5,285 लापता लोगों के परिवारों के लिए कानूनी बदलाव
नेपाल ने एक आपदा अध्यादेश जारी किया है, जिसका उद्देश्य परिवारों को 12 साल तक इंतजार करने के बजाय 45 दिनों के बाद मृत्यु की कानूनी मान्यता मांगने की अनुमति देना है। यह बदलाव 26 अगस्त, 2026 को भोटेकोशी और त्रिशूली में आई बाढ़ से तबाह हुए समुदायों की कई हफ्तों की अपील के बाद हुआ है। संशोधित आंकड़ों के अनुसार, अब भी 5,285 लोग लापता हैं।
विषय-सूची
- 5,285 लापता लोगों के परिवारों के लिए कानूनी बदलाव
- अंतिम संस्कार की रस्मों से आर्थिक सहायता नहीं मिली
- मौजूदा कानून वास्तव में क्या अनुमति देता है
- स्थानीय अपीलों से अध्यादेश तक का सफर
- पंजीकरण में एक से अधिक कानून शामिल हैं
- परिवारों को क्या मिल सकता है
- पहचान का काम अलग से जारी है
- बचाव अभियान खत्म होने से परिवारों में मतभेद
- पुनर्प्राप्ति की लागत और अनसुलझे फैसले
- मुख्य बातें
रसुवा, नुवाकोट और अन्य प्रभावित जिलों के परिवारों के लिए मृत्यु प्रमाणपत्र से यह तय हो सकता है कि उन्हें शोक-सहायता मिलेगी या नहीं, वे बीमा का दावा कर पाएंगे या नहीं, पेंशन का लाभ ले सकेंगे या संपत्ति हस्तांतरित कर पाएंगे। कुछ परिवार पवित्र कुश घास से प्रतीकात्मक शव बनाकर हिंदू अंतिम संस्कार पहले ही कर चुके हैं। फिर भी वार्ड कार्यालयों ने कहा कि पहचाने गए शव या किसी अन्य स्वीकृत कानूनी आधार के बिना उनके पास मृत्यु दर्ज करने का अधिकार नहीं था।
ताजा विवरण के अनुसार, अध्यादेश 10 अक्टूबर को जारी हुआ और इसकी पुष्टि राष्ट्रपति कार्यालय के प्रवक्ता कृष्ण बहादुर शाही ने की। एक अन्य रिपोर्ट में राष्ट्रपति की घोषणा की तारीख 9 अक्टूबर बताई गई है। दोनों रिपोर्टों में प्रतीक्षा अवधि घटाकर लगभग 45 दिन करने की बात है, लेकिन उनसे यह साबित नहीं होता कि हर लापता व्यक्ति को मृत घोषित कर दिया गया है या मृत्यु प्रमाणपत्र जारी हो चुके हैं।
इस सुधार को मौजूदा न्यायिक प्रक्रिया के संदर्भ में भी समझना जरूरी है। राष्ट्रीय नागरिक संहिता, 2017 की धारा 40(4) पहले से ही आपदा या दुर्घटना के मामलों में, जरूरी नहीं कि 12 साल इंतजार करने के बाद ही, न्यायिक रूप से मृत्यु घोषित करने की अनुमति देती है। तत्काल समस्या यह रही है कि शोकाकुल और विस्थापित परिवारों तथा स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, इतनी बड़ी आपदा में मान्यता पाने की प्रक्रिया बहुत जटिल है।
इसलिए अध्यादेश प्रतीक्षा अवधि के साथ-साथ प्रशासनिक बाधा को भी दूर करने का प्रयास करता है। इसका व्यावहारिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि पंजीकरण कार्यालय इसे कैसे लागू करते हैं, वे कौन-से सबूत मांगते हैं और उन परिवारों के मामलों को कैसे संभालते हैं जो अपने रिश्तेदारों को अब भी लापता के रूप में दर्ज रखना चाहते हैं।
अंतिम संस्कार की रस्मों से आर्थिक सहायता नहीं मिली
रसुवा के खल्टे के बाढ़-पीड़ित पूर्ण घले ने बताया कि उनका घर नष्ट हो गया और उनके पिता, बड़े बेटे, बहू, छोटे भाई, दो नातिनों और तीन दामादों समेत कई रिश्तेदार लापता हैं। उन्होंने कहा कि शव बरामद न होने और मृत्यु प्रमाणपत्र न मिलने के कारण उन्हें राहत नहीं मिल सकी और वे अपनी इच्छा के अनुसार अंतिम संस्कार की रस्में भी नहीं कर पाए।
घले ने बताया कि उनके लिए ये रस्में क्यों मायने रखती हैं:
कम से कम मैं अपने धर्म और परंपराओं के अनुसार रस्में करना चाहता हूं। शायद उनकी आत्माओं को शांति मिले।
जब शव बरामद न हो सके, तो कुश घास से परिवार धार्मिक रस्में कर सकते हैं। लेकिन इससे अपने-आप नागरिक पंजीकरण के लिए मृत्यु साबित नहीं होती। इस अंतर के चलते कुछ परिवार अपने धर्म के अनुसार शोक तो मना पाए, लेकिन लापता लोगों के आर्थिक और कानूनी मामलों का निपटारा नहीं कर सके।
नुवाकोट के अंगितार की साबित्री तामांग ने एक अलग मुश्किल बताई: वह रस्में करना चाहती थीं, लेकिन उनके पास खर्च उठाने के पैसे नहीं थे। उनके वार्ड कार्यालय ने कहा कि कानूनी जटिलताओं के कारण मृत्यु प्रमाणपत्र के बिना आर्थिक सहायता नहीं दी जा सकती।
तामांग ने उन परिवारों के बीच का फर्क बताया जो रस्मों का खर्च उठा पाए और जो नहीं उठा सके:
जिनके पास कुछ बचा था, वे रस्में पूरी कर चुके हैं। हमारे पास कुछ भी नहीं है।
मौजूदा कानून वास्तव में क्या अनुमति देता है
राष्ट्रीय नागरिक संहिता की धारा 40 में लगातार 12 साल तक अनुपस्थित रहने या कोई जानकारी न मिलने पर मृत्यु की सामान्य कानूनी धारणा का प्रावधान है, बशर्ते व्यक्ति के जीवित होने का सबूत न हो। इसमें अपवाद भी हैं। इसलिए यह कहना भ्रामक होगा कि बाढ़ के हर पीड़ित के मामले में 12 साल इंतजार करना अनिवार्य है।
धारा 40(4) के तहत, कोई संबंधित व्यक्ति अदालत से किसी व्यक्ति को मृत घोषित करने की मांग कर सकता है, यदि वह बिना कोई जानकारी दिए लापता हो गया हो या यह मानने का आधार हो कि उसकी मृत्यु किसी आपदा या दुर्घटना में हुई। अदालत अनुमानित मृत्यु की तारीख, स्थान, परिस्थितियों और आधार से जुड़े सबूतों की जांच करती है। दीवानी प्रक्रिया नियमावली, 2018 का नियम 60 आवेदन की प्रक्रिया बताता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता राजू खड्का ने बताया कि रिश्तेदार लापता व्यक्ति और घटना के बीच संबंध दर्शाने वाले सबूतों के साथ जिला अदालत में आवेदन कर सकते हैं। उपयोगी दस्तावेजों में पुलिस रिपोर्ट, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, यात्रा रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और फोन रिकॉर्ड शामिल हो सकते हैं। कौन-सा सबूत पर्याप्त माना जाएगा, यह हर मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
इसके बाद न्यायिक घोषणा संबंधित वार्ड कार्यालय में मृत्यु दर्ज कराने और संपत्ति या विरासत से जुड़ी आगे की प्रक्रियाओं का आधार बन सकती है। यदि व्यक्ति जीवित लौट आता है, तो इस घोषणा को रद्द किया जा सकता है। संपत्ति हस्तांतरण या अन्य लेनदेन से जुड़े किसी भी परिणाम का निपटारा संबंधित कानूनों के तहत करना होगा।
आपदा संबंधी प्रावधानों की व्याख्या रिपोर्टों में अलग-अलग है। संवैधानिक कानून विशेषज्ञ बिपिन अधिकारी ने कहा कि धारा 40 में इस बाढ़ जैसी आपदाओं के लिए कोई प्रावधान नहीं है। वहीं, धारा 40(4) के विवरण से मेल खाने वाली अन्य कानूनी व्याख्याएं आपदा और दुर्घटना के मामलों में पहले से उपलब्ध न्यायिक प्रक्रिया की ओर इशारा करती हैं। फर्क यह है कि अदालत से राहत पाने का रास्ता मौजूद है, लेकिन हजारों मामलों में स्थानीय कार्यालयों के इस्तेमाल के लिए एक सरल पंजीकरण प्रक्रिया नहीं है।
जिन परिवारों के घर, दस्तावेज और संभावित गवाह खो गए हैं, उनके लिए सबूत जुटाना और अदालत में अलग-अलग आवेदन देना अपने-आप में बड़ा बोझ हो सकता है। स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि हर परिवार को अकेले यह प्रक्रिया अपनाने देने के बजाय सरकार को उनके रिश्तेदारों की स्थिति स्थापित करने में मदद करनी चाहिए।
स्थानीय अपीलों से अध्यादेश तक का सफर
रसुवा और नुवाकोट की स्थानीय सरकारों ने 9 सितंबर को गृह मंत्रालय को पत्र लिखकर मृत्यु की पुष्टि और पंजीकरण के लिए वैकल्पिक व्यवस्था मांगी। धादिंग, गोरखा और अन्य प्रभावित जिलों के अधिकारियों ने भी यह मुद्दा उठाया। उनकी अपीलों में बीमा दावों और लापता लोगों की आधिकारिक मान्यता से जुड़ी मुश्किलों का जिक्र था।
उत्तरगया ग्रामीण नगरपालिका के अध्यक्ष माधव प्रसाद अर्याल ने कहा कि प्रतिनिधियों ने यह मुद्दा प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह, गृह मंत्री और अन्य मंत्रियों के सामने रखा। उन्होंने या तो मंत्रिमंडल के फैसले या तत्काल कानूनी संशोधन की मांग की। गृह मंत्रालय के प्रवक्ता आनंद काफ्ले ने बाद में कहा कि पत्र मिल चुके हैं और कानूनी मुद्दों पर चर्चा जारी है।
घटनाक्रम की खबरों से पता चलता है कि सरकार की प्रतिक्रिया चर्चा से कानूनी कार्रवाई तक कैसे पहुंची:
- 26 अगस्त, 2026: रसुवा, नुवाकोट और आसपास के इलाकों में बाढ़ आई।
- 9 सितंबर: रसुवा और नुवाकोट की स्थानीय सरकारों ने गृह मंत्रालय को अपना अनुरोध भेजा।
- 5 अक्टूबर: सरकार ने 40 दिन का खोज और बचाव अभियान समाप्त किया और पुनर्प्राप्ति तथा पुनर्निर्माण पर ध्यान देने की घोषणा की।
- 6 अक्टूबर: कानून मंत्रालय के अधिकारियों ने संसदीय विशेष समिति की बैठक में संशोधनों को तेजी से आगे बढ़ाने पर चर्चा की।
- 7 अक्टूबर: आपदा अध्यादेश की मंत्रिमंडलीय सिफारिश की खबर आई, जिसमें प्रतीक्षा अवधि लगभग 45 दिन करने का प्रस्ताव था।
- 9 या 10 अक्टूबर: खबरों में राष्ट्रपति की घोषणा या अध्यादेश जारी होने की तारीख अलग-अलग बताई गई।
मंत्रिमंडल की सिफारिश की घोषणा के समय सरकार के प्रवक्ता सस्मित पोखरेल ने प्रस्तावित बदलाव के बारे में कहा:
यह बदलाव काफी अहम है। 12 साल की अवधि घटाकर लगभग 45 दिन की जा रही है।
ताजा विवरण के अनुसार, यह अध्यादेश आपदा प्रबंधन से जुड़े नेपाल के कई कानूनों, 2083 बीएस, में संशोधन करता है और लागू होगा। भूमि और वन से जुड़े अलग प्रस्तावित अध्यादेश राष्ट्रपति के विचाराधीन रहे।
पंजीकरण में एक से अधिक कानून शामिल हैं
कानून, न्याय तथा संसदीय कार्य मंत्रालय ने आपदा जोखिम न्यूनीकरण तथा प्रबंधन अधिनियम और राष्ट्रीय पहचान पत्र तथा पंजीकरण अधिनियम को संशोधन की प्राथमिकता बताया। संयुक्त सचिव सुभाष कुमार भट्टराई ने कहा कि मंत्रालय आपदा पीड़ितों की कानूनी स्थिति और मृत्यु पंजीकरण के समाधान के लिए गृह मंत्रालय के साथ समन्वय कर रहा है।
भट्टराई ने संसदीय समिति को बताया कि बदलावों पर काम शुरू हो गया है:
लापता नागरिकों की मृत्यु घोषित करने और पंजीकृत करने के लिए मौजूदा कानूनी प्रावधान फिलहाल पर्याप्त नहीं हैं, इसलिए गृह मंत्रालय के समन्वय से संबंधित अधिनियमों में संशोधन की प्रक्रिया शुरू हो गई है।
कानून मंत्री सोबिता गौतम ने भी कहा कि उनका मंत्रालय राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण तथा प्रबंधन प्राधिकरण के साथ मृत्यु की घोषणा और पंजीकरण पर चर्चा कर रहा है। उन्होंने नागरिक संहिता और पंजीकरण कानूनों को कानूनी ढांचे के प्रासंगिक हिस्से बताया।
इन चर्चाओं में दो अलग-अलग कदम शामिल हैं: यह स्थापित करना कि किसी व्यक्ति की कानूनी रूप से मृत्यु हो चुकी है और उस मृत्यु को नागरिक पंजीकरण प्रणाली में दर्ज करना। परिवारों को प्रमाणपत्र दिलाने के लिए प्रतीक्षा अवधि घटाने के साथ वार्ड कार्यालयों के लिए व्यावहारिक प्रक्रिया भी जरूरी है।
अधिकारियों ने उन मामलों का भी जिक्र किया है जिनमें पीड़ित अपने गृह जिले से बाहर लापता हुए या पूरा परिवार गायब हो गया। नुवाकोट के मुख्य जिला अधिकारी शंभू प्रसाद रेग्मी ने कहा कि जब रिपोर्ट करने के लिए परिवार का कोई निकट सदस्य न बचा हो, तो किसकी जानकारी को आधिकारिक माना जाए, यह स्पष्ट नहीं है। प्रतीक्षा अवधि बदलने के बाद भी इन सवालों के प्रशासनिक जवाब जरूरी होंगे।
परिवारों को क्या मिल सकता है
राहत नीति की खबरों के अनुसार, परिवार में बाढ़ से हुई पहली मृत्यु पर 200,000 रुपये और उसी परिवार में हर अतिरिक्त मृत्यु पर 100,000 रुपये दिए जाते हैं। अंतिम संस्कार सहायता अधिकतम 25,000 रुपये बताई गई है। एक विवरण में पहली सहायता लगभग 200,005 रुपये दी गई है, जो अन्य जगह बताए गए 200,000 रुपये से थोड़ा अलग है।
200,000 और 100,000 रुपये के आंकड़ों के आधार पर, पांच मान्यता प्राप्त मौतों वाले परिवार को अंतिम संस्कार के लिए अलग से मिलने वाली सहायता से पहले, शोक-सहायता के रूप में 600,000 रुपये मिल सकते हैं। यह गणना बताती है कि पंजीकरण क्यों महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे किसी खास परिवार की पात्रता या भुगतान की स्थिति साबित नहीं होती।
ये रकम पिछली आपदा में मिली सहायता से भी अलग है। घले ने बताया कि 2015 के भूकंप के बाद सरकार ने अंतिम संस्कार के लिए प्रति पीड़ित 40,000 रुपये और इसके अलावा 100,000 रुपये की राहत दी थी। ये उनके अनुसार पिछली सहायता की रकम हैं, मौजूदा बाढ़ राहत नीति की नहीं।
मृत्यु पंजीकरण का असर पेंशन, सामाजिक सुरक्षा, बीमा, विधवा होने की आधिकारिक मान्यता और चल-अचल संपत्ति के स्वामित्व पर भी पड़ता है। लापता सेना और पुलिस कर्मियों के परिवारों को भी पेंशन और बीमा में ऐसी ही मुश्किलें आती हैं। एक रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि अगर एक साल के भीतर बीमा दावा दाखिल न किया जाए तो उसे हासिल करना मुश्किल हो सकता है, हालांकि पॉलिसी की शर्तें और लागू आवश्यकताएं अलग-अलग हो सकती हैं।
पहचान का काम अलग से जारी है
बाढ़ के बाद के हफ्तों में हताहतों के आंकड़े बदलते रहे। पहले के एक विवरण में 1,397 शव बरामद होने और 5,130 लोगों का कोई पता न चलने की बात थी। 18 सितंबर के एक विवरण में राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण तथा प्रबंधन प्राधिकरण के हवाले से 1,403 शव बरामद होने और 105 शव परिवारों को सौंपे जाने के आंकड़े दिए गए।
बाद के आंकड़ों में लापता लोगों की कुल संख्या 5,285 बताई गई। एक विवरण में प्राधिकरण के हवाले से कम से कम 1,455 मौतों की बात कही गई, जबकि दूसरे में 1,455 शव बरामद होने का जिक्र था। बाद की एक रिपोर्ट के अनुसार, 112 शवों की पहचान कर उन्हें परिवारों को सौंपा गया। ये आंकड़े अलग-अलग समय की रिपोर्टिंग से जुड़े हैं और कभी-कभी अलग श्रेणियों का इस्तेमाल करते हैं, इसलिए इन्हें एक-दूसरे के स्थान पर नहीं समझना चाहिए।
एक रिपोर्ट में दिए गए आंकड़े के अनुसार, पुलिस ने 3,139 डीएनए नमूने जुटाए थे: 1,286 शवों और अवशेषों से तथा 1,853 लापता लोगों के रिश्तेदारों से। डीएनए पहचान में अवशेषों से मिले आनुवंशिक पदार्थ की तुलना रिश्तेदारों के नमूनों से की जाती है, ताकि पहचान स्थापित करने में मदद मिले। नमूना लेना और उसका मिलान पूरा होना अलग-अलग बातें हैं।
जापान की अंतरराष्ट्रीय सहयोग एजेंसी ने नेपाल पुलिस की केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला को ऐसे निष्कर्षण किट दिए, जिनसे 480 नमूनों तक की जांच हो सकती है। जापान के राजदूत माएदा तोरू ने महाराजगंज स्थित नेपाल पुलिस अकादमी में विज्ञान, प्रौद्योगिकी तथा नवाचार मंत्री महाबीर पुन को ये किट सौंपे। यह सहायता नेपाल के विदेश मंत्रालय और प्रयोगशाला के अनुरोध के बाद दी गई।
कानूनी मान्यता से परिवार शव बरामद हुए बिना भी जरूरी मामलों का निपटारा कर सकते हैं। फोरेंसिक पहचान का उद्देश्य अलग है: यह पता लगाना कि बरामद अवशेष किसके हैं और जहां संभव हो, उन्हें रिश्तेदारों को सौंपना।
बचाव अभियान खत्म होने से परिवारों में मतभेद
सरकार ने 5 अक्टूबर को मुख्य खोज और बचाव अभियान समाप्त कर दिया और पुनर्वास तथा पुनर्निर्माण पर ध्यान देना शुरू किया। राष्ट्रीय आपातकालीन संचालन केंद्र के प्रमुख फणींद्र पौडेल ने कहा कि अभियान खोज और पुनर्निर्माण के चरण में जा रहा है। इससे संकेत मिलता है कि बचाव कार्य समाप्त होने का मतलब यह जरूरी नहीं कि अवशेष ढूंढ़ने के सभी प्रयास रुक जाएंगे।
परिवारों ने बेहतर खोज अभियान की मांग को लेकर प्रदर्शन और जागरण किए थे। पहले हुए बचाव से उम्मीद बनी रही: 4 सितंबर को त्रिशूली जलविद्युत परियोजना की सुरंग में नेपाल के दो श्रमिक मिले, और दो दिन बाद एक चीनी व्यक्ति मिला।
नदी किनारे बसे कस्बों में अपने पति को ढूंढ़ रहीं और बरामद शवों की तस्वीरें देख रहीं उषा खत्री, ठोस सबूत के बिना उन्हें मृत घोषित करने के खिलाफ थीं:
या तो उन्हें शव देना होगा या कोई ठोस सबूत दिखाना होगा कि मेरे पति नहीं रहे। उसके बाद ही उन्हें मृत घोषित किया जा सकता है।
परिवार के पांच सदस्यों को खोने वाले निराजन पौडेल ने दूसरी राय जाहिर की:
इतने दिन और हफ्ते बीतने के बाद किसी के जीवित मिलने की उम्मीद बहुत कम या नहीं के बराबर है। हमें यकीन है कि हमारे परिवार का कोई भी सदस्य नहीं बचा है और हम बस इस पीड़ा का अंत चाहते हैं।
लापता लोगों में विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। रसुवा में अपर त्रिशूली 1 निर्माण स्थल पर दक्षिण कोरिया के नौ कर्मचारियों की तलाश की जा रही थी। कर्मचारियों की कमी के कारण दशैं के आसपास कंपनी की खोज का दायरा घटने की उम्मीद थी, हालांकि भारी मशीनों से कुछ खुदाई जारी रह सकती थी। अध्यादेश हर परिवार की शव, पहचान या पूरी घटना का विवरण पाने की जरूरत पूरी नहीं करता।
पुनर्प्राप्ति की लागत और अनसुलझे फैसले
नेपाल के नुकसान के आकलन में 7,570 निजी इमारतें क्षतिग्रस्त या नष्ट हुईं और करीब 33,000 लोग प्रभावित हुए। बिदुर नगरपालिका ने 3,000 से अधिक इमारतों को नुकसान पहुंचने का अनुमान लगाया। हजारों विस्थापित लोग 37 अस्थायी केंद्रों में रह रहे थे, जहां पीने के पानी, स्वच्छता और बीमारी के जोखिम ने तत्काल जरूरतें और बढ़ा दी थीं।
सरकार ने पुनर्निर्माण की लागत 723 अरब रुपये आंकी। अन्य विवरणों में पुनर्प्राप्ति और पुनर्निर्माण की लागत लगभग 4.77 अरब डॉलर या 3.6 अरब पाउंड तक बताई गई। ये अलग-अलग मुद्राओं में दिए गए अनुमान हैं, इन्हें जोड़कर अलग-अलग बिल नहीं मानना चाहिए।
अक्टूबर में संसदीय चर्चाओं में अधिक सुरक्षित पुनर्निर्माण, लापता लोगों के परिवारों के लिए कानूनी और आर्थिक सहायता, रिश्तेदारों को खो चुके बच्चों की सुरक्षा और अधिक भरोसेमंद बाढ़ चेतावनी प्रणालियों पर भी चर्चा हुई। सांसदों ने सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण से पहले कई जोखिमों का आकलन करने और जहां संभव हो, नदी किनारे निर्माण के विकल्प तलाशने की मांग की।
पिछली आपदाएं सरकारी कार्रवाई का उदाहरण देती हैं। 2 अगस्त, 2014 को सिंधुपालचोक के जुरे में भूस्खलन के बाद 145 लोग लापता बताए गए थे और केवल 33 शव बरामद हुए थे। बाद में सरकार ने बाकी लापता लोगों को मृत घोषित कर दिया। 2015 के भूकंप के बाद भी करीब 198 लोग लापता बताए गए थे।
तत्काल अनसुलझा मुद्दा नए अध्यादेश का क्रियान्वयन है। रिपोर्टों में आवेदन के लिए पूरी चेकलिस्ट, हर मामले का सत्यापन कौन करेगा, मान्यता के लिए परिवार का अनुरोध जरूरी होगा या नहीं, या अंतर-जिला और विदेशी नागरिकों के मामलों को कैसे संभाला जाएगा, इसकी जानकारी नहीं है। यह भी स्पष्ट तारीख नहीं दी गई है कि वार्ड कार्यालय प्रमाणपत्र जारी करना कब शुरू करेंगे। प्रतीक्षा अवधि घटाना ठोस बदलाव है, लेकिन वित्तीय सहायता मिलने या कानूनी अधिकार तय होने से पहले परिवारों को पंजीकरण संबंधी फैसले चाहिए होंगे।
मुख्य बातें
- नेपाल ने आपदा में मृत्यु घोषित करने की प्रतीक्षा अवधि घटाकर 45 दिन करने का अध्यादेश जारी किया है।
- संशोधित आंकड़ों के अनुसार, 26 अगस्त, 2026 की बाढ़ के बाद 5,285 लोग अब भी लापता हैं।
- धारा 40(4) में आपदा और दुर्घटना के मामलों में बिना अनिवार्य 12 साल इंतजार किए अदालत जाने का रास्ता पहले से मौजूद है।
- बताई गई शोक-सहायता, बीमा दावों, पेंशन और संपत्ति संबंधी प्रक्रियाओं के लिए मृत्यु प्रमाणपत्र जरूरी हैं।
- डीएनए से पहचान का काम मृत्यु की कानूनी मान्यता से अलग जारी है।
- रिपोर्टों में राष्ट्रपति की घोषणा या अध्यादेश जारी होने की तारीख 9 या 10 अक्टूबर बताई गई है।
- रिपोर्टों में पंजीकरण की विस्तृत आवश्यकताएं और क्रियान्वयन की निश्चित समय-सीमा तय नहीं की गई है।






