लगा था। दफ़न वाले दिन सुबह करीब 11:00 बजे बिमान बांग्लादेश एयरलाइंस की उड़ान से उनका पार्थिव शरीर ढाका पहुंचा।
नमाज़ से पहले मुख्य समाचार संपादक जाहिदुल कबीर ने कार्यवाहक प्रधान संपादक बिस्वदीप दास का श्रद्धांजलि संदेश पढ़ा। संदेश में संपादक के निधन को उन लोगों की जिम्मेदारी से जोड़ा गया, जो उनका काम आगे बढ़ा रहे हैं।
खालिदी ने हमें सिखाया कि कठिन सवाल पूछें, दबाव में सिर न झुकाएं और सच को जनता के सामने लाएं, चाहे वह कितना ही असहज करने वाला क्यों न हो।
दास ने संगठन से अपेक्षित प्रतिबद्धता भी बताई:
उनके छोड़े आदर्शों और शुरू किए गए काम को आगे बढ़ाना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।
शोक जताने आए लोगों ने भी ऐसी ही इच्छा जाहिर की: bdnews24.com को खालिदी की बनाई राह पर आगे बढ़ना चाहिए। उनकी बातों से इस अपील का व्यावहारिक अर्थ सामने आया। उन्होंने तथ्यों की पुष्टि के नियमों, सटीक खबरें हटाने की मांगों का विरोध करने, पत्रकारों में निवेश करने और इस शुरुआती विश्वास को याद किया कि इंटरनेट के जरिये पहुंचाई गई खबरें बांग्लादेश के मीडिया को बदल देंगी।
लंदन से न्यूज़रूम और घर तक
खालिदी निजी यात्रा पर लंदन गए थे, जब 1 अक्टूबर की रात अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई। उन्हें सेंट बार्थोलोम्यू अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मस्तिष्क में रक्तस्राव की पुष्टि की। अगले दिन स्थानीय समयानुसार दोपहर 2:23 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।
8 अक्टूबर को दोपहर की नमाज़ के बाद पूर्वी लंदन की ब्रिक लेन मस्जिद में जनाज़े की नमाज़ अदा की गई। उनका पार्थिव शरीर स्वदेश लाए जाने से पहले पूर्व सहकर्मियों और स्थानीय बांग्लादेशी समुदाय के प्रतिनिधियों ने इसमें हिस्सा लिया।
ढाका में ताबूत को शाहजलाल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से bdnews24.com के कार्यालय ले जाया गया, जहां वह दोपहर से 12:20 बजे तक रखा रहा। इसके बाद उसे उनके निवास पर ले जाया गया, जहां परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों ने उन्हें आखिरी बार देखा। उनका पार्थिव शरीर करीब 2:30 बजे बनानी मैदान पहुंचा, जनाज़े की नमाज़ से एक घंटा पहले।
घटनाक्रम दो देशों में फैला रहा:
- 1 अक्टूबर: लंदन यात्रा के दौरान रात में खालिदी की तबीयत बिगड़ी।
- 2 अक्टूबर: स्थानीय समयानुसार दोपहर 2:23 बजे सेंट बार्थोलोम्यू अस्पताल में उनका निधन हुआ।
- 8 अक्टूबर: पूर्वी लंदन की ब्रिक लेन मस्जिद में जनाज़े की नमाज़ अदा की गई।
- 10 अक्टूबर: उनका पार्थिव शरीर ढाका पहुंचा, कार्यालय और घर ले जाया गया और बनानी में नमाज़ के बाद मीरपुर में दफ़नाया गया।
- 11 अक्टूबर: प्रगतिशील शिक्षक संगठनों के प्रतिनिधियों ने उनकी कब्र पर जाकर श्रद्धांजलि दी और दुआ की।
सार्वजनिक जीवन की हस्तियों और परिवार की श्रद्धांजलि
सहायक सैन्य सचिव ब्रिगेडियर जनरल मोहम्मद रईसुल इस्लाम ने राष्ट्रपति मिर्ज़ा फ़ख़रुल इस्लाम आलमगीर की ओर से पुष्पचक्र अर्पित किया। भारतीय उच्चायोग में राजनीतिक, प्रेस और सूचना मामलों के प्रथम सचिव गोकुल बिमल काला ने मिशन की ओर से श्रद्धांजलि दी।
स्थानीय सरकार, ग्रामीण विकास और सहकारिता मंत्री अब्दुल मोयीन खान ने रोज़मर्रा की घटनाओं की रिपोर्टिंग से परे खालिदी के योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों पर संपादक के विश्लेषण ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया था।
बांग्लादेश न्यूज़ 24 आवर्स लिमिटेड के निदेशक राद शरार खालिदी का बयान नमाज़ से पहले उनके चचेरे भाई तारफ़ खालिदी ने पढ़ा। परिवार का संदेश कार्यवाहक संपादक की श्रद्धांजलि के साथ विदाई का हिस्सा बना।
श्रद्धांजलि देने वालों में बांग्लादेश गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एंड एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष अनवर उल आलम चौधरी परवेज़, ढाका विश्वविद्यालय के कोषाध्यक्ष प्रोफेसर जहांगीर आलम चौधरी, और बीएनपी मीडिया सेल के सदस्य तथा शोमोयेर आलो के सलाहकार संपादक शायरुल कबीर खान भी शामिल थे। उनकी मौजूदगी में कारोबार, शिक्षा और राजनीति के प्रतिनिधि उन पत्रकारों के साथ आए, जिन्होंने खालिदी के साथ काम किया था।
एक संस्था बनाने वाले संपादक को याद करते हुए
द डेली स्टार के संपादक और प्रकाशक महफूज़ अनाम ने पत्रकार के तौर पर खालिदी के काम और मीडिया संगठन बनाने तथा उसे चलाने की उनकी उपलब्धि के बीच फर्क बताया। अंतिम संस्कार में उन्होंने कहा:
"हममें से कई लोगों ने अपनी ज़िंदगी पत्रकारिता को समर्पित की है। लेकिन उन्होंने bdnews24.com जैसी संस्था बनाई और उसे चलाया भी," अनाम ने कहा।
अनाम ने पेशेवर नैतिकता और संपादकीय स्वतंत्रता के प्रति संगठन की प्रतिबद्धता को बांग्लादेश के मीडिया में खालिदी के उल्लेखनीय योगदानों में से एक बताया। उन्होंने उन्हें साहसी और रचनात्मक व्यक्ति के तौर पर भी याद किया।
द डेली स्टार के परामर्श संपादक और वरिष्ठ पत्रकार कमाल अहमद ने bdnews24.com बनाते समय नई चुनौतियां स्वीकार करने की खालिदी की तत्परता को याद किया। खालिदी के मित्र न्यायमूर्ति अबू ताहेर मोहम्मद सैफुर रहमान ने उन्हें बुद्धिमान, प्रतिभाशाली और साहसी आवाज़ बताया।
जातीय प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष शौकत महमूद ने कहा कि खालिदी जिन पत्रकारों को आगे बढ़ाते थे, वे उनके आदर्शों को आगे ले जाएंगे। मुक्ति संग्राम के शोधकर्ता और स्तंभकार सालेक खोकोन ने उनकी मृत्यु को देश के लिए क्षति बताया और उन्हें कठिन समय में साहस दिखाने वाले संपादक के रूप में याद किया।
इन श्रद्धांजलियों में उनकी विरासत के दो पहलू सामने आए: उनके अपने फैसले और वे पत्रकार जिन्हें उनके बाद ऐसे ही फैसले लेने के लिए तैयार किया गया। इसलिए उनका काम जारी रखने का संकल्प संपादकीय नेतृत्व और न्यूज़रूम की रोज़मर्रा की कार्यशैली, दोनों से जुड़ा था।
प्रिंट से डिजिटल खबरों तक का सफर
खालिदी ने 1989 में संडे एक्सप्रेस से पत्रकारिता शुरू की। इसके बाद उन्होंने द डेली स्टार और द फाइनेंशियल एक्सप्रेस में काम किया। फिर वे बीबीसी वर्ल्ड सर्विस से जुड़े, जहां 2000 से 2005 तक काम किया। जुलाई 2006 में वह bdnews24.com के प्रधान संपादक और प्रबंध निदेशक बने।
पत्रकारिता में उनके 37 वर्षों में करीब दो दशक डिजिटल संगठन का नेतृत्व करते हुए बीते। इस कार्यकाल से पहले उन्हें अखबारों में रिपोर्टिंग और संपादन के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय प्रसारण का अनुभव था। पत्रकारिता के इन अलग-अलग रूपों को उन्होंने अपने नेतृत्व वाले न्यूज़रूम में जोड़ा।
पूर्व सहकर्मी आशीष चक्रवर्ती ने 2006 में खालिदी से मुलाकात को याद किया, जब संगठन की खेल टीम में शामिल होने को लेकर बातचीत हुई थी। खालिदी का मानना था कि ऑनलाइन खबरें धीरे-धीरे दैनिक अखबारों की जगह ले लेंगी। चक्रवर्ती की याद बताती है कि यह विश्वास काम में कैसे उतरा: क्रिकेट मैच के दौरान ही अपडेट प्रकाशित किए जाते थे, अगली सुबह के अखबार तक नहीं रोके जाते थे।
यह बदलाव केवल वही तैयार खबर किसी दूसरे मंच पर प्रकाशित करना नहीं था। इसके लिए पत्रकारों और संपादकों को जारी घटना पर काम करना, जानकारी की बार-बार जांच करना और उसे अपडेट करना पड़ता था। चक्रवर्ती ने याद किया कि उस समय, जब इंटरनेट की पहुंच बहुत कम थी, कुछ पत्रकारों को अब भी समझाना पड़ता था कि ऑनलाइन समाचार संगठन क्या होता है।
बांग्लादेश टेलीविजन के पूर्व उप महानिदेशक के. एम. हारून ने भी याद किया कि इंटरनेट की सीमित पहुंच के दौर में खालिदी ने प्रमुख पत्रकारों को एक साथ लाया था। उनकी श्रद्धांजलि में इस शुरुआती प्रयास से बांग्लादेश में डिजिटल पत्रकारिता के लिए बनी स्थायी नींव पर जोर था।
तेज़ी से पहले पुष्टि, पड़ताल के साथ निष्पक्षता
अपने संपादकीय दृष्टिकोण के बारे में खालिदी के बयानों में खबरों की सटीकता को न्यूज़रूम के काम का केंद्र बताया गया। 2021 में संगठन की 15वीं वर्षगांठ के कार्यक्रम में उन्होंने संवेदनशील जानकारी की कम से कम दो स्रोतों से पुष्टि करने और गुमनाम स्रोतों का सहारा लेने के बजाय स्रोतों के नाम बताने की कार्यशैली का जिक्र किया।
ये नियम दो अलग-अलग समस्याओं का समाधान करते हैं। दूसरे स्रोत से पुष्टि करने पर यह परखा जा सकता है कि दावा भरोसेमंद है या नहीं। जानकारी देने वाले व्यक्ति का नाम बताने से पाठक उसकी जानकारी, जिम्मेदारी और संभावित हितों का आकलन कर सकते हैं। खालिदी ने इन तरीकों को ऐसे मानकों के रूप में पेश किया, जिन्हें उनका संगठन बांग्लादेशी पत्रकारिता में स्थापित करना चाहता था।
2023 में 17वीं वर्षगांठ के कार्यक्रम में उन्होंने झूठी खबरों से बचने की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि कुछ मौकों पर न्यूज़रूम सच नहीं बता पाया और चुप रहा, लेकिन उसने इसके बजाय झूठ प्रकाशित करने का विकल्प नहीं चुना। ये संगठन के रिकॉर्ड के बारे में उनके अपने आकलन थे, न कि उसकी खबरों की स्वतंत्र जांच।
पूर्व सहकर्मी और अब आगामिर शोमोय के संपादक मुस्तफ़ा मामुन ने उस अनुशासन के एक और पहलू को याद किया: खबर का विषय बने व्यक्ति के साथ निष्पक्ष व्यवहार। उन्होंने कहा कि आरोपों के लिए पर्याप्त आधार होना चाहिए, जबकि प्रशंसा हद से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए। खबर से प्रभावित व्यक्ति को भी यह महसूस होना चाहिए कि उसके साथ निष्पक्ष व्यवहार हुआ है।
यह याद संपादकीय स्वतंत्रता को लेकर अंतिम संस्कार में दी गई श्रद्धांजलियों को ठोस आधार देती है। मामुन के अनुसार, बाहरी दबाव का विरोध करने से न्यूज़रूम की यह जिम्मेदारी खत्म नहीं होती कि वह दावे की सावधानी से पुष्टि करे और किसी व्यक्ति के बारे में लिखते समय संयम बरते।
रिपोर्ट हटाने का दबाव और स्वतंत्रता की सीमाएं
पूर्व वरिष्ठ समाचार संपादक मुनिरुल इस्लाम ने 6 जून 2018 की एक घटना को याद किया, जब प्रकाशित रिपोर्ट हटाने के लिए बार-बार दबाव डाला गया था। उनके मुताबिक, खालिदी ने पहले पूछा कि क्या रिपोर्ट में कोई गलती थी। जब उन्हें बताया गया कि गलती नहीं है, तो उन्होंने न्यूज़रूम को उसे न हटाने का निर्देश दिया।
यह फर्क मायने रखता है: उनके फैसले की वजह रिपोर्टिंग की सटीकता थी, न कि उसके खिलाफ मांग का दबाव। इस याद से यह नियम नहीं बनता कि गलतियों को कभी सुधारा न जाए। इसमें उस रिपोर्ट को वापस लेने से इनकार का जिक्र है, जिसे संपादक ने सही बताया था।
18 फरवरी 2021 को खालिदी ने कहा था कि संपादकों को रिपोर्ट हटाने की मांग करते हुए तीन दर्जन से अधिक कानूनी नोटिस मिले थे। बाद के विवरणों में यह भी कहा गया है कि भ्रष्टाचार निरोधक आयोग ने 5 सितंबर 2024 को ज्ञात आय से अधिक संपत्ति के आरोप वाला मामला वापस ले लिया था। यह बताया गया मामला वापस लिया जाना अदालत से बरी होने से अलग है; यहां किसी न्यायिक फैसले का जिक्र नहीं है।
खालिदी का यह भी तर्क था कि किसी मीडिया संगठन को सत्ता बदलने के राजनीतिक प्रयासों में शामिल नहीं होना चाहिए। उनकी चर्चाओं में मालिकाना हक, संपादकीय स्वतंत्रता और मीडिया को नियंत्रित करने तथा उसका नियमन करने के बीच के अंतर पर बात हुई। उन्होंने 2014 की राष्ट्रीय प्रसारण नीति और 2017 की राष्ट्रीय ऑनलाइन जनसंचार नीति का उल्लेख करते हुए इन चिंताओं को बांग्लादेश की नीतिगत बहसों से जोड़ा।
इन विचारों से उनकी समर्थित स्वतंत्रता का दायरा स्पष्ट होता है: ताकतवर लोगों की पड़ताल करने की आज़ादी, और साथ ही न्यूज़रूम को राजनीतिक गतिविधियों का साधन बनाने से बचने की सीमा।
सहकर्मियों और युवा पत्रकारों में निवेश
चक्रवर्ती ने bdnews24.com से जुड़ने की अपनी यादों में भर्ती का एक खास प्रस्ताव भी बताया। उनके अनुसार, खालिदी ने नए पत्रकारों को उनकी मौजूदा तनख्वाह के साथ मूल वेतन के बराबर 40 प्रतिशत अतिरिक्त राशि देने की पेशकश की थी। इसका मतलब कुल वेतन में ज़रूरी तौर पर 40 प्रतिशत बढ़ोतरी नहीं है, क्योंकि मूल वेतन मुआवज़े का केवल एक हिस्सा हो सकता है।
उन्हें यह भी याद था कि खालिदी सहकर्मियों पर भरोसा करते थे कि वे अपनी जिम्मेदारियां निभाएंगे और उन्होंने चक्रवर्ती से नए मीडिया का काम संभालने को कहा था। सेना समर्थित सरकार के दौरान राजनीतिक गिरफ्तारियों की कवरेज में अलग-अलग जगहों पर रिपोर्टर तैनात थे और फोन पर केंद्रीय डेस्क को जानकारी देते थे। फिर ये अपडेट वेबसाइट और मोबाइल पाठकों तक पहुंचते थे।
इन यादों से ऐसे संगठन की तस्वीर बनती है, जिसकी बुनियाद तकनीक के साथ-साथ समन्वित रिपोर्टिंग पर थी। घटनास्थल से पत्रकारों द्वारा जानकारी जुटाने और संपादकों द्वारा उसे तेजी से इस्तेमाल के लायक बनाने पर लाइव प्रकाशन निर्भर था।
युवा पत्रकारों में खालिदी की दिलचस्पी का एक ठोस उदाहरण हेलो था, बच्चों के लिए पत्रकारिता की वेबसाइट, जिसे 31 मार्च 2013 को शुरू किया गया था। वेबसाइट का नया संस्करण 31 मई 2022 को पेश किया गया। भविष्य के पत्रकारों को प्रशिक्षित करने की चर्चा में उन्होंने इस पहल का जिक्र किया था।
थिएटर निर्देशक मोहम्मद अली हैदर ने खालिदी को ऐसा व्यक्ति बताया, जिसे पत्रकारिता की दिशा का पहले से अंदाज़ा था और युवा लोगों के साथ काम करना पसंद था। यह आकलन अंतिम संस्कार में शौकत महमूद की उस श्रद्धांजलि से मेल खाता है, जिसमें उन्होंने उन पत्रकारों की पीढ़ी का जिक्र किया था जो उनके आदर्शों को आगे ले जाएगी।
दफ़न के बाद सांस्कृतिक योजनाएं और श्रद्धांजलियां
अभिनेता तारिक अनाम खान ने खालिदी की बेबाकी और साफगोई के साथ ऑनलाइन पत्रकारिता में उनकी भूमिका को याद किया। उन्होंने कहा कि पिछले दो-तीन महीनों में दोनों के बीच करीबी बढ़ी थी और वे एक-दूसरे के घर गए थे। खालिदी ने अभिनेत्री नीमा रहमान के साथ काम समेत सांस्कृतिक और मीडिया परियोजनाओं पर चर्चा की थी। उन्होंने एक यूट्यूब चैनल से जुड़े विचार भी साझा किए थे।
रहमान ने उनके जीवन के आखिरी आठ महीनों में साथ काम करने को याद किया। उनकी यादों में खालिदी की मेहमाननवाज़ी के साथ कार्यक्रम निर्माण पर उनका ध्यान भी शामिल था: वे छोटी-मोटी खामियां बताते और कार्यक्रमों को दर्शकों के लिए अधिक दिलचस्प बनाने के तरीके सुझाते थे। तारिक अनाम ने जिन परियोजनाओं का जिक्र किया था, उनके आगे बढ़ने के बारे में इन बयानों से पुष्टि नहीं होती।
विदाई में शामिल अन्य लोगों में ब्रैक के कार्यकारी निदेशक आसिफ सालेह, आगामिर शोमोय के कार्यकारी संपादक एहसानुल हक बाबू, बांग्लादेश फेडरल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के पूर्व अध्यक्ष उमर फारूक, स्तंभकार चिरंजन सरकार, बीबीसी पत्रकार कादिर कल्लोल, प्रोफेसर सदेका हलीम और मानवाधिकार कार्यकर्ता दिपायन खीसा शामिल थे।
रविवार दोपहर, 11 अक्टूबर को भी श्रद्धांजलि का सिलसिला जारी रहा। उस दिन बांग्लादेश पब्लिक यूनिवर्सिटी प्रोग्रेसिव टीचर्स सोसाइटी के नेताओं ने उनकी कब्र पर जाकर श्रद्धांजलि दी। वहां मौजूद लोगों में अध्यक्ष प्रोफेसर अहिदुज्जमान, महासचिव प्रोफेसर महबूबुर रहमान और संयुक्त महासचिव प्रोफेसर पूर्वा इस्लाम तथा प्रोफेसर मोनिरुज्जमान शाहीन शामिल थे। बांग्लादेश प्रोग्रेसिव टीचर्स सोसाइटी के अध्यक्ष शरीफ अहमद सादी और वरिष्ठ उपाध्यक्ष मोहम्मद अली चौधरी मानिक ने भी श्रद्धांजलि दी।
न्यूज़रूम के लिए सबसे स्पष्ट संकल्प वही है, जिसे जनाज़े की नमाज़ से पहले पढ़ा गया था: खालिदी के शुरू किए काम को जारी रखना। इन बयानों में उस संकल्प से जुड़े मानकों की पहचान की गई है, जिनमें पुष्टि, निष्पक्षता, संपादकीय स्वतंत्रता और अगली पीढ़ी में निवेश शामिल हैं। इन बयानों में स्थायी नेतृत्व नियुक्त करने की समय-सीमा या उनकी अधूरी सांस्कृतिक परियोजनाओं पर फैसलों की घोषणा नहीं की गई है।
मुख्य बातें
- 59 वर्षीय खालिदी को 10 अक्टूबर को बनानी में जनाज़े की नमाज़ के बाद मीरपुर में दफ़नाया गया।
- मस्तिष्क में रक्तस्राव के बाद 2 अक्टूबर को लंदन में उनका निधन हुआ।
- उन्होंने 1989 में पत्रकारिता शुरू की और जुलाई 2006 से bdnews24.com का नेतृत्व किया।
- सहकर्मियों ने तथ्यों की पुष्टि, निष्पक्ष व्यवहार और सटीक रिपोर्टों के खिलाफ दबाव का विरोध करने पर उनके जोर को याद किया।
- कार्यवाहक प्रधान संपादक बिस्वदीप दास ने उनके आदर्शों और काम को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।
- शिक्षक संगठनों ने 11 अक्टूबर को उनकी कब्र पर श्रद्धांजलि दी।






